Friday, May 15, 2009

दूर के ढोल सुहावने.....!

आज बस जी चाहा कि किसी अनाम की टिप्पणी पर हम भी कुछ कहें....
काश ... सरहदें न होतीं.....सिर्फ अपने परिवार से दूर होने की चाहत से नहीं बल्कि कई ऐसे बिखरे परिवारों के दर्द को देख कर....जो चाह कर भी एक साथ नहीं रह सकते.....

पिछली पोस्ट पर एनोनिमस महोदय/महोदया लिखते हैं.......
"अपना देश क्यों छोड़ा ? क्या कोई ढकेलने वाला था या केवल अधिक पैसे के लिए
तो फिर आप क्यों रो रहे हो "
सबसे पहले तो आप इस भ्रम से निकले..... कि विदेश में अधिक पैसा मिलता है....सुविधाएँ ज़रूर आकर्षित करती है.....खैर पहला सवाल....अपना देश क्यों छोड़ा.....? देश छोड़ने के अलग अलग पारिवारिक कारण हो सकते हैं..... सिताह जैसे लोग तो हज़ारों की तादाद में मिलेंगे....
हमारे जैसे लोग भाग्य द्वारा बाहर ढकेले जाते हैं.... आप को यह रोना लगा....हमें यह बाँटना लगा.....
इस पोस्ट को लिखने का एक ही मकसद है कि विदेश में अधिक पैसा मिलता है इस भ्रम को तोड़ा जाए....जानते हुए भी कई लोग बाहर का रुख करते हैं इसके पीछे भी कई कारण है....
हमारे देश की बात ही नहीं... एशिया के लगभग सभी देशों में यही समस्या है....बेरोज़गारी से जूझते लोग...अपने परिवार के पालन पोषण के लिए देश से बाहर किसी भी काम को करने के लिए तैयार रहते हैं....

सरकार का ढाँचा...जनसंख्या... बेरोज़गारी...... रोज़गार न होने के कारण कई परिवार भूखों तड़पते देखे जा सकते हैं लेकिन हमारी मानसिकता ऐसी है कि हम अपने ही देश में वेटर या 'बेबी सिटिंग' का काम नहीं करेंगे... विदेश में कर लेंगे...क्यों.... वहाँ हर काम को इज़्ज़त की नज़र से देखा जाता है...
अपने आस पास कितने ही लोगों को देखा जो विदेश जाकर कोई भी काम करने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन अपने देश में अपने ही घर का कूड़ा फेंकने के लिए जमादार चाहिए....
अच्छे घर परिवार की पढ़ी लिखी बहू घर बैठे बैठे ही बेबी सिटिंग करने के काम के बारे में सोच भी नहीं सकती....
पढ़ने वाले बच्चों को उधार ले लेकर पढ़ाने का बोझ माँ बाप अकेले ढोते हैं....बस तुम पढो... अच्छी नौकरी पा लो... कह कर अपने दर्द में बच्चों को हिस्सेदार नहीं बनाते.....वही बच्चे बड़े होकर अगर बूढ़े होते माँ बाप को एक तरफ छिटक दें तो फौरन उन्हें बुरा भला कहना शुरु कर देते हैं..... जबकि हम यह नहीं जानते कि बचपन से ही उन्हें एक दूसरे के दर्द में भागीदार बनाने पर ही वे परिवार से जुड़े रह पाएँगे.
विकासशील देश बेरोज़गारी की समस्या से जूझ रहे हैं....दुबई जैसे छोटे से देश में ही भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका के लगभग 700,000 मज़दूरों को रोज़गार मिला हुआ है.
सुबह की चाय के वक्त इतना नीरस विषय.... बस बैठे बैठे यूँ ही लिख लिया तो अब पोस्ट तो ज़रूर करेंगे....
पूजा पाठ करते नहीं लेकिन नास्तिक भी नहीं....एक असीम शक्तिपुंज है जिसकी मर्जी के खिलाफ एक पत्ता भी नहीं हिलता.... यह सोच तो अटल है...
कर्म करने पर विश्वास रखते है तो भाग्य को भी मानते हैं....

(एनोनिमस महोदय/महोदया..... आपके कारण हम एक पोस्ट लिख पाए..आपका बहुत बहुत शुक्रिया .......)

20 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

एक मिथक को तोड़ती

मीनाक्षी जी की

बेबाक रपट

रपट कहना ही सही लगा है इसे

क्‍योंकि जो रहे हैं रपट

उन्‍हें रोक सकती हैं सिलवट।

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

दूर के ढोल सुहावने..होते है ..से शतप्रतिशत सहमत हूँ . आभार

बी एस पाबला said...

पहचाने जाने का भय ही व्यक्ति को रोकता है किसी विशिष्ट कार्य को करने से। दूसरे देश/ प्रदेश में पहचाने जाने का डर नहीं, इसलिए कुछ भी करने को तैय्यार बैठे हैं लोग। इसके पीछे सामाजिक कारक ज़्यादा जिम्मेदार हैं।

akhileshwar pandey said...

मीनाक्षी जी,
वाकई आपने एक बडे सच को उजागर किया है। मैं भी अविनाश भाई की बात से सहमत हूं, इसे रपट कहना ही उचित है।

शारदा अरोरा said...

