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मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

मैं हूँ इक लम्हा (काव्य संग्रह )





मैं हूँ इक लम्हा जो अपने लफ्जों को  इंद्रधनुषी सोच से सजा कर मन की बात रखता है सबके सामने । सोच का सैलाब उमड़ता है छोटी बड़ी लहरों जैसे और कविता के रूप में  कई भाव जन्म लेने लगते हैं ।  लिखना तो बचपन से ही शुरू हो गया था लेकिन कविता कब से लिखनी शुरू की इसकी सही तारीख बताना मुश्किल होगा। 

बड़े बेटे वरुण का मानना है कि हर कविता का जन्म उसके अंदर छिपी किसी न किसी कहानी से होता है और कविता लिखते वक्त उस कहानी का जिक्र  होना  ज़रूरी है ।  इस बात से सहमत होकर उसी वक्त सोच  लिया कि पूरी कोशिश करूंगी कि हर कविता के जन्म के पीछे की कहानी को अच्छे से कह  पाऊँ ।  इस कोशिश में छोटा बेटा विद्युत और जीवनसाथी विजय ने पूरा साथ दिया । छोटे  बहन भाई बेला और चंद्रकांत अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर हमेशा कुछ न कुछ प्रतिक्रिया भेजते रहते  जिससे लेखन में सुधार करने की कोशिश रहती । मेरे लेखन को पुस्तक के रूप में देखने का सपना लेकर पिता इस दुनिया को अलविदा कह गए और माँ आज भी समीक्षक बन कर मेरे लेखन को कभी नकार देती है तो कभी तारीफ करती है  ।  परिवार और दोस्तों का  तहे दिल से शुक्रिया जिनके कारण मेरे शब्दों को खूबसूरत बसेरा मिला । एक पुस्तक  में एक साथ मिल कर सभी शब्द और उनके भाव कैसा  महसूस कर रहे होंगे , उसकी खुशी मेरे मन में कहीं ज्यादा है । 

सुबह की पहली किरण के उगते या दोपहर किसी छाया में या फिर अमावस या पूनम की रात में अगर इस पुस्तक को पढ़ना हो तो अपने देश के Amazon.in पर उपलब्ध है !


शुक्रवार, 8 नवंबर 2024

मैं हूं इक लम्हा

मैं हूं इक लम्हा 

मृत्यु अंधकारमय कोई शून्य लोक है 
या नवजीवन का उज्ज्वल प्रकाशपुंज है
या मृत्यु-दंश है विषमय पीड़ादायक
या अमृत-रस का पात्र है सुखदायक
तन-मन थक गए जब यह सोच
सोच 
तब मन-मस्तिष्क मे नया भाव
जागा 
मेरे पास सिर्फ एक लम्हा है
जो अजर-अमर है 
इस मृग-तृष्णा में जी लेने दो !!

बुधवार, 29 मई 2013

युद्ध की आग



आज जब चारों ओर इंसान इंसान को हैवान बन कर निगलते देखती हूँ तो बरबस इस कविता की याद आ जाती है जो शायद सन 2000 से भी पहले की लिखी हुई है जो 'अनुभूति' में तो छप चुकी थी लेकिन जाने कैसे ब्लॉग पर  पोस्ट न हो पाई. 
दुनिया के किसी भी कोने में होती जंग दिल और दिमाग को शिथिल कर देती है. अपने देश का हाल बेहाल हो या दुनिया के किसी दूसरे देश का बुरा हाल. मरता है तो एक आम आदमी जिसकी ज़रूरतें सिर्फ जीने के साधन जुटाने के लिए होती हैं. 
इस युद्ध की आग में प्रेम का सागर सूख जाए उससे पहले ही हमें इंसानियत के फूल खिलाने हैं. 


