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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

रेतीली हवाओं में संगीतमय फिल्म

गुरुवार की शाम घर से बाहर जाने का जोश ठंडा पड़ गया ..... रेतीला तूफ़ान (सैण्ड स्ट्रॉम) ऐसा शुरु हुआ कि घर के अन्दर भी साँस लेना मुश्किल हो गया... जान गए कि अभी फिलहाल कुछ देर के लिए तो बाहर निकलना नामुकिन है....सो चाय नाश्ता करते हुए एक फिल्म देखना निश्चित किया....
‘अगस्त रश’ ....सपनीली फिल्म जिसमें प्रेम और ममता का अनोखा रूप देखने को मिला.....संगीत की सुनहरी दुनिया में मिले दो अजनबी अनायास एक दूसरे की ओर खिंचे चले गए..दोनों ही संगीत के दीवाने....पहली नज़र का प्यार शायद इसी को ही कहते होंगे.....ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था... लड़की के पिता ने अपने अनुभव का सहारा लेकर दोनो को अलग करने की कोशिश की... सफ़ल भी हो गए......प्रेमी जोड़े की संतान को भी उनसे दूर कर दिया...ग्यारह साल के बाद बीमार पिता ने अपनी बेटी को अस्पताल बुला कर पुराने रहस्य को खोल दिया कि उसकी संतान ज़िन्दा है लेकिन किसी अनाथाश्रम है.....शायद मरता हुआ इंसान किसी भी अपराध भावना को लेकर इस दुनिया से नहीं जाना चाहता.... उधर दोनों प्रेमी भटकती आत्माओं की तरह दोनों एक दूसरे की तलाश में जी रहे थे.... उधर नन्हा सा बच्चा भी बड़ा हो रहा था अपने माता पिता की तलाश में.... संगीत प्रेम उसे अपने माता पिता से विरासत में मिला था.. प्रकृति के रोम रोम में संगीत की स्वर लहरी उस पर अनोखा जादू कर देती... उसे विश्वास था कि कहीं न कहीं उसके माता पिता भी उसे चाहते हैं...वे भी उसकी तलाश में होंगे.... संगीत के द्वारा वह अपने माता-पिता को खोजना चाहता था........
फिल्म के अगले हिस्से में शहर में पहुँचा लड़का खो गया और पहुँच गया एक ऐसी जगह जहाँ अनाथ बच्चे एक साथ रहते संगीत के ज़रिए पैसा इक्ट्ठा करके अपने लीडर को देते ... वह हिस्सा मन को बाँध न पाया लेकिन इसी बीच नाटकीय अन्दाज़ में पिता पुत्र की कुछ पल की मुलाकात भी होती है....
वहाँ से भाग कर चर्च में एक नन्हीं सी बच्ची से मुलाकात फिल्म को रोचक बना देती है.... उस बच्ची के कमरे में बैठकर संगीत बनाने का अनोखा तरीका हैरान करता है कि इतना छोटा सा बच्चा इतनी गहराई से कैसे अनुभव कर सकता है.... बच्चे का गिटार बजाने का अनोखा तरीका...गिटार बजाते हुए मंत्रमुग्ध करती मासूम मुस्कान ... मासूम मुस्कान, अलौकिक प्रेम की आभा और संगीतमय दिशाएँ.... मन को मोहित कर जाती हैं....
सुबह के सूरज की इठलाती किरणों का इधर उधर दौड़ना.. हवा का गुनगुनाना... .बास्केटबॉल खेलते बच्चों के जूतों की आवाज़ में भी उसे संगीत सुनाई देता...दूर किसी पार्क में झूला झूलते बच्चों की किलकारियाँ ... उसे मंत्रमुग्ध कर देतीं... चर्च की उस बच्ची के कारण उसके हुनर को निखारा वहाँ के बहुत बड़े संगीत स्कूल ने...
एक बहुत बड़े पार्क में संगीत के कार्यक्रम में माँ और बेटा दोनों हिस्सा लेते हैं....माँ को विश्वास था कि इसी शहर में कहीँ उसका खोया हुआ बच्चा है जिस तक उसके मन की आवाज़ पहुँच सकेगी... और बेटा हज़ारों लोगों के बीच में संगीत के माध्यम से अपने माता पिता तक अपने दिल की आवाज़ पहुँचाना चाहता था.
अंत में संगीत ने ही उन तीनों को एक दूसरे से मिला भी दिया.... फिल्म में संवाद बहुत कम हैं ... चेहरे पर आते जाते हाव भाव बहुत कुछ कह जाते हैं.... फिल्म देखने के बाद महसूस हुआ कि प्रेम संगीतमय है और संगीत प्रेमी ही प्रेम की परिभाषा को आसानी से समझ सकता है....
फिल्म के बारे में हम सही कह पाए हैं या नहीं यह तो आप फिल्म देख कर ही बता सकते हैं... !

