प्रकृति का ह्रदय चीत्कार कर रहा विकास के हर पल में !
विषैला शिशु-मानव हर पल पनप रहा उसके गर्भ में !
नस-नस में दूषित रक्त दौड़ रहा
रोम-रोम तीव्र पीड़ा से तड़प रहा !
पल-पल प्रदूषण भी फैल रहा
शुद्ध पर्यावरण दम तोड़ रहा !
मानव-मन में एक दूसरे के लिए घृणा का धुँआ भर रहा !
रक्त नहीं बचा अब, सिर्फ पानी ही उसके तन में बह रहा !
मानव-मन संवेदनशीलता खोज रहा
कैसे पा जाए यही बस सोच रहा !
आशा है मानवता की आँखों में
आश्रय पाती मानव की बाँहों में !!
नास्तिक फिल्म मे कवि प्रदीप द्वारा गाया गया गीत 'कितना बदल गया इंसान' सुनकर जहाँ दिल डूबने लगता है वहीं दूसरी ओर हेमंत और लता द्वारा गाया इसी फिल्म का दूसरा गीत मन को हौंसला देता है.
कितना बदल गया इंसान
गगन झनझना रहा
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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007
बुधवार, 26 दिसंबर 2007
सुनहरा अतीत गीतों में गुनगुनाता हुआ .....
आज पहली पोस्ट जो खुली रेडियोनामा की "फ़िज़ाओं में खोते कुछ गीत" जिसे पढ़कर लगा कि जहाँ चाह हो, वहाँ राह निकल आती है...
संयोंग की बात कि हमारे सिस्ट्म में कुछ पुराने गीतों का फोल्डर है जिसमें उषा जी का गाया हुआ 'भाभी आई' गीत है. सुर नूर लखनवी के हैं और संगीत दिया है सी रामचन्द्रन ने.
हालाँकि अन्नपूर्णा जी सुधा मल्होत्रा का गाया गीत सुनना चाहती हैं , इस बात की कोई जानकारे नहीं है हमें. फिलहाल इस गीत को सुनिए ..आशा करती हूँ कि आपको पसन्द आएगा.
संयोंग की बात कि हमारे सिस्ट्म में कुछ पुराने गीतों का फोल्डर है जिसमें उषा जी का गाया हुआ 'भाभी आई' गीत है. सुर नूर लखनवी के हैं और संगीत दिया है सी रामचन्द्रन ने.
हालाँकि अन्नपूर्णा जी सुधा मल्होत्रा का गाया गीत सुनना चाहती हैं , इस बात की कोई जानकारे नहीं है हमें. फिलहाल इस गीत को सुनिए ..आशा करती हूँ कि आपको पसन्द आएगा.
कपट न हो बस मै तो जानूँ !
तुम छल क्यों करते मैं न जानूँ
क्यों मन रोए मैं न जानूँ
कपट न हो बस मैं तो जानूँ !
निस्वार्थ भाव स्वीकार करें तुम्हे
तुष्ट न क्यों तुम मैं न जानूँ
कपट न हो बस मैं तो जानूँ !
नैनों में है नहीं हास मुक्त
वीरान हैं क्यों मन मैं न जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ
भाव ह्रदय के हैं अति शुष्क
पाषाण बने क्यों मैं न जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ
मुक्त हास से स्नेह भाव से
मुख दीप्तीमान हो इतना जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ
क्यों मन रोए मैं न जानूँ
कपट न हो बस मैं तो जानूँ !
निस्वार्थ भाव स्वीकार करें तुम्हे
तुष्ट न क्यों तुम मैं न जानूँ
कपट न हो बस मैं तो जानूँ !
नैनों में है नहीं हास मुक्त
वीरान हैं क्यों मन मैं न जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ
भाव ह्रदय के हैं अति शुष्क
पाषाण बने क्यों मैं न जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ
मुक्त हास से स्नेह भाव से
मुख दीप्तीमान हो इतना जानूँ
कपट न हो बस मै तो जानूँ
मंगलवार, 25 दिसंबर 2007
हाईबर्नेशन की अवस्था में ही सभी पर्वों पर शुभकामनाएँ !
when christmas comes to town
एक बार हाइब्रेशन की अवस्था में जाने पर शीत ऋतु में बाहर आने में एक सिहरन सी होती है. एक हफ्ता क्या बीता जैसे हम ब्लॉगजगत की गलियाँ ही भूल गए. बदहवास से इधर उधर देख पढ़ रहे हैं. "एक शाम ...ब्लागिंग का साइड इफेक्ट....नये रिश्तों की बुनियाद बन चुकी थी।" शत प्रतिशत सच है.
सोचा नहीं था कि हमारी मुलाकात को बेजी इतने सुन्दर रूप में यादगार पोस्ट बना देगीं.पोस्ट पढ़कर तो आनन्द आया ही...टिप्पणियाँ पढ़कर आनन्द चार गुना और बढ़ गया. सोचने लगे कि हम इसी ब्लॉग परिवार का हिस्सा हैं और यह सोचकर अच्छा लगने लगा.
