Tuesday, January 15, 2008

फुर्सत के पल यादों के मोती बने !!



आजकल बड़े बेटे वरुण की छुट्टियाँ हैं और छोटा बेटा अपनी पढ़ाई में व्यस्त है इसलिए मेरे पास समय ही समय है. व्यस्तता के बाद जब ऐसे पल हाथ लगते हैं तो मैं उन्हें दोनों हाथों में भर लेती हूँ. फुर्सत के पल यादों के मोती बन जाते हैं. उन बिखरे मोतियों को अपने दिल में सजा लेती हूँ. उनकी खूबसूरती से आँखों में चमक जो आती है उसे मैं छिपा नहीं पाती. इस वक्त भी ऐसा ही कुछ हो रहा है और मैं अतीत के सुनहरे बादलों में यादों के पंख लगा कर आवारा सी उड़ रही हूँ. कल मैं आवारा बंजारन थी जिसे आज यादों के पंख लग गए हैं.
उस दिन भी ऐसा ही कुछ अनुभव हो रहा था. चंचल मस्त हवा सी इधर से उधर भागती तैयारी में जुटी थी क्योंकि रात ही मुझे श्रीनगर के लिए रवाना होना था. कैसे दिन थे जब डर शब्द या उसके अर्थ से पहचान ही नहीं हुई थी. वादे के मुताबिक डैडी ने मुझे कश्मीर भेजने का सारा बन्दोबस्त कर लिया था. एक पल के लिए दिल धड़का था कि शायद दादी माँ कुछ कहेगीं लेकिन उन्होंने भी कोई रोक टोक नहीं की. अब सोचती हूँ तो अच्छा लगता है कि लड़की के रूप में जन्म लेने के बाद भी मुझे किशोर अवस्था तक आते आते टुकड़ों में आज़ादी न देकर पूरी आज़ादी दे दी गई ताकि मन में आत्मविश्वास पैदा हो सके.
15 साल की अल्हड़, शोख उम्र का नशा और कश्मीर की सुन्दर वादियों में घूमने का चाव. रेलवे स्टेशन पहुँच कर जम्मू तवी जाने वाले ट्रेन ढूँढी गई. एक कम्पार्टमैंट के बाहर लगी लिस्ट में अपना नाम देखकर राहत मिली और उछल कर चढ़ गई. अपने नम्बर की सीट भी दिख गई. सूटकेस सीट के नीचे रखा और खिड़की के पास जाकर बैठ गई. डैडी ने कहा कि नौ बजे के बाद यही तुम्हारी स्लीपिंग बर्थ होगी. उस वक्त किसी को बैठने नहीं देना और सो जाना. यह भी बता दिया कि दीदी जीजाजी के एक मित्र दो कम्पार्टमैंट छोड़कर बैठे हैं. बीच बीच में आकर खबर लेते रहेंगे. दिल और दिमाग तो कश्मीर में पहले ही पहुँच गया था तो क्या सुनती, बस एक मुस्कान के साथ सिर हिलाती रही. ट्रेन चलने का समय हुआ तो डैडी सिर पर हाथ फेरते हुए हैप्पी जर्नी कहते हुए नीचे उतर गए.
दो बोगी छोड़ कर जीजाजी के जो मित्र बैठे थे, उन्हें मैंने पहले कभी देखा भी नहीं था. रात के दस बजे अपने बैग से खाना निकालने के लिए बैग में हाथ डाला. अरे यह क्या...खाने का डिब्बा गायब. फट से अपना मनीबैग टटोला तो सन्न रह गए. डैडी से पैसे लेना भी भूल गई थी. मम्मी ने कहा भी था कि याद से पैसे ले लेना. चेहरा सफेद और दिल की धड़कनें तेज़.
सामने वाली सीट पर बैठी आंटी जी शायद कुछ भाँप गई थी. उन्होंने पूछा, 'अकेली हो?' 'नहीं, अंकल भी साथ हैं लेकिन उन्हें दो कम्पार्टमैंट छोड़कर सीट मिली है. जवाब देकर मैं साथ लाई एक किताब पढ़ने लग गई. किताब के पहले पन्ने पर ही दीदी का पता और फोन लिख लिया था, जिसे पढ़कर चैन की साँस ली. किताब के कोने से नज़र चुराकर देखा आँटी जी के चेहरे पर हैरानी के भाव थे. हैरानी के भाव धीरे धीरे नरम हुए तो चेहरे पर ममता भरी मुस्कान आ गई. अपने बच्चों को आलू पूरी देते समय मुझे भी खाने की मिन्नत की. मैंने सकुचाते हुए एक निवाला तोड़कर उनका मान रख लिया.
जीजाजी के मित्र ने दो बजे रात को खिड़की खटखटाते हुए पुकारा, 'मधु , ठीक हो? कुछ खाना है?' मधु मेरा बचपन का नाम है जो अभी तक जन्मपत्री में है. पाँचवीं तक के प्रमाणपत्र में भी लिखा हुआ है. छठी कक्षा में जाने पर पाँचवीं की क्लास टीचर ने मुझे मीनाक्षी नाम आशीर्वाद के रूप में दिया था . ननिहाल में अभी भी सब मधु ही पुकारते हैं.
मैंने ज़ोर से आवाज़ दी, 'अंकल, मै ठीक हूँ.' दबी आवाज़ में खाने के लिए भी हाँ कह दी कि शायद कुछ खाने को मिल जाए. 'इस वक्त रात के दो बजे हैं, सुबह जम्मू पहुँच कर नाश्ता जल्दी करेंगे.' कहते हुए वापिस अपने कम्पार्टमैंट की ओर लौट गए. मैं मन ही मन उन्हें कोसने लगी कि फिर इतनी रात को खाने का पूछा ही क्यों. पेट को दबाकर किसी तरह सोने की कोशिश की...!!
सफ़र तो चल ही रहा है......
लेकिन आज बस इतना ही..

