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शनिवार, 4 मई 2013

सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (2)


(चित्र गूगल के सौजन्य से) 

सुधा अपने आप को अपनों में भी अकेला महसूस करती है इसलिए अपने परिचय को बेनामी के अँधेरों में छिपा रहने देना चाहती है....  मुझे दीदी कहती है...अपने मन की बात हर मुझसे बाँट कर मन हल्का कर लेती है लेकिन कहाँ हल्का हो पाता है उसका मन.... बार बार अतीत से अलविदा कहने पर भी वह पीछे लौट जाती है...भटकती है अकेली अपने अतीत के जंगल में ....ज़ख़्म खाकर लौटती है हर बार...
उसका आज तो खुशहाल है फिर भी कहीं दिल का एक कोना खालीपन से भरा है.... 'दीदी, क्या करूँ ...मेरे बस में नहीं... मैं अपना खोया वक्त वापिस चाहती हूँ .... वर्तमान की बड़ी बड़ी खुशियाँ भी उसे कुछ पल खुश कर पाती हैं फिर वह अपने अतीत में चली जाती है.....       सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी  (1) 

पिछले साल सुधा से मुलाकात दिल्ली में हुई थी... पश्चिमी दिल्ली में नया घर लिया था...नई जगह , नए पड़ोसी ...सुधा सबसे पहले मिलने आई थी.... गोल मटोल छोटे से कद की ..हँसते माथे पर बड़ी सी लाल बिन्दी चमक रही थी..  हँसती हुई अचानक सामने आ खड़ी हुई थी...'मेरा नाम सुधा है... आप... ' मैं कुछ कहती उससे पहले ही अपने आप कह उठी.... दीदी कहूँ आपको... दीदी आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो मुझसे कहना.. ' मैं अन्दर बुलाने के लिए उसे कहती उससे पहले ही उसके बेटे ने पीछे से आवाज़ दी कि पापा का फोन आया है और वह वापिस लौट गई लेकिन उसके बाद कुछ ही दिनों में उसने अपने स्वभाव से मेरा मन जीत लिया...घंटों आकर बैठती अपने सुख दुख कहानी की कह जाती....उन्हीं दिनों उसने मुझे अपनी डायरी भी पढ़ने को दी थी और मैंने वादा किया था कि एक दिन अपने ब्लॉग़ पर उसकी कहानी ज़रूर लिखूँगी...
आजकल रियाद लौटी हूँ जहाँ वक्त कुछ ज़्यादा मेहरबान होता है सो लिखने बैठी हूँ पूरा मन बना कर.... आजकल सुधा कुवैत में है और मैं यहाँ रियाद में हूँ ... तय हुआ कि हम दोनों स्काइप पर बात करते हुए कहानी को अंजाम देंगे...
नया नया स्मार्टफोन सुधा के हाथ में है....स्काइप पर मेरे से बात करते करते अपने बेटे बहू की तस्वीर दिखा रही है जो अभी अभी उसके फोन पर आई है...बार बार एक ही बात दोहराती है सुधा कि नन्हीं प्यारी सी बहू पाकर वह धन्य हो गई.... असल में बहू नहीं बेटी मानती है उसे... कोमल की बात करते ही खुद पिघलने लगती है ..... 'मेरे घर आई एक नन्हीं परी' गीत उसे मेल करते हुए रोती भी जा रही है..आँसू प्यार के हैं ...दुलार के हैं...
कोमल को मेल मिलता है तो वह फौरन टैंगो पर आ जाती है..स्काइप पर मेरे साथ है तो फोन पर बेटे बहू के साथ ...बीच बीच में छोटे बेटे के मैसेज भी देख रही है.... बेटे बहू को देख कर तो सुधा निहाल हो जाती है.... बेटे की बलाएँ लेती है तो कभी उसे  डाँट देती है ..'मेरी बेटी को कुछ खिलाया पिलाया कर... देख  कितनी कमज़ोर हो गई है... ' ... सुधा की बात सुनकर दोनों खिलखिला उठते......उनकी खिलखिलाहट उसे बच्ची बना देते... जाने कैसी कैसी बच्चों जैसी हरकतें शुरु कर देती कि बच्चों का हँसते हँसते बुरा हाल हो जाता.....कॉलेज के लिए निकलते बच्चों को बाय बाय करती है कि छोटा बेटा दिल्ली से मैसेज कर देता है कि आलू शिमलामिर्च की सब्ज़ी कैसे बनाए....उधर वह अपने बेटे से बात करती है ... इधर स्काइप खुला छोड़ कर मैं भी अपनी किचन में चली जाती हूँ... अभी आटा गूँद कर फ्रिज  में रखती हूँ कि आवाज़ आ जाती ... 'दीदी ... मैं फ्री हो गई...आ जाओ.. ' लेकिन मुझे लगता है कि अब किचन का काम खत्म करके ही लौटूँ इसलिए सॉरी कहकर कुछ देर बाद मिलने का वादा करती हूँ .......
