क्यों मैं ही मैं हूँ
गर्व किस बात का
नासमझी क्यों
अहम त्यागो
अमर तुम नहीं
मृत्यु निश्चित
घना अंधेरा
छाया का साया नहीं
अविश्वास है
मृत्यु मित्र सी
चुपके से आती है
गले लगाती
यायावरी है
आना-जाना लोगों का
थके न कोई
गर्व किस बात का
नासमझी क्यों
अहम त्यागो
अमर तुम नहीं
मृत्यु निश्चित
घना अंधेरा
छाया का साया नहीं
अविश्वास है
मृत्यु मित्र सी
चुपके से आती है
गले लगाती
यायावरी है
आना-जाना लोगों का
थके न कोई
10 टिप्पणियां:
चुपके से आती है
गले लगाती....
सचमुच मृत्यु का सत्य कितना कमनीय और निष्ठुर होता है! इतने कम शब्दों में ढेर-सी अर्थवत्ता समेटे आपकी रचना सराहनीय है।
अद्भुत. थोड़े से शब्दों में सब कुछ की देने की यह कला अद्भुत है. मन प्रसन्न हो गया जी पढ़ कर.
आप की यह रचना पढ़ कर अच्छा लगा। यही लगा,कि काश मैं भी अपनी बात कुछ इतने ही थोड़े से शब्दों में कह पाया करूं....बस यूं ही लंबी लंबी हांकता रहता हूं। यह संक्षिप्त शैली बहुत कारगर है।
छुआ तो
त्रपदम हुए
शब्द मेरे
छुआ तो
त्रिपदम हुए
शब्द मेरे
mrutyu mitra,chupke se aati,gale lagati,sahi hai meenakshiji,sundar haiku .
sunder rachna aur vichar
सुंदर!
सभी एक से एक हैं।
बहुत सुंदर ,बार बार पढने वाली !!
meenakshi jee,
saadarabhivaadan. baap re baap kahan se laatee hain aap itnee saaree baatein ,itne vichaar aur itnee sunder lekhan shailee. kab padhtee hain aur kab likhtee hain. sach kahun to aap to sabkuchh hain. shikshak bhee , vidyaarthi bhee, paathikaa bhee aur lekhikaa bhee, daarshanik bhee aur bhee bahut kuchh .
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