Monday, May 27, 2013

सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (5)

चित्र गूगल के सौजन्य से 

सुधा अपने आप को अपनों में भी अकेला महसूस करती है इसलिए अपने परिचय को बेनामी के अँधेरों में छिपा रहने देना चाहती है....  मुझे दीदी कहती है...अपने मन की बात हर मुझसे बाँट कर मन हल्का कर लेती है लेकिन कहाँ हल्का हो पाता है उसका मन.... बार बार अतीत से अलविदा कहने पर भी वह पीछे लौट जाती है...भटकती है अकेली अपने अतीत के जंगल में ....ज़ख़्म खाकर लौटती है हर बार...
उसका आज तो खुशहाल है फिर भी कहीं दिल का एक कोना खालीपन से भरा है.... 'दीदी, क्या करूँ ...मेरे बस में नहीं... मैं अपना खोया वक्त वापिस चाहती हूँ .... वर्तमान की बड़ी बड़ी खुशियाँ भी उसे कुछ पल खुश कर पाती हैं फिर वह अपने अतीत में चली जाती है.....   
सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (1)    
सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (2)
सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (3) 
सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (4)

ब्लॉग लेखन में फिर से सक्रिय होने का कारण अगर 'सुधा' है तो इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ब्लॉग जगत का मोह भी कुछ कम नहीं है.. इसका मोह भी बहुत कुछ असल दुनिया के मोह जैसा ही है जिसका मोहक रूप बार बार अपनी तरफ खींच कर वापिस बुला लेता है ... ब्लॉग़ जगत के वासियों का मोह भी कुछ ऐसा ही है लेकिन बार बार एक लम्बे अंतराल के बाद मिलना ऐसा ही जैसे 'नज़र से दूर, दिल से दूर' फिर भी इतना यकीन तो है कि जब भी मिलेंगे अपनेपन से मिलेंगे....
शादी के बाद  ससुराल के पूरे परिवार के साथ सुधा पहला फेरा डालने अपने मायके पहुँच गई थी...धीरज को देख कर तो माँ समेत सभी परिवार वाले उसके ही आगे पीछे घूम रहे थे....किसी ने एक बार भी सुधा से नहीं पूछा कि वह कैसी है...हाँ बड़ी दीदी ने धीरज को हँसी हँसी में ताना ज़रूर मार था , "पहली बार नई दुल्हन को मायके क्या इस तरह लाते हैं,  बसों के धक्के और धूल फँकवाते हुए ....!" सुनकर बस खिसियानी हँसी हँस दिए थे धीरज.... छोटी भाभी ने हँसते हुए कहा , " जीजाजी के साथ सुधा ने बाहर ही जाना है...तब तक यहाँ धक्के धूल खा लेने दो दीदी..." तब भी धीरज कुछ न  बोले कि कम्पनी में काम न होने के कारण कई लोगों को देश वापिस भेज दिया गया है. धीरज भी अनिश्चित समय के लिए फिलहाल बेरोज़ग़ार ही कहे जा सकते थे उस वक्त.....
सुधा उस वक्त धीरज के साथ से ही इतनी खुश थी कि किसी बात का उस पर कोई असर न हुआ.... सुधा के परिवार वालों ने अपनी सामर्थ्य से भी ज़्यादा स्वागत सत्कार किया फिर भी सुधा के ससुराल वालों को खुश न कर सके...अक्सर हमारे समाज में यही देखने में आता है कि जितना लेन-देन को महत्त्व दिया जाए उतनी ही मात्रा में नाराज़गी और नाखुशी भी  बढ़ती है... 
 ससुराल लौटते ही सास ने थक कर चूर सुधा को रसोईघर में मेहमानों के लिए खाना बनाने के लिए लगा दिया और कुछ मेहमानों को बस स्टॉप तक छोड़ने चली गईं...लम्बे घूँघट को सँभालती हुई सुधा ने पहले पूरे घर की सफ़ाई की फिर खाना बनाने के लिए रसोईघर आई.. गैस का चूल्हा तो वहाँ था ही नहीं जिस पर उसने पहली बार हलवा बनाया था... मिट्टी के चूल्हे को कैसे सुलगाएगी .माँ के घर में काम खूब किया था लेकिन मिट्टी के चूल्हा यहीं देखा था...... सोचती हुई वहीं पास ही चारपाई पर बैठ गई... खुले आँगन में खुली रसोईघर बनी हुई थी, जो दो तरफ से बिना छत की छोटी छोटी दीवारों से ढकी हुई थी....सुधा टकटकी लगाए कच्चे चूल्हे को देख रही थी कि बड़ी ननद आ गई उसकी मदद करने...उन्होंने चूल्हा जलाने का तरीका बताया , बातों बातों में उन्होंने यह भी बता दिया कि उनके घर से गैस का चूल्हा आया था जो वापिस भिजवा दिया गया है...उनका घर पास में ही था......