 लेकिन सुधा यह सुनकर एकदम ही उदास हो जाती है ...मैं मूक सी उसे देखती रह जाती हूँ...पर क्या करूँ घर के काम भी करने ज़रूरी हैं.....उधर वह अकेली ही निकल पड़ती है फिर से अपने अतीत के जंगल में ...जहाँ काँटों के सिवा कुछ नहीं मिलता उसे .. शायद उसे बार बार उन जंगलों में लहूलुहान होकर भटकना भाने लगा है..... वापिस लौटती हूँ तो फिर अपनी कहानी कहने लगती है, 'दीदी आप मेरे अकेलेपन के दर्द को नहीं समझ सकतीं.....मुझे आजतक कोई नहीं समझ पाया',  कह कर रोने लगती... मुझे समझ न आता कि कैसे उसे हौंसला दूँ....कुछ ही पल में वह खुद ही सँभल जाती.....
सात भाई बहन में सबसे छोटी थी सुधा....पैदा हुई तो माँ पिताजी में से किसी ने उसे दुलार न दिया बल्कि होश सँभलने पर यही सुनती कि पता नहीं कैसे टपक पड़ी....मासूम बचपन सब से अलग कुछ और ही सोचता... भाग भाग कर माँ पिताजी का छोटा छोटा काम करके जबरदस्ती गले लग जाती... 'माताजी..देखो, मैंने सारा काम खत्म कर दिया, मैं अच्छी हूँ न...प्यार करो न मुझे...' और झट से माँ की गोद में बैठ जाती... माँ का थोड़ा सा दुलार ही उसके लिए बहुत होता...
पिताजी को देख कर तो सबके प्राण सूख जाते.... सुधा ही नहीं सभी भाई बहन घर के एक कोने में दुबक जाते... पिताजी काम के सिलसिले में सफ़र पर निकलते तो 3-4 दिन से पहले घर न लौटते और जब लौटते तो छोटी छोटी बातों पर कपड़े धोने वाले डंडे से खूब मारते....माँ भी कम न थी, गाय-भैंस को बाँधने वाली साँकल कमर में डालकर ताला लगा कर खिड़की की रॉड से बाँध देती....
सुधा स्काइप पर बात करते करते ही हिचकियों से रोने लगी....बड़े भाई याद आ गए जो कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गए... रुँधी आवाज़ में ही बोलती चली गई थी वह.... कई दिनों का रुका यादों का तूफान आज जैसे दर्द की नदी में सब कुछ बहा कर अपने साथ ले जा रहा हो ..... मैंने भी उसे रोकना मुनासिब न समझा....
बड़े भाई की शादी हुई .... भरे पूरे परिवार में भी दुल्हन का मन नहीं लगा.... बड़ी बहू थी घर की लेकिन एक ही झटके में सब रिश्ते तोड़ कर वापिस अपने मायके चली गई.... सूरज भैया अकेले पड़ गए... घर वालों ने उन्हें भी बोरिया-बिस्तर बाँध कर घर से निकाल दिया कि वह भी अपनी पत्नी के साथ ही रहे चाहे घर दामाद ही क्यों न बनना पड़े... सुधा के भैया थे गैरतमन्द पत्नी के पास नहीं गए.. ...जब तक किसी छोटे से ठिकाने का इंतज़ाम होता तब तक के लिए वे दफ़्तर के ही एक कोने में सो जाया करते....
सुधा लाड़ली थी अपने भैया की.... दफ़्तर के लंच टाइम में उसके सूरज भैया स्कूल के गेट के बाहर वाले बैंच पर आकर बैठ जाया करते.... सुधा भी इंतज़ार करती कि कब आधी छुट्टी होगी और वह भैया से मिलेगी......दौड़ती हुई भाई के गले लग जाती और झट से अपना लंचबॉक्स खोलकर अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगती....जानती थी कि भाई के रहने का ठिकाना नहीं तो खाने का कहाँ होगा....छुटकी बहन के आगे घर के सबसे बड़े बेटे की एक न चलती ..... भीगी आँखों से दोनों भाई बहन एक दूसरे को देखते खुश होते....
