पिछली पोस्ट को ज़ारी रखते हुए कायदे से 'सफ़र का अगला सफ़ा' दर्ज करना था लेकिन उस पोस्ट की टिप्पणियाँ पढते पढ़ते नीचे नज़र गई तो 'लिंक्स टू दिस पोस्ट' में लगे तीन ब्लॉग खोल कर पढ़ने का लालच न रोक पाई.....
पारुल और कंचन दोनो ही प्यारी लगती हैं ....पारुल छोटी बहन जैसी और कंचन बिटिया जैसी.... कंचन जैसे दिल वाली कंचन की काँच सी खनकती चूड़ियों जैसी आवाज़ फोन के ज़रिए कानों में पड़ती है तो दिल चाहता है कि बस बात होती ही रहे... बेटे वरुण को कंचन दीदी से मिलाने का वादा तो किया है लेकिन कब.... नहीं पता...खैर कंचन का लिंक खोला जिसे पढ़कर आँखें नम हो गईं...नम आँखों में अटके आँसू गालों में ढुलकने लगे.
17 मार्च 2003 का दिन नहीं भूलता जब मैं अपने बीमार पिता का हाथ छुड़ाकर अपने बच्चों के पास लौट गई थी... 19 मार्च को वे हमें सदा के लिए छोड़ गए....'मैं कहना चाहता हूँ "पापा आई लव यू " पर कह नही पाता' अनुरागजी के इस भाव को पढ़ कर बार बार मन ही मन अपने पापा से माफी माँग रही हूँ और पुकार रही हूँ कि बस एक बार फिर से वापिस लौट आएँ तो हाथ छुड़ा कर कहीं न जाऊँगी...
लावण्यजी के ब्लॉग पर जाकर जहाँ पापा के साथ बिताए बचपन के दिन याद आ गए तो वहीं युनूस जी द्वारा पोस्ट किए गए गीत को बचपन में कई बार गा गाकर टूर पर गए पापा को याद किया जाता था.
दिल और दिमाग बेचैन हो उठे ...जैसे अन्दर ही अन्दर बेबसी का धुँआ भरने लगा हो... सामने दीवार पर टँगी तस्वीर में मुस्कुराते पापा को देखते ही चेतना लौटने लगी...
इन्हीं विचारों में डूबते उतरते पारुल के लिंक को क्लिक किया तो गज़ल के बोल बार बार पढ़ने लगे और सुनकर तो मन शांत स्थिर झील सा होने लगा... एड्रेस बार में नीरजजी का ब्लॉग अभी दिख रहा था जिसे पढ़ना बाकि था...जिसे खोलते ही जयपुर में किताबों की दुनिया की जानकारी मिली... किताबों की बात आते ही जयपुर में कुश से मुलाकात और उनसे भेंट में मिली दो किताबों की याद आ गई जिन्हें पढ़ना अभी बाकि है.... वैसे कल ही उनके ब्लॉग़ की नई पोस्ट पढ़ी, अमीना आलम ने तो सच में नींद उड़ा दी...
तीसरे लिंक को खोला तो शब्दों के सफ़र में खानाबदोश और मस्त कलन्दरों के बारे में पढ़ने को मिला... खानाबदोश तो आजकल हम भी बने हुए हैं... फिलहाल 22-23 साल से इस जीवन शैली में मस्त कलन्दर बनने की कोशिश में लगे है.... !
सोचा नहीं था कि पोस्ट और टिप्पणियों के नीचे दिए गए लिंक्स से एक पोस्ट तैयार हो जाएगी... लेकिन पढ़ने और फिर लिखने के बाद अच्छा लग रहा है....... शुभ रविवार :)
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शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
सफ़र के कुछ सफ़े - 1

ब्लॉग जगत के सभी मित्रों को नमस्कार.... !
6 अक्टूबर 2008 को अपने देश की ज़मीन पर पैर रखते ही सोचा था कि हर दिन का अनुभव आभासी डायरी में उतारती जाऊँगी लेकिन वक्त हथेली से रेत की तरह फिसलता रहा....आज पूरे चार महीने हो गए घर छोड़े हुए...