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

ख़ानाबदोश ज़िन्दगी





नियमित न लिख पाने का एक बड़ा कारण है ख़ानाबदोश ज़िन्दगी... एक सूटकेस लिए कभी यहाँ तो कभी वहाँ... ब्लॉगजगत की पुरानी यादों ने झझकोरा तो एक पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग के बगीचे से एक नई कोंपल फूटी....14 अप्रेल को...सोचा तो यही था कि अब से नियमित लिखना शुरु करेंगे लेकिन फिर से सफ़र की तैयारी शुरु हो गई.....


दो दिन पहले ही दुबई से रियाद आए हैं... अभी यहाँ नेट , टेलिफोन और टीवी कनैक्शन की समस्या है...शहर से दूर एक नई जगह पर घर लेने के कारण नई समस्याएँ भी हैं.... खैर जैसे तैसे 5 जीबी कनैक्शन से ही खुश हैं...


यहाँ बाहर निकलने का सवाल ही नहीं है सो संगीत॥फिल्में और किताबें पढ़ने के बाद फोन पर पुराने दोस्तों से कुछ बातचीत होती है.... सुबह सवेरे धूप की नन्हीं नन्ही किरणें खिड़की के एक कोने से अन्दर आ ही जाती हैं...कुछ देर इठलाती इतराती इधर उधर भागती और फिर निकल जाती किसी ओर दिशा की ओर...खिड़की दरवाज़े बन्द होने के बावज़ूद पता नहीं कहाँ से धूल अन्दर आ धमकती है...दीवारों की मज़बूत बाँहों के घेरे में अपने आप को महफ़ूज़ पाकर मुँह चिढ़ाती सारे घर में उधम मचाती है... हम उसे भगाने मे लगे रहते हैं....


फिलहाल सप्ताह के अंत होने का इंतज़ार है ..... वीरवार और शुक्रवार को नीले आसमान के नीचे निकलने का मौका मिलेगा... शायद कुछ दोस्तों से भी मिलना हो...आभासी दुनियाअ तो लुभाती ही है लेकिन वास्तविक दुनिया का मोह भी नहीं छूटता....!


बुधवार, 14 अप्रैल 2010

भूली बिसरी यादों की खुशबू....





भूली बिसरी यादों की खुशबू फिर से मन को महकाने लगी.... भूली बिसरी यादें ! नहीं नहीं.......... यादें तो बस यादें होती हैं..शायद यादें कभी भुलाई ही नही जा सकती........खूबसूरत यादें...ज़िन्दगी की दिशाओं को महकाती यादें.... पिछले दिनों जाना कि जीवन प्याला जो साँसों के अमृत रस से भरा है आधा छलक गया .... छलका उस पथ पर जिस पर अपने ही चल रहे थे....उन्ही अपनों ने आधे भरे प्याले का आनन्द उठाने की दुआएँ दीं.....
उन्ही अपनों का आभार कैसे और किन शब्दों में व्यक्त करें... गर वे अपने हैं तो फिर वे मन के भाव अपने आप ही समझ जाएँगे..... !
एक अर्से के बाद लौटे हैं ब्लॉग जगत में.... यहाँ की यादों को फिर से तरो ताज़ा कर लें फिर अपने बारे में कुछ कहेंगे....

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

24वीं वर्षगाँठ पर ....
















पहली सितम्बर की सुबह की लालिमा ...

सन्ध्या की कालिमा में बदल गई....

लेकिन हाथ की कलम में कोई हरकत न हुई.....

इस उमस के मौसम में .......

टूटे बदन सी शिथिल पड़ी रही कलम .....

सोचा था उसके बल पर कुछ लिख पाऊँगी

चौबीस सालों का लेखा-जोखा कर पाऊँगी.....



कल की ही तो बात थी.....

माँ बाबा ने जीवन साथी संग भेज दिया था..

