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शनिवार, 27 अगस्त 2011

ज़िन्दगी एक बुलबुला है !

ज़िन्दगी एक बुलबुला है 


  आज के दिन ........ 
"  प्रेम ही सत्य है"  ब्लॉग जन्मा था .... हमेशा ज़िन्दा रहेगा अंर्तजाल पर  डॉ अमर कुमार की तरह ..... 
ब्लॉग को जन्म देने वाला न रहेगा....  कभी अचानक वह भी चल देगा डॉ अमर की तरह ..... 


Dr.Amar Favorite Quotation on Facebook : "  मुझे पढ़ लो, हज़ार कोटेशन पर भारी पड़ूँगा"  


चेतन जगत को लेकर कुछ ऎसे ही ख़्यालात मेरे भी हैं.. पर मृत्यु के बाद क्या और कैसे होगा.. यह नहीं सोचता । 
मूँदहू आँख कतऊ कछु नाहीं... कौन अपना जिया जलाये जिस तरह परिजन चाहें.. क़फ़न दफ़न करेंकुछ तो करेंगे हीदुनिया को दिखाना होता है... वैसे न भी कुछ करें मृत प्राणी को क्या फ़र्क़ पड़ता हैजिन्दा में घात प्रतिघात.. मरने पर दूध भात !  on आख़िरी नींद की तैयारी


नहीं जी, कम से कम मैंने तो आपकी पिछली पोस्ट का कोई अनर्थ न लिया. बरसों पहले (शायद 1982 में) एक अठन्नी के बदले किसी अनाम फ़क़ीर ने दुआ दी कि, “ज़िन्दगी में हमेशा मालिक को, और मौत को याद रखा करो, ताउम्र बिना कोई गलती किए सुखी रहोगे.” यह सूत्र मैंने अपना लिया है, मुझे किसी बात से कोई भय नहीं लगता. एक दूसरा सूत्र और भी...लेकिन वह यहाँ उतना प्रासंगिक नहीं है. आपके होनहार द्वय के चित्र व संगीत सँयोजन उत्कृष्ट के आस कहीं पर ठहरे हुए हैं...किंतु चीकने पात दिख गए. on यही तो सच है......


शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

जीवन का ज्वार-भाटा


नर और नारी

सागर किनारे बैठे थे 
झगड़ा करके ऐंठे थे 
रेत पर नर नारी लिखते 
लम्बे वक्त से मौन थे
नर ने मौन तोड़ा
नारी को लगा चिढ़ाने
दो मात्राओं की बैसाखियाँ
लिए हर दम चलती नारी
मै बिन मात्रा के हूँ नर
बिना सहारे चलता हरदम
नारी कहाँ कम थी
झट से बोल उठी
दो मात्राओं से ग़रीब
बिन आ-ई के फक़ीर
कमज़ोर हो तुम
बलशाली होने का
नाटक करते हो 
सुन कर नर भड़का
नारी का दिल धड़का
तभी अचानक लहरें आईं
रेत पर लिखे नर नारी को
ले गई अपने साथ बहा कर
गुम हो गए दोनों सागर में
जीवन का ज्वार-भाटा भी
ऐसा ही तो होता है .... !! 


मंगलवार, 2 अगस्त 2011

सूरज, साया और सैर

नियमित सैर के लिए किसी गंभीर बीमारी का होना ज़रूरी नहीं है...बस यूँ ही नियम से चलने की कोशिश है एक. आजकल सुबह सवेरे भी निकलते हैं सैर के लिए... सुबह सवेरे मतलब साढ़े सात आठ बजे......दोष हमारा नहीं...सूरज का है..(दूसरों पर दोष डालना आसान है सो कह रहे हैं) ... उसे ही जल्दी रहती है निकलने की... जाने क्यों कभी आलस नहीं करता.... निकलता भी है तो खूब गर्मजोशी से .... हम भी उसी गर्मजोशी से उसका स्वागत करते हुए सैर करते हैं लेकिन साया बेचारा....बस उसे देखा और कुछ लिखा दिया कविता जैसा..... 

सुबह सवेरे सूरज निकला
मैं और मेरा साया भी निकला
सूरज पीछे....साया आगे
हम सब मिल कर सैर को भागे
देखूँ साए को आगे चलता
पीछे मेरे सूरज है चलता
ज्यों ज्यों मेरी दिशा बदलती
त्यों त्यों साए की छाया चलती
आगे सूरज पीछे साया
पीछे सूरज आगे साया
आते जाते पेड़ों की छाया में
छिपता उनमें मेरा साया
आगे पीछे मेरे होता
सूरज की गर्मी से बचता
लुकाछिपी का खेल था न्यारा
साया मेरा मुझको प्यारा 


शनिवार, 30 जुलाई 2011

गर्मी में सैर


आजकल घर की सफ़ाई का अभियान चल रहा है... दोनों बेटों की मदद से रुक रुक कर पूरे घर की सफ़ाई की जा रही है... दो तीन दिन में घर को रंग रोगन से नया रूप भी दे दिया जाएगा... इस बीच जाने क्या हुआ कि आँखें स्क्रीन पर टिक ही नहीं पातीं.... काली चाय को ठंडा करके उससे बार बार आँखें धोकर कभी काम तो कभी यहाँ उर्जा पाने आ बैठती हूँ कुछ पल के लिए लेकिन फिर लिखना पढ़ना न के बराबर ही है.....बस सैर को नियमित रखने की कोशिश जारी है ......... 

