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शनिवार, 21 मई 2016

बच्चों जैसा उतावलापन था ! लाइसेंस लेते वक्त !


मेरी यादों की गुल्लक में आज भी सालों पुराने ड्राफ्ट ताज़ा हैं. जैसे कल की बात हो जब ड्राइविंग लाइसेंस 
मिलने पर सबने दावत माँगी थी. दुबई में लाइसेंस मिलना आसान नहीं और मिल जाए तो फिर ड्राइविंग 
स्कूल में भी मिठाई बाँटनी पड़ती है. दस साल पहले तुकबन्दी की थी जो आज साझा करने को जी चाहा. 

मुझे रात दिन ये ख्याल है
लाइसेंस मुझको मिलेगा कब

मुझे रात दिन ये ख्याल है
लाइसेंस मुझको मिलेगा जब

दिन रात नाचूँगी मै तो तब
लाइसेंस मुझको मिलेगा जब

टेस्टों का ज़ालिम ये सफ़र
कहीं कर न डाले दर बदर

मुझे रात दिन ये ख्याल है
लाइसेंस मुझको मिलेगा कब

मुझे रात दिन ये ख्याल है
कैसे सँभालूँ मै दिल को अब

बिलाहासा हँसता रुलाता है
ट्रैनिंग को जब भी मैं जाती हूँ 

टीचर के संग ड्राइवर के संग
रिश्ते अनोखे बने है अब

एग्ज़ामिनर हमारे अजूबे है
हँसना उन्हे आता है कब

हथकन्डे वो अपनाते है जब
नर्वस सभी हो जाते है तब

 पिया को कहूँगी मैं तो तब
प्यारी 'पैजो' दिला दो अब

प्यारी 'परैडो' दिला दो अब
लाइसेंस मुझको मिला है अब

मुझे रात दिन ये ख्याल है
सब कुछ अभी भी याद है ! 



रविवार, 28 अगस्त 2011

कुछ तकनीकी अज्ञान और कुछ मन की भटकन ....(साँसों का पैमाना)

कल की पोस्ट करते वक्त कुछ तकनीकी अज्ञान और कुछ मन की भटकन .... 
सब मिल कर गडमड हो गया.... 

अपने एक परिचित मित्र के मित्रों की दास्ताँ ने मन बेचैन कर दिया... 

लड़की 24-25 साल की है .....
28 साल के पति के साथ सालों की दोस्ती के बाद अभी छह महीने ही हुए थे शादी को...  
मस्ती करने गए थे समुन्दर में.... जो महँगी पड़ गई..... 
लड़की के पति बोट के किनारे पर बैठे अपना संतुलन खो बैठे और पीछे की तरफ़ गिर गए .... 
मित्रों ने फौरन निकाल लिया लेकिन रीढ़ की हड्डी को बहुत नुक्सान पहुँचा ......
अस्पताल में इलाज चलते पता चला कि वेजीटेबल स्टेट में हैं... 
लाइफ स्पोर्ट के यंत्र बस निकालने का फैंसला करना है......... 
लड़की अपने मन के भावों को संयत करती हुई बात करती है ... 
लेकिन जाने मन में कैसे कैसे झंझावात चल रहे होगे......!!!  

ऐसे हादसे अतीत की कड़वी यादों में ले जाते हैं..... 
मन अशांत हो जाता है....
मन अशांत हो तो जीवन ढोने जैसा लगता है....
समझो तो जीवन बुलबुले जैसा हल्का और क्षणभुंगुर भी लगता है ..... 

माँ से बात होती है तो मन बच्चे जैसा फिर से सँभलने लगता है .... 
बच्चा सा बन कर पल में रोते रोते फिर से हँसने लगता है.... 

अपनी ही लिखी हुई कुछ पंक्तियों बार बार याद आती हैं और  मन गुनगुनाने लगता है ...... 



"साँसों का पैमाना टूटेगा, 
पलभर में हाथों से छूटेगा
सोच अचानक दिल घबराया,
ख़्याल तभी इक मन में आया  
जाम कहीं यह छलक न जाए, 
छूटके हाथ से बिखर न जाए
क्यों न मैं हर लम्हा जी लूँ, 
जीवन का मधुरस मैं पी लूँ." 





सोमवार, 24 मार्च 2008

अपने ममता भरे हाथों से ....!



















(सन्ध्या के समय समुन्दर के किनारे बैठे बेटे विद्युत ने तस्वीर खींच ली,  
और हमने अपनी कल्पना में एक शब्द चित्र बना लिया. )







ममता भरे हाथों से सूरज को
वसुधा ने नभ के माथे पर सजा दिया

सजा कर चमचमाती सुनहरी किरणों को
साँवला सलोना रूप और भी निखार दिया

सागर-लहरें स्तब्ध सी रूप निहारने लगीं
यह देख दिशाएँ मन्द मन्द मुस्काने लगीं

गगन के गालों पर लज्जा की लाली सी छाई
सागर की आँखों में जब अपने रूप की छवि पाई

स्नेहिल-सन्ध्या दूर खड़ी सिमटी सी, सकुचाई सी
सूरज की बिन्दिया पाने को थी वह अकुलाई सी

रंग-बिरंगे फूलों का पलना प्यार से पवन झुलाए
हौले-हौले वसुधा डोले और सोच सोच मुस्काए

धीरे-धीरे नई नवेली निशा दुल्हन सी आएगी
अपने आँचल में चाँद सितारे भी भर लाएगी.