Saturday, May 30, 2009

समझदार को इशारा काफी !

आज माँ की बहुत याद आ रही है.... और उसका मौन... एक भी गलती हो जाने पर भयानक सज़ा मिलती....वह भी उसका अनंत मौन..... चारों दिशाओं में गहराती खामोशी.... और मेरे मन में हलचल.... मन ही मन चिल्लाती..... 'मम्मीईईईईईईईई ...... चिल्लाओ मुझ पर.... चीख चीख कर डाँटो..... गलती की है तो तमाचा जड़ दो.... बुरा भला कहो....लेकिन चुप न रहो..... ' लेकिन उधर.... एक कभी न टूटने वाली खामोशी...... जिससे दिल टूट टूट जाता..... लेकिन उस टूटने की आवाज़ माँ के कानों में न पहुँचती......

ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा के दिनों में अपनी सहेली के घर कुछ नोटस लेने गई..... शाम 6 बजे से पहले वापिस लौटने का वादा था लेकिन 7 बजे लौटी.... माँ ने दरवाज़ा खोला 8 बजे........... एक घंटा देरी से आने का एहसास हो गया था.... सज़ा भंयकर लेकिन इंसान गलतियों का पुतला... हर बार कोई न कोई गलती..... हाँ एक ही गलती को दुबारा दुहराने की नौबत कभी न आई....

धीरे धीरे चुपके चुपके जाने कब से यही मौन मुझमें आ बैठा..... लेकिन एक नए रूप में....माँ के मौन के आगे हम ठहर न पाते लेकिन हमारे बच्चे उस मौन को तोड़ने की हिम्मत करते हैं...

दोनों बेटे गलती करके खुद ही सामने आ बैठते हैं..... 'मम्मी, आप डाँटती क्यों नहीं.... चुप क्यों रह्ती हैं .......कभी कभी गलती पर डाँटना ज़रूरी होता है... तभी पता चलेगा कि आगे वही गलती नहीं दुहरानी है...' 'आप कभी नहीं कुछ कहतीं.... सब कुछ हम पर ही छोड़ देती हैं' ......

ऐसा सुनकर बस यही कहती...अपने देश में एक कहावत मशहूर है... बाप का जूता पाँव में आते ही बच्चे मित्र बन जाते हैं... फिर तो बस एक इशारा चाहिए और समझदार को इशारा काफी... एक उम्र के बाद अपनी गलती पहचानना और उसे फिर न दुहराना..... जिसे आ जाए.... वह जीवन में आने वाली मुसीबतों को आसानी से झेल जाएगा...

ऊँची आवाज़ में बोलने की ज़रूरत ही नहीं हुई..... कभी गलती हुई हो तो गलती करने के एहसास से ही एक दूसरे के सामने लज्जित होकर खड़े हो जाते क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों के पैरों का साइज़ लगभग बराबर ही है......... कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं लगती... !

28 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

एक उम्र के बाद अपनी गलती पहचानना और उसे फिर न दुहराना..... जिसे आ जाए.... वह जीवन में आने वाली मुसीबतों को आसानी से झेल जाएगा...

बिल्कुल सही बात।

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर। अंसार कंबरी की कविता है:
पढ़ सको तो मेरे मन की भाषा पढ़ो,
मौन रहने से अच्छा है झुंझला पड़ो।

शोभना चौरे said...

shi kha hai aapne .apka maoun apki ankhkho me utar aata hai tb shbdo ki kha jarurt hoti hai ?aur agr bachhe un ankho ko padh lete hai jisme unhe apni bhul ka ahsas hota hai aur vo seekh le lete hai vhi sanskar ban jate hai .
abhar

दिगम्बर नासवा said...

एक उम्र के बाद..........बच्चे अपने आप समझदार हो जाते हैं...........

vandana said...

bilkul sahi baat kahi........bas aisi soch hi sabki ho jaye.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पहले की अपेक्षा बच्चे अधिक परिपक्व हैं। वे बनते भी जल्दी हैं और बिगड़ते भी। पर अपना जमाना याद आता है। उस डाँट और मार में भी बहुत प्यार था।

Divine India said...

नमस्कार मीनाक्षी जी,
सच कहा है… खैर गलती को ना दुहराना समझदारी है… जब हम छोटे होते हैं तो बहुत सी ऐसी बातों को नहीं मानते हैं जो मेरे लिए होता है मगर शायद वही हमारे लिए राह भी देता है…।

VIJAY TIWARI " KISLAY " said...

सार्थक एवं प्रेरणास्पद आलेख के लिए साधुवाद.
- विजय

गौतम राजरिशी said...

इस मौन का तो कोई जवाब नहीं...बचपन में मेरी माँ का भी यही अचूक अस्त्र होता था और अब अर्धांगिनी भी ऐसे ही तेवर लिये मिली है।

पंकज सुबीर said...

क्‍या सारी माएं यही अस्‍त्र अपनाती हैं । सच है मां दुनिया में कहीं भी हो वो मां ही होती हैं । मां की तुलना किसी से नहीं हो सकती है । शायद इसीलिये कहते हैं कि ईश्‍वर हर घर में नहीं पहुंच सकता था इसलिये उसने मां बनायी ताकि हर घर में पहुंचे ।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मौन सबसे बड़ा दंड है .. सही लिखा है आपने इस विषय पर

अभिषेक ओझा said...

