Tuesday, April 22, 2014

बहुत दिनों के बाद......


बहुत दिनों के बाद...
अपने शब्दों के घर लौटी...
बहुत दिनों के बाद .......
फिर से मन मचल गया...
बहुत दिनों के बाद...
फिर से कुछ लिखना चाहा....
बहुत दिनों के बाद...
कुछ ऐसा मन में आया....
 फिर इक बार
नए सिरे से
 शुरु करूँ मैं लिखना ...
अपने मन की बात !!




सोचती हूँ ब्लॉग पर नियमित न हो पाना या जीवन को अनियमित जीना न आदत है और न ही आनंद...वक्त के तेज बहाव में उसी की गति से बहते जाना ही जीना है शायद. जीवन धारा की उठती गिरती लहरों का सुख दुख की चट्टानों से टकरा कर बहते जाने में ही उसकी खूबसूरती है.  खैर जो भी हो लिखने के लिए फिर से पलट कर ब्लॉग जगत में आना भी एक अलग ही रोमाँच पैदा करता है मन में.

2012 दिसम्बर में जब पति को दिल का दौरा पड़ा तब मैं सात समुन्दर पार माँ के पास थी. फौरन पहुँची रियाद जहाँ एक हफ्ते बाद ही एंजियोप्लास्टी हुई. एक महीने बाद ही नए साल में देवर अपने परिवार समेत रहने आ गए. उनके लिए 2013 का साल खूब सारी खुशियों के साथ कुछ भी दुख लाया था. अगस्त के महीने में वे परिवार समेत कार दुर्घटना की चपेट में आ गए. देवर और उनके बेटे को हल्की चोटें आईं लेकिन देवरानी की रीढ़ की हड्डी में और एक पैर की एड़ी में 'हेयर लाइन फ्रेक्चर' आया जिस कारण उसे दो महीने के लिए बिस्तर पर सीधा लेटना पड़ा. शूगर और हाई बीपी की मरीज़ के लिए जो बहुत मुश्किल होता है इस तरह लगातार लेटना. बिजली से गतिशील हवाई गद्दे का इस्तेमाल किया गया ताकि बेडसोल्ज़ न हों. गूगल के ज़रिए पहली  बार 'कैथेटर' का इस्तेमाल करना सीखा. एक साथ सब की मेहनत और लगन से देवरानी भी उठ खड़ी हुईं. 2 अक्टूबर को फिज़ियोथैरेपी के लिए भारत लौट गईं...

अक्टूबर 10 को हम पति-पत्नी दुबई पहुँचे दोनों बच्चों से मिलने. कहते हैं जितना मिले उसी में खुश रहना आना चाहिए दस दिन की खुशी लेकर हम भारत पहुँचे जहाँ कुछ दिन बाद अमेरिका से माँ ने आना था अपने इलाज के लिए. इलाज तो वहाँ भी हुआ लेकिन सेहत ठीक न हुई.  नवम्बर 7 को माँ आईं अपने देश एक उम्मीद लेकर कि स्वस्थ होकर वापिस लौटेंगी. पति अपनी नौकरी पर रियाद लौट गए. हम माँ बेटी रह गए पीछे अपने ही देश में अकेले. अकेले इसलिए कहा क्योंकि आजकल सभी अपने अपने चक्रव्यूह में फँसे जी रहे हैं इस उम्मीद से कि कभी वे चैन की साँस लेने बाहर निकल पाएँगें.

2013 नवम्बर 7 से 2014 मार्च 4 तक लगातार हुए इलाज के दौरान कई खट्टे मीठे और कड़वे अनुभव हुए. सरकारी अस्पताल से लेकर 5 और 7 सितारा अस्पताल तक जाकर देख लिया. आठ महीने से खाँसी हो रही थी उसका इलाज तो किसी को समझ नहीं आ रहा था. दिल की जाँच के लिए बड़े बड़े टेस्ट करवा लिए गए. पानी की तरह खूब पैसा बहाया जिसके लिए माँ की डाँट भी खानी पड़ी. हम माँ बेटी दो लोग साथ थे फिर भी अकेलापन लगता. समझ नहीं आता कि किस उपाय से माँ की खाँसी और कमज़ोरी दूर हो...

पता नहीं भले स्वभाव के लोग कम क्यों होते हैं लेकिन जितने भी होते हैं वे दिल में बस जाते हैं. माँ के वापिस लौटने के दिन आ रहे थे और उधर बीमारी जाने का नाम नहीं ले रही थी. घर के नज़दीक की मदर डेरी पर बैठने वाले सरदारजी हमेशा मदद के लिए तैयार रहते..यूँ ही कह गए कि अगर विश्वास हो तो गुरुद्वारे में बैठने वाले डॉक्टर को एक बार दिखा दीजिए. कभी कभी आस्था और विश्वास से भी लोग ठीक हो जाते हैं. उनकी आस्था का आदर करते हुए माँ को वहाँ दिखाया.

