Friday, July 4, 2008

अपने हिस्से की छोटी सी खुशी....

आज फ़िर उसकी आंखें नम थी... आँसू के दो मोती दोनों आंखों के किनारे अटके पड़े थे..गिरते तो टूट कर बिखर जाते लेकिन मैं ऐसा कभी न होने दूँगी.... . मैं चाहती तो क्लास टीचर होने के नाते उसके घर फ़ोन कर सकती थी कि स्कूल के फन फेयर में शीमा की ज़रूरत है लेकिन ऐसा करने का मतलब था शीमा को अपने घर में अजनबी बन कर रहने देना... अपने हिस्से की छोटी छोटी खुशियों को चुनने का मौका न देना.... आजकल वह अपने कमरे में ही बैठी रहती है.. दसवीं क्लास की पढ़ाई के बहाने ... न अम्मी के काम हाथ बंटाने की चाहत , ना अब्बा को सलाम का होश... छोटे भाई बहनों से खेलना तो वह कब का भूल चुकी थी... शायद इस उम्र में हर बच्चे का आक्रोश बढ़ जाता है...किशोर उम्र...पल में गुस्सा पल में हँसी... पल में सारा जहान दुश्मन सा दिखता और पल में सारी दुनिया अपनी सी लगती........ भाई अकबर शाम की मग़रिब के बाद खेलने जाता है तो देर रात तक लौटता है.... उस पर ही क्यों इतनी पाबंदी.सोच सोच कर शीमा थक जाती लेकिन उसे कोई जवाब न मिलता..... आज भी वह अम्मी अब्बू से बात करने की हिम्मत नही जुटा पायी थी ...
'मैम्म ,,, नही होता मुझसे... मैं बात नही कर पाउंगी...आप ही फोन कर दीजेये न...प्लीज़ ....' इतना कहते ही शीमा की आंखों से दोनों मोती गालों से लुढ़कते हुए कहीं गुम हो गए .... मेरा कलेजा मुंह को आ गया... अपने आप को सयंत करते हुए बोली... 'देखो शीमा ,, अपने पैरेंट्स से तुम्हें ही बात करनी होगी,,,,अगर अभी तुम अपने मन की बात न कह सकीं तो फिर कभी न कह पाओगी... अम्मी के काम में हाथ बँटाओ...सभी कामों में हाथ बँटाती हूँ, शीमा ने फौरन कहा... .. अब्बू से कभी कभी बात करो... चाहे अपनी पढ़ाई की ही....यह सुनते ही उसका चेहरा सफेद पड़ गया... अब्बू से सलाम के बाद हम सब भाई बहन अपने अपने कमरों में चले जाते हैं...यह सुनकर भी हर रोज़ क्लास में आने के बाद मुझे शीमा से बात करके उसे साहस देना होता... हर सुबह मैं सोचती कि आज शीमा दौड़ी दौड़ी आएगी और खिलखिलाते हुए कहेगी.... ''मैम्म.... अम्मी अब्बू ने फन फेयर में आने की इजाज़त दे दी.... " ऐसा करना ज़रूरी था...घर से स्कूल ..स्कूल से घर...बस यही उसकी दिनचर्या थी... कभी कभार कुछ सहेलियाँ घर आ जातीं लेकिन हर किसी में कोई न कोई खामी बता कर अगली बार से उससे मिलने की मनाही हो जाती... उसका किसी सहेली के घर जाना तो वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी.... मैं चाहती थी कि किसी तरह से कभी कभी वह अपने मन की बात अपने माता-पिता से कर पाए... कहीं न कहीं एक उम्मीद कायम थी कि कभी कुछ पलों की आज़ादी....कभी कुछ पलों के लिए पँख फैलाने की चाहत पूरी हो सके.... मन को मज़बूत करके उसमें अपने लिए थोड़ी आज़ादी खुद हासिल करने की चाहत भरने की कोशिश मेरी थी....सोचती थी शायद एक दिन शीमा कह पाएगी कि अपने हिस्से की थोड़ी सी खुशी लेने मे वह सफल हुई......
फन फेयर का दिन भी आ गया...प्रवेश द्वार पर ड्यूटी होने पर भी मन शीमा की ओर था... आँखें उसी को खोज रही थीं... ..मेरी शिफ्ट खत्म होते ही गेम्स एरिया की ओर बढ़ते हुए क्लास की दूसरी लड़कियों से शीमा के बारे में पूछा लेकिन किसी को कुछ पता नही था....
अचानक पीछे से किसी ने आकर मुझे अपनी बाँहों में ले लिया.... मैम्ममममममम ....मैं आ गई.... अम्मी अब्बू ने आखिर भेज ही दिया..कल शाम की चाय बनाकर अम्मी को दी और उसी वक्त ही फन फेयर पर जाने की बात की... अब्बू से बात करने को कहा... पूरे हिजाब में जाने की कसम खाई.... मामू को जासूसी करने की दुहाई भी दी.... पता नहीं अम्मी को क्या हुआ कि अब्बू से हमारी वकालत कर दी..... पूरे हिजाब में आने की शर्त कबूल.... कोई फर्क नही पड़ता .... मुझे तो सब दिख रहा है न.... उसकी चहकती आवाज़ ने मुझे नई ज़िन्दगी दे दी हो जैसे .... मेरी आँखों से गिरते मोती मेरे ही गालों पर ढुलक रहे थे....ये खुशी के चमकते मोती थे...

