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बुधवार, 3 जून 2026

सूरज उतरा मेरे अंगना

 पहले पहर का सूरज उतरा मेरे अँगना 

सुबह सवेरे घर भर में खनके मेरा कंगना 

अन्नपूर्णा बन सब की क्षुधा को शांत मैं करती 

साँझ के सूरज की लाली जीवन को समृद्धि से भरती 

माथे पर सुनहरी स्वेद कणों के मोती ढुलकते और चमकते 

सूरज की लाली से मेरी सूरत भी दमकती और निखरती !! 


बुधवार, 17 सितंबर 2014

उतरते सूरज की कहानी...



हर शाम जाते सूरज की बाँहों से
 किरणें मचल कर निकल जातीं...
नन्हीं रंगबिरंगी सुनहरी किरणें 
बादलों के आँचल से लिपट जातीं...








गुस्से में लाल पीला होता  
सूरज उतरने लगता आसमान से नीचे
गहराती सन्ध्या से सहमे बादल
 धकेल देते किरणों को उसके पीछे 

  
  


शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सूरज और पौधे




सूरज

आसमान से नीचे उतरा
धरती के आग़ोश में दुबका
ध्यान-मग्न पौधों का ध्यान-भंग करता
हवा के संग मिल साँसे गर्म छोड़ता

पौधे

एक पल को भी विचलित न होते
झूम-झूम कर फिर से जड़ हो जाते...
फिर से होकर लीन समाधि में
सबक अनोखा सिखला जाते 


सोमवार, 24 मार्च 2008

अपने ममता भरे हाथों से ....!



















(सन्ध्या के समय समुन्दर के किनारे बैठे बेटे विद्युत ने तस्वीर खींच ली,  
और हमने अपनी कल्पना में एक शब्द चित्र बना लिया. )







ममता भरे हाथों से सूरज को
वसुधा ने नभ के माथे पर सजा दिया

सजा कर चमचमाती सुनहरी किरणों को
साँवला सलोना रूप और भी निखार दिया

सागर-लहरें स्तब्ध सी रूप निहारने लगीं
यह देख दिशाएँ मन्द मन्द मुस्काने लगीं

गगन के गालों पर लज्जा की लाली सी छाई
सागर की आँखों में जब अपने रूप की छवि पाई

स्नेहिल-सन्ध्या दूर खड़ी सिमटी सी, सकुचाई सी
सूरज की बिन्दिया पाने को थी वह अकुलाई सी

रंग-बिरंगे फूलों का पलना प्यार से पवन झुलाए
हौले-हौले वसुधा डोले और सोच सोच मुस्काए

धीरे-धीरे नई नवेली निशा दुल्हन सी आएगी
अपने आँचल में चाँद सितारे भी भर लाएगी.