Monday, June 17, 2013

सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (8)

गूगल के सौजन्य से 
सुधा अपने आप को अपनों में भी अकेला महसूस करती है इसलिए अपने परिचय को बेनामी के अँधेरों में छिपा रहने देना चाहती है....  मुझे दीदी कहती है...अपने मन की हर बात मुझसे बाँट कर मन हल्का कर लेती है लेकिन कहाँ हल्का हो पाता है उसका मन.... बार बार अतीत से अलविदा कहने पर भी वह पीछे लौट जाती है...भटकती है अकेली अपने अतीत के जंगल में ....ज़ख़्म खाकर लौटती है हर बार...
उसका आज तो खुशहाल है फिर भी कहीं दिल का एक कोना खालीपन से भरा है.... 'दीदी, क्या करूँ ...मेरे बस में नहीं... मैं अपना खोया वक्त वापिस चाहती हूँ ' .... वर्तमान की बड़ी बड़ी खुशियाँ भी उसे कुछ पल खुश कर पाती हैं फिर वह अपने अतीत में चली जाती है.....   
सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी -  भाग (एक) , (दो) , (तीन) , (चार) , (पाँच) , (छह),  (सात) 

सुधा को लगता है कि ज़िन्दगी की कुछ खास बातों का ज़िक्र रह गया है जिन्हें दर्ज करना ज़रूरी है. उसी के लिखे में कुछ संशोधन करके जस का तस यहाँ उतार रही हूँ ---- 

जब पहली बार मुझे अकेला छोड़ कर ये विदेश गए थे तो मन में बच्चे के जाने का गहरा दुख था. दूसरी ओर अपने माता-पिता के सहारे मुझे छोड़ गए थे या मुझ पर उनकी देखभाल की जिम्मेदारी थी, ऐसे में समझ नहीं आ रहा था कि कैसे वक्त गुज़रेगा. अकेलेपन का दर्द और घर के हालात देख कर हँस कर विदा करना पड़ा. माता-पिता का स्वभाव भी समझ में आ रहा था परंतु जिन माता-पिता ने जन्म दिया है उनके प्रति फ़र्ज़ अदा करना हर बेटे का कर्म है सो मुझे माता-पिता के पास रहना स्वाभाविक ही था. अपने माता-पिता के सख्त स्वभाव के कारण अगर हम उन्हें नहीं छोड़ पाते तो फिर पति के माता-पिता को कैसे छोड़ा जाए. ऐसा करना मर्यादा से बाहर जाना होता, यही सोच कर पति के माता-पिता को अपना मान कर उनकी सेवा करना अपना फ़र्ज़ समझा.   माँ का स्वभाव नहीं बदला, मुझे अकेले देख कर भी उसे तरस नहीं आता, बात बात पर गुस्सा करती. घर के किसी अकेले कोने में रो लेती फिर उन्हें आकर प्यार करती, गलती हो या न हो उन्हें खुश करने के लिए उनके गले से लग जाती. 

वक्त बीतता गया तब तो गाँव में फोन भी नहीं होते थे सिर्फ खत ही लिखे जाते थे, 15-20 दिन में मुश्किल से एक खत आता. घर के गेट पर खड़े होकर डाकिए की बाट जोहती कि मेरा खत लेकर आएगा लेकिन वह तो आता मेरा खत न आता. मन बहुत उदास हो जाता. बाऊजी नरम दिल के थे सिर पर हाथ फेर कर कहते रोना नहीं बच्चू... कल तेरी चिट्ठी ज़रूर आएगी. उनका इतना कह देना ही मन को हौंसला दे जाता कि बाऊजी तो मेरे दिल का दर्द समझते हैं. 
दिल के दर्द को हलका करने के लिए उसे काग़ज़ पर उड़ेल देती -- 

"आस का दीपक जलते जलते सुबह से हो गई शाम 
अब तो थक कर बैठ गए हैं क्या होगा अंजाम 
इस दीपक की लौ है धीमी, शायद इसमें तेल नहीं है
विरह अग्नि में जलते रहेंगे होगा जब तक मेल नहीं 
कुदरत की करनी है ऐसी जिस्म से जान अलग न हो 
मन से दूर नहीं वो लेकिन तन की दूरी चाहे हो 
साया बनकर साथ चलें वो इन पलकों की छाँव में 
देंगे आकर वही सहारा काँटा चुभे जो पाँव में 
आस का दीपक जलेगा फिर भी चाहे खत्म हो जाए तेल 
दिल में प्यार अगर है सच्चा जल्दी होगा अपना मेल !"

