Wednesday, May 25, 2011

आख़िरी नींद की तैयारी

चित्र नेट द्वारा 

पिछले दो दिनों से तबियत कुछ ऐसी है कि आधी रात गहरी नींद में लगने लगता है जैसे दिल की धड़कन रुक जाएगी.. कोई खास बीमारी भी नहीं है जिस कारण चिंता हो .... .शायद थायरोएड....या फिर गालबलैडर में स्टोन...जो अभी दर्द ही नहीं देता तो उस तरफ कभी ख्याल ही नहीं गया....
आजकल अपने आप से ज़्यादा बातचीत होती है ...अपने आप से बात करने का कितना आनन्द है... कुछ भी ...कैसा भी... कह दो ....मन चुपचाप सुनता है... दरवाज़ा खोल कर बाहर आ गई...आधी रात के आसमान पर चाँद तारे दिखाई नहीं दे रहे थे...बादलों की या शायद धूल की हल्की चादर सी फैली थी... ठंडी हवा भी एक अजीब से सुकून के साथ बह रही थी...
यही हवा सूरज के सामने कैसे व्याकुल सी हो भागती है इधर उधर .... सूरज की याद आते ही रेगिस्तान के मृगतृष्णा की याद आ जाती है... जो सूरज से जन्म लेती है और उसी के साथ ही कहीं गुम हो जाती है....रात के काले साए याद दिलाते हैं कि वह तो एक खूबसूरत भ्रम होता है......जैसे ये दुनिया .... कितनी खूबसूरत है ...मेरी है....नहीं शायद ये दुनिया किसी की भी नहीं...फिर भी हम इस खूबसूरत भ्रम से कितना मोह करते हैं...मेरे विचार में मोह होना भी चाहिए... जब तक साँसों में गर्मी है......इस खूबसूरत भ्रम में जीने का आनन्द भी है.....
चित्र नेट द्वारा 

चंचल मन जाने कहाँ कहाँ दौड़ता है.....उसकी सोच की कोई सीमा नहीं...सोचने लगा ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाने के लिए दिन रात कोल्हू के बैल की तरह लगे रहते हैं... फिर मौत के स्वागत के लिए क्यों न कुछ तैयारी की जाए...अगर अचानक यहीं साँस रुक गई तो....यहाँ से अपने देश तक पहुँचने में ही महीनों लग जाएँगे, हाँ अगर वास्ता काम कर गया तो जल्दी पहुँच जाऊँगी अपने वतन...
पहली बार जब ईरान गई थी तो वहाँ की खूबसूरती देख कर लगा था बस आखिरी नींद के लिए यही जगह जन्नत है..... लेकिन वहाँ के कानून कायदे ऐसे कि मन मसोस कर रह जाना पड़ा ...भला हो ब्लॉग जगत के मित्रों का ...जिनके कारण अपने ही देश के हज़ारों सुन्दर कोनों के दर्शन हो गए... अब आराम करने के लिए किसी भी खूबसूरत जगह को चुना जा सकता है....
चित्र नेट द्वारा 

घर के पास के शमशान घाट पर पारम्परिक रूप में जला दिया जाए तो सबको आराम रहेगा... कहीं दूर नहीं जाना पड़ेगा... फिर सोचा एक मरे हुए इंसान के लिए पता नहीं कितने पेड़ों की हत्या करनी पड़ेगी..... उस पर घी तेल की अलग बरबादी...फिर प्रियजनों को तेज़ आग के आगे खड़ा होना पड़ेगा...कितनी गर्मी लगेगी उन्हें....जून जुलाई हुआ तो... वैसे मरने की तारीख तय कहाँ होती है... पता नहीं मौत भी क्यों हर बार ब्लाइंड डेट पर ही निकलती है......
जल समाधि कैसी रहेगी... ओह... जी घबराने लगा सोच कर ..पानी से बहुत डर लगता है ... खास कर नदी और समुन्दर के किनारे पर खड़े होकर ही लगने लगता है कि जैसे उनकी अनदेखी बाहें अपनी ओर खींच रही हों... .एक बार अखबार में पढ़ा था कि जब बिजली शमशान नहीं हुआ करते थे...तब निगम बोध घाट के आस पास के गाँवों की औरतों को जो बच्चे पैदा करते हुए जान से हाथ धो बैठती .या किसी बीमारी के कारण बच्चे चल बसते उन्हें नदी में बहा दिया जाता था... अपने जाल में फँसे हुए मृत शरीरों के टुकडों को देख कर बेचारे मछुआरे दुखी हो जाते.... कभी कभी तो बड़ी मछली को देख कर जितना खुश होते... उससे ज़्यादा दुखी होते उनके अन्दर इंसान के अंगों को देख कर........
सैर करते करते सोच रही थी या सोचते सोचते सैर कर रही थी...... अचानक बच्चों की तस्वीर सामने दिखी...बच्चो को देख कर पति याद आ गए.... पल भर में ही उनके मोहजाल ने जकड़ लिया .... पैरों से जैसे ज़मीन खिसकने लगी...शरीर में से सारी ताकत रुई के फोहों सी उड़ने लगी.....बच्चों के कमरे में आकर बैठ गई..... ध्यान हटाने के लिए नेट खोल लिया... अक्सर बच्चों की और कुदरत के नज़ारों की तस्वीरें देखना अच्छा लगता है और मन ठीक हो जाता है ....
ईरान (रश्त)


