Sunday, May 9, 2010

मेरे तो लगभग सभी दिन ऐसे ही खास होते हैं..!

आज न जाने क्यों सुबह नींद ही नहीं खुली.... विजय ऑफिस चले गए..बच्चे भी कब उठ गए पता ही नहीं चला.... छोटे की आवाज़ से नींद खुली कि चाय नाश्ता तैयार है मम्मी.... फ्रेश होकर किचन में गई तो मुस्कुराते हुए बच्चों ने ‘हैप्पी मदर्ज़ डे’ कह कर स्वागत किया... मन ही मन मैं सोच रही थी कि मेरे तो लगभग सभी दिन ऐसे ही खास होते हैं.... !

पिछले कुछ दिनों से सुबह आठ बजे विजय ऑफिस के लिए निकलते तो मैं भी उनके साथ हो लेती.... मुझे सहेली के घर छोड़ते हुए विजय ऑफिस निकल जाते और शाम को घर लौटते हुए ले लेते..इस बीच दोनो बेटे खुशी खुशी अपनी पसन्द का नाश्ता बनाते खाते और मस्ती करते....दोपहर के खाने में सूप, मैकरोनी या अंडे लेते लेकिन सबसे आसान और बढ़िया लगता रोटी पर जैतून का तेल डाल कर उसपर ज़ातर (अरब का खास मसाला) लगा कर खाते. कौन जान सकता है माँ के अलावा कि यह दिन उनके सबसे मज़ेदार दिन होते हैं...

‘बच्चे बेचारे खुद ही कैसे खाना बनाते और खाते हैं?’ दो तीन करीबी रिश्तेदार ऐसा पूछ चुके हैं... हालाँकि जानते हैं कि बच्चे अब बड़े हो चुके हैं.. बड़ा बेटा इंजिनियरिंग करके मास्टर्ज़ करने की सोच रहा है और छोटे ने कॉलेज का दूसरा साल अभी खत्म किया है और समर जॉब तलाश कर रहा है.

ज्यों ज्यों बच्चे बड़े होते हैं... अपनी एक अलग दुनिया बनाने में जुट जाते हैं...वे चाहते हैं कि उन पर विश्वास किया जाए कि वे अपनी दुनिया अपने बलबूते पर बना सकते हैं...लेकिन अगर उन्हें हमारी ज़रूरत है तो हम उनकी मदद के लिए तैयार भी रहें... हम हैं कि इसी भुलावे में रहते हैं कि हमारे बिना बच्चों का गुज़ारा कैसे होगा.....

खैर....जिस सहेली के घर गई थी...उसके दो छोटे छोटे बेटे हैं. बड़ा बेटा ढाई साल का और छोटा बेटा अभी पाँच महीने का है.. हम दोनो सहेलियाँ एक साथ रियाद स्कूल में पढ़ाया करतीं थीं, अब दोनों ही नौकरी छोड़ चुके हैं. जब भी रियाद आना होता है तो मिल बैठकर ज़िन्दगी की अनबूझ पहेली को सुलझाने की बातें होती तो कभी ज़िन्दगी को उस्ताद मान कर उससे जो भी सीखा उस पर बातचीत होती...,,,,

बीच बीच में दोनों बच्चों के साथ बच्चे बनकर खेलना शुरु करते तो वक्त का पता ही नहीं चलता....कब सुबह से शाम हो जाती और विजय पहुँच जाते लेने...शाम को घर आते तो गर्मागर्म चाय के साथ बच्चे स्वागत करते....चारों साथ मिल कर चाय पीते और इधर उधर की गपशप करते....

अपनी कई छोटी बड़ी समस्याओं को सुलझाने का सबसे बढिया उपाय है एक साथ बैठकर खुलकर बातचीत करना .....लम्बे अर्से के बाद परिवार एक हुआ है तो जितना भी वक्त मिलता है , साथ साथ गुज़ारते हैं... एक दूसरे की सुनते हैं, समझते हैं.... माता-पिता का सम्मान और बच्चों से प्यार परिवार का आधार तो है ही लेकिन अगर एक और रिश्ता ‘दोस्ती’ का बना लिया जाए तो एक दूसरे को और भी ज़्यादा सम्बल मिलता है.

11 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा ही सुन्दर विवरण है । आपके जीवन का आनन्द और बढ़े ।

दिलीप said...

aapki mitrata aur pragaadh ho yahi tamanna hai

Hindiblog Jagat said...

अच्छा लिखा है आपने.
क्या हिंदी ब्लौगिंग के लिए कोई नीति बनानी चाहिए? देखिए

दिगम्बर नासवा said...

नमस्कार मीनाक्षी जी ... बहुत समय बाद आपको ब्लॉग पर देखा ... बहुत अच्छा लगा ....

बच्चे खुश रहें ... अपने अपने काम में रहें ... माँ बाप के लिए इससे बढ़ कर कोई सुख नही होता ....

महेन्द्र मिश्र said...

सुन्दर प्रस्तुति.....आभार

Mayur Malhar said...

bahut hi sunder chitran kiya hai.

kshama said...

Aap khushqismat hain,ki, aapke saath,saath aapka pariwaar bhi aisi soch rakhta hai..aapasme mil baith kar khule manse charcha karna..warna barson beet jate hain,aur gruhini ko apne manki baat kabhi kahne ki mohlat nahi milti ya dee jati..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

यह तो बडे सौभाग्य की बात है।
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कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

संजय भास्कर said...

माँ बाप के लिए इससे बढ़ कर कोई सुख नही होता ....

संजय भास्कर said...

Maa Jaisa Koi nahi......

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा यह पढ़कर। सुन्दर परिवार! सुखी परिवार! :)