जब भी मन उदास होता ऐसे ही मन के भाव लिख कर अपने आँसुओं को रोक लेती --- 

" उस माँ ने किया है न जाने क्यों मुझसे मज़ाक , 
अश्क देकर ज़िन्दगी से मुस्कान छीन ली 
चुलबुली बुलबुल थी मैं छोटी सी थी बगिया मेरी,
 हँसती खेलती ज़िन्दगी की हर कहानी छीन ली 
तन-मन-धन से की सेवा जो भी मुझसे बन सका, 
पर मिला क्या इस जहाँ में एक नफ़रत के सिवा 
जिससे भी की दोस्ती उसने ही धोखा दे दिया, 
आगे क्या हो ज़िन्दगी में ये भी कुछ पता नहीं 
अब तो दिल में ये तमन्ना है के वो मुझसे मिले,
हाथ देकर हाथ में प्यार से बस ये कहें 
मैं ही तेरी ज़िन्दगी हूँ मैं ही तेरा प्यार हूँ ,  
मायूस ना हो मेरी जाँ बस मैं ही तेरा यार हूँ 
मैं तुझे दूँगा सहारा दुख में घबराना नहीं, 
तेरी बगिया में खुशी है कोई वीराना नहीं 
मुस्कुराहट तेरी तेरे होंठो पर ले आऊँगा, 
बस मेरी जाँ अब ना घबराना मैं जल्दी आऊँगा !! " 

एक साल के लम्बे इंतज़ार के बाद धीरज घर आते. खुशी मिलती लेकिन घर का बोझिल माहौल न बदलता. माँ बाऊजी का स्वभाव उन दिनों और भी तीखा हो जाता. दोनों अपनी अपनी ज़रूरतों की बात करते तो धीरज घर से बाहर भागते. दोनों बच्चों के जन्म के बाद से ही बाऊजी ने बिस्तर पकड़ लिया था. दिन ब दिन चलना-फिरना, उठना-बैठना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा था. इनकी छुट्टियाँ पंख लगा उड़ जातीं और लगता कि अभी कल ही तो आए थे और फिर वापिसी की तैयारी शुरु हो जाती. ये वापिस लौट जाते और मैं फिर पुरानी दिनचर्या में जुट जाती. छोटा बेटा बीमार उधर से बुज़ुर्ग सास-ससुर. लगता था कि दो नहीं मेरे चार बच्चे हैं. दो छोटे-छोटे बच्चे और दो बुज़ुर्ग जो बच्चों की तरह ही थे. 

गाँव से दूर बीमार बेटे को लेकर जाने किस किस शहर घूमती उसके इलाज के लिए. दुनिया का कोई इलाज नहीं छोड़ा. बीमार बेटे को लेकर निकलती तो गाँव की औरतें तरह तरह की बातें बनातीं. 'पता नहीं कैसा इलाज है हर आए दिन शहर चल देती है' कोई कहता, 'पति घर पर नहीं है और ये बूढ़े सास-ससुर को छोड़ कर घर से निकल जाती है' 'बेशर्म कहीं की, अकेले घर से बाहर निकलते हुए शर्म भी नहीं आती' एक औरत ने तो रास्ता रोककर एक बार मुँह पर ही कह दिया, 'सुधा, तेरी तो मौज है, घर वाले घर नहीं हमें किसी का डर नहीं' सुन कर सन्न रह गई. बच्चे की हालत दिखाकर एक बद्दुआ सी निकली मुँह से कि बीमार बच्चे के साथ ऐसे अकेले घूमना सब को नसीब हो. अकेली औरत घर परिवार बच्चे और बूढ़े सँभाल रही है चाहे कैसे भी उसकी तारीफ़ कोई नहीं कर सकता तो किसी को निन्दा करने का भी हक नहीं. माँ थी मैं जो भी जहाँ भी इलाज के लिए जाने को कहता चल देती. एक माँ के लिए बच्चे की सेहत सबसे अहम बात होती है. 

कहते हैं माता-पिता 10 बच्चों को पाल सकते हैं लेकिन 10 बच्चे माता-पिता की देखभाल नहीं कर सकते क्योंकि सबके अपने अपने परिवार होते हैं. कोई अपने छोटे घर होने का रोना रोता है तो कोई पैसा न होने का. सभी के अपने अपने कारण होते हैं. कुछ देश ऐसे हैं जहाँ बच्चे अपने माता-पिता को अपने साथ रखना भी चाहें तो वहाँ के नियम-कानून ऐसा करने से रोक देते. बात सिर्फ इतनी सी है कि जो आस-पास रहते हैं वे ही अगर वक्त वक्त पर आकर माता-पिता की सुध लें तो सेवा करने वाले बेटे-बहू को हौंसला मिल जाता है. 

