Monday, September 24, 2007

चक्रव्यूह

१५० कि०मी० की ड्राइव ने मुझे पस्त कर दिया था लेकिन पतिदेव के फोन आते ही कि वे दमाम ठीक-ठाक पहुँच गए हैं, मैंने चैन की साँस ली और सोने चली गई । दो घंटे की नींद ने मुझे नई शक्ति दे दी थी । उठने के बाद घर का काम खत्म करके कुछ लिखने बैठी लेकिन दिमाग जैसे कुछ काम नहीं कर रहा था , कल करने वाले कामों की लिस्ट तैयार थी । "मम्मी, थोड़ी देर के लिए सब भूल कर अपनी दुनिया में चली जाइए, आप फ्रेश हो जाएँगीं" बेटा अपने 'लेपटॉप' से नज़र हटा कर मेरी तरफ देखकर बोला। सोचा कि यादों के झरोकों से ही कुछ लिखकर मन हल्का कर लूँ ।

बात उन दिनों की है जब बेटे को दर्द तो हो रहा था लेकिन डाक्टर समझ नहीं पा रहे थे कि रोग क्या है। दो साल के दौरान की पीड़ा , छटपटाहट मुझे अन्दर ही अन्दर तोड़ रही थी , मैं एक ऐसे चक्रव्यूह में फँस गई थी कि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह से इस चक्रव्यूह से निकल पाऊँगीं ।


जीवन के चक्रव्यूह में हम फँसें
भूले कि अब हम कैसे हँसें ।
मन में धुँआ ही धुँआ उठे
और साँसों का भी दम घुटे ।
मुस्कान की रेखा मुख पर खिंचे
यह भाव मुझे कभी न मिले ।
जीवन जो काँटों जैसा चुभे
तन-मन का भी आँचल फटे।
कटे कैसे जिस जाल हम फँसे
छटपटाते रोएँ, न कभी हँसे।
तन पिंजरे में मन-पंछी जो रहे
बस उड़ने की वह इच्छा करे।
कठिन क्षण आसान कैसे बनें
इच्छा है चक्रव्यूह से निकल चलें।।

3 comments:

Udan Tashtari said...

कुछ परेशानियों के दिनों को याद कर लिया आपने.

अनिल रघुराज said...

मीनाक्षी जी, कोई चक्रव्यूह ऐसा नहीं है, जिसे भेदा नहीं जा सकता। बस इच्छा होनी चाहिए।
मन में धुआं ही धुआं उठे
और सांसों का भी दम घुटे
भावनाओं का अच्छा चित्रण है।

Sanjeet Tripathi said...

ज़ीवन चित्र को शब्द चित्र में आसानी से बदलने में कामयाब रही हैं आप!

जब मन हो इच्छा तो चक्रव्यूह तो है टूटना ही!!


परिचय में बहुत सही लाईन्स लिखी है आपने!