घर कहते ही मन सोच में पड़ जाता है कि कौन से घर की बात की जाए... पति और बच्चों के साथ बीस साल जहाँ बिताए वह घर या फिर बच्चों की खातिर दूसरी जगह आकर रहना पड़ा , उस घर की बात की जाए.....या अपने देश के घर की जहाँ रोज़ नित नए अनुभव बहुत कुछ सिखा रहे हैं....
अरब खाड़ी में रहने वाले लगभग सभी परिवारों के साथ एक बात कॉमन है.....बच्चों की स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही एक अभिवावक खासकर माँ को अपने देश आना पड़ता है .... कुछ बच्चे विदेश चले जाते हैं...कुछ बच्चे अपने देश के अलग अलग प्रदेशों में कॉलेज में दाखिला पा लेते हैं... जन्म से लेकर बाहरवीं तक की पढ़ाई के बाद कुछ बच्चे तो अपने देश में फौरन ही रच बस जाते हैं और कुछ बच्चों को वक्त लगता है...उन्हें परिस्थितियों से मुकाबला करने की कला सिखाने के लिए माँ को ही आगे आना पड़ता है। कुछ सालों की मेहनत के बाद बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं और बस निकल जाते हैं अपनी मंज़िल की ओर....
वरुण की पढाई खत्म होते ही वीज़ा भी खत्म..... स्टडी वीज़ा खत्म होने के कारण वरुण को दुबई छोड़ना पड़ा... वैसे भी इलाज के लिए अपने देश से बढ़िया का कोई जगह नहीं है... देश विदेश से लोग इलाज के लिए भारत आते हैं सो हमने भी दिल्ली का रुख किया..... छोटे बेटे ने कॉलेज में दाखिला अभी लिया ही था , न चाहते हुए भी उसे अकेले ही दुबई छोड़ना पड़ा .... खैर अब हम दिल्ली में है .... श्री तजेन्द्र शर्मा जी की कहानी 'पासपोर्ट के रंग' उनकी ज़ुबानी सुनते सुनते अपने बारे में सोच रहे थे कि 'शेर वाला नीला पासपोर्ट' होते हुए भी हम अरब देश से बाहर 6 महीने से अधिक नहीं रह सकते... छह महीने के अंतराल में एक बार खाड़ी देश में जाना लाज़िमी है... सफ़र ज़ारी है कभी यहाँ , कभी वहाँ ... लेकिन सर्दी का मौसम सफ़र में थकान होने ही नहीं देता...
पहली बार अक्टूबर में भारत का आनन्द ही अलग लगा... मीठी मीठी धूप में तीखी तीखी मूली खाने का खूब मज़ा ले रहे हैं..इसके अलावा क्या क्या गिनाए.... राजधानी दिल्ली में अलग अलग राज्यों के अलग अलग स्वादिष्ट पकवान सोचते ही बस आपके सामने..... ठंड के मौसम में खाने पीने का अलौकिक आनन्द अभी ले ही रहे थे कि अचानक आईने पर नज़र गई तो चौंक गए...पहले से ही अरब देश का खाना पीना ही नहीं हवा भी खूब लग रही थी .... इधर अपने देश के छ्प्पन भोग से जी था कि भरने का नाम ही नही ले रहा था लेकिन अभी और जीना है यह सोचकर अपने ऊपर पाबन्दी लगाने की बात कुछ इस तरह सोची.........
रे मन अब तू धीरज धर ले !
चिकन मटन को छोड़ के अब तो
घास फूस पर जी ले अब तू ...... रे मन .... !
चिकनी चुपड़ी भूल जा अब तो
रूखी सूखी ही खा ले अब तू .... रे मन .... !
चना-भटूरा, आलू-छोले से कर तौबा अब तो
धुली मूँग पर सबर बस करले अब तू .... रे मन .... !
भरवाँ-पराठाँ, आलू-गोभी मिले न अब तो
फुलका फुलकी में ही मन को लगाले अब तू ... रे मन .... !
मखनी-दाल, नवरतन कोरमा को विदा कर अब तो
अंकुरित दाल, सलाद को अपना ले अब तू ... रे मन ... !
स्थूल काया कम होगी कैसे यही फिकर है अब तो
कृशकाया कैसे फिर आए, यही सोच बस अब तू... रे मन ...!