सैर के लिए तन्हा 
रात के पहले पहर निकलती हूँ
गर्मी के मौसम में
लाल ईंटों की पगडंडियों पर चलती हूँ 
जो लगती हैं धरती की माँग जैसी 
लेकिन बलखाती सी.. 
हरयाली दूब के आँचल पर 
टंके हैं छोटे बड़े पेड़ पौधे बूटेदार 
कभी वही लगते धरा के पहरेदार 
सीना ताने रक्षक से खड़े हुए 
कर्तव्य पालन के भाव से भरे हुए...
उमस घनेरी, घनघोर अन्धेरा  
अजब उदासी ने आ घेरा
फिर भी पग पग बढ़ती जाऊँ 
आस के जुगनू पथ में पाऊँ
मन्द मन्द मुस्काते फूल 
खिले हुए महकते फूल  
कहते पथ पर बढ़ते जाओ 
गर्म हवा को गले लगाओ !! 






बुधवार, 27 जुलाई 2011

सपने डराते भी हैं... .!

सपने अक्सर् सुहाने होते हैं लेकिन जब डराते हैं तो फिर भूलते नहीं.... कुछ् दिन से फिर शुरु हुए प्लेन क्रेश के सपने.... अच्छी तरह से जानती हूँ कि एक दिन हम सबने जाना है इसलिए मौत से भागना बेकार है.....

कभी बहुत पहले कनिष्का प्लेन क्रेश से भी पहले से हवाई दुर्घटना के सपने आते थे.... दूर आकाश में उड़ते जहाज़ों को क्रेश होते देखती हूँ .... कभी उनमें बैठी नहीं..... बीच बीच में ऐसे सपने आना बंद हो जाते हैं.... अब फिर से शुरु हुए वही सपने.... पिछले हफ्ते..... कल रात फिर ....... खड़ी हूँ धरती पर...नज़र है आकाश पर..... चाँद तारे क्यों नहीं दिखते.... सिर्फ हवाई जहाज़ ही क्यों दिखते हैं..... दिखते हैं तो दिखें...... लेकिन अचानक अपने रास्ते से भटकते.... तेज़ी से घूमते.. चक्कर लगाते.... धड़ाम से नीचे गिरते ही क्यों दिखाई देते हैं....... आजकल फिर से इन सपनों ने तंग करना शुरु कर दिया है.....

कुछ सपने दिल और दिमाग की डायरी में दर्ज हो जाते हैं और कुछ पल भर के लिए ही ज़िन्दा रह पाते हैं...

*बचपन का एक ही सपना याद रह जाता है .... ऊपर से नीचे की तरफ गिरना....

*समुद्र के किनारे एक किशोर लड़के को अजीब सी पोशाक में खड़े देखना... जो टकटकी लगाए मुझे देखता रहता है बिना कुछ बात किए.....सालों तक यह सपना आता रहा... फिर सच हो गया...

* एक बड़ा आलीशान घर हवेली जैसा.... ऊपर की ओर जाती लाल कालीन से ढकी सीढियाँ और उस पर चलता एक काले रंग का मकोड़ा......

*एक काला हाथ ...जबरन पकड़ कर अपनी ओर खींचता ......

*सफेद कपड़ों में लिपटी एक ममी को दरवाज़े की दहलीज पर खड़े मेरी तरफ देखना... चेहरा कभी दिखाई नहीं दिया....ऐसा लगता कि वह मेरी रक्षा के लिए दरवाज़े पर खड़ी है....

*सपनों में डैडी का आना.... हर सपने में मेरे करीबी दोस्त के साथ चिर परिचित मुस्कान के साथ बातें करना...असल ज़िन्दगी में एक बार मिले उस दोस्त को मम्मी डैडी अपना सा मानते जानते थे...

*रोते चाँद को देखना...फिर सपने में ही सोचना कि मुझे ही क्यों यह रोता चाँद दिखाई देता है....

*चाँद का पीला पड़ जाना..... उसके ऊपर काला जाला ....जिसे हटाने की पूरी कोशिश करना..... उसके बाद फीके चाँद का दिखना

* कई सपने आए और गए....लेकिन हवाई दुर्घटना के सपने हैं कि पीछा ही नहीं छोड़ते..... अनगिनत सपने हैं जिनमें प्लेन क्रेश होते हुए देखती हूँ और घबरा कर उठ जाती हूँ ... सभी सपनों में एक बात कॉमन है कि किसी भी हवाई जहाज़ में मैं कभी बैठी नहीं..... सभी को दूर से क्रेश होते देखती हूँ फिर भी मन बेचैन और अशांत हो जाता है....

इस वक्त मन शांत है.... मन कहता है मत घबरा.... हर हाल में खुश रहना है....ठान ले बस......
 मंज़िल तक जाने का रस्ता बदलेगा..... आसमान से...... आसमान में उड़ने की चाहत होगी पूरी ....
धरती पर..... धरती के आँचल में छिपने का सुख पाएगी..... जहाँ कहीं जैसे तैसे... जाना तो निश्चित है... !!