भाई से मिलने की सज़ा भी खूब मिलती....कपड़े धोने वाले डंडे से कमर नीली कर दी जाती और बाँध दिया जाता साँकल से ताला लगा कर ...बाकि भाई बहन को धमकी दे दी जाती कि खबरदार अगर किसी ने इसे खोला या खाना दिया....बाथरूम जाने के लिए भी ताला खुलता सिर्फ खिड़की से...कमर में तो साँकल बँधी रहती ... दरवाज़े की ओट में ही फारिग़ होना पड़ता और फिर से कैदी की तरह खिड़की के पास बाँध दिया जाता....खिड़की से बाहर नीला आसमान भी उचक उचक कर देखना पड़ता..... नीले आसमान का विस्तार उसे बहुत पसन्द था लेकिन उस खिड़की से दिखता था बहुत कम .....थक कर सो जाती तो  सपने लेती पंछी बन कर दूर तक उड़ान भरने के......
तीसरे दिन सुबह सुबह सुधा को अपनी बड़ी दीदी के रोने की आवाज़ आई.... माँ से रो रोकर कह रह थी कि अब तो उससे नहीं देखा जाता... रो रोकर कहने लगी, 'मुझे भी साथ बाँध दो या खाना खिलाने दो' ....जाने क्या सोच कर माँ ने साँकल खोल दी... माँ पिताजी से मार तो सब भाई बहन ने बहुत खाई था क्योंकि मार के मामले में खुला दिल था दोनों का ....लड़का लड़की का भी कोई भेदभाव नहीं था...छोटी छोटी बात पर मार मार कर नीला कर देते...घंटों बेहोशी छाई रहती.... .बात करते करते कभी सुधा खिलखिला देती तो कभी रो पड़ती.... मैं सोचती कैसे कहूँ कि कुछ पल रुको....साँस लो..... चाय की शौकीन सुधा के सामने जैसे ही चाय का नाम लिया तो तय हुआ कि चलो एक घंटे के बाद फिर मिलेंगे......
दुबारा मिलने पर बचपन के कुछ हँसी खुशी के पल बाँटने को कहा....दीवाली दशहरे पर माँ पिताजी पूरे साल की खुशी लुटा देते..पिताजी रामलीला में एक्टर हुआ करते थे जिस कारण पास मिलते थे...सभी सबसे आगे जाकर बैठते और रामलीला का आनन्द लेते.......होता यह कि एक ही रंग और प्रिंट के थान से सभी बच्चों के एक जैसे कपड़े घर ही सिल दिए जाते... दशहरे वाले दिन सभी एक जैसे नए कपड़े पहन कर बाहर निकलते...तरह तरह की मिठाइयाँ और जलेबी खाने का मज़ा उन दिनों ही आता....
इस मस्ती के अलावा सिनेमा या सरिता पत्रिका जैसे किसी भी किताब का ज़िक्र भी होता तो खूब पिटाई होती...उन दिनों सुधा की आँखों में सपने तैरते कि कब उसकी शादी होगी...कोई सुन्दर सा राजकुमार अपने साथ ले जाएगा.... नए नए कपड़े पहन कर सिनेमा देखने जाएगी... खूब घूमेगी फिरेगी...
बस ऐसे ही कुछ छोटे छोटे सपने लेकर एक आम लड़की जीना चाहती है यह मुझे महसूस हुआ सुधा से मिलने के बाद....सदियों से चली आ रहीं पुरानी परम्पराएँ , अच्छे बुरे रीति-रिवाज़ , अन्धविश्वास और जाने कैसी कैसी विचारधाराएँ  हमारे रहन-सहन में  रच बस गईं कि उन्हें किसी के भी दिल और दिमाग से निकालना आसान नहीं....
खुशी के पल कम बयाँ होते .....घूम फिर कर सुधा फिर से उदासियों के जंगल में खींच कर ले जाती... जहाँ दुख के झाड़-खँखार ज़्यादा होते...दर्द के काँटों में उलझ कर ज़िन्दगी तार तार हो ...उधर जाने से मुझे कोफ़्त होती है.... दुख और दर्द हर किसी के जीवन में होते हैं लेकिन उनका असर कम हो इसके उपाय जुटाना ज़रूरी है न कि उन्हीं में डूब कर छोटी सी अनमोल ज़िन्दगी को बेकार कर देना.... !
फिर मिलने का वादा करके हमने सुधा से अलविदा ली ....
(कहानी सच के एक अंश से शुरु होती है लेकिन अनायास ही कल्पना के कई रंगों से सजने लगती है)

