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बुधवार, 3 जून 2026
मंगलवार, 16 दिसंबर 2025
मैं हूँ इक लम्हा (काव्य संग्रह )
मैं हूँ इक लम्हा जो अपने लफ्जों को इंद्रधनुषी सोच से सजा कर मन की बात रखता है सबके सामने । सोच का सैलाब उमड़ता है छोटी बड़ी लहरों जैसे और कविता के रूप में कई भाव जन्म लेने लगते हैं । लिखना तो बचपन से ही शुरू हो गया था लेकिन कविता कब से लिखनी शुरू की इसकी सही तारीख बताना मुश्किल होगा।
बड़े बेटे वरुण का मानना है कि हर कविता का जन्म उसके अंदर छिपी किसी न किसी कहानी से होता है और कविता लिखते वक्त उस कहानी का जिक्र होना ज़रूरी है । इस बात से सहमत होकर उसी वक्त सोच लिया कि पूरी कोशिश करूंगी कि हर कविता के जन्म के पीछे की कहानी को अच्छे से कह पाऊँ । इस कोशिश में छोटा बेटा विद्युत और जीवनसाथी विजय ने पूरा साथ दिया । छोटे बहन भाई बेला और चंद्रकांत अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर हमेशा कुछ न कुछ प्रतिक्रिया भेजते रहते जिससे लेखन में सुधार करने की कोशिश रहती । मेरे लेखन को पुस्तक के रूप में देखने का सपना लेकर पिता इस दुनिया को अलविदा कह गए और माँ आज भी समीक्षक बन कर मेरे लेखन को कभी नकार देती है तो कभी तारीफ करती है । परिवार और दोस्तों का तहे दिल से शुक्रिया जिनके कारण मेरे शब्दों को खूबसूरत बसेरा मिला । एक पुस्तक में एक साथ मिल कर सभी शब्द और उनके भाव कैसा महसूस कर रहे होंगे , उसकी खुशी मेरे मन में कहीं ज्यादा है ।
बुधवार, 19 नवंबर 2025
करनी का फल ( धंवंतरि)
मंगलवार, 18 नवंबर 2025
डाक बक्सा ( To Letter Box)
To Letter Box
तेरा लाल रंग कहीं पीला पड़ा
तो कहीं काला और बदरंग हुआ
और तू
खाली खाली वीरान सा
खामोश खड़ा
शायद सोचता होगा
एक दिन
कोई तो आएगा और
ज़ंग लगा ताला तोड़ कर
फिर से आबाद कर देगा तुझे
लो आज तुम्हारी तम्मना पूरी हुई
आज सरहद को भुला कर
एक मियां बीबी आए
अपने खत औ खिताबत के साथ
प्यार मुहब्बत का पैगाम लेकर
सरहद वागा भी जी उठा
डाकिया बन कर
खतों की खुशबू फैलाने लगा
उनमें कहीं आंसुओं का खारापन
तो कहीं इश्क की खुशबू महकने लगी
यही नहीं हुआ डाक बक्से
अनगिनत एहसासों में डूबे लफ़्ज
भी जी उठे
और छा गई रौनक तुझ पर
सुर्ख हुआ समूचा वजूद तेरा
हो सके तो बताना , एहसास कराना
मुझे ही नहीं सारी कायनात को
खतो के जरिए मुहब्बत जगाना
इसे कहते हैं
खतो के जरिए मुहब्बत जगाना
इसे कहते हैं
इंतज़ार में
मीनाक्षी धन्वंतरि