फिकर फिगर का धीरे धीरे बढ़ता जाता अब तो
खोई हुई फिगर का सपना फिर से देखले अब तू... रे मन ... !
(पतंजलि योगपीठ का सफ़र अगले सफ़े में .........)
गुरुवार, 29 जनवरी 2009
आपकी अभिव्यक्ति पर मेरे भाव
दूर दूर तक गहराते कोहरे में अपने वजूद को गुम होते देख कर स्तब्ध रह जाना और फिर उसी वजूद की तलाश में निकल जाना .... बस ऐसे ही दिन पर दिन , हफ्ते दर हफ्ते और महीनों निकल गए....
कोहरा, कलम और मैं जब एक जुट हुए तो शब्दों को एक नया आकार मिलने लगा जिसे आप सब ने निहारा और तारीफ में कुछ और शब्द जोड़ दिए...
जिन्दगी की उहा पोह, उलझनें और जिम्मेदारियाँ अक्सर ऐसी ही मानसिक स्थितियाँ निर्मित कर देती हैं, जिन्हें आपने इतनी सुन्दरता से शब्द दिये हैं. मनोभावों की सशक्त एवं सहज अभिव्यक्ति. – उड़न तश्तरी
समीरजी, आपने सही पहचाना... खानाबदोश सी ज़िन्दगी कब थोड़ा ठहरेगी.बस इसी इंतज़ार में लिखना पढ़ना छोड़ बैठे.....जल्दी ही अपनी खानाबदोश ज़िन्दगी के कुछ अनुभव लिखूँगी.
कलम की जय हो! - अनूप शुक्ल
अनूप जी , कलम में सर कलम करने की ताकत भी है और समाज को बदलने का कमाल भी कलम ही कर सकती है. तभी तो उसकी जय जयकार होती है.
कीबोर्ड पर ऊंगलियों के
थिरकने से निकलते
नये तराने हैं – अविनाश वाचस्पति
सोलह आने सच है आपकी बात... कीबोर्ड पर उंगलियों के थिरकने से
तराने नए निकलते हैं जो दिल और दिमाग को तरोताज़ा कर देते हैं.
Fog Is A Tunnel
Life Is A Train
At The End Of The Tunnel
There Is Light Always
Keep The Train Of Life
Chugging On - रचनाजी
रचना जी, सच कहूँ तो इस घने कुहासे में सिर्फ और सिर्फ अपने होने का एहसास होता है.... दूर दूर तक बस मैं और गहरा कोहरा... कभी कभी उससे बाहर निकलने का मन ही नहीं करता...
आपकी आमद हमेशा सुखद रहती है....इस कलम को छोडियेगा नही....ये कई दर्द से मुक्ति दिलाती है - डा. अनुराग
डा. अनुराग , कलम को छोड़ने का सोच भी नहीं सकते , हाँ कभी दर्द हद से ज़्यादा बढ़ जाता है तो उंगलियाँ सुन्न सी हो जाती हैं.... और कलम हाथ से छूट जाती है....
हमारी भी दशा कोहरामय है। बस आप कलम की बात कर रही हैं - मैं रेलगाडी की! – ज्ञानदत्त जी
ज्ञानजी, इसमें कोई शक नहीं कि हम सब के जीवन में कोहरामय कोहराम मचा है...
बहुत दिनों बाद आज आप दिखी है ।
मीनाक्षी परेशान न हो ये दौर गुजर जायेगा ।
ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्यों की हम इस दौर से गुजर चुके है (sep -jan )जब कुछ भी लिखने का मन नही करता था । -- ममता जी
ममताजी, कभी कभी इस दौर से गुज़रने का अपना एक अलग ही अनुभव होता है। मौका पाते ही आपसे ज़रूर बाँटूगी।
हिन्दी ब्लोग जगत मेँ तशरीफ रखिये स्वागतम ~~~ Where have you been ? :)- लावण्या
लावण्यादी, घने कोहरे के घेरे से घिरी मैं... नहीं जानती कैसे मुक्त हो पाऊँ मैं... कोशिश एक आशा जान बस उस किरण का इंतज़ार करूँ मैं....