मेरे ससुराल का हाल कुछ उलटा था. माँ-बाऊजी का जब भी दिल उदास होता तो खत लिख कर दिल्ली से दोनों बेटों को बुला लेते. वे भी औपचारिकता निभाते हुए आते, एक दो रात रह कर घर का माहौल और भी बिगाड़ कर चले जाते. मेरी छोटी-छोटी गलती को पकड़ कर आरोप लगा दिया जाता कि मुझे बुज़ुर्गों का ख्याल रखना नहीं आता. यही नहीं माँ-बाऊजी को मेरे खिलाफ़ भड़का कर घर के माहौल को और भी बोझिल बना कर चल देना सब को खुश कर देता. दूसरी तरफ विदेश से  बेटा-बहू आते तो घर की रौनक ही कुछ और हो जाती. मस्ती, हँसी और खुशहाली से दो चार दिन भी बहुत अनमोल लगते. उनका कुछ दिन का रहना कई कई दिनों तक माँ बाऊजी के चेहरों पर यादों की मुस्कान बिखेरे रखता जिससे मेरा जीना आसान हो जाता. मेरे दोनों बच्चे भी खुश होकर उनके आने का इंतज़ार करते और उनके जाने पर उदास हो जाते.

बीमार बच्चे के साथ साथ बाऊजी भी बिस्तर पकड़ चुके थे. अचानक माँ को दिल का दौरा पड़ गया. फौरन उन्हें शहर के अस्पताल ले गए जहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि घर पर ही उनकी सेवा की जाए. उन दिनों नवरात्रे चल रहे थे, मन ही मन माँ से विनती करने लगी, 'हे माँ, अगर मेरे मन में आपके प्रति सच्ची लगन  है तो मेरी सासू माँ की ज़िन्दगी बख्श दो ताकि मेरे ऊपर कलंक न लगे कि मैंने उनकी सेवा नहीं की. चाहती हूँ इनका बेटा इनके पास हो, कोई ये न कह सके कि चार बेटों के होते हुए एक भी पास नहीं था. इस परिवार की और मेरी इज़्ज़त आपके हाथ है देवी माँ. जैसे तुम मेरी माँ हो इस माँ को भी मैं ऐसे ही पूजती हूँ. अगर ये स्वस्थ हो जाएँ तो इनके चरण धोकर चरणामृत पीऊँगी. उस जगत माता ने मेरी पुकार सुन ली और माँ का स्वास्थ्य धीरे धीरे सुधरने लगा. मन को हौंसला मिला लेकिन फिर भी एक बात मन को कचोटती रहती कि सेवा करने के लिए कोई भी बेटा उनके पास नहीं है. 

धीरज विदेश में थे फिर भी पैसे की तंगी रहती ही थी. बच्चे स्कूल जाने लगे थे. दो बुज़ुर्ग और दो बच्चे स्कूल जाने वाले उनमें से एक बच्चा बीमार जिसकी देखरेख के लिए पैसे की ज़रूरत लगी रहती है. सोचा कुछ करूँ ताकि घर खर्च में कुछ मदद हो सके. कहते हैं हाथ का हुनर काम आता है. घर पर ही गाँव की लड़कियों को पेटिंग सिखाना शुरु कर दिया. हाथ का हुनर काम आया और दो पैसे भी बनने लगे. सब ठीक होने लगा कि माँ फिर से बीमार पड़ गईं. उनकी सेवा के लिए पेटिंग सिखाना बन्द करना पड़ा. माँ की सेवा , बिस्तर पर पड़े बाऊजी की देखभाल उस पर बीमार बेटे का ख्याल इतना व्यस्त कर देता कि कुछ सोचने का वक्त ही नहीं होता. माँ बाऊजी लगभग दोनों ही मेरे लिए बच्चों जैसे थे. माँ ने कभी पहले भी काम नहीं किया था अब तो चारपाई पर बैठे बैठे साग सब्ज़ी काट छील देती तो वही बहुत लगता. बाऊजी के सारे काम बिस्तर पर ही होते. इतना कुछ होते हुए भी कुछ करने की चाह से थकावट दूर हो जाती. मनियारी का सामान रख लिया जब भी कोई आएगा तो बस सामान देना है उस वक्त. इन्हीं छोटे छोटे कामों से मन बहल जाता और दो पैसे भी जुड़ जाते.

