Thursday, September 27, 2007

वसुधा की डायरी २



आज वैभव का पहला पेपर था 'सोशल' जो सबसे मुश्किल माना जाता है। अच्छे अच्छे होशियार बच्चे भी घबरा जाते हैं। विलास को जूते पहनाते हुए सागर का मुँह लाल हो रहा था, शायद आँसुओं को रोकने का प्रयास कर रहे थे। सागर जितने गहरे हैं, उतना ही उनमें भावनाओं का वेग भी है। लहरों जैसे उठते-गिरते भाव उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे जाते हैं। वसुधा ने सागर का ध्यान खींचने के लिए कहा, 'सागर प्लीज़ , आप कार स्टार्ट कीजिए, विलास भाई का बैग लेकर आएगा।' वैभव की ओर देखकर वसुधा का दिल छलनी हो रहा था जो नई बैसाखियों के सहारे चलने का प्रयास कर रहा था। छोटा बेटा विलास वैभव से चार साल छोटा था लेकिन भाई के दर्द ने उसे बड़ा बना दिया। हर सुबह स्कूल के लिए अपने आप तैयार होना, अपनी और भाई की पानी की बोतल भर कर बैग में रखना , फिर भाई को यूनिफॉर्म पहनाने में मदद करना और दोनों के बैग लेकर कार में बैठ जाना, स्कूल पहुँचते ही वैभव की क्लास में उसका बैग रखकर अपनी क्लास की ओर भागना , उसकी दिनचर्या बन गई थी ।
वैभव धीरे-धीरे चलते हुए बाहर निकला । आज शायद ज़्यादा ही दर्द थी , मानसिक तनाव भी दर्द बढ़ा देता है लेकिन अभी कुछ कहना मुनासिब न समझकर वसुधा कार में जा बैठी। सभी स्कूल के लिए रवाना हुए । विशेष अनुमति लेकर वसुधा ने वैभव को मेडिकल रूम में पेपर देने के लिए बिठाना था । सागर ने कार को मेडिकल रूम के ठीक साथ सटा कर खड़ा किया और वैभव को उतरने में मदद करनी चाही पर वसुधा ने आँखों ही आँखों में इशारे से मना कर दिया। वसुधा नहीं चाहती थी कि बेटे को सहानुभूति दिखा कर कमज़ोर बनाया जाए। वैभव ने खुद ही निर्णय लिया था कि उसे दसवीं बोर्ड की परीक्षा में बैठने दिया जाए।
कई दिनों तक वसुधा और वैभव बैठ कर रोए थे , एक दूसरे पर गुस्सा उतारा था। कई दिनों तक वैभव का एक ही प्रश्न होता था , " वाय मी, मम्मी, वाय डिड गॉड गेव मी दिस पेन?" कई दिनों तक वसुधा इस प्रश्न का जवाब न दे पाई थी । सच में उसे भी लगता था कि उसने या सागर ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा या बुरा नहीं किया फिर क्यों बेटे को यह दर्द मिला। जब कोई उत्तर नहीं मिलता तो हम ईश्वर की शरण में जाते हैं। वसुधा भी छिपकर उस अदृश्य शक्ति को याद करके बहुत रोई थी। वसुधा अपने को
संयत करके वैभव के कमरे में पहुँचीं। "वैभव , सोशल का पेपर कैसा हुआ ? " वसुधा के पूछने पर वैभव झुंझलाते हुए बोला, "प्लीज़ मम्मी , मत पूछो , पास तो हो जाऊँगा , विश्वास है मुझे।" वसुधा ने वैभव की ही बात पकड़ कर कहा, " फिर तुम्हें अपने आप पर विश्वास क्यों नहीं कि तुम दर्द को सहजता से ले सकते हो ।" वैभव की आँखों में आँसू छलक आए, किसी भी तरह से वह यह बात नहीं समझ पा रहा था कि उसे दर्द क्यों मिला।