8 comments:

Sanjay said...

तो मधु ने भूखे रह कर की थी कश्‍मीर की यात्रा..च च च!! अब इसे पूरा जरूर करें. ईरान की तरह अधूरा संस्‍मरण नहीं रह जाए. फिर सुबह नाश्‍ते में क्‍या मिला?

Gyandutt Pandey said...

खाली पेट, खाली बटुआ, और टोटल आजादी! हिन्दुस्तान ने भी १५ अगस्त १९४७ को ऐसा ही अनुभव किया होगा - अगर उसकी आत्मा रही होगी तो।
अच्छा लेख!

उन्मुक्त said...

कभी कभी या अक्सर, भावनाओं में, सपनो में रहने का मन करता है। मुझे तो यह चिट्ठी किसी राजकुमारी की कहानी सी लग रही है। जिसमें, बस उसके सपनों के राजकुमार के आने की देर है।
क्या आपको सपने का राजकुमार वहीं मिला :-)

Parul said...

क्या आपको सपने का राजकुमार वहीं मिला :-)
UNMUKT JI KE SAWAAL KA JAVAAB HUM BHI JAAN NEY KO UTSUK HAIN di,

Sanjeet Tripathi said...

अगली किश्त का इंतजार रहेगा मधु जी!
ज्ञानदत्त और उन्मुक्त जी की टिप्पणी सटीक है।

Vivek Rastogi said...

वाकई मधु जी जब कोई खाने का पूछे और बिना हाँ सुनने का इंतजार करे चला जाये तो वाकई कोई कुछ नहीं कर सकता...

Vivek Rastogi said...

वाकई मधु जी जब कोई खाने का पूछे और बिना हाँ सुनने का इंतजार करे चला जाये तो वाकई कोई कुछ नहीं कर सकता...

मीनाक्षी said...

@संजय जी, इरान का सफर तो ताउम्र चलेगा... लेकिन ज़रूर दुबारा लिखना शुरु करती हूँ..नाश्ता तो मिला...
@ज्ञान जी, अनुभव में याद आती है कविता..हम पंछी उन्मुक्त गगन के.

@उन्मुक्त जी, आप तो लेख पढ़कर भाव जान लेते हैं. सपनों में राजकुमार वही कश्मीर मे दिखा था...
@पारुल अब यह तो बड़ा पेचीदा सवाल है.
@संजीत जी और विवेक जी...कोशिश करती हूँ कि यादों की पिटारी में से कुछ और भी आप से बाँट सकूँ.