Monday, January 30, 2017

ख़ुख़री सी आवाज़ वाला फ़ौजी



कब से बैठे हैं ये शब्द बेरोज़गार
ख्वाब दे कुछ इन्हें , इनको कुछ काम दे

खुख़री सी आवाज़ वाले फ़ौजी गौतम राजर्षि से पहली बार मिलने का सुखद अनुभव हुआ हालाँकि कश्मीर में आई बाढ़ के दिनों में चैट हुआ करती थी फिर भी आमने सामने मिलने की बात ही कुछ और होती है. उस  धारदार खरखरी आवाज़ में 'दीदी' सुन कर चरण स्पर्श करना अच्छा लगा हालाँकि मेले में मिलना भी कोई मिलना नहीं होता फिर भी मुझ जैसा सादा प्राणी कम को भी ज़्यादा समझ कर आनन्द ले लेता है. गौतम की किताब "पाल ले इक रोग नादाँ" के इंतज़ार की बदौलत कुछ देर और रुकना हो गया. आख़िरकार मेले से निकलते वक़्त वो भी मिल ही गई और जो अब पढ़ी जा रही है.

ख़्वाब जो भी बुना, वो बुना रह गया
उम्र बीती मगर बचपना रह गया


मिसरे, शेर, काफ़िए या फिर मुक्क़मल गज़ल हो उसके बनने में कानून कायदे का पूरा इल्म ना भी हो तो भी किसी भी किताब को पाठक अपने नज़रिए से पढ़ता समझता है. मेरे विचार में "पाल ले इक रोग नादाँ" की हर ग़ज़ल कई कहानियाँ कहती हुई सी लगती हैं. कई शेर मेरे दिल में उतर गए...कुछ का ज़िक्र यहाँ अपने ब्लॉग में दर्ज करने की इच्छा हुई.
रोज़ाना ही ख़ून ख़राबा पढ़कर ऐसा हाल हुआ       सहमी रहती मेरी बस्ती सुबहों के अख़बारों से"  
इस शेर को पढ़कर बड़े बेटे की याद आ गई जिसकी उम्र लगभग 9-10 साल की होगी जो टीवी में कई देशों में होती जंग और ख़ून ख़राबे को देख देख कर दुखी होता. उसका अबोध मन समझ ना पाता कि ऐसा क्यों होता है. एक दिन मेरे सामने दुनिया का नक़्शा रख दिया और  पूछने लगा, "मम्मी इस नक़्शे में देखो, बतायो यहाँ कौन सा देश है जहाँ लड़ाई नहीं होती, सब प्यार से रहते हैं ?"
धरा सजती मुहब्बत से , गगन सजता मुहब्बत से  मुहब्बत से ही खुशबू,  फूल, सूरज, चाँद होते हैं 
उस वक्त जवाब देते नहीं बना,  बेटे के सवाल ने बेचैन कर दिया था ,  शाम होने तक प्रश्नचिन्ह ने कविता का रूप ले लिया लेकिन एक आशा की किरण के साथ मन भी सँभला. मासूम बचपन सब कुछ जल्दी से आत्मसात कर लेता है इसलिए बच्चों को सबसे प्यार करते हुए चलने को कहा फिर चाहे प्रकृति , जीव-जंतु होंं या इंसान !

न मन्दिर की ही घंटी से, ना मस्ज़िद की अज़ानों से
करे जो इश्क वो समझे जगत का सार चुटकी में 

काश हम समझ पाएँ कि जगत एक खूबसूरत सपने सा है जिसे जितना प्यार और मुहब्बत से जिया जाएगा उतना 
ही आनन्द होगा जीवन में. मन में बहने वाले प्रेम की नदी उसमें सागर जैसा हौंसला भर देती है तभी तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी सीमा पर डटा रहता है.

ऐसा इश्क का बीज पड़ा  हुआ के
नस नस  में पनपा महुआ है

अजब हैंग ओवर है सूरज पे आज
ये बैठा था कल चाँदनी बार में 

सीमा का प्रहरी अपने देश का रखवाला है लेकिन एक इंसान पहले है जो देश के लिए मर मिटने का हौंसला 
रखता है तो उस पार के दुश्मन को मरते हुए देख कर भी विचलित हो जाता है. मरता हुआ सैनिक सोचता होगा 
कि क्या जंग से किसी समस्या का समाधान हो सकता है.