उस शाम के बाद हम पतिदेव विजय और उनके छोटे भाई की मेहमाननवाज़ी में जुट गए जो साउदी से ईद की छुट्टियाँ मनाने आए थे. इस बार ईद पर छोटे भाई साहब के कारण शाकाहारी व्यंजन परोसे गए नहीं तो कबाब और बिरयानी के बगैर ईद मनाने का मज़ा कहाँ !
ईद के बाद ईरानी परिवार के साथ ऑनलाइन चैट करके शब ए याल्दा मनाई गई. इस रात को सबसे लम्बी रात माना जाता है. इस रात दिवान ए हाफिज़ पर चर्चा होती है और उसी किताब से ही अपना फाल निकाला जाता है बस इतना ही मालूम है. एक शब ए याल्दा हम ईरान में बिता चुके हैं जिसकी मधुर यादें आज भी मस्ती में डुबो देती हैं. हमारे मित्र अली के बिज़नेस पार्टनर मुहन्दिस ज़ियाबारी हाफिज़ पर बहुत अच्छा बोलते हैं लेकिन फारसी में. अली और उनकी पत्नी लिडा बारी बारी से अंग्रेज़ी में बताते हैं. धीरे धीरे सुनने पर फारसी भी कुछ कुछ समझ आ ही जाती थी.
खुशियाँ लेकर क्रिसमस आया. मित्रों को बधाई देते हुए विजय अपने भाई को एक हफ्ते में दुबई की सैर भी करवाना चाहते थे सो हम भी उनका साथ देते हुए घूमते रहे पर दिमाग में ब्लॉग घूम रहे थे जिन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिल रहा था.
अब जाकर कुछ समय निकाल पाए हैं कि वापिस आभासी दुनिया में लौटा जाए.
नए साल में जाने से पहले पिछले साल को अलविदा करते हुए उसे कुछ देने की चाह....
विदाई का तोहफा !
क्या तोहफा दिया जाए हम इस सोच में डूबे हैं.
आप क्या कहते हैं !!!!
लब पे आती है दुआ ... !
एक बार हाइब्रेशन की अवस्था में जाने पर शीत ऋतु में बाहर आने में एक सिहरन सी होती है. एक हफ्ता क्या बीता जैसे हम ब्लॉगजगत की गलियाँ ही भूल गए. बदहवास से इधर उधर देख पढ़ रहे हैं. "एक शाम ...ब्लागिंग का साइड इफेक्ट....नये रिश्तों की बुनियाद बन चुकी थी।" शत प्रतिशत सच है.
सोचा नहीं था कि हमारी मुलाकात को बेजी इतने सुन्दर रूप में यादगार पोस्ट बना देगीं.पोस्ट पढ़कर तो आनन्द आया ही...टिप्पणियाँ पढ़कर आनन्द चार गुना और बढ़ गया. सोचने लगे कि हम इसी ब्लॉग परिवार का हिस्सा हैं और यह सोचकर अच्छा लगने लगा.
उस शाम के बाद हम पतिदेव विजय और उनके छोटे भाई की मेहमाननवाज़ी में जुट गए जो साउदी से ईद की छुट्टियाँ मनाने आए थे. इस बार ईद पर छोटे भाई साहब के कारण शाकाहारी व्यंजन परोसे गए नहीं तो कबाब और बिरयानी के बगैर ईद मनाने का मज़ा कहाँ !
ईद के बाद ईरानी परिवार के साथ ऑनलाइन चैट करके शब ए याल्दा मनाई गई. इस रात को सबसे लम्बी रात माना जाता है. इस रात दिवान ए हाफिज़ पर चर्चा होती है और उसी किताब से ही अपना फाल निकाला जाता है बस इतना ही मालूम है. एक शब ए याल्दा हम ईरान में बिता चुके हैं जिसकी मधुर यादें आज भी मस्ती में डुबो देती हैं. हमारे मित्र अली के बिज़नेस पार्टनर मुहन्दिस ज़ियाबारी हाफिज़ पर बहुत अच्छा बोलते हैं लेकिन फारसी में. अली और उनकी पत्नी लिडा बारी बारी से अंग्रेज़ी में बताते हैं. धीरे धीरे सुनने पर फारसी भी कुछ कुछ समझ आ ही जाती थी.
खुशियाँ लेकर क्रिसमस आया. मित्रों को बधाई देते हुए विजय अपने भाई को एक हफ्ते में दुबई की सैर भी करवाना चाहते थे सो हम भी उनका साथ देते हुए घूमते रहे पर दिमाग में ब्लॉग घूम रहे थे जिन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिल रहा था.
अब जाकर कुछ समय निकाल पाए हैं कि वापिस आभासी दुनिया में लौटा जाए.
नए साल में जाने से पहले पिछले साल को अलविदा करते हुए उसे कुछ देने की चाह....
विदाई का तोहफा !
क्या तोहफा दिया जाए हम इस सोच में डूबे हैं.
आप क्या कहते हैं !!!!
लब पे आती है दुआ ... !