सब कहते हैं लड़की अपने पाँवों पर खड़ी हो तभी उसकी शादी करनी चाहिए. नौकरी या लघु व्यवसाय किसी भी काम में जाना मुश्किल नहीं लेकिन अगर ऐसे परिवार में शादी हो जाए जहाँ पति विदेश में हो और उसके बुज़ुर्ग माता-पिता और दो बच्चे जिनमें से एक बच्चा बीमार हो तो क्या किया जाए. फिर भी औरत इन हालातों से जूझती हुई जीवन बसर करती रहती है. मैं भी जी रही थी जीवन की हर मुश्किल को अकेले झेलने की आदत सी हो गई थी. अचानक माँ को फिर से दिल का दौरा पड़ा और उनका देहांत हो गया. उन दिनों धीरज छुट्टी पर आए हुए थे. माँ को अपने हाथों विदा करके भारी मन से ये फिर चले गए. 

किस्मत का लिखा कोई नहीं बदल सकता क्योंकि एक बार फिर घर से शुरु किया काम बन्द करना पड़ा. बाऊजी अब पूरी तरह से बिस्तर पर थे. घर से बाहर निकलने का तो सवाल ही नहीं था. बाऊजी को सूसू पॉटी और नहाने के बाद कपड़ बदलने तक का जिम्मा मेरा था. बहू नहीं उनकी बेटी बन कर सेवा करती थी. बच्चे की तरह गोद में उठा कर आँगन में जहाँ भी धूप होती वहीं चारपाई पर बिठा देती. बुज़ुर्गों की सेवा करने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन औरत होने के नाते कई  बार मुश्किल लगता. सोचती काश कि धीरज मेरे साथ होते या कोई बेटा महीने में एक बार कुछ दिन के लिए ही आ जाता. कभी कभी बाऊजी अपनी लाचारी पर रोने लगते. उन्हें देख कर मुझे रोना आता कि बुज़ुर्गों की ज़िन्दगी कैसी होती है. धीरे धीरे अपने ही शरीर से लाचार हो जाते हैं. चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते. 

गाँव वाले सब देखते और मेरी मिसाल देते कि बहू हो तो ऐसी लेकिन घर परिवार के लोग उतना ही मुझसे चिढ़ते. मुझ पर आरोप लगाते कि दो रोटी खिलाना ही सेवा नहीं है. माँ के देहांत के बाद बाऊजी एक साल भी न रह पाए और वे भी हमें छोड़ कर चले गए. 84 साल की माँ और 92 साल के बाऊजी के जाने के बाद भी यही सुनने को मिलता कि सुधा माँ बाऊजी को वक्त पर रोटी नहीं देती थी इसलिए वे जल्दी चल बसे. मेरे मासूम बच्चे मेरे सेवाभाव को अपनी आँखों से देखते और समझते. कई बार बच्चों ने भी मेरी मदद करते हुए अपने दादाजी की पॉटी रूई से साफ की. उन्हें कपड़े पहनने में मदद की. 

माँ बाऊजी के गुज़रने के बाद 3 साल तक गाँव में ही रही फिर बच्चों की बड़ी पढ़ाई के लिए शहर आना पड़ा. एक छुट्टी में आकर धीरज ने शहर में घर खरीदा और हम गाँव से शहर आ गए. बच्चे अभी स्कूल में ही थे लेकिन अब एक नई जिम्मेदारी सिर पर थी. दो बेटों को अच्छे संस्कार देने का काम भी मुझ पर आ गया था. अब मैनें बच्चों को माँ की ममता और पिता का अनुशासन देने के लिए कमर कस ली थी अकेले ही." 

क्रमश: 





4 comments:

vandana gupta said...

बेहद मार्मिक चल रही है कहानी

rashmi ravija said...

ओह!! बहुत कुछ सहा है ,सुधा ने पर उसे ये संतोष भी होना चाहिए कि उसने अपने सारे कर्तव्य बखूबी निभाये. अपनी नज़रों में सच्चा रहने से बढ़कर और कुछ नहीं.

Ekta Nahar said...

बहुत सुन्‍दर रचना

आशा जोगळेकर said...

बहुत सुंदर कहानी । सुधा जैसी बहू पाकर कोई भी धन्य हो जाये ।