मुट्ठियाँ भींचे हुए कितने दशक बीतेंगें और
क्या सुलझता है कोई मुद्दा कभी हथियार से

चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से

 कभी कभी फौजी का मन अपने देशवासियों से कुपित होकर सवाल भी करता, उसे लगता है कि 
दूर कहीं कोई उसे याद भी करता है कि नहीं. उसका मन तो एक छोटी सी याद बन कर दिलों में बस जाना चाहता है. 

तेरे ही आने वाले महफ़ूज़ ‘कल’ की ख़ातिर
मैंने तो हाय अपना ये ‘आज’ दे दिया है

घड़ी तुमको सुलाती है, घड़ी के साथ जगते हो
ज़रा सी नींद क्या है चीज़ पूछो इस सिपाही से
  
फौजी गौतम का कवि मन पूरे जीवन को अन्दर बाहर से समझना समझाना चाहता है इसलिए किसी भी विषय को चित्रित करने से घबराता नहीं. 

चलो चलते रहो पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

‘यूँ ही चलता है’ ये कह कर कब तलक सहते रहें
कुछ नए रस्ते , नई कुछ कोशिशों की बात हो

मत चल लक़ीरों पर कभी 
जब जो भी कर अपवाद कर

ज़ुल्मों सितम पर चुप न रह 
हुंकार भर , उन्माद कर 

मुझे आज भी लेखन में छायावाद मोहता है, गौतम ने बड़े प्यार और मस्ती से निडर होकर नए निराले बिम्ब इस्तेमाल किए हैं जो सीधे दिल में उतर जाते हैं.
उबासी लेते सूरज ने पहाड़ों से जो माँगी चाय
उमड़ते बादलों की केतली फिर खौलती उट्ठी

भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले
पहाड़ों से चहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है

सुलगते दिन के माथे से पसीना इस कदर टपका
हवा के तपते सीने से उमस कुछ हाँफती उट्ठी 

मौत से आँख मिला कर चलने वाला वीर कभी भावुक होकर अपने घर परिवार की यादों में गुम हो जाता है. कभी बूढ़े पिता की याद आती तो गली कूचे और उनसे जुड़ी मोहक यादों में खो जाता.

घर आया है फ़ौजी जब से थमी है गोली सीमा पर
देर तलक अब छत के ऊपर सोती तान मसहरी धूप

बाबूजी हैं असमंजस में, छाता लें या रहने दें
जीभ दिखाए लुक छिप बादल में चितकबरी धूप

बरस बीते गली छोड़े मगर है याद वो अब भी
जो इक दीवार थी कोने में नीली खिड़कियों वाली

कभी पिता बन कर बेटी का मोह जाग उठता और उसके साथ बिताए पल याद आने लगते. 
अपने शहीद साथी की बड़ी होती बेटी की चिंता सताने लगती. 

क्यूँ खिलखिलाकर हँस पड़ा ‘झूला’ भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्हीं सी परी

झीने से लगने लगे घर के उसे सब पर्दे
बेटियाँ होने लगीं जब से सयानी उसकी

बिन बाप के होती हैं कैसे बेटियाँ इनकी बड़ी
दिन रात इन मुस्तैद सीमा प्रहरियों से पूछ लो 

कभी आशा का संचार करता हुआ निराश मन को समझाता है जाने कितने पाठक एक मिसरे को ही पढ़ कर 
जीने का नई राह पाते होंगे.

नन्हा परिन्दा टह्नियों पर जो फुदकता है अभी
छुएगा इक दिन उड़ के वो अम्बर भले कुछ देर से

हो हौसला तो डूबती कश्ती को भी साहिल तलक
ले जाता है उम्मीद का सागर भले कुछ देर से
कुछ काफ़िए ऐसे भी जिनसे अतीत के कई पन्ने फिर से याद आने लगे तभी तो यह कहना सही लगता है कि हर पढ़ने वाला अपने नज़रिए से किसी भी लिखे पर एक खत्म न होने वाली बहस कर सकता है. 

