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कुछ दिल ने कहा....कविता जैसा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शनिवार, 4 मार्च 2023

बेवजह ज़िन्दगी की चाहत


बहुत पुराना ड्राफ्ट जिसे आज मुक्त किया पब्लिश करके - छोटी बहन जैसी भावुक नीलम की लिखी कविता -- आशा है आप सबको पसंद आएगी -- 

जब ज़िन्दा थे तो किसी ने प्यार से अपने पास न बिठाया
अब मर गए तो चारों ओर बैठे हैं !

पहले किसी ने मेरा दुख मेरा हाल न पूछा
अब मर गई तो पास बैठ कर आँसू बहाते हैं !

एक रुमाल तक भी भेंट न दी जीते जी किसी ने
अब गर्म शालें औ’ कम्बल ओढ़ाते हैं !

सभी को पता है ये शाले ये कम्बल मेरे किसी काम के  नहीं
मगर बेचारे सब के सब दुनियादारी निभाते हैं !

जीते जी तो खाना खाने को कहा नहीं किसी ने
अब देसी घी मेरे मुँह में डाले जाते हैं !

जीते जी साथ में एक कदम भी चले नहीं हमारे साथ जो
अब फूलों से सजा कर काँधे पर बिठाए जाते हैं !

आज पता चला कि मौत ज़िन्दगी से कितनी अच्छी नेमत है
हम तो बेवजह ही ज़िन्दगी की चाहत में वक्त गँवाए जाते थे.... !!

द्वारा - नीलम

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

तुम्हारा स्पर्श


पिछली पोस्ट पर अपनी एक दोस्त का परिचय दिया था...आठ साल बाद फिर से फेसबुक पर मिलना हुआ..यादों के पल मोती जैसे सहेजने के लिए ब्लॉग बनाने को कहा ..जब तक ब्लॉग़ बने सोचा क्यों न उसी की लिखी एक पुरानी कविता पढ़वा दूँ ..... मैं बोलती तो वह सपने लेती...वह लिखती तो मैं कल्पना करती नए नए अर्थों के साथ ..... 'तुम्हारा स्पर्श' कविता का आरंभ लगा किसी प्रेयसी के मन का हाल ..... तो अंत पढ़ते लगा जैसे क़लम और काग़ज़ मिल कर कविता को जन्म दे रहे हों.....उस कविता को खूबसूरत रूप देने के लिए लालायित हों....... आपको क्या लगता है... ? 


तुम ने जो सहलाया...मेरी घनी जुल्फों को 
अपने हाथों से 
मेरा झुमर खनक उठा
तुम ने जो छुआ .. ...मेरी पलकों को अधरों से 
होठो को होठो से 
मेरे कंगन खनक उठे 
तुम ने जो बेधा.....मुझे नैनो के तीरों से 
कानो के प्रेमाक्षरों से 
मेरे कर्ण फूल बज उठे 

मेरी साँसे जो तुम से टकरा रही थीं 
अधूरी दास्ताँ मेरे दिल की सुना रही थी 
मेरी करधनी,  मेरी पायल 
तुम्हारे एहसास के बिन सूनी पड़ी है 
जो गीत तुम्हारे ही गा रहे  है 
मेरे उन अलंकारों को रूप नया दे दो .. (अनिता ) 

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

कल रात मैं रात के संग थी...



कल रात मैं रात के संग थी
तन्हाँ सिसकती सी रात को ....
समझाना चाहा ...
हे रात ! तुम्हें ग़म किस बात का 
साए तो सदा साथ रहते हैं अंधेरों के... 
देखो तो दिवस को ... 
पहर दर पहर 
साए आते जाते हैं 
फिर साथ छोड़ जाते हैं... 
दिन ढलता जाता है 
और फिर मर जाता है...! 
हम भी कितने पागल है
यूँ ही बस किसी अंजान साए के पीछे भागते हैं... 