वसुधा ने वैभव के हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े प्यार से बेटे को देखा । कितना सुन्दर, खिला हुआ मुस्कराता चेहरा , कोई सोच भी नहीं सकता कि वैभव के पूरे शरीर में २४ घंटे दर्द खून में दौड़ता रहता है। दर्द से शरीर के सभी जोड़ जकड़ जाते हैं लेकिन किसी को गुमान भी नहीं होता। वसुधा के अलावा किसी ने वैभव को रोते नहीं देखा। वसुधा बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोली , "तुम्हें पता है , तुम भगवान के सबसे प्यारे बच्चे हो, भगवान ने तुम्हें अपना मैसेन्जर बना लिया है।" वैभव की आँखों में जिज्ञासा जाग उठी। "वो कैसे?", वैभव के पूछने पर वसुधा बोली, " दर्द में भी तुम सबके सामने मुस्कराते हुए जाओगे, यह विश्वास भगवान को था। उसके दूसरे बच्चे जो दर्द में रोते हैं, उन्हें दिखाने के लिए कि देखो मेरा सबसे प्यारा बेटा कितने दर्द में है, फिर भी मुस्कुराता हुआ ज़िन्दगी को ज़िन्दादिली से जी रहा है।" वसुधा की बात सुनकर वैभव के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान लौट आई। हार मान कर बोल उठा 'मम्मी, रीयली यू ऑर कलेवर इन टॉकस, बातें बनाना आपको बहुत अच्छा आता है।" वसुधा ने संजीदा होते हुए कहा, " सच कह रही हूँ । सिवा मेरे किसी ने भी तुम्हें रोते नहीं देखा। आइना देखो, वह तो झूठ नहीं बोलेगा। तुम्हारे चेहरे को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि तुम्हें इतना दर्द है।" दोनो ने एक दूसरे से वादा किया कि न रोएँगें, न रोने देगें।
इस बातचीत के बाद से घर का बोझिल वातावरण फिर से दुबारा नॉर्मल होने लगा। बेटे की प्यारी मुस्कान ने टूटती वसुधा को संबल देकर फिर से खड़ा कर दिया था। बहुत दिनों बाद आज वसुधा स्कूल में वही पुरानी चुलबुली शरारतों से सबको छेड़ती हुई स्टाफरूम में बैठी खिलखिला कर हँस रही थी। उसके दिल से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। उसे विश्वास था कि उसका बेटा हिम्मत वाला है । इस बात पर उसे और भी यकीन हो गया जब उर्दू के टीचर मीर साहब गीली आँखों को पोंछते हुए वसुधा के पास आकर बोले, " मैडम, आपके बेटे में गज़ब की ताक़त है, उसे बैसाखी से चढ़ते-उतरते देखकर मैं ख़ुद की रफ़्तार कम कर देता हूँ, सच मानिए, बड़ी तकलीफ़ होती है पर बच्चा जब मुस्कराता हुआ सलाम करता है तो दिल से दुआ निकलती है। अल्लाह पाक उसे सेहत बख़्शे।" "शुक्रिया मीर साहब, आपकी दुआ का ही असर है जो वह हिम्मत से चल रहा है , हमेशा दुआ में याद रखिए। " यह कह कर वसुधा आगे बढ़ गई।

क्रमशः

4 comments:

Divine India said...

बाल मनोविज्ञान, स्नेह और विश्वास पर रचित यह सुंदर रचना बहुत कुछ कह रही है… काफी अच्छा है

Udan Tashtari said...

यह भी बहुत उम्दा लिखा है. अगली कड़ी का इन्तजार लगवा दिया.

अभिनव said...

समीर जी नें ठीक कहा है, बहुत उम्दा।

मीनाक्षी said...

अभिनव जी
प्रणाम
टिप्पणी के लिए धन्यवाद। अंर्तजाल पर आप सब अनुभवियों की दुनिया बहुत बड़ी है । हिन्दी लेखन के गहरे सागर में गोते लगाने का मेरा पहला अनुभव है । अभी पूरी तरह से तैरना बाकि है लेकिन बहुत अच्छा लग रहा है।
आशा है कुछ ही दिनों में गोताखोरी तो नहीं पर कुछ दूर तक तैरना ज़रूर आ जाएगा।
समीर जी की उदारता के बारे में कौन नहीं जानता ।
एक बात और आपकी आवाज़ मधुर है।
धन्यवाद
मीनाक्षी