विश्व युद्ध की आग में जल रहा
मानव का हृदय सुलग रहा
प्रेम का सिन्धु सागर सूख रहा
द्वेष भाव के दलदल में डूब रहा

विश्व युद्ध की आग में जल रहा।
मानव का हृदय सुलग रहा।।

भोला बचपन हाथों से छूट रहा
मस्त यौवन रस भी सूख रहा
मातृहीन शिशु का क्रन्दन गूंज रहा
बिन बालक माँ को न कुछ सूझ रहा

विश्व युद्ध की आग में जल रहा।
मानव का हृदय सुलग रहा।।

पिता अपने बुढ़ापे का सहारा खोज रहा
पुत्र भी पिता के प्यार को तरस रहा
बहन का मन भाई बिन टूट रहा
प्राण भाई का बहन बिन छूट रहा

विश्व युद्ध की आग में जल रहा।
मानव का हृदय सुलग रहा।।

प्रेममयी सहचरी का न साथ रहा
मनप्राण का सहचर न पास रहा
मित्र का मित्र से विश्वास उठ रहा
मानव मानव का नाता टूट रहा

विश्व युद्ध की आग में जल रहा।
मानव का हृदय सुलग रहा।।
प्रेम का सिन्धु सागर सूख रहा
द्वेष भाव के दलदल में डूब रहा



शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

जीवन का ज्वार-भाटा


नर और नारी

सागर किनारे बैठे थे 
झगड़ा करके ऐंठे थे 
रेत पर नर नारी लिखते 
लम्बे वक्त से मौन थे
नर ने मौन तोड़ा
नारी को लगा चिढ़ाने
दो मात्राओं की बैसाखियाँ
लिए हर दम चलती नारी
मै बिन मात्रा के हूँ नर
बिना सहारे चलता हरदम
नारी कहाँ कम थी
झट से बोल उठी
दो मात्राओं से ग़रीब
बिन आ-ई के फक़ीर
कमज़ोर हो तुम
बलशाली होने का
नाटक करते हो 
सुन कर नर भड़का
नारी का दिल धड़का
तभी अचानक लहरें आईं
रेत पर लिखे नर नारी को
ले गई अपने साथ बहा कर
गुम हो गए दोनों सागर में
जीवन का ज्वार-भाटा भी
ऐसा ही तो होता है .... !! 


बुधवार, 9 अप्रैल 2008

शैशव की स्मृति



स्मृतियाँ लौटीं , शैशव की याद आई
घुटनों के बल कितनी माटी खाई

चूड़ियाँ माँ की कानों में खनकी
भूली यादों से आँखें भर आईं

ममता की चक्की चलती चूल्हा जलता
स्नेह भरे हाथों से फिर खाना पकता

रोटी पर माखन साग को ढकता
दही छाछ जो पेट को फिर भरता

खोजते नन्हे पैर तपती धूप में छाया
धूल भरी राहों में डोलती वो काया

चोरी से बेर तोड़ना बेहद भाता था
मन-पंछी सैंकड़ों सपने लाता था

सन्ध्या का सूरज रक्तिम आभा को लाता
दीपक का प्रकाश घर-भर में छा जाता

बेटी की सुन पुकार टूट गया सपना
जैसे पीछे कोई छूट गया हो अपना

खट्टी मीठी यादों का टूटे सँग ना
फिर याद आ गया छूट गया अँगना

सोमवार, 21 जनवरी 2008

प्रथम मिलन को भूल न पाऊँ





आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

सूखे कगार सी पतली दो रेखाएँ
बेचैन भुजाएँ बनकर आलिंगन करना चाहें !!

सूखे अधरों का कंपन बढ़ता ही जाए
फिर भी प्यास प्रेम की बुझ न पाए !!

आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

प्रथम मिलन को भूल न पाऊँ
मोहपाश में फिर-फिर बँधती जाऊँ !!

प्यासे अधरों की, चंचल नैनों की
भाषा प्रेम की फिर से पढ़ना चाहूँ !!

आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

शनिवार, 12 जनवरी 2008

मैं झरना झर झर बहूँ, प्रेम बनूँ औ' हिय में बसूँ !