मौन कई बार बिना शब्द कितना कुछ कह जाता है !

डॉ .अनुराग said...

सच कहा मौन सबसे बड़ा हथियार है.......बड़ा कष्ट देता है .....वैसे मां रूठने के बाद मन पसंद खाना भी बनाती थी

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सच कहा ये मुहावरा जीवन का सच लिये ही बना होगा -
मौन की अपनी ही एक भाषा है मीनाक्षी जी
आपकी माँ जी को नमन -
अब उनसे मिलने आ ही जायेँ :)
-- लावण्या

Harkirat Haqeer said...

एक माँ को सारे गुर आते हैं बच्चों को सही राह पर लाने के ....सच मौन से बड़ा हथियार कोई नहीं है.......भाव्स्पर्शी...बेहतरीन रचना ....!!

बहुत-बहुत बधाई ....!!

Mired Mirage said...

पता नहीं हमारे घर में तो प्रजातंत्र सा था। कभी सजा मिली हो या माँ रूठी हों याद नहीं आता। मैंने बच्चियों के साथ मौन का अस्त्र कभी उपयोग नहीं किया, वैसे वे ही सही व बेहतर बता सकती हैं। शायद इसलिए कि मौन रहना आता ही नहीं।
घुघूती बासूती

कंचन सिंह चौहान said...

सच अम्मा गुस्सा हो जाती थीं डाँट लेती थीं, तब तो ठीक रहता था। अब भी..! जब गुस्सा निकाल लेती हैं तो बात आई गई हो जाती है। मगर जब चुप हो जाती हैं, तब वाक़ई कुछ समझ में नही आता...! अब तो रहती ही नही हूँ उनके पास। फोन पर कितनी देर चुप रहेंगी। लेकिन हाँ याद है एख बार एख हफ्ते तक चला था ये मौन। कहीं मन नही लगता था। उस समय स्वतंत्रता यद्यपि अधिक मिल जाती थी। मगर स्वतंत्रता का उपयोग ही नही था कोई।

अब यही शायद मेरा हाल है। भला या बुरा मगर स्वभाव तो यही विकसित हो गया है। ज तक छोटी छोटी बातें होती हैं तब तक तो बड़बड़ा लूँगी, डाँट लूँगी। मगर यदि अधिक खराब लगी बात तो शांत ही हो जाती हूँ..! और कुछ हथियार भी तो नही, क्या करूँ....! :) :)

KK Yadav said...

बहुत सुन्दर लिखा आपने..साधुवाद !!
__________________________
विश्व पर्यावरण दिवस(५ जून) पर "शब्द-सृजन की ओर" पर मेरी कविता "ई- पार्क" का आनंद उठायें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएँ !!

महामंत्री - तस्लीम said...

मौन की भाषा सबसे सशक्त होती है, पर शर्त यह है कि सामने वाला उतना समझदार भी हो।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दीपा सिंह said...

सही कहा आपने एक़ चुप सौ को हराये ळडाई न करके चुप रह कर हम अधिक असर कर सकते हैँ हार कर भी जीत सकते हैँ

Mrs. Asha Joglekar said...

चुप्पी वह भी माँ की सबसे कठोर शासन है । मैने तो खूब डांट लगाई है बच्चों को ।

Vijay Kumar Sappatti said...

namaskar mitr,

aapki saari posts padhi , aapki posts me jo bhaav abhivyakt hote hai ..wo bahut gahre hote hai .. aapko dil se badhai ..

is posts ne ek nayi baat samjhaayi ..

dhanyawad.....

meri nayi kavita " padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

aapka

Vijay

M Verma said...

chuppi jab bolti hai to man ke parat kholti hai.
bahut achchha sansmaran.

poemsnpuja said...

मेरी माँ भी थोड़े बहुत गुस्से में तो दांत लेती थी, पर बहुत गुस्सा होती थी तो चुप हो जाती थी...और दुखी हो जाती थी...उसस गुस्सा तो फिर भी बर्दाश्त हो जाता पर उसका दुखी होना इस तरह तोड़ता था...आत्मा धिक्कारने लगती थी. बड़ी खूबसूरती से तीन पीढियों के दरमियाँ मौन मन रखा है आपने...अच्छा लगा पढ़ कर की आपके घर में सभी के जूते एक ही साइज़ के हैं :)

Rahul Purohit said...

Bahut khoob likha hai.....rojmarra ki baato ko bahut khoob pash kiya hai aapne.....

महेन्द्र मिश्र said...

माँ का कठोर अनुशासन ही उन्नति का मार्ग प्रशस्त कराता है . भावपूर्ण संस्मरण .

हर्षवर्धन said...

सही है

pooja joshi said...

pad kar mujhe meri galtiyo ki yaad aa rahi hai aur mammi ki chupi...fir vahi ahsaas ho rahaa hai ki kaise woh mujhe har baat samjhati hai..i love u mammi