गुरुवार, 30 जून 2011

एक कर्मयोद्धा सा


रियाद में अपने घर की खिड़की से ली गई तस्वीर 




सड़क के उस पार शायद कोई मजदूर बैठा है
कड़ी धूप में सिर झुकाए जाने क्या सोचता है...
मैं खिडकी के अधखुले पट से उसे देखती हूँ
जाने क्या है उसके मन में यही सोचती हूँ ..
कुछ देर में अपनी जेब से पर्स निकालता है
शायद अपने परिवार की फोटो निहारता है
बहुत देर तक एकटक देखता ही रहता है
कभी होठों से तो कभी दिल से लगाता है
जाने कितने सालों से घर नहीं गया होगा...
अपनों को याद करके कितना रोया होगा..
विधाता ने किस कलम से उनका भाग्य लिखा...

एक पल के लिए दुखी होती हूँ ------
दूसरे ही पल मुझे वह -------
हर बाधा से जूझता एक कर्मयोद्धा सा दिखा..!!


शुक्रवार, 24 जून 2011

खिड़की के बाहर खड़े पेड़




खिड़की के बाहर खड़े पेड़
हमेशा मुझे लुभाते हैं....
उनकी जड़ें कितनी गहरी होगीं..
मानव सुलभ चाहत खोदने की ...
उनका तना कितना मज़बूत होगा ...
इच्छा होती छूकर उन्हें कुरेदने की ...
उनकी शाखाओं में कितना लचीलापन होगा...
पकड़ कर उन्हें झुका लूँ
या झूल जाऊँ उन संग
खिड़की के बाहर खड़े पेड़
हमेशा मुझे बुलाते हैं..
कभी सर्द कभी गर्म
हवाओं का रुख पाकर

अचानक शाख़ों में छिपे पंछी चहचहाते
जबरन ध्यान तोड़ देते हैं मेरा.....!!! 

गुरुवार, 2 जून 2011

बादलों का आंचल

 साँझ के वक्त आसमान से उतरते सूरज की कुछ तस्वीरें लीं....कुछ भाव भी मन में आ गए बस उन्हें इस तरह यहाँ उतार दिया.... चित्र को क्लिक करके देखिए...शायद अच्छा लगे..... 






शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अपने को बदलो....बदलाव नया इक आएगा....

अन्नाजी अनशन पर बैठे सपना सुन्दर लेकर

इक दिन ऐसा आएगा जब होगा भष्ट्राचार खत्म ....

होगा लोकपाल बिल पास, बंद होगा बेईमानी का खेल

भ्रष्टाचारी नेता जाएँग़ें जेल, जनता में जागी इक आस......


टीवी के हर चैनल में खबर यही थी...

अखबारों में भी चर्चा इसकी थी......

बेटा टीवी देख रहा था, सोच में अपनी डूब रहा था...

पापा से बोला.....

बिजली पानी का मीटर डायरेक्ट लगा है....

गेट हमारा सरकारी सड़क पर बना है....

हाउसटैक्स क्या भरा हुआ है...इंकम टैक्स .....

बात काट के पापा चिल्लाए......

चुप कर.....तू तो बच्चा है .... अक्ल का कच्चा है...

तू क्या जाने , समझेगा कैसे.....

दसवीं में पढ़ता हूँ , कुछ कुछ समझ रहा हूँ

सहमा सहमा सा बेटा समझ न पाया

पापा क्यों चिल्लाए...


मुझसे बोला, माँ सीख हमेशा देतीं तुम कहती हो

अपने को बदलो....बदलाव नया इक आएगा....


बदलेगा सब कुछ बाहर भी........



अनशन पर बैठे अन्नाजी क्या सब कुछ बदल सकेंगे.....

अनशन खत्म हुआ तो भी क्या कुछ बदलेगा..... !!!!!


सोच रही हूँ बस...... बस सोच रही हूँ ........ !