मन चंगा तो कठौती में गंगा.... बस दिमाग में बिजली कौंधी...शरीर की एक दो बीमारी को छोड़ कर सब पुर्ज़े सही सलामत ही हैं.... चिकित्सा जगत में अगर कुछ काम आ सके तो इससे बढ़िया कोई बात नहीं... उसके बाद शरीर को गत्ते के डिब्बे में मलमल की चादर से लपेट कर आधुनिक बिजली शमशान ले जाया जाए....लकड़ी के साँचे में अपने आप को बँधना कतई पसन्द नहीं...सबकी अपनी अपनी पसन्द है...कास्केट या डिब्बा जिसमें आराम से लेटा जा सकता है....साधारण सा हो और उसपर बच्चे अगर कोई कलाकारी कर दें तो क्या कहना ....

चित्र नेट द्वारा 


बिजली शमशान के चैम्बर के अन्दर लगभग दो ढाई घंटे में ही 1400 से 1800 डिग्री फ़ॉहरनाइट तापमान में शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है.....अग्नि , वायु , धरती , आकाश और जलतत्व में से आत्मा कैसे कब और कहाँ जाती होगी.... यह पता ही नही चलता... शायद उस वक्त पता चले..... मिट्टी के कलश में अपने शरीर की मिट्टी.... उसे कहाँ उड़ेला जाए... मन की इस चाह को न कहा जाए तो उसे शांत करने की राह कहाँ मिलेगी......मिट्टी का कलश एक घर में है जो मुझे बहुत पसन्द है......उसे भी इस्तेमाल किया जा सकता है...
घर का कलश 

लेटिन भाषा में अफ़ीम को नींद लाने वाली वनस्पति "sleep-bringing poppy" कहा जाता है.....आखिरी नींद को ज़्यादा से ज़्यादा गहरी करने के लिए अस्थि कलश को अगर उन खूबसूरत खेतों में बिखेर दिया जाए तो कैसा हो.....सदा के लिए सपनों की दुनिया में रहने के लिए निद्रा देवी को प्रसन्न करना कितना आसान हो जाएगा... अफ़ीम का ज़िक्र करना अगर किसी को बुरा लगे तो माफ़ करिएगा.... क्यों कि दर्द निवारक औषधि ‘मॉरफिन’ बनाने के लिए अफ़ीम का भी इस्तेमाल किया जाता है....कुदरत की हर देन वरदान ही होती है, हम इंसान ही उसे अभिशाप में बदल देते हैं....
चित्र नेट द्वारा 

वाह ...जहाँ चाह ...वहाँ राह ..... अभी अभी एक लिंक दिखा.... आप भी देखिए.... ‘माई फंकी फ्यूनरल’..इसमे तो बहुत रोचक जानकारी है .... एक इंसान की राख से 240 पैंसिलें बन सकती हैं...बच्चे कलाकार है तो बरसों तक पैंसिलें इस्तेमाल करके याद करेंगे... वैसे देखा जाए तो सभी एक से बढ़कर एक आइडिया है...
चित्र नेट द्वारा

साँसों का पैमाना टूटेगा
पलभर में हाथों से छूटेगा

सोच अचानक दिल घबराया
ख्याल तभी इक मन में आया

जाम कहीं यह छलक न जाए
छूट के हाथ से बिखर न जाए

क्यों न मैं हर लम्हा जी लूँ जीवन का मधुरस मैं पी लूँ

27 comments:

kshama said...

Kya likhtee hain aap! Ekek shabd,ekek pankti dilo dimaag ko kuredtee gayee!

कविता रावत said...

अपना दर्द खुद ही झेलना होता है... पर यह सच है कि जो दर्द में जीता हो वह पराया दर्द बखूबी समझता है.... मन को झकझोर गयी आपकी यह प्रस्तुति ...आभार

रश्मि प्रभा... said...