दिल थाम कर उसको कहा ‘हो जा मेरा!’ तो नाज़ से
उसने कहा “पगले ! यहाँ पर कौन कब किसका हुआ?”

हर्फ़ों की ज़ुबानी हो बयाँ कैसे वो क़िस्सा
लिक्खा न गया है जो सुनाया न गया है

पराक्रम पदक से सम्मानित कर्नल गौतम का जितनी बहादुरी से गोली का साथ रहा उतनी ही शिद्दत से गज़ल कहने में महारत हासिल की. 

उबरते रहे हादसों से सदा
गिरे , फिर उठे, मुस्कुरा कर चले

लिखा ज़िंदगी पर फ़साना कभी
कभी मौत पर गुनगुना कर चले

लगता है जैसे बहुत कुछ लिखना रह गया हो, एक बार और पढ़ना होगा... एक बार और लिखना होगा तब तक 
के लिए इतने लिखे को ही बहुत माना जाए. 
मीनाक्षी D

Friday, January 27, 2017

सीमा का रखवाला

बादल, बिजली, बारिश
और महफ़ूज़ घरों में हम
सैनिक डटे सीमाओं पर
हर पल रखवाली में व्यस्त
रखवाली में व्यस्त ना होते पस्त
दुश्मन हो या हो क़ुदरत का अस्त्र
अचल-अटल हिमालय जैसे डटे हुए
 बर्फ़ीले तूफ़ानों में गहरे दबे हुए
आकुल-व्याकुल से नीचे धँसे हुए
घुटती साँसों से लड़ते बर्फ़ में फँसे हुए
सीमा पर लडता गोली खाके मरता
अकुला के फिर सोचे सीमा का रखवाला !
सीमाहीन जगत प्रेमी हो हर कोई सोचे ऐसा
मरने-जीने का क्रम भी प्रेममयी हो जाए
निष्ठुरता क़ुदरत की हो या हो मानव की
करुणा में बदले, स्नेहमयी सृष्टि हो जाए !!

"मीनाक्षी धंवंतरि" 

Thursday, January 26, 2017

गणतंत्र दिवस 

दिल्ली से दुबई तक गणतंत्र दिवस का जश्न देखने और मनाने का आनंद अलग ही सुख दे रहा है. कई बरसों बाद पहली बार विश्व पुस्तक मेला देखा और अब गणतंत्र दिवस देखने का सौभाग्य मिला चाहे टीवी के सामने. दसवीं क्लास से कॉलेज ख़त्म होने तक हर साल परेड पर घर परिवार और मित्रों को लेकर जाने का ज़िम्मा जोश से पूरा करती थी. कॉलेज के आख़िरी साल में एन॰एन॰सी॰ की बदौलत ग़ैरिसन ग्राउंड में शामिल होने की याद भी ताज़ा हो गई.

"बादल, बिजली, बारिश
 और महफ़ूज़ घरों में हम
 सैनिक डटे सीमाओं पर
 हर पल रखवाली में व्यस्त"

 "देश महल है मेरा
 सजा सुनहरे कँगूरों से
 मेरा दिल सजदा करता
 नींव की ईंट बने वीरों का"

देश-विदेश के सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ !!

Tuesday, June 21, 2016

प्रेम - Unconditional




सागर की लहरों से बतियाती रेत पर लकीरें खींचती 
पीठ करके बैठी कोस रही थी चिलचिलाती धूप को 
सूरज की तीखी किरणें तीलियों सी चुभ रहीं थीं
हवा भी लापरवाह अलसाई  हुई कहीं दुबकी हुई थी 
बैरन बनी चुपके से छिपकर कहीं से देख रही होगी
सूरज के साथ मिल कर मुझे सता कर खुश होती है 
पल भर को मैं डरी-सहमी  फिर घबरा के सोचा 
क्या हो अगर धूप और  हवा दोनों रूठ जाएँ 
दूसरे ही पल चैन की साँस लेकर सोचा मैंने 
सूरज, चाँद , सितारे , हवा और पानी सब 
 जब तक साँस है तब तक सबका साथ  है 
जन्म-जन्म के साथी निस्वार्थ भाव से 
करते हम सबको
प्यार बिना शर्तों के !


