तू सूरज मैं मूरत हूँ मोम की
तू अग्निकण मैं बूँद हूँ ओस की !
तपन तेरी से पिघले तन-मन
तपिश तेरी से सुलगे प्रति-क्षण !
तू समझे न बातें मेरे ह्रदय की
तू क्या जाने पीड़ा मेरे मन की !
अभिव्यक्त करूँ मैं कैसे अपने भावों को
हँसते-हँसते सहती हूँ तेरी घातों को !