क्रमश:

बुधवार, 1 मई 2013

सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी

(चित्र गूगल के सौजन्य से)

सुधा अपने आप को अपनों में भी अकेला महसूस करती है इसलिए अपने परिचय को बेनामी के अँधेरों में छिपा रहने देना चाहती है....  मुझे दीदी कहती है...अपने मन की बात हर मुझसे बाँट कर मन हल्का कर लेती है लेकिन कहाँ हल्का हो पाता है उसका मन.... बार बार अतीत से अलविदा कहने पर भी वह पीछे लौट जाती है...भटकती है अकेली अपने अतीत के जंगल में ....ज़ख़्म खाकर लौटती है हर बार...
उसका आज तो खुशहाल है फिर भी कहीं दिल का एक कोना खालीपन से भरा है.... 'दीदी, क्या करूँ ...मेरे बस में नहीं... मैं अपना खोया वक्त वापिस चाहती हूँ .... वर्तमान की बड़ी बड़ी खुशियाँ भी उसे कुछ पल खुश कर पाती हैं फिर वह अपने अतीत में चली जाती है.....
एक दिन अचानक अपनी डायरी लेकर मेरे सामने आ खड़ी हुई... उतरी हुई सूरत... उदास खुश्क आँखें... सूखे होंठ.....मेरे हाथ में अपनी डायरी थमा दी....उसके लिखे एक एक शब्द में मुझे गहरा दर्द महसूस हुआ... 'आपने कहा था न कि अपने दर्द को शब्दों के ज़रिए बह जाने दो ...मैंने लिखना शुरु कर दिया है... बड़ी मासूमियत से पूछने लगी... 'क्या आप अपने ब्लॉग में छापेंगी..?' क्यों नहीं...मेरा इतना कहते ही चहक उठी.... 'दीदी,,,,फिर तो मैं हर रोज़ आपको कुछ न कुछ लिख कर भेजूँगी पर मेरा नाम बदल देना ...' भरोसा पाकर उसे राहत मिली...
सुधा का अतीत लिखूँ लेकिन उससे पहले उसके वर्तमान को लिखना मुझे ज़रूरी लग रहा है क्योंकि मेरे विचार में दुखों के गहरे अन्धकार के बाद ही खुशियों का खूबसूरत उजाला होता है जिसे नकारना ग़लत होगा...
आजकल सुधा अपने पति के साथ कुवैत में रहती है...फिलहाल अभी विज़िट वीज़ा पर है... दो प्यारे से बेटे हैं. बड़े बेटे की शादी हो चुकी है जो अपनी पत्नी के साथ न्यूज़ीलैंड में रहता है .. दोनों बच्चे पढ़ाई और काम साथ साथ कर रहे हैं...पैसे के लिए दोनों ने ही कभी अपने माता-पिता के आगे हाथ नहीं फैलाया.. छोटा बेटा अभी कुँवारा है जो नौकरी की तलाश में दिल्ली रहने लगा है...घर चंडीगढ़ में है....छोटा सा घर है लेकिन अपना है.....