जिस ब्लॉग जगत में कलम और उससे जन्मे शब्दों की परवरिश होती है , चाह कर भी उस दिशा में बढ़ते कदम अनायास रुक जाते हैं और मन बेचैन हो उठता है. शब्दों के भाव विपरीत दिशा में चलने की चाहत पैदा कर देते हैं...तो कभी जीवन धारा सब बाँध तोड़ कर बह जाने को मचल उठती है ...
आप सबकी कलम से जन्मे शब्दों और उनके भावों ने मेरी कलम को एक नई उर्जा दी है, आप सबका आभार... यही उर्जा अजन्मे शब्दों को एक नया और सुन्दर रूप देगी जिसे आप जल्द ही देख पाएँगे.
कोहरा, कलम और मैं जब एक जुट हुए तो शब्दों को एक नया आकार मिलने लगा जिसे आप सब ने निहारा और तारीफ में कुछ और शब्द जोड़ दिए...
जिन्दगी की उहा पोह, उलझनें और जिम्मेदारियाँ अक्सर ऐसी ही मानसिक स्थितियाँ निर्मित कर देती हैं, जिन्हें आपने इतनी सुन्दरता से शब्द दिये हैं. मनोभावों की सशक्त एवं सहज अभिव्यक्ति. – उड़न तश्तरी
समीरजी, आपने सही पहचाना... खानाबदोश सी ज़िन्दगी कब थोड़ा ठहरेगी.बस इसी इंतज़ार में लिखना पढ़ना छोड़ बैठे.....जल्दी ही अपनी खानाबदोश ज़िन्दगी के कुछ अनुभव लिखूँगी.
कलम की जय हो! - अनूप शुक्ल
अनूप जी , कलम में सर कलम करने की ताकत भी है और समाज को बदलने का कमाल भी कलम ही कर सकती है. तभी तो उसकी जय जयकार होती है.
कीबोर्ड पर ऊंगलियों के
थिरकने से निकलते
नये तराने हैं – अविनाश वाचस्पति
सोलह आने सच है आपकी बात... कीबोर्ड पर उंगलियों के थिरकने से
तराने नए निकलते हैं जो दिल और दिमाग को तरोताज़ा कर देते हैं.
Fog Is A Tunnel
Life Is A Train
At The End Of The Tunnel
There Is Light Always
Keep The Train Of Life
Chugging On - रचनाजी
रचना जी, सच कहूँ तो इस घने कुहासे में सिर्फ और सिर्फ अपने होने का एहसास होता है.... दूर दूर तक बस मैं और गहरा कोहरा... कभी कभी उससे बाहर निकलने का मन ही नहीं करता...
आपकी आमद हमेशा सुखद रहती है....इस कलम को छोडियेगा नही....ये कई दर्द से मुक्ति दिलाती है - डा. अनुराग
डा. अनुराग , कलम को छोड़ने का सोच भी नहीं सकते , हाँ कभी दर्द हद से ज़्यादा बढ़ जाता है तो उंगलियाँ सुन्न सी हो जाती हैं.... और कलम हाथ से छूट जाती है....
हमारी भी दशा कोहरामय है। बस आप कलम की बात कर रही हैं - मैं रेलगाडी की! – ज्ञानदत्त जी
ज्ञानजी, इसमें कोई शक नहीं कि हम सब के जीवन में कोहरामय कोहराम मचा है...
बहुत दिनों बाद आज आप दिखी है ।
मीनाक्षी परेशान न हो ये दौर गुजर जायेगा ।
ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्यों की हम इस दौर से गुजर चुके है (sep -jan )जब कुछ भी लिखने का मन नही करता था । -- ममता जी
ममताजी, कभी कभी इस दौर से गुज़रने का अपना एक अलग ही अनुभव होता है। मौका पाते ही आपसे ज़रूर बाँटूगी।
हिन्दी ब्लोग जगत मेँ तशरीफ रखिये स्वागतम ~~~ Where have you been ? :)- लावण्या
लावण्यादी, घने कोहरे के घेरे से घिरी मैं... नहीं जानती कैसे मुक्त हो पाऊँ मैं... कोशिश एक आशा जान बस उस किरण का इंतज़ार करूँ मैं....
जिस ब्लॉग जगत में कलम और उससे जन्मे शब्दों की परवरिश होती है , चाह कर भी उस दिशा में बढ़ते कदम अनायास रुक जाते हैं और मन बेचैन हो उठता है. शब्दों के भाव विपरीत दिशा में चलने की चाहत पैदा कर देते हैं...तो कभी जीवन धारा सब बाँध तोड़ कर बह जाने को मचल उठती है ...