शायद आस्था और विश्वास का दिल और दिमाग पर असर होता है या संयोग था कि 'नेबुलाइज़र' और 'इनहेलर' की हल्की खुराक से माँ को कुछ आराम मिलने लगा...हालाँकि यह इलाज पहले भी चल रहा था लेकिन ढेर सारी दवाइयों के साथ. श्रद्धा और विश्वास के कारण ही माँ ताकत की दवा और नेबुलाइज़र और इनहेलर की एक एक डोज़ से अच्छा महसूस करने लगी. पूरे देश में तौबा की सर्दी जिस कारण घूमने फिरने का सपना सपना ही रह गया. माँ को छोड़ कर मैं कहाँ जाती...ब्लॉग जगत के मित्र , पुस्तक मेला या किसी तरह की खरीददारी माँ के साथ से कमतर लगे.

4 मार्च की रात माँ को विदा करके  10 मार्च की वापिसी तय हुई हमारी दुबई के लिए जहाँ एक रात के लिए बच्चों से मिल कर रियाद लौट आए. 11 मार्च वीज़ा खत्म होने की अंतिम तारीख़ थी इसलिए शाम तक रियाद दाख़िल होना ज़रूरी था.

तब से हम यहाँ है रियाद के घर की चार दीवारी में...यहाँ की दीवारें बहुत ऊँची होती हैं लेकिन सबसे आख़िरी मंज़िल के बाद छत से दिखने वाला नीला आसमान सारे का सारा अपना है. 
नीले आसमान पर सिन्दूरी सूरज की बिन्दिया , चमकती बिन्दिया से सुनहरी धूप, धूप से चमकती रेत से शरारत करती हवा,  चाँद का सफ़ेद टीका , नीले आसमान के काले बुरके पर टिमटिमाते टँके तारे सब अपने हैं.... ! 



11 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मां सब जानती है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Dr.NISHA MAHARANA said...

jiwan ke rang ...yahi to hain .....

प्रतिभा सक्सेना said...

एक के बाद एक, बहुत से तूफ़ान झेल लिए -
अब ऊँची दीवारों के अपने आसमान की छाँह में क़लम उठा लीजिए,जो बीत चुका उससे आगे ... !

ARUN SATHI said...

दिल को छूती हुई....

abhi said...

होता है...जरूर होता है आस्था और विश्वास का असर.....मैंने भी देखा है ! एक के बाद एक चिंताओं और परेशानियों से गुजरी हैं आप...! लिखना शुरू कीजिये अब, ब्लॉग बहुत दिन से सुना पड़ा है आपका !

ऐसी कुछ कुछ मेरी भी कहानी है, ९ नवम्बर के बाद से बहुत अजीब चिंताओं और परेशानियों से घिरा रहा. खैर अब थोड़ी बहुत राहत मिली है उन सब परेशानियों से !

संजय भास्‍कर said...

सलाम। बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आया हूं। व्यस्तताओं और उलझनों में फंसा मन आपकी पोस्ट में इस कदर उलझ गया कि खुद को भूल गया।
वाकई माँ भले स्वभाव के लोग कम क्यों होते हैं लेकिन जितने भी होते हैं वे दिल में बस जाते हैं. बस अब माँ अपनी क़लम उठा लीजिए और लिखना शुरू कर दीजिये

शुभकामनाओ के साथ
संजय भास्कर

रचना said...

welcome always

expression said...

आपसे और आपके सुन्दर ब्लॉग से मिलकर बड़ी खुशी हुई...

ढेरों शुभकामनाएं.

अनु

Digamber Naswa said...

लंबे समय से जीवन कि उथल पुथल से आप झूझती रहीं ... आपका साहस था जो आप सहज हो सकीं ... हमने कई बार आपके बारे में बातें कीं पर आपसे बात नहीं हो सकी ... शायद नियति या कुछ भी ... आप वापस रियाद में हैं ... आशा है अब सब कुछ ढर्रे पे वापस आने लगा होगा ... अबकी बार दुबई आयें तो जरूर बताएं ... मिलने का सबब निकालेंगे ... अनीता भी मिलना चाहती है ...

मीनाक्षी said...

@ब्लॉगबुलेटिन ,,शुक्रिया...इसी बहाने हमें और भी कई लिंक पढ़ने को मिल गए.
@डॉ निशा @प्रतिभा दी @अरुणजी आभार
@अभि...शुक्र है कि 9नवम्बर के बाद तुम्हारी ज़िन्दगी में भी ठहराव आया..
@संजय..लिखना शुरु कर दिया ... खुश रहो.
@रचना..हमेशा की तरह लिखने के लिए प्रोत्साहन देने के लिए तहे दिल से शुक्रिया
@अनु , आपकी तो टिप्पणियों ने बहुत पहले से ही दिल जीत लिया था, मैं ही उलझी थी... आपका आना अच्छा लगा.
@नासवा भाई... आप और अनिता को कोई एक बार मिल ले तो फिर भुला न पाए , हम तो फिर कई बार मिल चुके हैं... मैं भी बेहद बेचैन हूँ मिलने के लिए... दुबई आते ही मिलना तय है...

Pramod Singh said...

ओह, दु:ख की दीवारें कैसी ऊंची होती हैं, इसीलिए आदमी फिर काले चश्‍मे भी खरीद लाता है कि दीवार और ख़ुद दोनों ही को देखने की बदकिस्‍मती से निजात मिले. यह दूसरी बात है कि घबराकर फिर बाज मर्तबा आदमी (या औरत) लिखने भी लगता है, मगर फिर दु:ख की दीवारें और-और दिखने भी लगती हैं, क्‍यों दिखती हैं इतना, न दिखती दु:ख की दीवारें ?