क्रमश:



शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

लघु कथा - महिला सम्मान


तेज़ बुख़ार में तपती मुन्नी निशा की गोद से उतरती ही न थी... दो दिन से मुन्नी बीमार है लेकिन रमन के पास वक्त ही नहीं है उसे अस्पताल ले जाने का .... दूर दूर तक कोई छोटा मोटा क्लिनिक भी नही है कि जहाँ निशा खुद ही रिक्शा करके बेटी को ले जाए... आज दिन भर मुन्नी गोद से उतरी ही नहीं थी....घंटो तक ठंडे पानी की पट्टियाँ करती रही थी...अब साँझ होते होते बुखार कुछ कम हुआ था और उसकी आँख लगी थी.

निशा का दिल धड़कने लगा था कि रमन के आने का वक्त हो गया है.. अभी दाल चढ़ानी है कुकर में... आटा गूँदना है... सब्ज़ी तो है नहीं पकाने के लिए.... मुन्नी को बिस्तर पर लिटा कर निशा किचन में जाते जाते पिछले दरवाजे तक चली गई कि कुकर की सीटी से मुन्नी उठ न जाए ... पड़ोसन सविता को पिछवाड़े के आँगन से आवाज़ देकर पूछा कि रात के लिए उसने क्या बनाया है.... सविता शायद समझ गई पहले ही मूँग दाल और आलू गोभी की सब्ज़ी के दो डोंगे भर कर ले आई... सविता एक अच्छी पड़ोसन ही नहीं निशा की पक्की सहेली भी है... दोनो एक दूसरे के सुख दुख की भागीदार हैं..

निशा की मुस्कान ने ही धन्यवाद कह दिया ... जल्दी से दोनों डोंगे लेकर निशा किचन की ओर बढ़ी ... अभी दोनों डोंगे रखे ही थे कि डोरबेल बज उठी...भागती हुई रमन के लिए दरवाज़ा खोलने गई...दरवाज़ा खोलते ही गुस्से से भरा रमन उसपर चिल्लाया कि इतनी देर क्यों लगा दी दरवाज़ा खोलने में.. .निशा कुछ कहती उससे पहले ही रमन का वज़नदार हाथ उसकी पीठ पर पड़ा .... घुटती हुई चीख को दबाते हुए किचन की ओर भागी आटा गूँदने के लिए कि कहीं रमन का गुस्सा कहर बन कर न टूट पड़े ... 

दर्द को पीते हुए आटा गूँदने लगी कि फिर से पीठ पर किसी तेज़ अंगारे को अन्दर तक जाते हुए महसूस किया...अभी आटा गूँद रही हो और मैं भूख से मर रहा हूँ,,  कहते हुए रमन ने इतनी बेरहमी से सुलगती सिगरेट को निशा की पीठ पर दागा कि उसकी चीख निकल गई ... उधर मुन्नी को रोने की आवाज़ और इधर रमन की ऊँची आवाज़ ने उसके दर्द को और बढ़ा दिया और वह चक्कर खाकर गिर गई....
तेज़ बुख़ार में तपती मुन्नी के कारण वह भूल गई थी कि आज रमन को महिला सम्मान और उसकी सुरक्षा से जुड़ी रिपोर्ट तैयार करके अगले दिन कई अलग अलग आयोजनों में भाषण देना था.....निशा बस इतना ही सुन पाई कि रमन भूख और थकावट से बेहाल है........!!  

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

काली होती इंसानियत....