आप सबकी कलम से जन्मे शब्दों और उनके भावों ने मेरी कलम को एक नई उर्जा दी है, आप सबका आभार... यही उर्जा अजन्मे शब्दों को एक नया और सुन्दर रूप देगी जिसे आप जल्द ही देख पाएँगे.
बुधवार, 28 जनवरी 2009
कोहरा, कलम और मैं

1
कोहरा सर्द आहें भरता हुआ अपने होने का एहसास कराता है... दूर दूर तक फैले नीले आसमान के नीचे मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लेता है , उसके आगोश में कसमसाती मैं और मेरे हाथों में कराहती कलम जिसके गर्भ में शब्द आकार लेने से पहले ही दम तोड़ते जा रहे हैं....
नहीं जानती कि ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है लेकिन हो रहा है....
कलम का दर्द मुझे अन्दर तक हिला देता है...उसे हाथों में लेने को आगे बढ़ती हूँ..... मेरा स्पर्श पाते ही पल भर में उसका दर्द गायब हो जाता है....उसके मन में एक उम्मीद सी जागी है..शब्दों को सुन्दर रूप और आकार मिलेगा, इस कल्पना मात्र से ही वह खिल उठी है.....
कोहरा सर्द आहें भरता हुआ अपने होने का एहसास कराता है... दूर दूर तक फैले नीले आसमान के नीचे मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लेता है , उसके आगोश में कसमसाती मैं और मेरे हाथों में कराहती कलम जिसके गर्भ में शब्द आकार लेने से पहले ही दम तोड़ते जा रहे हैं....
नहीं जानती कि ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है लेकिन हो रहा है....
कलम का दर्द मुझे अन्दर तक हिला देता है...उसे हाथों में लेने को आगे बढ़ती हूँ..... मेरा स्पर्श पाते ही पल भर में उसका दर्द गायब हो जाता है....उसके मन में एक उम्मीद सी जागी है..शब्दों को सुन्दर रूप और आकार मिलेगा, इस कल्पना मात्र से ही वह खिल उठी है.....
मंगलवार, 4 नवंबर 2008
नेह निमंत्रण सस्नेह स्वीकर...! ...
मन हर्षाया
निमंत्रण जो पाया
छाया उल्लास
उर्जा पाऊँगी
हर एक स्त्रोत से
नए भाव की
निमंत्रण जो पाया
छाया उल्लास
उर्जा पाऊँगी
हर एक स्त्रोत से
नए भाव की
सौहार्द चर्चा के लिये नेह निमन्त्रण
सभी ब्लॉग लिखती महिला को नेह निमन्त्रण हैं सौहार्द चर्चा मे आने का । मिलने का दिन रविवार ९ नवम्बर तय किया गया हैं । समय और स्थान पता करने के लिये रंजना भाटिया अथवा रचना सिंह से संपर्क करे ।
अब तक जिन लोगो की स्वीकृत मिल गयी हैं
अनुराधा
मिनाक्षी
सुनीता शानू
मनविंदर
रंजना भाटिया
रचना
4 comments:
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008
आशा का दीप जलाया जाए तो प्रकाश होगा ही...
आजकल हम दिल्ली में हैं.....दुबई से चलते हुए मन में कई मंसूबे बाँधे थे कि भारत भ्रमण के बहाने ब्लॉगजगत की परिक्रमा ज़रूर करेंगे लेकिन यहाँ आकर दिन में तारे नज़र आने लगे... सबसे पहले तो एयरपोर्ट पर उतरते ही प्रीपेड टैक्सी के काउंटर पर ही मज़ेदार अनुभव हो गया... बात बहुत छोटी सी थी लेकिन माँ की डाँट ने सोचने पर लाचार कर दिया कि शायद गलती हो गई... एयरपोर्ट से वसंत कुंज के लिए 165 रुपए की रसीद काट कर 170 रुपए लेने वाले साहब से हमने 5 रुपए वापिस क्यों नही लिए .... सिस्टम को खराब करने का ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया...