Tuesday, June 14, 2016

अम्माजी के छोटे-छोटे सपने


ऑफिस से नीचे उतरते ही मैट्रो स्टेशन है. जहाँ से घर की दूरी चालीस मिनट की है. घर के पास वाला स्टेशन भी नज़दीक ही है. हर शाम पाँच बजे सीमा मदर डेरी में होती है. दूध , दही, सब्ज़ियाँ और फल लेकर ही घर जाती है. घर जाते ही फ्रेश होकर पहले अम्मा और अपने लिए चाय बनाती है. दोनों एक साथ चाय पीते हुए एक दूसरे से सारे दिन का हालचाल पूछते  हैं. 'बहू, आज भी सेब की सब्ज़ी बनाना. रात के खाने के लिए'. सास के इतना कहते ही सीमा बोल उठती है, 'अरे अम्मा कल तो कुछ था नहीं घर में. दाल से आपका यूरिक एसिड बढ़ जाता है इसलिए सेब की रसेदार सब्ज़ी बना ली थी, आज तो मैं आपकी पसन्द की सारी सब्ज़ियाँ ले आई हूँ.' अम्मा का झुर्रीदार चेहरा चमक उठता है. 'तो फिर सीताफल बनाना आज' कह कर चाय का लम्बा घूँट भरते हुए सीमा को प्यार भरी नज़र से देखती हैं.

'अम्मा, बस अभी आई, सीतफल यहीं ले आती हूँ' सीमा कहती हुई चाय के खाली प्याले लेकर किचन के सिंक में रख कर सीताफल थाली में ले आती है. इधर उधर की बातें करते हुए सीताफल कट जाता है. अम्मा को भी चाय पीते हुए सीमा से बात करना बहुत अच्छा लगता है. बुज़ुर्गों को सिर्फ इतना ही तो चाहिए कि बच्चे कुछ पल उनके साथ बैठे, यही पल उन्हें खुशी तो देते ही हैं साथ ही जीने के लिए नई उर्जा भी दे जाते हैं. आज स्कूल की पिकनिक के कारण बच्चे शाम छह बजे से पहले घर लौटने वाले नहीं थे इसलिए सीमा कुछ बेफिक्र थी .  इत्मीनान से अम्मा के पास बैठ कर बतियाते हुए सब्ज़ी काट रही थी.

सीमा के छोटे से घर परिवार में सुख-शांति है. एक दूसरे के लिए प्रेम और आदर है. सभी एक दूसरे की ज़रूरतों और सुविधाओं का ख्याल रखते हैं. इस घर में कलह होता है तो सिर्फ एक ही बात पर कि राजेश परिवार को लेकर कहीं बाहर घुमाने नहीं ले जाता. उसकी अपनी मजबूरियाँ हैं. दो साल से नई नौकरी की तलाश में जुटे राजेश को बस इंतज़ार है एक अच्छी नौकरी का. जिस दिन उसके मनपसन्द की नौकरी मिलेगी, पहली छुट्टी में सभी मनाली घूमने जाएँग़ें. सीमा भी यह जानती है इसलिए गुस्से पर जल्दी ही काबू पा लेती है.

इस बात को ध्यान में रखते हुए राजेश ने पिछले साल अम्मा के जन्मदिन पर उन्हे टचपैड लेकर दिया था जिस पर वे कुछ गेम्ज़ बड़े शौक से खेलती हैं. उन्हें हिन्दी के सीरियल पसन्द नहीं. टीवी पर संगीत के कार्यक्रम अच्छे लगते हैं या नेशनल जीयोग्राफ़ी देखने का शौक रखती हैं . कुछ दिन बाद राजेश ने सीमा के लिए भी होम थिएटर खरीदा. राजेश अच्छी तरह जानता है कि संगीत सीमा में गजब की मस्ती भर देता है. उसे कितनी भी थकावट होगी अच्छे म्युज़िक सिस्टम पर संगीत सुनते ही दूर हो जाएगी.