बुधवार, 13 जुलाई 2011

रूठी कविता


जाने क्यों आज सुबह से ....
मेरी 'कविता' रूठी है मुझसे
दूसरी कविताओं को देख कर
वैसा ही बनने की चाहत जागी है उसमें...
मेरे दिए शब्द और भाव अच्छे नहीं लगते उसे
दूसरे का रूप और रंग मोहते हैं उसे
मेरी 'कविता' नहीं जानती, समझती मुझे
मैं भी उसे उतना ही दुलारती सँवारती हूँ
जितना कोई और ............

जाने क्यों उसे भी आज के दौर की हवा लगी है...
अपने पास जो है उससे खुश नहीं....
दूसरे का रूप-रंग देख कर ललचाती है...
उन जैसा बनने की आस करने लगी है...
जो अपने पास है , वही बस अपना  है...
यह समझती ही नही....

जाने क्यों हीन-भावना से उबरती  नहीं ...
अपने स्वाभाविक गुणों  को  पहचानती नहीं
पालन-पोषण में क्या कमी रह गई...
कविता मेरी क्यों कमज़ोर हुई...
मैं हैरान हूँ , परेशान हूँ , उदास हूँ  !!


देख मुझे मेरी रूठी कविता ठिठकी
उतरी सूरत मेरी देख के  झिझकी
फिर सँभली....रुक रुक कर बोली....
"कुछ पल को कमज़ोर हुई...
नए शब्द औ' भाव देख के 
आसक्त हुई... 
तुम मेरी जननी हो...
मैं तुमसे ही जनमी हूँ ...
जो हूँ , जैसी हूँ ..
यही रूप  सलोना मेरा अपना है !!"





शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

कल रात मैं रात के संग थी...



कल रात मैं रात के संग थी
तन्हाँ सिसकती सी रात को ....
समझाना चाहा ...
हे रात ! तुम्हें ग़म किस बात का 
साए तो सदा साथ रहते हैं अंधेरों के... 
देखो तो दिवस को ... 
पहर दर पहर 
साए आते जाते हैं 
फिर साथ छोड़ जाते हैं... 
दिन ढलता जाता है 
और फिर मर जाता है...! 
हम भी कितने पागल है
यूँ ही बस किसी अंजान साए के पीछे भागते हैं... 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

आज लाखों का नुक्सान हो जाता ग़र.....!

