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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008
तस्वीरों में सफर की कहानी
साउदी अरब में कुछ बड़े बड़े कम्पाउंड छोड़कर अधिकतर घर कुछ इस तरह माचिस की डिब्बी से होते हैं. जिसका कुछ हिस्सा खोलकर धूप और ताज़ी हवा का थोड़ा मज़ा लेने की कोशिश की जाती है.
धूप का एक भी टुकड़ा घर के अन्दर आ जाए तो समझिए कि हम बहुत भाग्यशाली हुए अन्यथा पति की दया पर निर्भर कि किसी दोपहर को धूप लगवाने परिवार को बाहर ले जाएँ.
हमने अपने घर के एक कमरे में जैसे ही सूरज के सुनहरे आँचल को फैलते देखा.... हाथ जोड़कर सर झुका दिया......
नाश्ते में चटकदार रंग के ताज़े फल खाने से पहले तस्वीर लेना न भूलते. हर बार अलग अलग ऐंगल से तस्वीर खींच कर फिर ही खाते.
उसके बाद घर के कोने कोने से यादों की बेरंग धूल को ढूँढ ढूँढ कर साफ करते.
बन्द घर में भी ऐसी महीन धूल कहीं न कहीं से
दनदनाती हुई
आ ही जाती है... सुबह भगाओ तो दोपहर को फिर आ धमकती है...दोपहर अलसाई सी धूल शाम तक फिर कोने कोने पर चढ़ जाती है.... लकड़ी का कुत्ता जो अम्बाला शहर से कुछ दूर एक गाँव नग्गल की कोयले की एक टाल से लाया गया है, जिसके पैरों तले धूल बिछी पड़ी है...
जिस तरह रेतीली हवाएँ कभी आहिस्ता से आकर सहला जाती हैं तो कभी तेज़ी से आकर झझकोर जाती हैं , उसी तरह हरा भरा पेड़ जब ठूँठ हो जाता है तो दिल को झझकोर डालता है... लगता जैसे पेड़ का अस्थि पंजर अपनी बाँहें फैला कर शरण माँग रहा हो....
चित्त को चंचल करती इस जड़ को ही देखिए...
आपको क्या दिखता है.....
बस इसी तरह घर भर में डोलते सुबह से शाम
बस इसी तरह घर भर में डोलते सुबह से शाम
हो जाती. दोनों बेटे तो अपने कमरे में अपनी अपनी पढ़ाई में मस्त रहते. हम कभी मोबाइल पर उर्दू रेडियो का स्टेशन पकड़ने की कोशिश करते तो कभी अंग्रेज़ी और अरबी गाने सुनकर मन बहलाते. किताबें तो आत्मा में उतरने वाला अमृत रस जो जितना पीते उतना ही प्यास और बढ़ती...
एक हाथ में 'दा सीक्रेट' तो दूसरे हाथ में 'वुमेन इन लव' ..... एक रोचक तो दूसरी नीरस....लेकिन पढ़ना दोनो को है सो पढ़ रहे हैं. जल्द ही उस विषय पर कुछ न कुछ ज़रूर लिखेंगे.
गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008
लौट आए हैं फिर से ...
लौट आए हैं फिर से पुरानी दिनचर्या में.... पिछले कुछ दिनों से सफ़र और अतिथि सत्कार में व्यस्त थे. दो दिन पहले दम्माम से लौटे तो अपनी कुर्सी पर आ बैठे और बस लगे पढ़ने ब्लॉग पर ब्लॉग जैसे एक जाम के बाद एक दूसरा..तीसरा...चौथा....अनगिनत...कोई रोकने-टोकने वाला नहीं....... लिखने की सुध ही नहीं रही...
लेकिन लगा कि ....
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं....
फिर थोड़ा रुके... शब्दों का सफर में एक कविता पढ़ी, पारुल के ब्लॉग पर अपनी मन-पसन्द गज़ल सुनी तो मन में इक लहर सी उठी. और हलचल सी हुई....होश आया कि बहुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं है लेकिन शुक्र है कि किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया....
उनको ये शिकायत है कि हम..... (यह गीत कुछ प्यारी यादों के साथ जुड़ा है)
लेकिन लगा कि ....
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं....
फिर थोड़ा रुके... शब्दों का सफर में एक कविता पढ़ी, पारुल के ब्लॉग पर अपनी मन-पसन्द गज़ल सुनी तो मन में इक लहर सी उठी. और हलचल सी हुई....होश आया कि बहुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं है लेकिन शुक्र है कि किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया....
उनको ये शिकायत है कि हम..... (यह गीत कुछ प्यारी यादों के साथ जुड़ा है)
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008
कुछ पल मेरे अपने
मुम्बई से लौटे अभी दो दिन न बीते थे कि ईरान से अतिथि आ पधारे। भारतीय संस्कृति के अनुसार अतिथि को देव मान कर सत्कार में जुट गए। सुबह-सवेरे बेटों को स्कूल कॉलेज विदा करके मित्र को लेकर निकलते दुबई की प्रोपटी दिखाने, दोपहर घर आकर अपने हाथों से भारतीय व्यंजन पकाकर खाते-खिलाते , आराम करते शाम हो जाती , फिर निकलते शॉपिंग के लिए। आठ दिन इसी भागमभाग में बीते फिर आठ फरवरी को मित्र को ईरान के लिए रवाना किया और शाम की फ्लाइट से हम बच्चों के साथ साउदी अरब वीज़ा इकामा के काम से निकले।
इस दौरान एक दिन भी ब्लॉग जगत को नहीं भूले। यहाँ पतिदेव के पास एक ही लैपटॉप है जो शाम सात बजे के बाद ही मिलता है। सबसे पहले दोनों बेटों का नम्बर आता । जब तक अपनी बारी आती मन असमंजस में पड़ जाता । कुछ ही पलों में दुविधा दूर हो जाती , मन सोचता कि पूरे परिवार के साथ मिल-जुल कर रहने का आनन्द लिया जाए ।
यहाँ घर में टी०वी० है लेकिन कनैक्शन नहीं है सो मोबाइल को टी०वी० से जोड़कर रेडियो सुनते हैं। सोनी का एक बहुत पुराना डिजिटल कैमरा है जिससे घर की चारदीवारी के अन्दर की तस्वीरें खींचते रहते हैं। धूप के टुकड़े जब कमरों में आते हैं तो उनमें अपनी छाया की अलग अलग छवियाँ देखकर मन बहलाते हैं और कैमरे में कैद कर लेते हैं। रसोई में खाना पकाते पकाते खाने-पीने का अक्स उतार लेते हैं। खाना खत्म करते ही किताबों का स्वाद न चखा जाए तो खाना कैसे पचे सो किताबों के रस में डूब जाते हैं। फिलहाल आजकल यही दिनचर्या है ।
मंगलवार, 29 जनवरी 2008
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