तू सूरज मैं मूरत हूँ मोम की
तू अग्निकण मैं बूँद हूँ ओस की !
तपन तेरी से पिघले तन-मन
तपिश तेरी से सुलगे प्रति-क्षण !
तू समझे न बातें मेरे ह्रदय की
तू क्या जाने पीड़ा मेरे मन की !
अभिव्यक्त करूँ मैं कैसे अपने भावों को
हँसते-हँसते सहती हूँ तेरी घातों को !
10 टिप्पणियां:
सशक्त अभिव्यक्ति। फुरसतिया जी जैसे दिग्गजो की नजर नही पडी। नही तो वे आपको पुस्तक प्रकाशन का सुझाव जरूर देते।
बस यह हंसते हंसते घात सहने से ही अभिव्यक्ति मंजती है।
tu suraj,main murat mom ki,sundar,bhav meenakshiji,aise hi to hota hai,koi apne bhav keh nahi pata,aur bas sehta jata hai andar man mein.this is beautiful.
कम शब्दों मे सब कुछ कह दिया आपने।
कमाल की पंक्तियाँ है।
इतनी गंभीर मन: स्थिति, क्या बात है!!
सरल शब्दों मे गहरी बात जैसे गागर मे सागर.
बहुत अच्छी कविता.
बधाई.
उपर जो भाईयों नें कहा है उसे ही हमारी टिप्पणी माने । कविता का मजा तो चंद शव्दों में महाकाव्य को समेट लेने पर ही आता है ।
संजीव
त्रिलोचन : किवदन्ती पुरूष
sundar bhaav DI...
Haste-haste sahtee hu tere ghaaton ko.....
Teree khushee ke vaste na jane kyaa kyaa sahaa ,
har mod jindgee kaa hum khushee se jee liye.
Muje ye lines yaad aa gayee.
Very well said.Likhtee rahiye....
बहुत खूब! आपको सच में किताब छपवानी चाहिये। :)
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