'प्रेम ही सत्य है' इस अटल सत्य को कोई नकार नहीं सकता. स्वामी विवेकानन्द जी ने भी कहा है, 'प्रेम ही विकास है, प्रेम ही मानव जीवन का मूलमंत्र है और प्रेम ही जीवन का आधार है, निस्वार्थ प्रेम और निस्वार्थ कार्य दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं. जैसे प्रेम से उच्च तत्त्व नहीं वैसे ही कामना के बराबर कोई नीच भाव नहीं. 'हमारे मन की बात हो जाए' कामना का यह भाव दुखों का मूल है.
कामनाओं के, इच्छाओं के बीहड़ जंगल में हम भटकते हैं, अपने मन की शक्ति से बाहर भी निकल सकते हैं . उस जंगल से बहुत दूर निकल कर प्रेम के महासागर में डुबकी लगा कर शांति पा सकते हैं. बस एक कोशिश करके........

मैं झरना झर झर बहूँ ।
अमृत की रसधार बनूँ ।।

मैं तृष्णा को शान्त करूँ।
प्रेम बनूँ औ' हिय में बसूँ।।

मैं मलयापवन सी मस्त चलूँ।
मानव मन में सुगन्ध भरूँ।।

मैं सबका सन्ताप ग्रहूँ।
हिय के सब का शूल गहूँ।।

मैं ग्यान की ऊँची लपट बनूँ।
अवनि पर प्रतिपल जलती रहूँ।।

मैं विश्व की ऐसी शक्ति बनूँ।
मानव मन को करूणा से भरूँ।।

मंगलवार, 1 जनवरी 2008

विश्व - प्राँगण











नववर्ष के प्रथम दिवस का सूर्योदय एक नई आशा की किरण लेकर आया. एक नई सुबह खिलखिलाती सी, जगमगाती सी अपने सुन्दर रूप से मुझे मोहित कर रही थी. मंत्र-मुग्ध सी मैं आकाश के एक कोने से चमकते सूरज को देख रही थी तो दूसरी ओर आँखों से ओझल होता फीकी हँसी हँसता शशि न चाहते हुए भी विदा ले रहा था.

नए वर्ष का मंगल गीत गाते हुए पंछी वृक्षों की फैली बाँहों में नाचते हुए चारों दिशाओं को मोहित कर रहे थे.

यह सुन्दर दृश्य देखकर विश्व प्राँगण में उतरी हर ऋतु की सुन्दरता का रूप याद आने लगा.


विश्व-प्राँगण में उतरीं ऊषा की किरणें
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

सूर्योदय की चंचल किरणें मुस्काईं
अपने ही स्वर्णमयी यौवन से शरमाईं
पीतवर्ण सरसों आँचल सी लहराई
अन्न धन हाथों में अपने भर लाई.

विश्व-प्राँगण ग्रीष्म के ताप से तप्त हुआ
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

ओस पसीने सा चमका धरती के माथे पर
प्यास बुझाने की तृष्णा थी सूखे अधरों पर
धानी आँचल फटा हुआ कृशकाय तन पर
वीरानापन छाया था वसुधा के मुख पर.
विश्व-प्राँगण में पावक पावस अति छाए
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

जगी प्यास जब घनघोर घटाएँ छाईं
रिमझिम बूँदें लेकर मोहक वर्षा-ऋतु आई
नभ की कजरारी अखियाँ प्यारी भाईं
दामिनी चपला ने भी अदभुत सुन्दरता पाई.

विश्व-प्राँगण ठिठुर गया काँपा सीसी कर
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

शरदऋतु के आते सब सकुचाए दुबके कोने में
मानव, पशु-पक्षी सब ओझल हुए किसी कोने में
तड़प उठी वसुधा पपड़ी फटे होठों पर होने से
तरु-दल भी पाले से मुरझाए शीत के होने से.


विश्व-प्राँगण में सूखा सा पतझर छाया
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

अस्थि-पंजर बन कृशकाय तन लहराया
प्यासी बेरंग आँखों में पीलापन छाया
पावक पावस ने वसुधा का मन भरमाया
मधु-रस पाने का स्वर सूखे होठों पर आया.