 बस स्टॉप से लौटी सास ने जब बहू को चूल्हे के साथ उलझते देखा तो अपने गुस्से पर काबू न रख पाई....."ऐसे कैसे चलेगा...अभी तक चूल्हा ही नहीं जला तो खाना कब बनेगा" सास के तीखे तेवर देख कर वह सहम गई..हाथ तेज़ी से चलने लगे... चूल्हे पर दाल रखकर आटा गूँदने लगी...लम्बे घूँघट के कारण काम करना मुश्किल लग रहा था लेकिन किससे कहती.. जेठानियाँ भी घूँघट में ही बैठी दिखीं तो वह भी मन मसोस कर रग गई....बला की गर्मी...बिजली के साथ साथ हवा भी ग़ायब थी... जैसे-तैसे खाना खत्म किया कि चाय के लिए पुकार होने लगी...
चाय के इंतज़ार में कुछ मेहमान सुस्ताने लगे और कुछ अपना सामान बाँधने लगे.. तभी दिल्ली शहर से खबर आई कि धीरज के चचेरे भाई सागर का बेटा हुआ है. सुधा किस्मत वाली थी कह कर सभी उसे और एक दूसरे को  मुबारकवाद देने लगे. धीरज और सागर कुवैत  में एक ही कम्पनी में काम करते हैं.....सागर भैया कुवैत में ही थे लेकिन अणिमा भाभी अपने मायके में थी. सास-ससुर ने तय किया सभी बड़े  बेटे के घर जाएँग़े जहाँ सागर के बेटे का नामकरण किया जाएगा. एक खास बात दिखी थी यहाँ कि चाचा ताऊ के बच्चों में कोई फर्क नहीं समझा जाता.
सुधा पहली बार दिल्ली शहर आई थी. दिल्ली में घर खरीदना आसान नहीं,  किराए के घर भी कबूतरखाने जैसे होते हैं.,धीरज के बड़े भैया का घर बहुत छोटा था जिसमें दो भाई और उनके परिवार एक साथ रहते थे.  एक ही कमरे में दरियाँ बिछीं थीं और घर के सभी लोग एक साथ बैठे बातचीत में मगन थे.  घूँघट की ओट से सुधा सबको देख रही थी... सुन रही थी सबकी बातें जिनमें अणिमा भाभी का बार-बार ज़िक्र हो रहा था. आधी बात समझ आ रही थी और आधी बात सिर के ऊपर से निकल रही थी.
ससुरजी ने तय कर लिया था कि अगर अणिमा बच्चे के चोले की रस्म के लिए बड़े भैया के घर नहीं आएगी तो कोई उसके मायके नहीं जाएगा. परिवार के कुछ आदमी जाएँगें बस औपचारिकता निभाने के लिए. बात सिर्फ इतनी थी कि अणिमा भाभी और बच्चे की तबियत ठीक नहीं थी और 11 दिन के बच्चे को लेकर वे सफ़र नहीं करना चाहती थीं. उनकी 'न' ने घर भर में हंगामा खड़ा कर दिया . सभी भाभी को बुरा भला कहने लगे.
मन ही मन सुधा अणिमा भाभी और उनके बेटे को देखने के लिए उत्सुक थी.
धीरज चुप थे. एक पल के लिए नहीं सोचा कि सागर भैया को कितना बुरा लगेगा. उनकी खातिर एक बार साथ चलने के लिए कहते लेकिन न कुछ कह पाए और न ही साथ गए. सुधा ने महसूस किया कि उसके पति अपने माता-पिता से बहुत डरते हैं. वे चाहकर भी साथ चलने की बात नहीं कर पाए.
आदर और डर में फ़र्क होता है , अक्सर हमारे समाज के बुज़ुर्ग डर को आदर समझने की भूल कर बैठते हैं. कई बार घर के बड़ों के सामने बच्चे अपने मन की बात नहीं रख पाते.. उनके डर के कारण  ग़लत को ग़लत कहने से घबराते हैं. सभी नहीं तो अधिकाँश लोग इस त्रासदी को झेल रहे हैं. यही कारण है कि कभी बुज़ुर्गों की तानाशाही बच्चों को उग्र बना देती है तो कभी एक दम दब्बू. 