अन्धेरे कमरे के एक कोने में दुबकी सिसकती
बैठी सुन्न सहम जाती है फोन की घंटी से वह

अस्पताल से फोन पर मिली उसे बुरी खबर थी
जिसे सुन जड़ सी हुई वह उठी कुछ सोचती हुई

एक हाथ में दूध का गिलास दूसरे में छोटी सी गोली
कँपकँपाते हाथ ...थरथर्राते होंठ , आसुँओं से भीगे गाल

नन्ही सी अनदेखी जान को कैसे बचाएगी इस जहाँ से
खुद को  बचा न पाई थी उन खूँखार दरिन्दों से....

कुछ ही पल में सफ़ेद दूध ....लाल हुआ फैलता गया
एक कोने से दूसरे कोने तक टूटे गिलास का काँच बिखरा
और  फ़र्श धीरे धीरे लाल से काला होता गया....

शायद इंसानियत भी ....... !!!

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सूरज और पौधे




सूरज

आसमान से नीचे उतरा
धरती के आग़ोश में दुबका
ध्यान-मग्न पौधों का ध्यान-भंग करता
हवा के संग मिल साँसे गर्म छोड़ता

पौधे

एक पल को भी विचलित न होते
झूम-झूम कर फिर से जड़ हो जाते...
फिर से होकर लीन समाधि में
सबक अनोखा सिखला जाते 


गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

18 महीने बाद 18 अप्रेल को एक बार फिर नमस्कार ......

 यहीं अपने इस घर में किसी कोने में ध्यानमग्न बैठी थी  जैसे.....लगता ही नहीं कि मैं 18 महीने बाद लौटी हूँ .... इन दिनों इतना कुछ  हुआ ...हिसाब लगाने लगूँ तो कई कहानियाँ बन जाएँ ....

कीबोर्ड पर थिरकती उंगलियाँ कुछ कम ज़्यादा अंतराल में थिरकतीं रहीं लेकिन बन्द कमरे में.... मतलब यह कि ड्राफ्ट के रूप में कैद ..... उन्हें आज ब्लॉग जगत के खुले आसमान में उड़ने को छोड़ दिया....
19 नवम्बर 2011 सफ़र नया शुरु हुआ.... दिल्ली के लिए निकले 'सफ़र' शब्द के साथ एक पोस्ट को अंजाम देते हुए जो ड्राफ्ट में बस उसी शब्द के साथ रुकी रही....



12 मई 2012 को एक नई कोशिश के साथ बस इतना ही लिखना जुटा पाई कि शब्द शराब बन उतरते हैं दिल औ' दिमाग़ में .... भावों का नशा चढ़ता है तो उतरता नहीं............ 


28 मार्च 2012 की शाम फिर हाथ आया वक्त और ब्लॉग जगत को नमस्कार कहने आ पहुँचे....उस नमस्कार को भी कैद ही रखा..... 


17 जून 2012 को जाने क्यों डैडी की याद आ गई..... बस यूँही बेतुकी सी चाहत जाग उठी कि काश उनसे वीडियो चैट हो पाए तो कैसा हो......क्या आने वाले वक्त में ऐसा मुमकिन होगा कि मैं 'वहाँ' से यहाँ चैट कर पाऊँगी अपनों से........... 


26 मार्च 2013 बैठी थी सात समुन्दर पार ... बेचैन था मन ...कोई अपना बीमार था बड़ा.... बस जी चाहा कि कुछ दो चार शब्दों के साथ मिल बैठूँ फिर एक बार....... 



यह तो हुई चर्चा पिछले 18 महीनों में लिखे कुछ भावों की..... लिखा लेकिन पोस्ट नहीं किया.....लिखा उन पर भी नहीं जिन्हें कभी कभार पढ़ा ब्लॉग जगत में आकर ..... 
फेसबुक जिसे कहती हूँ 'चेहरा पुस्तक' वहाँ परिवार के कारण ज़्यादा आना-जाना रहा.... एक क्लिक 'लाइक' से  ही काम चल जाता है ..... 
 लेकिन इस  बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ब्लॉग की अपनी महत्ता है...
खासकर हिन्दी ब्लॉग जगत में आजकल की गतिविधियों से तो यही प्रमाणित होता है... 
The Bobs awards के बारे में सुना फिर पढ़ा भी जो DW के प्रतिनिधि के रूप में दुनिया की कई भाषाओं के ब्लॉगज़ के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व दिखाँएगें.... 