विश्व-प्राँगण में ऋतुराज बसंत पधारे
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

ऋतुराज जो आए संग बासंती पवन भी लाए
रंग-बिरंगे महकते फूलों की बहार लुटाने आए
वसुधा के सुन्दर तन पर धानी आँचल लहराए
रोम-रोम में उसके सुष्मिता अनोखी छा जाए.

नभ पर सुन्दर अति सुन्दर सुरचाप सजे
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

चंदा की मदमाती किरणें उतरीं बहकी-बहकी
रवि-किरणें थी चंचल चपला से चहकी-चहकी
वसुधा के आँगन में कलियाँ बिखरीं महकी-महकी
नीलम्बर की सतरंगी सुषमा है लहकी-लहकी.

विश्व-प्राँगण में बिखरी चंदा की किरणें
धरती ने जब ली अँगड़ाई !
चंदा की चंचल चाँदी से किरणें सजीं हुईं
नभ की साड़ी अनगिनत तारों से टंकी हुई
चोटी जगमग करते जुगनुओं से भरी हुई
लहराते दुग्ध धवल आँचल से ढकी हुई.

विश्व-प्राँगण में उतरा मानव का विज्ञान
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

विश्व-प्राँगण है प्रकृति का सुन्दर आँगन
रंग-बिरंगे फूलों का सुगन्धित उपवन
धीरे धीरे नीरसता से जो भरता जाता है
प्रदूषण से अब बेरंग हुआ वो जाता है.

विश्व-प्राँगण के सुन्दर आँग़न में वसुधा जब ले अँगड़ाई तो प्रकृति का सुन्दर मोहक रूप ही दिखाई दे उसमें, नव वर्ष में यही कामना है.

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

कपट न हो बस मै तो जानूँ !

तुम छल क्यों करते मैं न जानूँ
क्यों मन रोए मैं न जानूँ
कपट न हो बस मैं तो जानूँ !

निस्वार्थ भाव स्वीकार करें तुम्हे
तुष्ट न क्यों तुम मैं न जानूँ
कपट न हो बस मैं तो जानूँ !

नैनों में है नहीं हास मुक्त
वीरान हैं क्यों मन मैं न जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ

भाव ह्रदय के हैं अति शुष्क
पाषाण बने क्यों मैं न जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ

मुक्त हास से स्नेह भाव से
मुख दीप्तीमान हो इतना जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ

शनिवार, 8 दिसंबर 2007

सवाल

"प्रश्न-चिन्ह" कविता जो हिन्दी भाषा में सँवरी तो "सवाल" को उर्दू ने निखारने की कोशिश की... सोचा था अवध मंच पर सवाल पढ़ने का मौका मिलेगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया... आज यही "सवाल" आप सबके नाम ---


सवाल
धूप जैसे सर्द होती , इंसानियत भी सर्द होती जा रही
इंसान से इंसान की खौफज़दगी बढ़ती जा रही !

कब हुआ ? कैसे हुआ ? क्यों हुआ ?
सवाल है उलझा हुआ !!

इंसान में हैवान कब आ बैठ गया
रूह पर कब्ज़ा वो कर कब ऐंठ गया
इंसानियत को वह निगलता ही गया

कब हुआ ? कैसे हुआ ? क्यों हुआ ?
सवाल है उलझा हुआ !!

इंसान की लयाकत क्या कयामत लाई
इंसानियत पर कहर की बदली है छाई
अब तो कहरे-जंग की बदली बरसने आई

कब हुआ ? कैसे हुआ ? क्यों हुआ ?
सवाल है उलझा हुआ !!

दिल ए इंसान से हैवान कब डरेगा ?
इंसानियत से उसका कब्ज़ा कब हटेगा ?
दुनिया पे छाया कहर का कुहरा कब छटेगा ?

इंसाँ से इंसाँ का खौफ कब मिटेगा ?
इंसानियत का फूल यह कब खिलेगा ?
जवाब इस सवाल का कभी तो मिलेगा !!

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!