 मेरी नई चप्पल 

सच कहा गया है कि ईश्वर जो करता अच्छे के लिए ही करता है....हुआ यूँ कि कार की रजिस्ट्रेशन कराने के लिए एक कम्पनी से आए कर्मचारी को कार , पैसे और पेपर देने की जल्दी में बेटे के साथ हम अंडरग्राउंड पार्किंग  की तरफ जा रहे थे...पूरे साल का ज़ुर्माना लगभग 1,250 दरहम था....स्पीडिंग करने और  पार्किंग गलत करने या दस मिनट भी ऊपर हो जाने पर दुबारा टिकट न लगाने का हर्ज़ाना तो भरना ही था... रजिस्ट्रेशन की फीस भी देनी थी.....
पैसे कम पड़ गए थे इसलिए एटीएम मशीन से पैसे निकालने की जल्दी में ऊँची एड़ी की नई चप्पल पहन कर घर से निकले.......जाने क्या सोच कर ऊँची हील की चप्पल खरीद ली थी ...नए फैशन की नई चप्पल पहने हुए तेज़ गति से आगे बढ़ते जा रहे थे....एक पल के लिए भी नहीं लगा कि चप्पल कहीं धोखा दे जाएगी....दिखने में भी अच्छी और पहनने में भी सुविधाजनक.....पता नहीं क्यों हम ऊँचा होने की ललक नहीं छोड़ पाते.... पटक दिया उसने ज़मीन पर..... चप्पल ने ही सिखा दिया.....क्या ज़रूरत है ज़मीन से कुछ इंच भी ऊपर होने की...जहाँ हो, जैसे हो, वैसे ही रहो....!! 
जैसे हैं वैसे ही क्यों नहीं रह पाते, यह समझ आ जाए तो फिर कोई गिरता ही नहीं... गिर कर फिर उठने की कला से भी वंचित रहता......ख़ैर .दूसरों की नकल करने का अंजाम क्या होता है आज गिरने पर जाना...विद्वानों ने सही कहा है कि नकल करने में  भी अक्ल की ज़रूरत होती है.....मन ही मन ठान लिया कि हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे ...उसी रूप में जो स्वीकार ले वहीं अपना......... 
ज़मीन पर पड़े पड़े सोच रही थी कि अगर मैं वही पहले जैसी छरहरी , पतली सी टुथपिक जैसी होती तो लाखों का नुक्सान हो जाता.....गिरते ही झट से हड्डी टूट जाती ...क्या पता कंधे, कूल्हे या घुटने पर प्लास्टर चढ़वाना पड़ता.... अस्पताल का भारी खर्चा उठाना पड़ता..बिस्तर पर  पड़ जाते सो अलग......
मान भी लिया जाए कि पतले लोग सेहतमंद और मज़बूत होते हैं लेकिन धीरे धीरे पचास तक आते आते  हडियाँ तो  कमज़ोर  होने ही लगती हैं... उस पर अगर माँस मज्जा की कमी हो तो पूछो नहीं कितना पैसा डॉक्टरों की जेब में जाने को आतुर हो जाए......
अब हम खाते पीते घर के हैं....वैसे ही भरे पूरे परिवार के दिखने भी तो चाहिए...... लेकिन घरवालों की  रातों की नींद बेकार में ही ग़ायब हो जाती है....हमें देख देख कर दिन रात बस हमारी लम्बी उम्र की कामना करते हुए दिखते हैं...अब उन्हें कैसे समझाएँ कि हम जैसे सेहतमंद लोगों का दिल झट से चाबी की तरह शरीर से निकलता है और कार बन्द... :) होना भी यही चाहिए न.... सोते सोते ही निकल जाओ चुपके से... 
खैर इतनी लम्बी भूमिका के बाद असल कहानी पर आते हैं कि आज सुबह सुबह हम गिर गए...पैर फिसला नहीं (शुक्र है)अचानक से बायाँ पैर मुड़ गया... दाहिना पैर आगे निकल गया... अब दोनों पैरों को दिमाग क्या आदेश देता...वह भी कंफ्यूज़ हो गया..... हम धड़ाम से ज़मीन पर...... लेकिन गिरते ही  दिमाग ने दाएँ बाज़ू को संकेत दे दिया कि सहारा देकर गिरते हुए शरीर को सँभाल लेना .... बस दाईं बाज़ू के सहारे इतने ज़ोर से गिरे कि लगा जैसे भूचाल आ गया हो.... एक पल लेटे रहे...दो पल बैठे रहे.... इधर उधर देखने लगे कि कोई देख तो नहीं रहा....आज तक समझ नहीं आया कि गिरते हुए को देख कर लोग हँसते क्यों हैं.... मज़ा क्यों  लेते हैं जैसे वे तो कभी गिरते ही न हों....  
शुक्र  था कि अंडरग्राउंड पार्किंग में सिर्फ दो कर्मचारी काम कर रहे थे....दौड़े आए....फर्श पर लाल रंग के रोग़न की चमकती दो तीन बूँदें देख कर घबरा गए...बैठे बैठे ही हमने बड़ी सी मुस्कान बिखेरते हुए कहा...'आए एम एन इंडियन वुमैन' ...दोनो कर्मचारी यह सुनते ही मुस्कुराते हुए वापिस लौट गए..... भारतीय औरत ही क्यों पूरी दुनिया की औरत का इतिहास  किसी से छिपा नहीं........कभी कभी औरत लीची फल जैसी दिखती है...एक आवरण ओढ़े कोमल मन रसभरा फल जैसा.. जो अन्दर ही अन्दर सख़्त गुठली जैसे गज़ब का बल लिए रहती है... 
उसी पल अपनी कार की तरफ बढ़ता बेटा पीछे पलटा... उसे समझ नहीं आया कि क्या करे....भागता हुआ मुझे उठाने की कोशिश  करता उससे पहले ही हम आधे उठ चुके थे...(ऊपर के लिए नहीं...:) ) घुटनों के बल खड़े हुए तो बेटे ने हाथ देकर खड़ा कर दिया... वैसे वह न भी होता तो दो नहीं तो पाँच मिनट के बाद खुद ही खड़े हो जाते... वह तो सामने सुविधा देख कर हम कमज़ोर होने लगते हैं या दिखाने लगते हैं.... 
खैर खड़े हुए...चाहे हम  ज़िन्दगी का आधा सफ़र  पार कर चुके हैं फिर भी  इतना तो यकीन था कि हड्डियाँ ज़मीन से बहुत दूरी पर थी... उनके टूटने का तो सवाल ही नहीं था ...  बेटा परेशान देख रहा था... झट से कार की चाबी लेकर खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गया ..... काँपते हुए हम पेसेंजर सीट पर जा बैठे.....बार बार एक ही सवाल करता गया...  .. 'आप ठीक तो है..... हाथ हिलाइए...पैर हिला कर दिखाइए... ' अच्छी भली कसरत करवा निश्चिंत हुआ कि सब ठीक है लेकिन उसे समझ न आया कि शरीर अन्दर तक कैसे हिल गया.....
अब उसे समझाने के लिए उनके बचपन के दिनों के एक खिलौने की चर्चा करनी पड़ी.....पंचिंग टॉय जिसे पंच मार मार कर बच्चे  गिराते  लेकिन फिर से वह उठ खड़ा होता ...उसके तल में मिट्टी का बैग अगर टूट कर अन्दर ही बिखर जाए तो बेचारा एक पंच खाकर भी फिर उठ नहीं पाता...शरीर के अन्दर के दर्द के लिए दिए गए उदाहरण को सुन कर वह ज़ोर से हँसने लगा..... उसे देख मैं भी खिलखिला उठी....
पंच खाने के इंतज़ार में 

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

गुलमोहर और ताड़


मेरे घर के सामने

हर रोज़ ध्यान लगाने की कोशिश करती हूँ ....
आँखें खुलते ही शीशे की दीवार से पर्दा हटा देती हूँ ...
दिखता है विस्तार लिए नीला आसमान ... 
उस पर उसी के बच्चे से बादल
हँसते-रोते सफ़ेद रुई के फोहे से 
कभी कभी तो धुँए के तैरते छल्लों से लगते  ...
ध्यान हटाती हूँ ...
आँखें नीचे उतरने लगती हैं पेडों पर ....