बच्चों का चेहरा सामने रखें और ... ज़िन्दगी मासूम हो जाएगी

उन्मुक्त said...

आशा है आप जल्द ही आशावादी मनोदशा में आयेंगी।

समीक्षा said...

पेंसिल वाली बात दिल को छू गई|मर्मस्पर्शी लेख|

डा० अमर कुमार said...

.चेतन जगत को लेकर कुछ ऎसे ही ख़्यालात मेरे भी हैं..
पर मृत्यु के बाद क्या और कैसे होगा.. यह नहीं सोचता ।
मूँदहू आँख कतऊ कछु नाहीं... कौन अपना जिया जलाये
जिस तरह परिजन चाहें.. क़फ़न दफ़न करें, कुछ तो करेंगे ही, दुनिया को दिखाना होता है...
वैसे न भी कुछ करें मृत प्राणी को क्या फ़र्क़ पड़ता है, जिन्दा में घात प्रतिघात.. मरने पर दूध भात !

arbuda said...

ओशो की एक किताब है,' मैं मृत्यु सिखाता हूँ', ज़रूर पढ़ना।

Sunil Kumar said...

ज़िंदगी ज़िन्दा दिली का नाम है मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते है | चैन से सौ साल तक जीना है सोंच कर सो जाइये ....

Arvind Mishra said...

अरे,शुभ शुभ बोलिए! मौत का तो एक दिन सभी के लिए मुकर्रर है-तो काहें की फिकर !
लाख जिन्दा हम रहेगें फिर भी मर जायेगें हम !

rashmi ravija said...

ओह!! ये क्या लिख डाला....
मुझसे पढ़ते नहीं बन रहा....आपने इतने विस्तार से लिख कैसे दिया
मृदुला गर्ग की एक लम्बी कहानी याद आ गयी..."डैफोडिल्स जल रहे हैं "
कहीं मिले तो पढियेगा...बड़ी प्यारी सी कहानी है.

Archana said...

मै कुछ नहीं कहूँगी बस एक गीत कि पंक्तिया याद आ रही है
-----ठहरिये होश में आ लू ,तो चले जाइयेगा.......

Udan Tashtari said...

हरि ओम!!

ऐसे विचार मन में उठें मतलब उम्र बढ़ जाती है. ऐसा कहा गया है. तो चलेगा ऐसे विचार आये भी तो...


एक बार इसी पर कुछ अलग बात लिखने की कोशिश की थी, मौका मिले तो पढ़ियेगा:

http://udantashtari.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html

अविनाश वाचस्पति said...

आपकी पुस्‍तक यहां मेरे पास इंतजार कर रही है।
मैं एक बार पुनर्जन्‍म ले चुका हूं।
दर्द से दोस्‍ती कर लो, फिर सब अच्‍छा और सच्‍चा लगता है।
दर्द को मत तड़पाओ, उसे गले लगाओ तो अपना लगता है।
अपनापन काम आता है, दर्द फिर नहीं तड़पाता है।

कल्‍पना खूब उड़ा रही है। तो हिन्‍दी चेतना के नव वर्ष के अंक में मेरा व्‍यंग्‍य पढ़ें। कल्‍पना के घोड़े नहीं ऊंट। मन प्रसन्‍न हो जाएगा।
अवसाद को प्रसाद बना लें।
खूब लिख दिया, काफी है। टिप्‍पणी पढ़ने के बाद एक कप काफी पिएंगी तो काफी सुकून मिलेगा।
जय हिंदी ब्‍लॉगिंग। इसमें बहुत बल है। सबसे बड़ा संबल है। दर्द में कंबल है।

मीनाक्षी said...

@क्षमाजी..लिखना बस अनायास हो जाता है...
@कविताजी, जाने कैसे मन से आपने पढ़ा लेकिन सच है इस वक्त दर्द नहीं था मन में..
@रश्मिजी, आप जानती नहीं आजकल के मासूम बच्चे ऐसी बातें भी करते हैं..
@उन्मुक्तजी.. शायद मेरे लेखन मे अभी कमज़ोरी है...
@समीक्षा..अच्छा लगा जानकर कि आप भी पैंसिल पसन्द करते हैं...

मीनाक्षी said...