"सैकड़ो निर्दोष लोगों का खून बहाया गया मुझे उस से दर्द होता है. " अभय जी की इस पंक्ति ने अतीत में पहुँचा दिया. जब दस साल का बेटा वरुण साउदी टी.वी. में हर तरफ फैले युद्ध की खबरें देख कर बेचैन हो जाया करता. दुनिया का नक्शा लेकर मेरे पास आकर हर रोज़ पूछता कि कौन सा देश है जहाँ सब लोग प्यार से रहते हैं...लड़ाई झगड़ा नहीं करते .हम वहीं जाकर रहेंगे...अपने आप को उत्तर देने में असमर्थ पाती थी. ..तब मेरी पहली कविता का जन्म हुआ था उससे पहले गद्य की विधा में ही लिखा करती थी.
रियाद में हुए मुशायरे शाम ए अवध में पढ़ी गई यही पहली हिन्दी कविता थी.

प्रश्न चिन्ह

थकी थकी ठंडी होती धूप सी
मानवता शिथिल होती जा रही

मानव-मानव में दूरी बढ़ती जा रही
क्यों हुआ ; कब हुआ; कैसे हुआ ;

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

क्या मानव का बढ़ता ज्ञान
क्या कदम बढ़ाता विज्ञान !

क्या बढ़ता ज्ञान और विज्ञान
मन से मन को दूर कर रहा !

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

मानव में दानव कब आ बैठ गया
अनायास ही घर करता चला गया !

मानव के विवेक को निगलता गया
कब से दानव का साम्राज्य बढ़ता गया !

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

कब मानव में प्रेम-पुष्प खिलेगा ?
कब दानव मानव-मन से डरेगा ?

कब ज्ञान विज्ञान हित हेतु मिलेगा ?
क्या उत्तर इस प्रश्न का मिलेगा ?

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

क्रमश:

बुधवार, 5 दिसंबर 2007

अमृत की ऐसी रसधार बहे !

तपती धरती , जलता अम्बर
शीतलता का टूटा सम्बल
आकुल है वसुधा का चन्दन
रोती अवनि अन्दर अन्दर !

धरती प्यासी , अम्बर है प्यासा
कण-कण है अमृत का प्यासा !!

ओस के कण हैं बने अश्रु-कण
सूख रहे हैं वे क्षण-क्षण
पिघल रहे हिमखण्ड प्रतिक्षण
फिर भी तृष्णा बढ़ती प्रतिकण !

धरती प्यासी , अम्बर है प्यासा
कण-कण है अमृत का प्यासा !!

तपती धरती का ताप हरे
जलते अम्बर में शीत भरे
मानवता की फिर प्यास बुझे
अमृत की ऐसी रसधार बहे !

धरती प्यासी , अम्बर है प्यासा
कण-कण है अमृत का प्यासा !!

रविवार, 2 दिसंबर 2007

कल और आज



कल
माँ की सुन पुकार मैं उठ जाती
चूल्हा सुलगाती भात बनाती
ताप से मुख पर रक्तिम आभा छाती
मुस्कान से सबका मन मैं लुभाती !


माँ की मीठी टेर सुनाई देती
झट से गोद में वह भर लेती
जैसे चिड़िया अंडों को सेती !
लोरी से आँखों में निन्दिया भर देती !


नन्हे भाई का रुदन मुझे तड़पाता
मन मेरा ममता से भर जाता
नन्हीं गोद मेरी में भाई छिप जाता
स्नेह भरे आँचल में आश्रय वह पाता !


सोच सोच के नन्हीं बुद्धि थक जाती
क्यों पिता के मुख पर आक्रोश की लाली आती
क्रोध भरे नेत्रों में जब स्नेह नहीं मैं पाती
मेरे मन की पीड़ा गहरी होती जाती !


आज

मेरी सुन पुकार वह चिढ़ जाती
क्रोध से पैर पटकती आती
मेरी पीड़ा को वह समझ न पाती
माँ बेटी का नाता मधुर न पाती !