17 comments:

सतीश पंचम said...
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सतीश पंचम said...

अच्छा लिखा...काफी संवेदनशील रचना है..... फान्ट सेटिंग गडबड हो जाने से पिछली टिप्पणी ठीक न आ सकी, ईसलिए हटाना पडा।

Lavanyam - Antarman said...

युवा मानस और उसे समझने के लिये ऐसा ही सँवेदनाशील मन होना चाहीये जैसे आपने लिखा है :)
- लावण्या

उन्मुक्त said...

दिल को छू गयी।

नीरज गोस्वामी said...

आजादी की क्या कीमत होती है आप की पोस्ट कितनी सरलता से बता गयी...बहुत ही अच्छा लिखा है आपने...हमेशा की तरह.
नीरज

इन्दौरनामा said...

आज़ाद ख़यालों को मिलती रहे परवाज़
बुलंद होती रहे बेटियों की आवाज़.

रंजू ranju said...

थोड़ा सा विश्वास और थोडी आजादी और भावनाओं को समझना बहुत जरुरी है .दिल को छु लेने वाली लेख है यह

advocate rashmi saurana said...

bhut bhavanaprad lekha. ati uttam. likhati rhe.

Rohit Tripathi said...

yed do pal ki khushi sheema ke liye duniya ki sabse badi khushi hai.. Bahut acha likha aapne :-)

Roz Roz Aankhon Tale : My Favorite

DR.ANURAG said...

पल्टो रवायतो के कुछ ओर सफ्हे
गिरायो इक ओर रूह
दफ़न कर दो एक ओर लाश
तहजीब के लबादे मे.........
ख़ामोश रहकर भी किस कदर डराती है...

Gyandutt Pandey said...

शीमा के पूरे हिजाब में रहते हुये भी इतनी खुशी! सच में खुशी या गम बहुत तुलनात्मक होते हैं।
अच्छा लगा इस लड़की के बारे में जानना।

Parul said...

di, aapko padhkar kuch purana kahaa yaad aa gaya...:)
पखं थे परवाज़ की हिम्मत ना हो सकी
दुनिया के उसूलों से बग़ावत ना हो सकी।

इक रूह थी उड़ती रही बेबाक़ फ़लक पर
बरसों से क़ैद जिस्म मे हरकत ना हो सकी ।

pallavi trivedi said...

bahut samvedansheel kahani..dil ko chhoo gayi. kaash ye hizab ka parda bhi hat sake hamare samaj se.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

भाव संवेदन और प्रस्तुति में
साफ़ तौर पर झलकता सरोकार
मनोहारी बन पड़ा है.
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बधाई
डा.चन्द्रकुमार जैन

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

डा० अमर कुमार said...

बेशक सुन्दर बन पड़ा है !

मीनाक्षी said...

उन्मुक्त जी, संजय जी , रश्मि जी , ज्ञान जी , अनूप जी आप का बहुत बहुत शुक्रिया...
अनूप जी.. कमाल है आप टैलीपैथी भी जानते हैं जो आप यहाँ आए...