@डॉअमर..जले जिया से नहीं मस्ती में लिखा है..लेकिन आपकी आखिरी लाइन दिल में उतर गई...
@अर्बुदा....मुझे याद है जब वरुण की कही बात की थी तब भी तुम नाराज़ हुई थी...
@सुनीलजी..ज़िन्दादिली भी कह रहे हैं और सोने के लिए भी कह रहे है... :)
@अरविन्दजी...सही...काहे की फिकर..ऐसा लिखने से मैं मर तो जाऊँगी नहीं..:)
@रश्मि...किताबों और फिल्मों की बात होती है तो दिल जलता है..यहाँ कहाँ मिलेगी...नेट पर ढूँढती हूँ
@अर्चनाजी..यह गीत तो मुझे भी बहुत पसन्द है...

मीनाक्षी said...

@समीरजी..2007 की आपकी इस पोस्ट को याद रखते तो अपनी पोस्ट के लिए हास्य का पुट चुरा लाते वहाँ से...
@अविनाशजी..अभी पढ़ते है आपकी रचना...लिंक दे देते तो ढूँढने मे वक्त न जाता...

संजय भास्कर said...

मन को झकझोर गयी आपकी यह प्रस्तुति ...

निवेदिता said...

मीनाक्षी ,आपने पता नहीं किस मन:स्थिति में लिखा है ,पर पढ़ कर मन भारी हो गया ।ऐसे उदास करने वाले तथ्यपरक ख्याल जब भी आयें मेरी तो एकमात्र औषधि अपने बच्चों का ख़्याल ही है .....ऐसी उदासी क्यों ?

Anonymous said...

jindgi...gal gal kardi ha majak..kada sukha naal kada dukha naal..jindgi ha jiva koi khad kuda di..koi jit jada koi har janda ta koi har ka v jeet janda..samjna chanda har koi is kad nu jina chanda har koi is kad nu...par da dava kado daga kinu pata aa.asi ta ha kidona bus us sacha malak da..odi raja ch chali janda aa..kita ni kada maan na kara ga..bus har gal layi onu hi salama kari janda aa...

नूतन .. said...

भावमय करती यह‍ प्रस्‍तुति ।

ZEAL said...

.

पढ़कर लगा की जो बात आपको असल में परेशान कर रही है , उसका जिक्र कहीं नहीं हुआ है लेख में। फिर भी जो ख़याल आते हैं , उन्हें कागज़ पर उतार देना ही बेहतर। लेख में काफी बातें विस्तार से पाता चलीं जिसका ज्ञान नहीं था मुझे। उस दृष्टि से बहुत ही ज्यान्वर्धक आलेख।

जाने क्यूँ .....
ईश्वर आपके मन को बहुत सी हिम्मत दे ....

.

सतीश सक्सेना said...

यह क्या चल रहा है ? ...क्या लिख रहीं हैं आप ...? इस मनस्थिति से बाहर निकलना होगा !

मुझे लगता है जीवन पर हमारा कोई अधिकार नहीं, यह उनके लिए हैं जिनको हमारी जरूरत है ! हर हालत में उनके लिए जीना है जो हमें प्यार करते हैं !

अगली पोस्ट जीवन से सरावोर हो, ऐसी आशा करता हूँ !
शुभकामनायें !!

Anonymous said...

We never stop laughing when we grow old, we grow old if we stop laughing.
Take he life as it come
evry one knows"har jevit vastu ka aant nishit hai"

be happy and age gracefully

Anonymous said...

क्‍या कहें, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।

---------
हंसते रहो भाई, हंसाने वाला आ गया।
ध्‍वस्‍त हो गयी प्‍यार की परिभाषा!

विशाल said...

मृत्यु चिंतन कोई असामान्य बात नहीं.बल्कि परिपक्वता का चिन्ह है.
मृत्यु चिंतन हमें ईश्वर के और करीब ले जाता है.

बहुत आभार आपका.

Mired Mirage said...

पानी से भय! मुझे तो बचपन से पानी मोहित करता है। जल समाधि, काशी करवट इतने सही लगते हैं (जल प्रदूषण की बात छोड़ दें व उदरस्थ करने को मछलियाँ हों तो)कि Walking into The Sea लम्बी कविता लिख डाली। मृत्यु से भी अधिक मोहक मृत्यु का विचार है। यह न होती तो जीवित रहने का साहस कहाँ से आता? बस मृत्यु सदा उत्तरदायित्व निभाने के बाद ही हो, संतान की न हो तो उसका सदा स्वागत है।
घुघूती बासूती

amrendra "amar" said...

bahut gehre utar diya aapne hume, itna to abhi tak hum kabhi soch hi nahi paye the...........
aapke is utkrist lekh ne man me ajeeb si halchal paida ker di hai............
kahi soonya me jaker bahut kuch sochne pe vivas krti hai ..........padhker bahut accha laga ...........kash ye jeevan bhi kisi ke kaam aa jaye ..........aabhar