रविवार, 16 दिसंबर 2007
काश गन से गिटार बनाई जाए !
पिछली दिनों अपने देश में दिल दहला देने वाली घटना पढ़कर मन व्याकुल और विचलित हो गया. उस पर फुरसतिया जी का लेख पढ़कर चंचल मन सोचने लगा कि काश गन फैक्टरियाँ गन को अगर गिटार में बदलना शुरु कर दें तो कितना अच्छा हो... गिटार बनेगा तो संगीत का जन्म होगा, संगीत की साधना से संघर्ष का नाश होगा ..... संगीत के साधक शांति दूत बनकर खड़े हो जाएँगे और चारों ओर चैन और अमन फैल जाएगा. सपने देखने से कौन रोक सकता है..अच्छे सपने सच भी हो जाते हैं..... कहते हैं सपने देखो तो उन्हें सच करने की लालसा भी जागती है.
गन से गिटार बनाने की बात दिमाग में आते ही सोचा कि मेरे जैसे कोई और ज़रूर होगा जो ऐसा सपना देख रहा होगा या देख चुका होगा और उसे सच करने की कोशिश में लगा होगा. ऐसा सपना Cesar Lopez ने देखा और उसे सच करने को चल रहा था शांति की राह पर हथियार को संगीत का साधन बना कर. खोजने पर एक और नाम मिला पीटर तोष उसके पास भी M16 गन से बनी गिटार है.


सीज़र लोपैज़ कम्बोडियन संगीतकार हैं जो शांति कार्यकर्ता हैं. देश में होने वाली हिंसा को रोकने की कोशिश में लगा रहता हैं. विशेष रूप में कम्बोडिया की राजधानी बोगोटा में जब भी हिंसा होती वहाँ की गलियों में जा जाकर हिंसा के शिकार लोगों के लिए मधुर हल्का संगीत बजाने लगता.
एक बार बोगोटा के किसी क्लब पर हुए हमले के दौरान उसने देखा कि एक सिपाही राइफल को गिटार की तरह लेकर खड़ा है. बस उसे देखते ही उसे सूझा कि क्यों इन सभी बन्दूकों को गिटार में बदल दिया जाए. शांति लाने का इससे अच्छा उपाय क्या हो सकता था. फिर क्या था सीज़र अपनी सोच को मूर्त रूप देने में लग गया और बना डाली एक गिटार जो शांति चिन्ह के रूप में जानी जाती है.
एक बार बोगोटा के किसी क्लब पर हुए हमले के दौरान उसने देखा कि एक सिपाही राइफल को गिटार की तरह लेकर खड़ा है. बस उसे देखते ही उसे सूझा कि क्यों इन सभी बन्दूकों को गिटार में बदल दिया जाए. शांति लाने का इससे अच्छा उपाय क्या हो सकता था. फिर क्या था सीज़र अपनी सोच को मूर्त रूप देने में लग गया और बना डाली एक गिटार जो शांति चिन्ह के रूप में जानी जाती है.
(An escopetarra is a guitar made from a modified rifle, used as a peace symbol. The name is a portmanteau of the Spanish words escopeta (shotgun/rifle) and guitarra (guitar).
सन 2003 में पहली इलैक्ट्रिक गिटार विनचैस्टर राइफल से बनाई. उसके बाद पाँच एसकोपैट्रास बनाईं गईं जिसमें से एक कम्बोडियन संगीतकार जुऐन को, एक अर्जेंटीन संगीतकार फिटो पैज़ और एक संयुक्त राष्ट्र संघ में रखी गई.बोगोटा की सरकार को भी एक गिटार सौंपी गई. एक अपने लिए रखी जिसे बाद में ब्रेवरी हिल्स के फण्ड रेज़र्स को 17,000 डालर में बेच दी. संयुक्त राष्ट्र संघ को दी गई गिटार को 2006 की डिसआर्मामेण्ट की कोंफ्रेस की प्रदर्शनी में रखा गया.
लुइस एल्बैट्रो परडेस के सहयोग से विनचैस्टर राइफल से गिटार बनाने के बाद अब 2006 तक लोपैज़ ने AK-47 की बारह मशीन गन कम्बोडिया के पीस कमीशनर के ऑफिस से लेकर गिटार में बदल दीं हैं. शकीरा, कार्लोस संटाना और पॉल मैक्कार्टनी जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों को शांति-चिन्ह के रूप में दिए जाने का विचार है. दलाई लामा ने हथियार से बनाई हुई गिटार को लेने से मना कर दिया. लोपैज़ सोच रहा हैं कि स्वयं जाकर इस विषय पर बात करेगा. वह गन से गिटार को शांति चिन्ह में बदलने के उद्देश्य को विस्तार से बताना चाहता हैं.
यूट्यूब की वीडियो की भाषा समझ आए या न आए...लेकिन हम यह तो अनुभव कर ही सकते हैं कि दुनिया में कोई भी राइफल या पिस्तौल से जुड़ी हिंसा को पसन्द नहीं करता बल्कि अपने अपने तरीके से उसे रोकने का प्रयास करता है.
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