गुलमोहर और ताड़ के पेड़
कैसे एक साथ खड़े हैं...बाँहों में बाँहें डाले...
गुलमोहर की नाज़ुक बाँहें नन्हें नन्हें 
हरे रोमकूप से पत्तों सी कोमल...
ताड़ की सूखी खुरदरी... 
तीखी नोकदार फैली हुई सी बाँहें.....
फिर भी शांत..ध्यानमग्न हो जैसे एक दूसरे में...
मेरा ही ध्यान क्यों टूट जाता है....!! 

अपनों के बीच भी हम कहाँ रह पाते हैं
अपना मान कर एक दूसरे को ...!!




गुरुवार, 30 जून 2011

एक कर्मयोद्धा सा


रियाद में अपने घर की खिड़की से ली गई तस्वीर 




सड़क के उस पार शायद कोई मजदूर बैठा है
कड़ी धूप में सिर झुकाए जाने क्या सोचता है...
मैं खिडकी के अधखुले पट से उसे देखती हूँ
जाने क्या है उसके मन में यही सोचती हूँ ..
कुछ देर में अपनी जेब से पर्स निकालता है
शायद अपने परिवार की फोटो निहारता है
बहुत देर तक एकटक देखता ही रहता है
कभी होठों से तो कभी दिल से लगाता है
जाने कितने सालों से घर नहीं गया होगा...
अपनों को याद करके कितना रोया होगा..
विधाता ने किस कलम से उनका भाग्य लिखा...

एक पल के लिए दुखी होती हूँ ------
दूसरे ही पल मुझे वह -------
हर बाधा से जूझता एक कर्मयोद्धा सा दिखा..!!


रविवार, 26 जून 2011

पलाश




लाल फूलों से दहकता पलाश
जैसे पछतावे की आग में जलता हो...
कभी उसने शिव पार्वती के
एकांत को भंग किया था





शांति दूत सा सफेद पलाश
खड़ा मेरे आँगन में ...
कभी निहारती उसे
कभी अपने आप को
वर्षों तक अपने शरीर को उसके आग़ोश में
सरंक्षित रखने की इच्छा जाग उठी ...


शुक्रवार, 24 जून 2011

खिड़की के बाहर खड़े पेड़




खिड़की के बाहर खड़े पेड़
हमेशा मुझे लुभाते हैं....
उनकी जड़ें कितनी गहरी होगीं..
मानव सुलभ चाहत खोदने की ...
उनका तना कितना मज़बूत होगा ...
इच्छा होती छूकर उन्हें कुरेदने की ...
उनकी शाखाओं में कितना लचीलापन होगा...
पकड़ कर उन्हें झुका लूँ
या झूल जाऊँ उन संग
खिड़की के बाहर खड़े पेड़
हमेशा मुझे बुलाते हैं..
कभी सर्द कभी गर्म
हवाओं का रुख पाकर

अचानक शाख़ों में छिपे पंछी चहचहाते
जबरन ध्यान तोड़ देते हैं मेरा.....!!! 