स्वप्न लोक की है वह राजकुमारी
नन्हीं कह मैं गोद में भरना चाहती
मेरा आँचल स्नेह से रीता रहता
उसका मन किसी ओर दिशा को जाता !


भाई की सुन पुकार वह झुँझलाती
तीखी कर्कश वाणी में चिल्लाती
पश्चिमी गीत की लय पर तन थिरकाती
करुण रुदन नन्हें का लेकिन सुन न पाती !


पढ़ना छोड़ पिता के पीछे जाती
प्रेम-भरी आँखों में अपनापन पाती
पिता की वह प्रिय बेटी है
कंधा है , वह मनोबल है !


माँ की सुन पुकार मैं उठ जाती थी
मेरी सुन पुकार वह चिढ़ जाती है
कल की यादें थोड़ी खट्टी मीठी थी
आज की बातें थोड़ी मीटी कड़वी हैं !

शनिवार, 24 नवंबर 2007

हे प्राण मेरे, आँखें खोलो !

हे प्राण मेरे, आँखें खोलो 
सृष्टि को रूप नया दे दो ! 
कब तक निश्चल पड़े पड़े 
देखोगे कब तक खड़े खड़े ! 
हे प्राण ..................... 
उठो उठो हे सोए प्राण 
आँखें मूँदे रहो न प्राण ! 
हे प्राण ................. 
मानवता का संहार है होता 
वसुधा मन पीड़ा से रोता ! 
हे प्राण .................... 
कृतिकार के मन का रुदन सुनो
विश्व की करुण पुकार सुनो ! 
हे प्राण ..................... 
हे प्राण मेरे, आँखें खोलो
सृष्टि को रूप नया दे दो !!

शुक्रवार, 23 नवंबर 2007

व्यक्तित्त्व























सामने से उसे आते देख मैं चौंक गई
सुन्दर, सौम्य, मुस्काती नम्र नम आँखें
चाल में शालीनता, चेहरे पर नहीं मलिनता

किसी ने कहा - "देखते ही पता चलता है
वह घमण्डी है, नकचढ़ी है!"

किसी ने कहा - " नहीं नहीं , वह गूँगी है,
उसे बोलना ही नहीं आता है !"

किसी ने कहा - "कछुए की तरह सदा अपने
कवच में छिपी रहती है !"

किसी ने कहा - "हीन भावना से ग्रस्त शायद
निर्धन घर की लड़की है !"

किसी ने कहा - "बन्द किताब का वह एक
कोरा पन्ना है !"

लेकिन

किसी ने नहीं कहा था - "वह भावुक संवेदनशील
ह्रदय वाली है !"

किसी ने नहीं कहा था - "उसका मन शीशे जैसा
बेहद नाज़ुक है !"

किसी ने नहीं कहा था - "वह मानव के छल-कपट
से आहत है!"

किसी ने नहीं कहा था - " वह प्रेम रस पीने को
व्याकुल है!"

सामने से उसे आते देख मैं समझ गई !
इन आँखों को पढ़ना बहुत मुश्किल है !
पढ़ लिया तो फिर समझना मुश्किल है !
समझ लिया तो फिर भूलना मुश्किल है !

बुधवार, 14 नवंबर 2007

सिसकते भाव




















हर्षवर्धन जी का लेख ज्यादा पढ़े-लिखे भारत को लड़कियां कम पसंद हैं पढ़कर मन बेचैन हो गया और बस सिसकते से भावों ने कविता का रूप ले लिया.



भाव मेरे वाणी बन अधरों पर आना चाहें
अंजानी शक्ति वाणी के प्राण हर लेना चाहे !


बात रुक गई, साँस घुट गई
आँखों में वीरानी छा गई !!
सिसकते भाव कुछ कहना चाहें
दुनिया कुछ न सुनना चाहे !!

भाव मेरे वाणी बन अधरों पर आना चाहें
अंजानी शक्ति वाणी के प्राण हर लेना चाहे !

सिसक कर जीते जाएँ भाव मेरे
तड़प कर मरते जाएँ भाव मेरे
सर पटक रोते जाएँ भाव मेरे
जीवन पाना चाहें भाव मेरे !!