सृष्टि की रचना के पुण्य कर्म करने को ...

धर्म निभाने को नई राह पर चला दिया था....

पतिदेव नहीं.... धर्म पति, सखा और मित्र बने....

आस्था, निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास अटल ने

जीवन में अमृत रस था घोल दिया....!



अपने अपने आसमान में.....

हम दोनों जीवन संगी भी विचरते....

इक दूजे की सीमा में दाखिल न होते...

दूर गगन की छोर को छूने ....

हम भी उड़ते बेफिक्री से....

अजब ग़ज़ब सी शक्ति पाकर

फिर लौट के आते नीड़ में अपने...!



एक आसमान हम दोनो का भी....

जिसके नीचे दो नन्हें पौधें जन्में...

मिले सूरज चाँद बराबर दोनों को ..

स्नेह की वर्षा होती दोनो पर इक जैसी...

नन्हें पौधों से बढकर रूप बड़ा लेने को बेचैन

दोनों मगन हुए लगन से बढ़ते जाते....

अपना अपना आसमान छूने को उड़ते जाते..... !

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

'प्रेम ही सत्य है' ब्लॉग का जन्मदिवस



मोबाइल का अलार्म बजते ही सन्देश पढ़ा कि आज हमारे छोटे भाई के बेटे समर्थ का जन्मदिन है और अनायास याद आ गई अपने ब्लॉग़ की जिसका जन्म भी आज के ही दिन(27 अगस्त 2007) हुआ था... समर्थ सात साल का हुआ है और ब्लॉग मात्र दो साल का नन्हा सा बालक है जो दो साल का लगता नहीं... लेखन रूपी पौष्टिक आहार न मिलने के कारण कमज़ोर है.... कमज़ोर होने के कारण किसी भी काम में बढ़चढ़ कर भाग न ले पाने के कारण किसी का ध्यान उस बालक पर कम ही जाता है...

सच कहूँ तो इस बालक के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए ब्लॉग-परिवार के कई सदस्यों ने चिंता व्यक्त की.... पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन (लेखन सामग्री) द्वारा ब्लॉग के पालन पोषण पर ज़ोर दिया....

कुछ मित्रों ने लिखने के लिए प्रेरित किया तो कुछ के लेखन से प्रेरणा मिली.... आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद...

सभी का ज़िक्र करने की इच्छा है लेकिन कमज़ोर ब्लॉग बालक को कुछ समय चाहिए.... सेहत में सुधार आते ही... यानि लेखन नियमित होते ही ऐसा करने का विचार है.... !!

शनिवार, 30 मई 2009

समझदार को इशारा काफी !

आज माँ की बहुत याद आ रही है.... और उसका मौन... एक भी गलती हो जाने पर भयानक सज़ा मिलती....वह भी उसका अनंत मौन..... चारों दिशाओं में गहराती खामोशी.... और मेरे मन में हलचल.... मन ही मन चिल्लाती..... 'मम्मीईईईईईईईई ...... चिल्लाओ मुझ पर.... चीख चीख कर डाँटो..... गलती की है तो तमाचा जड़ दो.... बुरा भला कहो....लेकिन चुप न रहो..... ' लेकिन उधर.... एक कभी न टूटने वाली खामोशी...... जिससे दिल टूट टूट जाता..... लेकिन उस टूटने की आवाज़ माँ के कानों में न पहुँचती......

ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा के दिनों में अपनी सहेली के घर कुछ नोटस लेने गई..... शाम 6 बजे से पहले वापिस लौटने का वादा था लेकिन 7 बजे लौटी.... माँ ने दरवाज़ा खोला 8 बजे........... एक घंटा देरी से आने का एहसास हो गया था.... सज़ा भंयकर लेकिन इंसान गलतियों का पुतला... हर बार कोई न कोई गलती..... हाँ एक ही गलती को दुबारा दुहराने की नौबत कभी न आई....

धीरे धीरे चुपके चुपके जाने कब से यही मौन मुझमें आ बैठा..... लेकिन एक नए रूप में....माँ के मौन के आगे हम ठहर न पाते लेकिन हमारे बच्चे उस मौन को तोड़ने की हिम्मत करते हैं...