घर के गेट के आगे पड़ोसी पानी के पाइप से खूब देर तक अपनी कार को स्नान कराते हैं,,,पिछवाड़े में पानी की टंकियाँ ओवर फ्लो होती दिखती हैं जिन्हें देखकर कुछ कह न पाने की विकलता का बयान कैसे करें नहीं जानते...
पूरे देश में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जिसे हम चुपचाप देख सुन रहे हैं लेकिन कुछ न कर पाने की पीड़ा भी झेल रहे हैं..... किसी इंसान को अपने पालतू कुत्ते के साथ टहलते देखते ही मन में एक एहसास जागने लगता है कि काश अपने कुत्ते से प्यार करने वाला इंसान अपने आस पास के इंसानों को भी इतना ही प्यार दे पाता....
निराश होने की बजाय आशा का दीप जलाया जाए तो प्रकाश होगा ही... प्रेम, विश्वास और भाईचारे के भाव दिखने लगते हैं..... एक ड्राइवर लम्बे रास्ते से ले जाकर कि.मी. बढाकर पैसा ऐंठने की सोचता है तो दूसरा परिवार के सदस्य की तरह से हर तरह की मदद करने को तैयार दिखता है....
इसी प्यार और विश्वास ने बेटे वरुण को एक हकीम साहब के पास जाने को तैयार कर दिया... सालों से अंग्रेज़ी दवा लेने के बाद जड़ी बूटियों की दवा लेना आसान नहीं था... प्रेम और विश्वास चमत्कार कर देते हैं.... पिछले 4-5 दिन से बिना पेनकिलर लिए वरुण हैरान और परेशान है ... हमें आशा की एक किरण दिखाई देने लगी है कि अपने चमत्कारी देश का चमत्कार ज़रूर दिखाई देगा...
घर के गेट के आगे पड़ोसी पानी के पाइप से खूब देर तक अपनी कार को स्नान कराते हैं,,,पिछवाड़े में पानी की टंकियाँ ओवर फ्लो होती दिखती हैं जिन्हें देखकर कुछ कह न पाने की विकलता का बयान कैसे करें नहीं जानते...
पूरे देश में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जिसे हम चुपचाप देख सुन रहे हैं लेकिन कुछ न कर पाने की पीड़ा भी झेल रहे हैं..... किसी इंसान को अपने पालतू कुत्ते के साथ टहलते देखते ही मन में एक एहसास जागने लगता है कि काश अपने कुत्ते से प्यार करने वाला इंसान अपने आस पास के इंसानों को भी इतना ही प्यार दे पाता....
निराश होने की बजाय आशा का दीप जलाया जाए तो प्रकाश होगा ही... प्रेम, विश्वास और भाईचारे के भाव दिखने लगते हैं..... एक ड्राइवर लम्बे रास्ते से ले जाकर कि.मी. बढाकर पैसा ऐंठने की सोचता है तो दूसरा परिवार के सदस्य की तरह से हर तरह की मदद करने को तैयार दिखता है....
इसी प्यार और विश्वास ने बेटे वरुण को एक हकीम साहब के पास जाने को तैयार कर दिया... सालों से अंग्रेज़ी दवा लेने के बाद जड़ी बूटियों की दवा लेना आसान नहीं था... प्रेम और विश्वास चमत्कार कर देते हैं.... पिछले 4-5 दिन से बिना पेनकिलर लिए वरुण हैरान और परेशान है ... हमें आशा की एक किरण दिखाई देने लगी है कि अपने चमत्कारी देश का चमत्कार ज़रूर दिखाई देगा...
सोमवार, 27 अक्टूबर 2008
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Is it for woman leaving at certain place? If so I hope full coverage will be here. One suggestion if possible please do complete videography of the meeting. In my opininon it is history making event. - Amita
amita as of now we are getting together in delhi but every woman who blogs is invited
please get in touch with us
Thats great, I have followed the Kavi Sammelan available as "Video In Internet" the first one, made a history in Internet, a Brave Heart Kavitri Sunita Shanoo.
Now it is great and pleasing news from you about the Nari Blogger. It is again a History in making from Delhi.
बहुत दूर होने के कारण आपके इस आयोजन में भाग नहीं ले सकूँगी परन्तु मेरी शुभकामनाएं ।
घुघूती बासूती