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सोमवार, 22 अक्टूबर 2007

करुणा भर दो ! ( तपन प्रकृति की )



पृथ्वी के होठों पर पपड़ियाँ जम गईं
पेड़ों के पैरों मे बिवाइयाँ पड़ गईं.

उधर सागर का भी खून उबल रहा
और नदियों का तन सुलग रहा.

घाटियों का तन-बदन भी झुलस रहा
और झीलों का आँचल भी सिकुड़ रहा.

धूप की आँखें लाल होती जा रहीं
हवा भी निष्प्राण होती जा रही.

तब

अम्बर के माथे पर लगे सूरज के
बड़े तिलक को सबने एक साथ

निहारा ---
और उसे कहा ---
काली घाटियों के आँचल से
माथे को ज़रा ढक लो .
बादलों की साड़ी पर
चाँद सितारे टाँक लो

और फिर

मीठी मुस्कान की बिजली गिरा कर
प्यार की , स्नेह की वर्षा कर दो

धरती को हरयाले आँचल से ढक दो
प्रकृति में, इस महामाया में करुणा भर दो .....!

10 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

धरती को हरयाले आँचल से ढक दो
प्रकृति में, इस महामाया में करुणा भर दो .....!


--सुन्दर है!!

मीनाक्षी ने कहा…

समीर जी , मान गए आपको...कुछ तो राज़ है...प्लीज़ हमें भी बता दीजिए कि आपने उड़न तश्तरी कहाँ से बनवाई :) पूरी दुनिया मे इतनी तेज़ी से उड़ती सबको हैरान और प्रसन्न भी करती रहती है...आपकी उड़न तश्तरी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ

अनिल रघुराज ने कहा…

काली घाटियों के आंचल से माथे को ज़रा ढक लो,
बादलों की साड़ी पर चांद सितारे टांक लो...
विराट कल्पना है। पढ़नेवाले का पूरा क्षितिज विस्तृत हो जाता है।

Atul Chauhan ने कहा…

मीनाक्षी जी,कविता के साथ फोटो मैचिंग बहुत पसद आई। लगा बिल्कुल आंखों देखा हाल!

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

शब्द जहां पर मौन हो गये
चित्र सुनाते एक कहानी

Anita kumar ने कहा…

मिनाक्षी जी
बहुत सुन्दर कविता है और चित्रों ने तो चार चाँद लगा दिए कविता में

Pankaj Oudhia ने कहा…

वाह! क्या बात है।


पर तपना भी उतना ही जरूरी है जितना कि बरसना।

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

इस पोस्ट में आपकी चिंता और आशा दोनो ही बहुत सुन्दर बन पड़ी हैं।

मीनाक्षी ने कहा…

आप सबका आभार कि आपने मेरे भावों को सराहा.

हरिराम ने कहा…

शब्दों, पदों, भावों के साथ ताल मिलाते चित्रों का सुमेल संयोजन।