DW-- Deutsche Welle means in english 'German Wave'. DW is Germany's International broadcaster. 
वक्त नहीं है इनका अनुवाद करने का लेकिन दोनों लिंक पढ़ने के बाद लगा कि बॉब्ज़ एवार्ड के लिए किसी भी ब्लॉग को चुनने के लिए इनके बारे में जानकारी लेना ज़रूरी लगा....

फिर पहुँचे अपने ब्लॉगजगत जहाँ  चिट्टाचर्चा पर पहले नज़र गई क्यों .....क्योंकि कभी हम भी चर्चा किया करते थे वहाँ ......... नारी ब्लॉग को फेसबुक के माध्यम से तो चोखेरबाली को टिवटर के माध्यम से वोट दे आए... 
हिन्दी भाषा का प्रचार और उस पर नारी से जुड़े ब्लॉगज़..... बस इतनी ही समझ समझिए..  
वक्त अभी मुट्ठी में था इसलिए एक और ब्लॉग पर गए.... पढ़ने को वहाँ बहुत कुछ था ...पढ़ा भी .. मन ही मन चिंतन भी किया लेकिन जो कविता पसन्द आई ...पसन्द ही नहीं बेहद पसन्द आई उसके शब्द और उनमें छिपे भाव बहुत कुछ कह जाते हैं बस समझने की ज़रूरत है....... 

शब्दों के भी
होते हैं सींग
तभी तो कुछ शब्द
बहुत मारते हैं डींग
जी हां
शब्दों के भी होते हैं सींग
पैने-पैने नुकीले सींग
कलेजे में घुस जाते हैं तो
कलेजा फाड़ देते हैं
लहू-लुहान हो जाती हैं सम्वेदनायें
दम तोड़ देते हैं संस्कार
और वे सींग
प्रेम को घृणा की ज़मीन में कहीं गहरे गाड़ देते हैं।
फिर भी,
आपने उगा रखे हैं ये सींग
अरे!
जु़बान पर भी लगा रखे हैं सींग
माना कि
इन सींगों से आप
बड़े-बड़े काम करते हैं
क्योंकि
इनसे इज्जतदार
बहुत डरते हैं
पर सोचो,
कभी जुबान पर लगे ये सींग
गले के रास्ते
अपने ही भीतर उतर गये तो
अपने आपसे डर गये तो!
सच जानिये
ऐसे में आप
खुद से भी मिल नहीं पायेंगे
खून की तरह बिखर जायेगा वजूद
जिसे आप समेट नहीं पायेंगे
इसलिये,
रच सकते हो तो
जुबान पर
मिश्री की अल्पना रचो,
और शब्दों को सींग बनाने से बचो।
डा.कमल मुसद्दी
प्रवक्ता राजकीय आयुध निर्माणी इंटर कालेज,अर्मापुर
सद्य प्रकाशित और दिनांक २९.०४.०७ को लोकार्पित
कविता संग्रह कटे हाथों के हस्ताक्षर से साभार!




मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

कीबोर्ड पर थिरकती उंगलियाँ


हाथ की सफ़ाई ... कभी कीबोर्ड पर कभी यहाँ 

आज तेइस दिन बाद उंगलियाँ कीबोर्ड पर थिरकने के लिए मचलने लगी तो सोचा चलो उन्हें मौका दिया जाए...वैसे चलती तो थीं यहाँ लेकिन आँखों की मदद करने के लिए चलती थीं एक ब्लॉग से दूसरे ब्लॉग़ पर क्यों कि दोनों ही दिमाग की ख़ुराक जुटाने में कोई कसर न रखते......

