![]() |
| मेरे घर के सामने |
हर रोज़ ध्यान लगाने की कोशिश करती हूँ ....
आँखें खुलते ही शीशे की दीवार से पर्दा हटा देती हूँ ...
दिखता है विस्तार लिए नीला आसमान ...
उस पर उसी के बच्चे से बादल
हँसते-रोते सफ़ेद रुई के फोहे से
कभी कभी तो धुँए के तैरते छल्लों से लगते ...
ध्यान हटाती हूँ ...
आँखें नीचे उतरने लगती हैं पेडों पर ....
गुलमोहर और ताड़ के पेड़
कैसे एक साथ खड़े हैं...बाँहों में बाँहें डाले...
गुलमोहर की नाज़ुक बाँहें नन्हें नन्हें
हरे रोमकूप से पत्तों सी कोमल...
ताड़ की सूखी खुरदरी...
तीखी नोकदार फैली हुई सी बाँहें.....
फिर भी शांत..ध्यानमग्न हो जैसे एक दूसरे में...
मेरा ही ध्यान क्यों टूट जाता है....!!
अपना मान कर एक दूसरे को ...!!