मंगलवार, 21 जून 2011

'हरी मिर्च' के साथ 'स्वप्न मेरे' बन गए यादगार पल

वीडियो से ली गई तस्वीर में मनीषजी और दिगम्बरजी 


महीनों या शायद सालों से मिलने की सोच सच में बदली तो खुशी का कोई ठिकाना ही न था.. बहुत दिनों की कोशिश रंग ले ही आई और हमें दिगम्बर नासवा (स्वप्न मेरेऔर मनीष जोशी 
('हरी मिर्च') से मिलने का मौका मिल ही गया. बस उसी खुशी में उन पलों को तस्वीरों में कैद करना ही भूल गए.
पहले थोड़ा हिचकचाए थे कि घर कई महीनो से बच्चों के हवाले था...दीवारों पर अल्मारी के शीशे के पल्लों पर तस्वीरें बनी हैं... घर के सभी कोनों में बच्चों का ही सामान दिखाई देता है... इस झिझक को तोड़ा बच्चों ने... याद दिलाया कि आप तो दिखावे में यकीन नहीं करती थी फिर अब क्या हुआ.... आप दोनों ब्लॉग मित्रों को बुलाइए उन्हें बिल्कुल बुरा नहीं लगेगा क्यों कि सब जानते हैं कि बच्चों से घर घर लगता है.....बच्चों से बात करते करते बस जोश आया और दोनो परिवारों को फोन कर दिया... मिलना तय हुआ 17 जून शुक्रवार ...
मनीषजी  और उनकी पत्नी मोना पहले पहुँचे....पहली बार मिलने पर भी लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिले...एक अपनापन लिए मुस्कुराते दो चेहरे सामने थे जिनकी मुस्कान देख कर मन खुश  हो गया...उनके हाथ में फूल देख कर तो खुश हुए लेकिन बच्चों के लिए चॉकलेट्स और घर के लिए खुशबू का तोहफा पाकर समझ न पाए कि क्या करें क्या कहें.... कुछ ही देर में दिगम्बर और उनकी पत्नी अनिता भी आ गए...स्वागत में खड़े कभी उन्हें देखते तो कभी उनके लाए तोहफे को... पता नहीं क्यों किसी से उपहार पाकर मन समझ नहीं पाता कि कैसे व्यवहार किया जाए... हाँ देते वक्त कोई मुश्किल नहीं होती... आते ही दिगम्बरजी ने समीरजी की दो पुस्तकें भी थमा दीं (सिर्फ पढ़ने के लिए ली हैं) और भी कई किताबों का लालच दे दिया .. मन ही मन सोच लिया कि अगली बार उन्हीं के घर जाकर उनकी किताबों का संग्रह देखा जाएगा ... वैसे हम सबने ही तय कर लिया कि अगली मुलाकात जल्दी ही होगी...
दिगम्बरजी कुछ संकोची स्वभाव के लगे लेकिन अनिता उनके विपरीत खिलखिलाती सी मिली....
गहरी नदी की धारा सी शांत लेकिन कहीं चंचल लगने वाली मोना के व्यक्तित्व ने जहाँ प्रभावित किया वहीं झरने सी झर झर बहती अनिता के स्वभाव ने मन मोह लिया.... समुद्र की गहराई लिए हुए दो ब्लॉगर कवि धीरे धीरे सहज हो गए और फिर महफिल ऐसी लगी कि मन ने चाहा बस यूँ ही दोनों कवियों का कविता पाठ चलता रहे...    
विद्युत को जब पता चला कि कविता पाठ होने वाला है तो  एक छोटा सा विडियो कैमरा सोफे पर फिक्स कर दिया ताकि दिगम्बरजी और मनीषजी की कविता रिकॉर्ड कर ली जाएहालाँकि बाद में डाँट भी खाई कि तस्वीरें लेने का ख्याल क्यों ना आया........खैर दोपहर के खाने के बाद दोनों कवियों की कविता सुनने की माँग हुई तो वरुण का लैपटॉप थमा दिया गया कि अपनी ऑनलाइन ड्यारी (ब्लॉग़) खोलिए और कुछ अपनी पसन्द का सुना दीजिए....हमें सबसे अच्छा यह लगा कि दोनो बच्चे इस दौरान हमारे साथ ही बैठे रहे और कविताओं को न सिर्फ सुना ...उनको समझने की कोशिश भी की. 
पढ़ी गई कविताओं के लिंक भी लगा रही हूँ,,,, साथ साथ पढ़ने में शायद कोई रुचि रखता हो ... 
मनीषजी की  जीवन साथी कविता वीडियो में दर्ज नहीं हो पाई लेकिन चुहलकदमी और  बढ़ते हुए बच्चे का लुत्फ आप ले सकते हैं... उसके बाद उन्होंने लैपटॉप दिगम्बरजी को पकड़ा दिया... उनकी मुक्त छन्द की कविताएँ बच्चों को आसानी से समझ आ रही थी इसलिए रौ में वह पढ़ते गए और सब उसी रौ में सुनते गए ... उफ़ .... तुम भी न नीला पुलोवर बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है  झूठ   
लेकिन मैं झूठ नहीं कहूँगी कि जब भी दोनो कवियों से फिर मिलना होगा उनकी कविताएँ सुनने का मौका नहीं जाने दूँग़ी...!!!








बुधवार, 15 जून 2011

नूतन व पुरातन का समन्वय (कबीर जयंती)


"डॉअमर की पोस्ट पढ़ने पर ही पता चला कि आज कबीर जयंती है ... या अध्यापन के दिनों में पता चलता कि कौन सी जयंती किस दिन है...संत  कबीर और रहीम हमेशा से प्रिय रहे क्यों कि बच्चों  को पढ़ाते हुए उनका ज़िक्र न हो ऐसा हो ही नही सकता था...नवीं दसवीं के बच्चों को कबीर के दोहे याद कराने के लिए उनका अर्थ समझाने के लिए क्या क्या पापड़ नहीं बेले थे...कभी बच्चों को पॉप की नकल करके दोहे सुनाने की भी इजाज़त दे दी थी.... उन्हीं बच्चों के कारण ही ऐसा लेख लिख पाए कि किसी भी तरह जीवन मूल्यों का महत्त्व कहने वाले संत फकीर उन्हें याद रह पाएँ" 
(यह लेख 2007 में पोस्ट किया जा चुका है जब हमने अभी नया नया ब्लॉग बनाया ही था... किसी ने पढ़ा भी न हो शायद....आज 'कबीर जयंती' के  दिन फिर से इसे पोस्ट करने का श्रेय डॉ अमर को जाता है)


भारतेन्दु युग से नूतन और पुरातन के बीच संघर्ष रहा है। भाषा के विकास के लिए भाषा से जुड़े‌ विषयों को पुराना ही रहने दें या नए-नए विषयों का समावेश किया जाए या पुराने विषयों का सरलीकरण किया जाए। इस संघर्ष में भारतेन्दु जैसे लेखकों ने तटस्थ न रहकर दिशा में नेतृत्व देकर आधुनिकता के आरम्भ के लिए ज़मीन तैयार की थी। आज फिर प्राचीन और नवीन के संधि-स्थल पर खड़े होकर कुछ विषयों को नया रूप देने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
महान् सन्त कबीर और रहीम जैसे समाज सुधारक और दार्शनिक कवियों ने छोटे-छोटे दोहे लिखकर मानव जीवन के व्यापारों एंव भावों का सफल चित्रण किया। समाज में एकात्मकता लाने के लिए काव्य को माध्यम बना कर जन-जन के मानस में पहुँचाने का कार्य किया लेकिन आज ये सन्त और उनका साहित्य धूल धूसरित रतन की भांति धूल में छिप गए हैं जो चिन्ता का विषय हैं।
"मेरी बोली पूरब की, समझे बिरला कोय।" कबीर जी की इस पंक्ति को पढ़ कर लगता है कि आज पुरातन को नवीनता का रूप लेना ही होगा अन्यथा नई पीड़ी उनकी शिक्षा से परिपूर्ण रचनाओं से लाभ उठाने से वंचित रह जाएगी।
पुरातन को नवीनता का रूप देने का भरसक प्रयत्न इस आशा से किया है कि विद्यार्थी ही नहीं आम जन-मानस भी सहज भाव से अर्थ ग्रहण कर सकेगा।

१ रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे से फिर न जुड़े , जुड़े गाँठ पड़ जाए ।।
"प्रेम का धागा , मत तोड़ो निष्ठुरता से ।
टूटा तो फिर जुड़ेगा , जुड़ेगा कई गाँठों से ।।"

२ ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करे , आपुहिं शीतल होए।।
"मीठे मधुर बोलों से , मन को वश में कर लो।
स्वयं को सभी को , शीतलता से भर दो ।।"

३ खीरा सर ते काटिए , मलियत लोन लगाए।
रहिमन कड़वे मुखन को , चहियत इहै सजाए।।"
"खीरा सिर से काटकर , नमक रगड़ा जाए ।
कड़वा बोल जो बोले , सर उसका पटका जाए।।"

४ चलती चाकी देख के , दिया कबिरा रोए।
दो पाटन के बीच में , साबुत बचा न कोए।।
"कबीर जी रोते थे , चलती चक्की को देखकर।
दो पाटों के बीच में, सभी मिटे पिस कर ।।"

५ माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंधें मोहे ।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंधूँगी तोहे।।
"कुम्भकार से कहती मिट्टी, तू क्या मिटाएगा मुझे।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं मिटा दूँगी तुझे।। "
मीनाक्षी धन्वन्तरि

(आबु धाबी में भारतीय राजदूत महामहिम श्री चन्द्र मोहन भण्डारी जी की अध्यक्षता में प्रथम मध्यपूर्व क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन में छपी पत्रिका में प्रकाशित रचना । )

मंगलवार, 14 जून 2011

सुर्ख रंग लहू का कभी लुभाता तो कभी डराता





आज अचानक आटा गूँथने ही लगी थी कि तेज़ दर्द हुआ और हाथ बाहर खींच लिया... देखा छोटी उंगली से फिर ख़ून बहने लगा था....ज़ख़्म गहरा था...दर्द कम होने के बाद किचन में आने का सोच कर बाहर निकल आई...याद आने लगी कि रियाद में कैसे शीशे का गिलास धोते हुए दाएँ हाथ की छोटी उंगली कट गई थी और ख़ून इतनी तेज़ी से बह रहा था कि उसका सुर्ख रंग मन में एक अजीब सी हलचल पैदा करने लगा था... उंगली कुछ ज़्यादा ही कट गई थी लेकिन दर्द नहीं  हो रहा था.......
मैं बहते खून की खूबसूरती को निहार रही थी....चमकता लाला सुर्ख लहू.... फर्श पर गिरता भी खूबसूरत लग रहा था....अपनी ही उंगली के बहते ख़ून को अलग अलग एंगल से देखती आनन्द ले रही थी....
अचानक उस खूबसूरती को कैद करने के लिए बाएँ हाथ से दो चार तस्वीरें खींच ली....लेकिन अगले ही पल एक अंजाने डर से आँखों के आगे अँधेरा छा गया....भाग कर अपने कमरे में गई... सूखी रुई से उंगली को लपेट कर कस कर पकड़ लिया.... उसी दौरान जाने क्या क्या सोच लिया....
एक पल में ख़ून कैसे आँखों में चमक पैदा कर देता है और दूसरे ही पल मन को अन्दर तक कँपा देता है .... सोचने पर विवश हो गई कि दुनिया भर में होने वाले ख़ून ख़राबे के पीछे क्या यही कारण हो सकता है... 
बहते ख़ून की चमक...तेज़ चटकीला लाल रंग...उसका लुभावना रूप देखने की लालसा.... फिर दूसरे ही पल एक डर...गहरा  दुख घेर लेता हो .... मानव प्रकृति ऐसी ही है शायद...
पल में दानव बनता, पल मे देव बनता मानव शायद इंसान बनने की जद्दोजहद में लगा है...... 
क्या सिर्फ मैं ही ऐसा सोचती हूँ ......पता नहीं आप क्या सोचते हैं...  !!!!! 


मन भटका  
जंगली सोचें जन्मी
राह मिले न
*****
खोजे मानव  
दानव छिपा हुआ
देव दिखे न
*****
बँधी सीमाएँ
साँसें घुटती जाती
मुक्ति की चाह





रविवार, 12 जून 2011

एक पिता के कुछ यादगार पल बच्चों के नाम ...