सुबह सवेरे भक्ति संगीत लगा कर होता काम घर का..... दैनिक कार्यों से निवृति ....योग ...सैर.....नाश्ता सुबह का....ईरानी रोटी...खट्टी क्रीम... अखरोट के दो टुकड़े... शहद ... पीनट बटर ..... अपनी देसी चाय के साथ...
फिर निकलना घर से बेटे को ऑफिस छोड़ कर रसोईघर की खरीददारी कभी कभार..... वापिस लौट कर फिर से घर का अंतहीन काम... दोपहर का खाना तैयार करना.... कपड़े मशीन में डालना .... साथ साथ लैपटॉप पर एक से बढ़ कर एक पोस्ट पढ़ना..... टिप जैसी चीज़ टिप्पणी को मान कर उसे नज़र अन्दाज़ करना और बस पढ़ते जाना और मन ही मन मोहित होना .... प्रभावित हो कर सबके लेखन से उन्हें ढेरों शुभकामनाएँ देना.....

इसी बीच वक्त होना .... छोटे बेटे को कॉलेज छोड़ कर आने का ..... लैपटॉप को यूँ ही खुला छोड़ कर जाने का.... आकर फिर से पढ़ने का लालच कहाँ छूटेगा..... आदतें कुछ नशे की जैसे गले लगती है तो जान लेकर ही जाती हैं..... सभी नशे कुछ ऐसे ही हैं......अति न हो तो अति सुन्दर....अति हो तो इति हो जाए ज़िन्दगी की .......
खैर बेटे को कॉलेज छोड़ कर लौटते तो कुछ दोस्तों का प्यार खींचता अपनी ओर .... फोन पर बातचीत...मिलने का वादा...घुमाने का इरादा कर के निकल पड़ते उन्हें संग लेकर यहाँ से वहाँ...... वहाँ से कहाँ कहाँ अब उसकी चर्चा फिर कभी.....

आज के दिन छोटे बेटे ने कार ले जाने की विनती की...अच्छी तरह से जानता है कि 'बेटा बन कर सबने खाया, बाप बन कर किसी ने नहीं' ...इतनी नम्रता से अपने मन की बात मनवा लेता है कि मन ही मन उसकी शीरनी सी चालाकी की तारीफ़ किए बिना नहीं रह पाती..... कभी कभी बड़े भाई को समझाता है .... मिठास भरे गुर बताता है कि कैसे बड़ों का दिल जीतना है कुछ झुक कर .... क्या फर्क पड़ता है....काम तो निकलता है.... दोनों पार्टी खुश...नम्रता और मान को मिला कर घर का माहौल हो जाता है मिठास भरा......

एक सहेली का आना जाना मुझ पर निर्भर है....दूसरी थकी है लगी है घर को सजाने में..... तीसरी अपनी माँ की सेवा में लगी है....चौथी गई है अपनी दूसरी दोस्त के घर कुछ महीनों के लिए उसकी तन्हाई को दूर करने.... बाकि सभी दोस्त लगे हैं ज़िन्दगी की जद्दोजहद में....जुटे हैं उन्हें आसान करने की आस में.....और  हम करते हैं दुआ इसी आस में कि उनकी आस पूरी हो...... इसलिए आज घर के इस एकांत में उंगलियाँ थिरक रही है कीबोर्ड पर अपने मन का हाल लिखती हुई......

संगीत अभी भी चल रहा है लेकिन भक्ति संगीत की जगह दोपहर की नीरवता को दूर करता हुआ कुछ  अलग ही खुमार लिए हुए ... गीत सुस्त करता  उससे पहले ही फेसबुक पर देखा कि माँ भी ऑनलाइन हैं.... और चुस्त हो गए...... उनसे बात होगी तो दूर तलक होगी....... :) इसलिए आगे की बात फिर कभी......
आज की पोस्ट लिखवाने के सहायक दोस्त को शुक्रिया न किया तो बेमानी होगी....कुछ न कुछ लिखते रहने की बात हुई तो उसी रौ में इतना कुछ लिख गए....बातों ही बातों  में एक  पोस्ट तैयार हो गई जिसका श्रेय फुरसतियाजी को जाता है.