सुधा का बचपन भी ऐसे ही परिवार में बीता था जहाँ छोटी छोटी गलतियों पर साँकल से बाँध दिया जाता या कपड़े धोने वाले डंडे से पीट दिया जाता था. सुधा समेत सभी बेटियों को दसवीं के बाद सिलाई कढ़ाई सिखा कर घर बिठा दिया गया था. शादी के सपने देखते हुए सोचती थी कि पति के घर में आज़ादी मिलेगी. कुछ हद तक मिली भी लेकिन जंजीरें यहाँ भी थी.
दिल्ली से लौट कर अभी 15 दिन भी नहीं हुए थे कि सुधा को फिर दिल्ली जाने का आदेश हुआ. बिना कुछ सवाल जवाब किए अपनी दुल्हन को धीरज दिल्ली छोड़ आए अपनी मझली भाभी की सेवा के लिए जिन्हें अभी चौथा महीना शुरु हुआ था. सुधा का तो दिल ही बैठ गया क्योंकि उसे समझ आ गई थी कि बच्चा होने तक  उसे वहीं ठहरना होगा. वे दिन भी भुलाए नहीं भूलते. दो जेठानियों के बीच में पिसती सुधा ने कैसे अपने दिन बिताए, वही जानती है.
छोटी होने के कारण सुधा पर दोनों जेठानियाँ बड़े  रौब से हुक्म चलातीं. बड़ी  का काम अधूरा छोड़कर छोटी के काम को पूरा करती तो बड़ी नाराज़ हो जाती... बड़ी का काम करके आती तो छोटी का मुँह बना होता. कभी कभी तो दोनों की नाराज़गी में उसे भूखे पेट ही सोना पड़ता. शर्म के कारण दोनों में से किसी एक को भी कह न पाती कि उसे भूख लगी है. उस वक्त धीरज की याद आती कि क्या उन्हें भी उसकी याद आती होगी. एक बार भी आकर नहीं पूछा कि क्या हाल है, कैसे दिन कट रहे हैं. आए तो पूरे छह महीने बाद चाचा बनने के बाद.
सुधा की खुशी का ठिकाना नहीं था. धीरज के साथ बस पर बैठने के बाद ही उसे यकीन हुआ कि सच में वह ससुराल लौट रही है.
धीरज के चेहरे को एक पल देखते हुए सर झुकाकर सुधा ने पूछा, 'आपको मेरी एक बार भी याद नहीं आई इतने महीनों में' 'आई, पर क्या करता.' कह कर धीरज दूसरी तरफ देखने लगे. मन ही मन कितने ही सवाल लेकर सुधा ने सफर पूरा किया. उसके मन में एक गाँठ थी जो खुलने का नाम न लेती. तस्वीर से रिश्ता पक्का होने के बाद धीरज ने एक बार भी अकेले मिलने की कोशिश नहीं की थी. दो तीन बार कोशिश करने पर अकेले बाहर जाने की बजाए परिवार के साथ वक्त गुज़ारा.  सास-ससुर के पाँव छूकर अन्दर जाने ही लगी थी बैग रखने कि पीछे से आवाज़ आई, 'बहू मुँह हाथ धोकर चाय बना ले.'  लेटे लेटे ही सास ने कहा था. सुधा सास ससुर को खुश रखने के लिए कोई कसर न छोड़ती. फटाफट कपड़े बदल कर मुहँ हाथ धोकर चूल्हा जला कर चाय का पतीला रख दिया.
नौकरी थी नहीं. जमापूंजी से घर चल रहा था. आने वाले बच्चे के लिए कोई भी तैयार नहीं था. धीरज तो बिल्कुल नहीं. शादी करके घर बसाना, पत्नी का ख्याल रखना , बच्चे पैदा करते वक्त छोटी छोटी बातों का ध्यान रखना , ऐसा कुछ भी नहीं था धीरज में. सुधा फिर भी उसे पति परमेश्वार मान कर उसकी ही नहीं उसके माता-पिता की जी जान से सेवा करती. उसे अपना बचपन याद आ जाता जब माँ को खुश करने के लिए वह घर के कई काम जल्दी से खतम करके माँ की गोद में जा बैठती, 'माताजी, मैंने इतने सारे कपड़े धो दिए. मुझे प्यार करो न' और माँ उसके सिर पर हाथ फेर देती. सुधा उसी में ही खुश हो जाती. यहाँ भी वह उसी जोश से काम करके सोचती कि कभी तो धीरज , सास-ससुर प्यार से उसकी पीठ थपथपाएँगें. लेकिन हर शाम उसकी चाहत भी अंधेरों में गुम हो जाती. इस तरह हर सुबह नई उमंग और आशा के साथ वह काम में जुट जाती और शाम होते होते सूरजमुखी के फूल जैसे मुरझा जाती.