शुक्रवार की रात रियाद से दुबई पहुँची...फ्लाइट एक घंटा लेट थी लेकिन छोटा बेटा जल्दी ही एयरपोर्ट आ गया था.. इसलिए घर पहुँचते पहुँचते 11.30 बज गए.....बड़े बेटे ने पास्ता बना कर रखा था..अभी वह परोसता कि एक दोस्त आ गई....उसका आना हमारे लिए 'अतिथि देवो भव:' जैसा ही था... स्वागत तो हमने वैसे ही किया जैसे तिथि बता कर आए मेहमानों का करते हैं...
मेरे मुस्कुराते चेहरे को देख कर उसे राहत हुई और फौरन अपने बेटे को भेज कर पति और माँ को बुलवा लिया.....बेटी भी बड़े गौर से देख रही थी कि कहीं मम्मी ने आकर कोई गलती तो नहीं कर दी...लेकिन यह सौ फीसदी सच है कि मुझे उनका इस तरह आना अच्छा ही लगा...सहेली का बेटा नानी को व्हील चेयर पर लेकर अन्दर आया तो सलाम दुआ करते हुए वे उसी चेयर पर  ही बैठी रहीं... कुछ देर मेरे कहने पर सोफे पर आ कर बैठ गई.....
पूरा परिवार बार बार यही कह रहा था कि आप थक गई है तो हम चले जाते हैं...लेकिन कुछ ही देर में उन्हें तसल्ली हो गई कि हम सभी ने उनका दिल से स्वागत किया... छोटे बेटे ने झट से चाय भी बना दी....अचानक मिलने के लिए आना....एक साथ बैठना....मिल कर अपनी खुशी ज़ाहिर करना......वे पल यादगार बन गए.
हमें तो सहेली की माँ बहुत प्यारी लग रही थीं....कमज़ोर नाज़ुक सा सिलवटों भरा चेहरा उस पर बच्चों जैसी मासूम मुस्कान...बड़े ध्यान से बातें सुनती आनन्द ले रही थीं... एक पल भी चेहरे पर शिकन नहीं आने दी कि आधी रात को सोने के वक्त पर कहाँ कहाँ भटकना पड़ रहा है....इकलौती बेटी है, उसी के साथ ही रहना है... दामाद प्यार आदर देने वाले.....न चाहते भी दो बजे के करीब अगले वीक एंड पर मिलने का वादा लेकर चले गए...
उसके बाद बच्चों के साथ हल्का डिनर किया...फिर बातों का दौर चले बिना नींद कैसे आती..विजय रियाद में अकेलापन महसूस कर रहे थे इसलिए वे भी लाइन पर आ गए..... सोते सोते तीन बज गए.... अगले दिन दस बजे नींद खुली...सुबह की दिनचर्या से निपट कर चाय नाश्ता करके घर के काम में लग गए...कल का पूरा दिन घर का काम करके आज लगा कि बस अब और नहीं...... अब कुछ देर अपने लिए....अपने लिए वक्त निकालना हम अक्सर भूल ही जाते हैं.... अपने लिए जीने की कला न सीखी तो फिर दूसरे के जीवन को कलात्मक कैसे बना पाएँग़े.....यही सोच कर घर के कामों को नज़रअन्दाज़ किया और आ बैठे यहाँ ...... 
पिछले दिनों अपने देश में जो हुआ या जो हो रहा है ...या जो होना चाहिए उसके लिए बस एक ही बात जो हमेशा मन में आती रही है कि मुझे देश और समाज के लिए कुछ करना है तो घर से ही शुरु करना होगा....अपने बच्चों को इंसान बना दिया तो वह भी समाज और देश के लिए ही कुछ करने जैसा है.....खुद को अपने परिवार को लेकर सही रास्ते पर चलना है...हम अगर इतना भी कर लें तो एक इकाई के दीपक जैसे जलने से हल्की रोशनी तो होगी ही....जीवन कर्म जो पहले से ही तय हैं उन्हें जी जान से करने में जुटे हैं.....
इसी दौरान कुछ पल ऐसे यादगार बन जाते हैं जिन्हें सबके साथ बाँटने का जी चाहता है..... 
ईंट पत्थरों में काम करने वाले पति विजय भी कुछ लिख पाएँगे यह मेरे लिए चौंकाने की बात थी...उड़नतश्तरी की एक कविता को पढ़ कर विजय के मन में कुछ भाव आए...जो इस तरह से यहाँ उतरे... 

बिछा देता हूँ कुछ पुरानी यादों के पत्र
चुनता हूँ एक एक करके खुशी के वो पल
लगा देता हूँ एक फ्रेम में चुन चुन कर...
वो गाँव की कच्ची गली में चलना सँभल कर
तोड़ना चोरी से कच्चे आम छुप छुप कर
नहाना मटमैले तालाब में टीले से कूद कर
वो गीले कपड़ों में आना छुप कर...
स्कूल छूटा और जवानी आई निकलना सज सँवर कर
इंतज़ार बस का करना लोगों से नज़र चुरा कर
पता नहीं कब जवानी उड़ गई पंख लगा कर
गृहस्थी में रखा पाँव जमा कर
जीने मरने की कसमें साथ खा कर
बच्चों की....! 

बच्चों का बचपन उनके नए नए खेल

फिर उनका किशोर जीवन, जवानी में क़दम 
बस यही ज़िन्दगी के कुछ पल जो रखे हैं संजो कर
बना दूँ उसकी तस्वीर टाँग दूँ दीवार पर
और निहारूँ उसे जिस पल
पाऊँ अपने चेहरे पर एक मुस्कान
निश्छल !!!  
काश कि
देखता रहूँ उसे हर पल...!  

माँ का स्नेह तो जग जाहिर है लेकिन एक पिता का प्यार बच्चो के प्रति.....
उन्हीं की पसन्द का एक वीडियो 'Save The Children by Marvin Gaye'