Monday, November 26, 2007

नारी मन के कुछ कहे , कुछ अनकहे भाव !



मानव के दिल और दिमाग में हर पल हज़ारों विचार उमड़ते घुमड़ते रहते हैं. आज कुछ ऐसा ही मेरे साथ हो रहा है. पिछले कुछ दिनों से स्त्री-पुरुष से जुड़े विषयों को पढकर सोचने पर विवश हो गई कि कैसे भूल जाऊँ कि मेरी पहली किलकारी सुनकर मेरे बाबा की आँखों में एक चमक आ गई थी और प्यार से मुझे अपनी बाँहों में भर लिया था. माँ को प्यार से देख कर मन ही मन शुक्रिया कहा था. दादी के दुखी होने को नज़रअन्दाज़ किया था.
कुछ वर्षों बाद दो बहनों का एक नन्हा सा भाई भी आ गया. वंश चलाने वाला बेटा मानकर नहीं बल्कि स्त्री पुरुष मानव के दोनों रूप पाकर परिवार पूरा हो गया. वास्तव में पुरुष की सरंचना अलग ही नहीं होती, अनोखी भी होती है. इसका सबूत मुझसे 11 साल छोटा मेरा भाई था जो अपनी 20 साल की बहन के लिए सुरक्षा कवच बन कर खड़ा होता तो मुझे हँसी आ जाती. छोटा सा भाई जो बहन की गोद में बड़ा होता है, पुरुष-सुलभ (स्त्री सुलभ के विपरीत शब्द का प्रयोग ) गुणों के कारण अधिकार और कर्तव्य दोनों के वशीभूत रक्षा का बीड़ा उठा लेता है.
फिर जीवन का रुख एक अंजान नई दिशा की ओर मुड़ जाता है जहाँ नए रिश्तों के साथ जीवन का सफर शुरु होता है. पुरुष मित्र, सहकर्मी और कभी अनाम रिश्तों के साथ स्त्री के जीवन में आते हैं. दोनों में एक चुम्बकीय आकर्षण होता है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता.
फिर एक अंजान पुरुष धर्म का पति बनकर जीवन में आता है. जीवन का सफर शुरु होता है दोनों के सहयोग से. दोनों करीब आते हैं, तन और मन एकाकार होते हैं तो अनुभव होता है कि दोनों ही सृष्टि की रचना में बराबर के भागीदार हैं. यहाँ कम ज़्यादा का प्रश्न ही नहीं उठता. दोनों अपने आप में पूर्ण हैं और एक दूसरे के पूरक हैं. एक के अधिकार और कर्तव्य दूसरे के अधिकार और कर्तव्य से अलग हैं , बस इतना ही.
अक्सर स्त्री-पुरुष के अधिकार और कर्तव्य आपस में टकराते हैं तब वहाँ शोर होने लगता है. इस शोर में समझ नहीं पाते कि हम चाहते क्या हैं? पुरुष समझ नहीं पाता कि समान अधिकार की बात स्त्री किस स्तर पर कर रही है और आहत स्त्री की चीख उसी के अन्दर दब कर रह जाती है. कभी कभी ऐसा तब भी होता है जब हम अहम भाव में लिप्त अपने आप को ही प्राथमिकता देने लगते हैं. पुरुष दम्भ में अपनी शारीरिक सरंचना का दुरुपयोग करने लगता है और स्त्री अहम के वशीभूत होकर अपने आपको किसी भी रूप में पुरुष के आगे कम नहीं समझती.
अहम को चोट लगी नहीं कि हम बिना सोचे-समझे एक-दूसरे को गहरी चोट देने निकल पड़ते हैं. हर दिन नए-नए उपाय सोचने लगते हैं कि किस प्रकार एक दूसरे को नीचा दिखाया जाए. यह तभी होता है जब हम किसी न किसी रूप में अपने चोट खाए अहम को संतुष्ट करना चाहते हैं. अन्यथा यह सोचा भी नहीं जा सकता क्यों कि स्त्री और पुरुष के अलग अलग रूप कहीं न कहीं किसी रूप में एक दूसरे से जुड़े होते हैं.
शादी के दो दिन पहले माँ ने रसोईघर में बुलाया था. कहा कि हाथ में अंजुलि भर पानी लेकर आऊँ. खड़ी खड़ी देख रही थी कि माँ तो चुपचाप काम में लगी है और मैं खुले हाथ में पानी लेकर खड़ी हूँ. धीरज से चुपचाप खड़ी रही..कुछ देर बाद मेरी तरफ देखकर माँ ने कहा कि पानी को मुट्ठी में बन्द कर लूँ.
मैं माँ की ओर देखने लगी. एक बार फिर सोच रही थी कि चुपचाप कहा मान लूँ या सोच समझ कर कदम उठाऊँ. अब मैं छोटी बच्ची नहीं थी. दो दिन में शादी होने वाली है सो धीरज धर कर धीरे से बोल उठी, 'माँ, अगर मैंने मुट्ठी बन्द कर ली तो पानी तो हाथ से निकल जाएगा.'
माँ ने मेरी ओर देखा और मुस्कराकर बोली, "देखो बेबी , कब से तुम खुली हथेली में पानी लेकर खड़ी हो लेकिन गिरा नहीं, अगर मुट्ठी बन्द कर लेती तो ज़ाहिर है कि बह जाता. बस तो समझ लो कि दो दिन बाद तुम अंजान आदमी के साथ जीवन भर के लिए बन्धने वाली हो. इस रिश्ते को खुली हथेली में पानी की तरह रखना, छलकने न देना और न मुट्ठी में बन्द करना." खुली हवा में साँस लेने देना ...और खुद भी लेना.
अब परिवार में तीन पुरुष हैं और एक स्त्री जो पत्नी और माँ के रूप में उनके साथ रह रही है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं, न ही उसे समानता के अधिकार के लिए लड़ना पड़ता है. पुरुष समझते हैं कि जो काम स्त्री कर सकती है, उनके लिए कर पाना असम्भव है. दूसरी ओर स्त्री को अपने अधिकार क्षेत्र का भली-भांति ज्ञान है. परिवार के शासन तंत्र में सभी बराबर के भागीदार हैं.