भाव मेरे वाणी बन अधरों पर आना चाहें
अंजानी शक्ति वाणी के प्राण हर लेना चाहे !

रविवार, 11 नवंबर 2007

मानव की प्रकृति

विद्युत रेखा हूँ नीले अंबर की
स्वाति बूँद हूँ नील गगन की !

गति हूँ बल हूँ विनाश की
अमृत-धारा बनती विकास की !

अग्नि-कण हूँ ज्योति ज्ञान की
मैं गहरी छाया भी अज्ञान की !

मैं मूरत हूँ सब में स्नेह भाव की
छवि भी है सबमें घृणा भाव की !

वर्षा करती हूँ मैं करुणा की
अर्चना भी करती हूँ पाषाण की !

सरल मुस्कान हूँ मैं शैशव की
कुटिलता भी हूँ मैं मानव की !!

बुधवार, 7 नवंबर 2007

प्राणों का दीप


















प्राणों का दीप जलने दो
जीवन को गति मिलने दो !

विश्व तरु दल को न सूखने दो
वसुधा को प्रेमजल सींचने दो !

विषमता का शूल न चुभने दो
जीवन-पथ को निष्कंटक करने दो !

अनिल से अनल को मिलने दो
प्रचंड रूप धारण करने दो !

सिन्धु-सरिता की सुषमा बढ़ने दो
धरा-अंबर की शोभा निखरने दो !

घन-चंचला कुसुम खिलने दो
विश्व उद्यान माधर्य बढ़ने दो !

प्राणों का दीप जलने दो
जीवन को गति मिलने दो !!

सोमवार, 29 अक्टूबर 2007

नभ की सुषमा

अभी तो सूरज दमक रहा है. दिन अलस जगा है.
चंदा के आने का इंतज़ार अभी से क्यों लगा है !
बस उसी चंदा के ख्यालों में मेरा मन रमा है
नभ की सुषमा देखने का अरमान जगा है !
कविता के सुन्दर शब्दो का रूप सजा है
अब ब्लॉगवाणी पर पद्य मेरा हीरे सा जड़ा है !



नील गगन के नील बदन पर
चन्द्र आभा आ छाई !

ऐसी आभा देख गगन की
तारावलि मुस्काई !

नभ ने ऐसी शोभा पाई
सागर-मन अति भाई !

कहाँ से नभ ने सुषमा पाई
सोच धरा ने ली अँगड़ाई !

रवि की सवारी दूर से आई
उसकी भी दृष्टि थी ललचाई!

घन-तन पर लाली आ छाई
घनघोर घटाएँ भी सकुचाईं !

नील गगन के नील बदन पर
रवि आभा घिर आई !

ऐसी आभा देख गगन की
कुसुमावलि भी मुस्काई !

नील गगन के नील बदन पर
चन्द्र आभा आ छाई !

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2007

तपता - हँसता जीवन !

सूरज का अहम देख कर
चन्द्र्मा मन ही मन मुस्करा उठा
और सोचने लगा -
अपनी आग से सूरज
धरती को देता है नवजीवन ही नहीं
मन-प्राण भी उसका झुलसा देता है.
धरती के हरयाले आँचल से
टके हुए ओस के मोती चुरा लेता है.
स्वयं पल-पल जलता है
और प्रकृति का रोम-रोम भी जला देता है
अपने आप में भूला, जलता जलाता सूरज
मेरे आसितत्व को ही भुला देता है
समझता नहीं सूरज कि मैं भी
धरती के मन-प्राणों में शीतलता भर देता हूँ
अपनी सुषमानूभूति से मैं
जलती धरती को मुस्काना सिखा देता हूँ.
मैने दोनो को हँस कर देखा
और सोचा कि मेरे जीवन में
दोनों का ही महत्त्व है ---
सूरज जीवन में जलना तपना सिखाता है
चन्द्र्मा जलते-तपते जीवन में हँसना सिखा देता है......!