'अम्मा, बच्चे आने वाले हैं, जल्दी से खाना पका लूँ नहीं तो उनके ऊधम से काम रुक जाएगा' सीमा कहते हुए उठ जाती है. पीछे पीछे अम्माजी भी किचन में आ जाती हैं. जानती हैं कि किचन में काम करते हुए सीमा को ऊँची आवाज़ में म्युज़िक सुनने की आदत है इसलिए अम्मा अपने कानों पर ईयर प्रोटेक्टर लगा कर म्युज़िक सिस्टम ऑन कर देती हैं. सीमा के मना करने पर भी आटा गूँदने वाली  मशीन में आटा गूँदने लगती हैं. उधर सीमा एक तरफ कुकर में दाल और दूसरी तरफ सीताफल पकने के लिए रख देती है.

ऊँची आवाज़  में संगीत सुनते हुए सीमा के हाथ फुर्ती से चलने लगते हैं. फटाफट सलाद काट कर डाइनिंग टेबल पर रखती है और अम्मा के लिए गाजर कद्दूकस करके उसमें नींबू की दो चार बूँदें भी डाल देती है. म्यूज़िक की ऊँची आवाज़ के कारण दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई नहीं देती...हमेशा की तरह राजेश कुछ कहते  उससे पहले ही सीमा खिलखिलाते हुए उसकी नकल करते हुए कहती है, " चोर की मौसी , चोरों का काम आसान कर देती हो " बेटा बहू को हँसते हुए देख कर अम्मा के मुहँ पर भी ढेर सारी हँसी फैल जाती है. बिना कुछ सुने ही बस बहू बेटा को मुस्कुराते खिलखिलाते देख उनका झुर्रीदार चेहरा भी खिल उठता है.

हमेशा की तरह फ्रेश होने के बाद राजेश भी किचन में आ जाता है. 'हैलो अम्मा.....ठीक हो?'  इशारे से ही मुस्कुराती अम्मा थम्ज़अप का इशारा कर देती हैं. घर आकर सीमा और राजेश ऑफिस का कम ही ज़िक्र करते हैं. बच्चों के बारे में राजेश कुछ पूछते कि डोरबेल बज उठती है... पिकनिक से थके दोनो बच्चे घर पहुँचते ही फिर से जोश में आ जाते हैंं. बड़ी पोती सारे दिन का लेखाजोखा सुनाने के लिए  दादी को उनके कमरे में खींंच कर ले जाती है. छोटी पोती भी पीछे पीछे पहुँच जाती है. राजेश तब तक हाथ मुँह धोकर वापिस किचन में आता है सीमा का हाथ बँटाने. दोनों मिल कर डाइनिंग टेबल पर खाना लगाते हैं. सीमा जानती है कि राजेश को आजकल के नए गाने बिल्कुल पसंद नहीं इसलिए खाना खाते वक्त कम आवाज़ में ग़ज़लें लगाना नहीं भूलती.
खाते हुए बोलना अम्माजी को कतई पसंद नहीं लेकिन अपनी बातों से एक दूसरे को पछाड़ती पोतियों के मुस्कुराते चेहरे देख कर खुद भी मुस्कुराने लगतींं हैं. खाने के बाद दोनों पोतियाँ बेफिक्री और मस्ती से डाइनिंग टेबल को साफ करती हैं. बचे  हुए काम को समेटते हुए बेटा बहू कब अपने कमरे में जाते हैं उन्हें नहीं पता. खाना खत्म करते ही हमेशा की तरह बच्चों को शुभरात्रि कह कर वे अपने कमरे में लौट आती हैं.  
अक्सर उदासी की चादर ओढ़े रात के अंधेरे में अकेली तन्हा कभी कभी सिसकती हैं अपने साथी को याद करते हुए फिर भी एक सुकून की नींद सोती अपने छोटे छोटे सपनों की दुनिया में खुश हैं अम्माजी  !