दोनों बेटे गलती करके खुद ही सामने आ बैठते हैं..... 'मम्मी, आप डाँटती क्यों नहीं.... चुप क्यों रह्ती हैं .......कभी कभी गलती पर डाँटना ज़रूरी होता है... तभी पता चलेगा कि आगे वही गलती नहीं दुहरानी है...' 'आप कभी नहीं कुछ कहतीं.... सब कुछ हम पर ही छोड़ देती हैं' ......

ऐसा सुनकर बस यही कहती...अपने देश में एक कहावत मशहूर है... बाप का जूता पाँव में आते ही बच्चे मित्र बन जाते हैं... फिर तो बस एक इशारा चाहिए और समझदार को इशारा काफी... एक उम्र के बाद अपनी गलती पहचानना और उसे फिर न दुहराना..... जिसे आ जाए.... वह जीवन में आने वाली मुसीबतों को आसानी से झेल जाएगा...

ऊँची आवाज़ में बोलने की ज़रूरत ही नहीं हुई..... कभी गलती हुई हो तो गलती करने के एहसास से ही एक दूसरे के सामने लज्जित होकर खड़े हो जाते क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों के पैरों का साइज़ लगभग बराबर ही है......... कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं लगती... !

रियाद की शान -- बुलन्द ईमारतें


खाड़ी के देशों में साउदी अरब सबसे अलग अपने ही कानूनों के साथ चलने वाला देश है. मक्का-मदीना जैसे पवित्र तीर्थ स्थान वाले इस देश में दुनिया भर से हज करने के लिए लोग आते हैं...यहाँ पर्यटन के लिए वीज़ा की कोई गुंजाइश नहीं है.. हज और उमरा के अलावा लोग यहाँ सिर्फ नौकरी के लिए आते हैं...आसानी से वीज़ा न मिलने के कारण इस देश के बारे में जानने की जिज्ञासा लोगों मे बनी रहती है....

होटल की खिड़की से फैसलिया टॉवर और किंग़डम सेंटर दिखा तो सोचा कि आज इन बुलन्द ईमारतों की ही चर्चा की जाए.. यू.के. बेस्ड आर्चिटेक्ट फॉस्टर एंड पार्टंनर्ज़ द्वारा डिज़ाईन किया गया फैसलिया टॉवर रियाद की शान माना जाता है.. साउदी अरब की राजधानी रियाद के बीचों बीच बना यह टॉवर व्यापार का केन्द्र तो है ही इसमें शॉपिंग मॉल भी है जिसमें दुनिया भारत के मशहूर ब्रैंडज़ देखने को मिलते हैं...

दूर से यह ईमारत एक बॉलपॉएंट पेन की तरह दिखता है...जिसके चार मज़बूत बीम सबसे ऊपर पहुँच कर एक गोल्डन टिप से जुड़े दिखते हैं... एक गोल्डन टिप एक बॉल है..या कहिए कि एक ग्लोब है जो एक रिवोलविंग रेस्टोरेंट है....जिसमें बैठकर पूरे रियाद की खूबसूरती देखी जा सकती है...वहीं से रियाद की दूसरी खूबसूरत ईमारत किंगडम सेंटर दिखाई देता है....
किंग़डम सेंटर को बुर्ज अल ममलका भी कहा जाता है... 311 मीटर ऊँची ईमारत दुनिया की 45वीं ऊँची ईमारत है जिसे बेस्ट स्काईस्क्रेपर का एवार्ड भी मिला है... 99 फ्लोर्ज़ में 4 बेसमेंट भी हैं...व्यापार के इस केन्द्र में भी खूबसूरत शॉपिंग मॉल है..सबसे ऊपर 100 मीटर लम्बा डैक है, जहाँ से खड़े होकर पूरे रियाद को देखा जा सकता है... एक और खास बात है इस टॉवर में.... इसकी दूसरी मज़िल को लेडीज़ किंगडम कहा जाता है, जहाँ पुरुष दाखिल नहीं हो सकते...अल ममलका शॉपिंग मॉल और सिर्फ और सिर्फ औरतों के लिए है... जहाँ जाने माने 40 स्टोर्ज़ है ...लगभग 160 शोरूम्ज़ हैं जो औरतों द्वारा ही मैनेज किए जाते हैं... साम्बा बैंक की लेडीज़ ब्रांच ...लेडीज़ मॉस्क...रेस्टोरेंट ...कुल मिला कर औरतों से जुडी हर ज़रूरत को पूरा करता हुआ फ्लोर एक अलग ही मस्ती का माहौल दिखाता है....