मीनाक्षी जी
मैं समझ सकती हूँ कि आपको कौन सी शै भारत से जोड़े रखती होगी , वो क्या चीज है जो हमवतन ,हम-शहर , पडोसी को करीब लाती है , मिट्टी की खुशबू है बचपन की आवाजें , जड़ों से जोड़ जातीं हैं , बीते वक़्त की थपकियाँ यादों को जगा जातीं हैं |

नीरज गोस्वामी said...

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है

आपने सही कहा है...देश के बाहर सब कुछ अच्छा ही नहीं होता खास तौर पर खाड़ी के देशों में काम करना कितना मुश्किल है ये वोही जान सकता है जिसने किया हो...दूसरों को सिर्फ पैसा दिखता है पैसे के पीछे छुपे दर्द नहीं दिखाई देते. मैंने आस्ट्रेलिया अमेरिका कनाडा न्यूजी लैण्ड आदि संपन्न देशों में भारतियों को टैक्सी चलाते देखा है और उनसे बात भी की है, वो ये सब कर रहे हैं लेकिन मन से खुश नहीं हैं...पैसा है लेकिन कुछ है जिसे वो शिद्दत से मिस करते हैं...शायद अपनों का प्यार...पैसा और सुविधाएँ जुटाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पढ़ती है...जिसे हर कोई नहीं समझ सकता.
नीरज

GK Awadhiya said...

सही बात है, हर किसी को दूसरे के थाल में अधिक घी दिखाई देता है।

मान भी लें कि विदेश अधिक पैसा मिलता है तो भी वहाँ जा कर नौकरी करने वालों ने क्या बुरा किया है? बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो कि स्वयं तो कुछ कर नहीं पाते, जो लोग कुछ कर रहे हैं उन पर छींटे कसना ही उनका काम होता है।

Science Bloggers Association said...

कभी कभी छोटी छोटी चीजें भी सृजन का कारण बन जाती हैं। मैं तो यही कहूंगाकि ऐसी चीजें होनी रहनी चाहिए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

संगीता पुरी said...

बहुत सही ..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कभी भावनाएँ भी टकराती हैं आपस में तो शब्द बहुत तकलीफ देते हैं।

कंचन सिंह चौहान said...

एनानिमस महोदय/महोदया को मेरा भी धन्यवाद....! लिखने के लिये चाय के साथ नमकीन दी..! :)

Shastri said...

मीनाक्षी जी को एक सशक्त आलेख लिखने कि लिये जो अज्ञात महोदय प्रेरणा सिद्ध हुए उनको हमारा भी आभार !!

यदि हर कोई मीनाक्षी जी के इसी नजरिये से अज्ञात महोदय की टिप्पणियों को देखने लगे तो उनका धंधा चौपट हो जायगा.

आलेख के लिये साधुवाद!!

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आप चाय का आनँद लीजिये मीनाक्षी जी,
"करम की गति न्यारी ..
बडे बडे नयन दीये मिरगनको
बन बन फिरत उघारी सँतोँ,
करम की गति न्यारी..सँतो "
मीराँजी ने भी तो गाया था ना,
उन्होँने ससुराल का राजमहल ' मेडता ' छोडा...
और
बन बन घूमीँ..
सीता जी जनकपूरी ना गयीँ..
ना हि
कौशल नगरी मेँ रहीँ ..
बन बन कटँक बन मेँ
पति के पीछे चलीँ
सब करम के खेल हैँ !
उन्हेँ किसने ठेला था ? :)
- लावण्या

डॉ .अनुराग said...

हैरान हूँ की लोग कितने केक्टस अपने भीतर पाले हुए है ?कितनी तल्खिया लोग कम्पूटर में भी फेंकते है ....कभी अनूप भार्गव जी पे किसी ने ये सवाल उठाया था .....क्या बिहार के लोग दिल्ली में नौकरी नहीं करते ?क्या यू पी के लोग बॉम्बे ,असम नौकरी नहीं करते ?हैरान हूँ ...क्या अपने जीवन यापन के लिए किसी जगह बसर करने से मुझे अपने गाँव अपने वतन को याद करने का हक नहीं है ?ये कौन सा पैमाना है ????मेरे तो बहुतेरे ऐसे दोस्त है .जो विदेश में है ओर उन्होंने अपने मेडिकल कॉलेज को लाखो रुपये दिए है ....इंस्ट्रूमेंट दिए है.....अपने गाँव को ..स्कुल के लिए पैसे दिए है ....ओर ऐसे भी लोग है जो यहाँ रहकर भी कभी स्कूल के फंक्शन में भी नहीं जाते .चंदे की तो खैर दूर की बात ....

अभिषेक ओझा said...

बात तो बिलकुल सही कही है आपने, पर वही समझ सकता है जिसने महसूस किया है. नहीं तो दूर के ढोल तो सुहावने लगते ही हैं.

विनय said...

बहुत बढिया बात कही आपने!

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

शोभना चौरे said...

bhut shi kha aapne mai bhi m. p .se yha beglore me baithi hu mere liye to ye bhi videsh hi hai .gav se kasba ksbe se shahr shahr se mhangar
ye yatra to honi hi chhiye vrna kuye ke medhak jaisi taraaaaa taraaaaaaaaaa.
koi bhi isan khi bhi rhe apni mitti ki mahk uski sanso me bsi hi rhti hai .

तुषार राज रस्तोगी said...

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज ३ जून, २०१३ के ब्लॉग बुलेटिन - भूली कहावतें पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

कविता रावत said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...