तीसरा महीना भी खतम हो गया लेकिन किसी ने भी अस्पताल में उसका नाम लिखवाने की नहीं सोची. गाँव के अस्पताल से नर्स आती पूछताछ के लिए लेकिन उसे बाहर से भेज दिया जाता. गाँव की दाई के भरोसे छोड़ कर सास निश्चिंत हो गई थी. धीरे धीरे अंदर का जीव आकार लेने लगा जिसका असर सुधा के ऊपर साफ दिखने लगा था. अब उससे गाय का दूध निकालने के लिए बैठा न जाता, बड़ी मुश्किल से चारा पानी दे पाती. धीरज होते तो कोई मुश्किल न होती लेकिन रसोई तो खुद ही बनानी पड़ती. अगर किसी दिन सुधा की सास धीरज को सुधा की मदद करते देख लेती तो आसमान सिर पर उठा लेती. 'हे भगवान, हमने तो जैसे बच्चे जने ही नहीं थे' 'तेरी बीवी तो अनोखा बच्चा पैदा कर रही है' 'बीवी के घुटनों के साथ जुड़ कर बैठ जा' ऐसी बातें सुनकर धीरज घर देर से ही लौटता. उस दौरान सुधा की हालत और भी बुरी हो जाती. नीचे बैठकर रसोई पकाना अब उसके लिए अज़ाब होने लगा था.
दसवाँ महीना खतम होने को था. दिन ब दिन सुधा की तबियत बिगड़ती जा रही थी.  तब भी उसकी सास उसे कोसने से न चूकती. 'इसे अक्ल तो है नहीं...दिन गिनने कहाँ आते हैं..इसे पता नहीं ही नहीं होगा कि कौन सा महीना चल रहा है ' हर बार हर किसी को यही बात कहकर टाल देती. उधर धीरज डर के मारे कुछ कर न पाता या माता-पिता के सिरदर्दी समझ कर चुप था. उस वक्त सुधा को समझ नहीं आता कि जिससे शादी हुई है उसका क्या फर्ज़ है लेकिन धीरज के तर्क कुछ और होते कि अगर अपने आप वह अस्पताल ले गया तो घर भर में कलह-क्लेश होगा. नौंवाँ  महीना खतम होते-होते उसे दिखना बंद हो गया. दीवार पकड़ पकड़ कर घर के काम खतम करती. परिवार के लिए जल्दी खाना बनाकर रख देती.  दिन ब दिन सुधा की हालत बद से बदतर होने लगी लेकिन सास पर इस बात का भी कोई असर नहीं हुआ. उसका कहना था गर्भ ठहरने के दौरान ऐसा अक्सर होता है.  आस-पड़ोस के लोग आकर सुधा को अस्तपताल ले जाने की बात करते तो इस बात का गुस्सा भी सुधा पर ही उतरता कि लोग अपने आप को सयाना समझ कर उसे उपदेश देने आते हैं.
ग्यारवाँ महीना अभी शुरु ही हुआ था कि मझली जेठानी घर आईं. सुधा की हालत देख कर उससे रहा न गया. बड़ी ननद को साथ लेकर आई  सास-ससुर को समझाने लगी, 'सुधा की हालत तो देखो, अब तो ले जाओ उसे अस्पताल नहीं तो बच्चे समेत यहीं मर जाएगी.' पता नहीं क्या सोच कर सास ने सुधा को अस्पताल ले जाने की हामी भर दी.
सुधा की कहानी उसी की ज़ुबानी सुनते हुए मुझे धीरज पर बेहद गुस्सा आ रहा था. समझ नहीं पा रही थी कि कोई इंसान इतना बेदर्द कैसे हो सकता है, तटस्थ रह कर कैसे किसी को तड़पते देख सकता है. क्या सिर्फ माँ-बाप की मर्ज़ी से शादी करने से कोई अपने फर्ज़ों से मुँह मोड़ सकता है. दस महीने बीतने के बाद भी डॉक्टर के पास अपनी पत्नी को न ले जाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं. सुधा में भी हिम्मत नहीं थी कि अपने होने वाले बच्चे की खातिर खुद ही अस्पताल चली जाती. नहीं समझ पा रही रिश्तों के समीकरण..... ग्यारवें महीने में पहली बार अस्पताल जाती  सुधा की क्या हालत होगी....होने वाले बच्चे को बचाना मुमकिन हो पाएगा... सोच कर ही दिल और दिमाग सुन्न होने लगे. 

क्रमश:







4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ओह ॥ बहुत दर्दनाक कहानी ... पता नहीं मानवता कहाँ छूट जाती है लोगों में

रचना said...

bold areas nae kehani ko naya maksad diyaa haen

writer kaa farj bakhubhi nibhayaa haen un line mae aapne

aur blog jagat mae aapki vapsi , mehnat mae bhi iskae liyae kam nahin kartii hun !!

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...

आपकी यह रचना कल मंगलवार (28 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

क्या कहूं, बहुत सुंदर कहानी
बहुत बढिया