http://es.youtube.com/watch?v=CRr9eubXo68&feature=related

http://es.youtube.com/watch?v=e5n78sw8t9Q&feature=related

(ईरानी फिल्म 'मिम मिसले मॉदर' के छोटे छोटे दो क्लिपस हैं जो मुझे बहुत अच्छे लगे. यहाँ भाषा नहीं लेकिन भाव आप ज़रूर अनुभव कर पाएँगें.)

13 comments:

उन्मुक्त said...

मेरी बहन मुझसे सात साल बड़ी है। अक्सर अपने बेटे को मेरे नाम से और मुझे इसके नाम से बुलाती है। मेरे उसके बीच शायद मां बेटे का सा रिश्ता है। यह चिट्ठी पढ़ते समय, मालुम नहीं क्यों उसकी याद आयी।

Sanjeeva Tiwari said...

बढिया चिंतन प्रस्‍तुत किया मीनाक्षी जी, नारी मन के भावों को पुरूषों को समझ होना चाहिए । बधाई .. अच्‍छा जवाब ।

www.aarambha.blogspot.com

रंजू said...

बहुत ही सुंदर सोच लिखी है आपने .यह पंक्तियाँ दी को छू गई ..बहुत ही अच्छी बात कही है ..""कब से तुम खुली हथेली में पानी लेकर खड़ी हो लेकिन गिरा नहीं, अगर मुट्ठी बन्द कर लेती तो ज़ाहिर है कि बह जाता. बस तो समझ लो कि दो दिन बाद तुम अंजान आदमी के साथ जीवन भर के लिए बन्धने वाली हो. इस रिश्ते को खुली हथेली में पानी की तरह रखना, छलकने न देना और न मुट्ठी में बन्द करना." खुली हवा में साँस लेने देना ...और खुद भी लेना.
.मैंने इसको अपने पास नोट कर लिया है :)

AtulChauhan said...

समाज के रिश्तों की डोरी बडी अजीब है,एक मिनट में जिंदगी भर का रिशता! जब मां-बाप 25-30 साल तक अपनी औलाद को समझ नहीं पाते तो बेचारे पति-पत्नी क्या खाक एक दूसरे को समझेंगे। फिर भी भारतीय समाज पौराणिक रीती रिवाजों की पगडण्डियों पर महान बनकर खडा है।
आपने अपने लेख में जिन बिंदुओं को छुआ है,वह नारी मन की उस व्यथा को दर्शाता है,जिससे उसे हर दिन दो-चार होना पदता है।
इस उम्मीद के साथ की जल्द ही भारतीय नारी." खुली हवा में साँस लेने देना ...और खुद भी लेना.सीख जायेगी।

अभय तिवारी said...

बहुत सुन्दर.. बहुत तरल!

मीनाक्षी said...

उन्मुक्त जी,मधुर रिश्तों की यादें जीवन को सरल बना देती हैं. संजीव जी, आप समझ गए शायद कि यह किसी पोस्ट का जवाब ही है...
रंजू जी,मेरी शादी होने पर माँ ने मुझे यह बात कही थी. कल मैं अपने बेटे को यही बात उसकी शादी होने से पहले कहूँगी.
अतुल जी, यह बात सिर्फ नारी के लिए नहीं, पुरुष के लिए भी लागू होती है.जहाँ तक एक दूसरे को समझने की बात है वह तो जीवन भर चलता रहता है.समय समय पर व्यक्तित्व के नए रूप को जानने का आनन्द लेना चाहिए.
अभय जी, आपको यहाँ देखकर बहुत अच्छा लगा. एक और बात का धन्यवाद कि आपके कारण फिर से फारसी की पढ़ाई शुरु हो गई.

Pranjal said...

very nice description maam..... the learning lesson about the water in the palm is very meaningful and wonderfully explained

Lavanyam - Antarman said...

सुन्दर अभिव्यक्ति मीनाक्षी जी ..आपकी माता जी का कहा कितना सही है .आज भी !

Ashvaj said...

Congratulations you really write too well, being in this part of the world, where people generally come to make money at the cost of their emotions, i mean i see people living a life where they have accepted emotional bankruptcy as a way of life..as a defence mechanism..perhaps they are right..perhaps my concerns are more about human sensibilities at a certain level than say a gulf war or starvation back home in india or whatever. to me a life lived in borrowed, compromised comfort is worse than a life lived in privationl..meenakshi my hindi is not as good as yours and neither is my english, but still i can appreciate good work...congratulations again hope to meet you some day..

Sanjeet Tripathi said...

सुंदर लिखा आपने!!

bhupen said...

बहुत ही छूने वाली टिप्पणी है. पालिटिकली करेक्ट भी है.

रवीन्द्र प्रभात said...

बहुत सुंदर मीनाक्षी जी,
नारी मन की व्यथा और अंत: संवेदनाओं पर इससे बेहतर टिपण्णी हो हीं नहीं सकती , कहा गया है कि सांच को आंच नहीं होता , आज आपका यह पोस्ट पढ़कर यह विश्वास और पुख्ता हो गया , बहुत सुंदर प्रस्तुति रही ! बधाईयाँ !

Divine India said...

बहुत ही बढ़िया लिखा है… मन को भावनाओं ने घेर लिया…।