Thursday, May 14, 2009

काश ..... सरहदें न होतीं..... !

गर सरहदें न होती तो इस वक्त बेटा वरुण भी अपने पापा के साथ दमाम से दुबई आ रहा होता. पूरा परिवार लम्बे अर्से के बाद एक साथ होता....एक साथ मिलकर उसका जन्मदिन मनाते..... लेकिन ज़रूरी नहीं कि जो हम चाहें सब वैसा ही हो.....
अक्सर ऊँची शिक्षा के लिए बच्चे विदेशों में जाते ही हैं, अपने देश से , अपने माता-पिता, भाई-बहन से दूर चले जाते हैं...
लेकिन एक देश से दूसरे देश में दाखिल होने के लिए जद्दोजहद करनी पड़े , नौकरी लायक बेटे को विदेश में घर अपना होने पर भी वीज़ा आसानी से न मिले, इस छटपटाहट को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता....
यह दर्द सिर्फ एक का नहीं , कई लोगों का है.....
कई परिवारों के पुरुष विदेश में हैं तो स्त्री देश में घर परिवार की देखरेख करती है, कहीं पुरुष के सहारे पूरा परिवार को छोड़ कर औरत चली आती है विदेश में.... रोज़ी रोटी के कारण , परिवार के पालन पोषण के कारण कितने ही परिवार बिखर जाते हैं....
कुछ दिन पहले समुद्र के किनारे बैठी एक फीलिपीनो औरत को रोते देखा तो रहा न गया... पूछ ही लिया.....'मिस, आर यू ओके?' भीगी आँखों से उसने हमारी तरफ देखा तो उन आँखों मे बहते दर्द को देख न पाए... फौरन आँसू पोछ कर उसने कहा,
आइ एम सिताह....अपनत्व की मुस्कान देखते ही यादों का सैलाब उमड़ पड़ा...
ड्राइवर पति की कमाई से गुज़ारा नहीं हुआ तो पति के सहारे चार बच्चों को छोड़ कर फीलिपीन से दुबई आ गई.......
चलते वक्त पाँच साल के सबसे छोटे बेटे की आँखों को वह कभी नहीं भुला पाई... उन आँखों का दर्द उसके साथ उसकी कब्र तक जाएगा ... ऐसा कहते ही वह फिर रो उठी....
छोटी से एलबम मेरी तरफ बढ़ा दी.....बच्चों और पति की तस्वीर दिखाते हुए कहने लगी कि सबसे बड़ी बेटी अब कॉलेज में है, फीस न भेजने के कारण पढ़ाई अगले साल तक रोकनी पड़ी...
एक साथ दो दो जगह बेबी सिटिंग का काम करके भी गुज़ारा मुश्किल है.... काफी देर तक वह अपने परिवार के बारे बताती रही...
कुछ ही देर में घड़ी देखकर उठ गई कि उसे मैडम और बच्चों को पियानो क्लास खत्म होने पर पिक करना है...सिताह की व्यथा के आगे अपनी कथा तो धूमिल लगने लगी......
सोचने लगी हमारा परिवार तो सिर्फ 4-5 सालों से ही अलग हुआ है... फिर समय समय पर हम मिलते भी रहते हैं....
वरुण के पास साउदी वीज़ा था सो पापा के पास चला गया और हम रेज़िडेंस वीज़ा होने के कारण छोटे बेटे विद्युत के पास आ गए.. सिताह की याद आते ही अपनी परेशानियाँ तो उसके दुख के आगे बहुत कम लगने लगी..... फिर दोनो बेटे अपनी अपनी समझ के अनुसार हमारे मन के संताप को दूर करते हैं...
एक बेटा अगर माँ को चिंता मुक्त करता है तो दूसरा बेटा पिता को नए नए उपाय बताकर उनकी थकान हर लेता है.
दम्माम से 200 कि.मी. दूर अल हफूफ में नए प्रोजेक्ट पर जाने के लिए होटल रुकना और नए घर की तलाश शुरु कर देना...आसान नहीं था... जाना जाता है कि अल हफूफ नाम का शहर साउदी अरब का सबसे गर्म इलाका माना जाता है... फिर भी बला की गर्मी में घर ढूँढ लिया गया...पेपर बने..एडवांस का पैसा दे दिया गया...अब बस हमें पहुँच कर घर बदलना था .....
अचानक खबर आई कि हैड ऑफिस वापिस लौटा जाए , वहाँ ज़रूरत है... सब छोड़ छाड़ कर परिवार को लेकर रियाद जाना होगा.... सुनकर एक पल के लिए सकते में आ गए....... फिर खुशी हुई क्योंकि सालों से हम उसी शहर में रहे थे... 5 साल बाद फिर से उसी शहर में अपने परिचित मित्रों के पास लौटना खुशी की ही बात थी.... अब नए सिरे से फिर से रियाद जाकर एक घर की तलाश शुरु करनी होगी....
अब तो हम कहते हैं कि सारी दुनिया हमारा आशियाना है.... !!
आशियाने के एक कोने में बेटा वरुण है जिसे हम इस पार से प्यार और आशीर्वाद भेज रहे हैं.... अपने देश की पूर्वी दिशा से रचना मौसी ने प्यार और आशीर्वाद भेजा तो उनके साथ और भी कई प्यार करने वाले और शुभकामनाएँ भेजने वाले साथ हो लिए...... तो जंगल में मंगल हो गया.... सूखे रेगिस्तान में प्यार की वर्षा होने लगी.....!

5 comments:

Udan Tashtari said...

सरहदें तो अब नाम को हैं. पूरा विश्व एक गांव बन चुका है..अच्छा लगा आपको पढ़ना..यह स्थापन-विस्थापन तो जीवन का सिलसिला है. शुभकामनाऐं.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

'सिताह' जैसी स्त्रियोँ की मजबूरी
और माँ का प्यार
अपने से बिछुडे बच्चे के लिये,
आँखेँ नम कर गया -
आप भी धैर्य और हिम्मत रखियेगा - चि. वरुण बेटे को
सालगिरह पर आशिष और पापा और माँ के साथ
सारे हिन्दी ब्लोग जगत का
ढेरोँ दुलार ..
स स्नेह,
- लावण्या

Rachna Singh said...

जानम देख लो मिट गई दूरियाँ
मैं यहा हूँ , यहा हूँ, यहा हूँ यहा
कैसी सरहदें, कैसी मजबूरीयाँ
मैं यहा हूँ , यहा हूँ, यहा हूँ यहा
Javed Akhtar

संगीता पुरी said...

कहने को ही सरहदें समाप्‍त हो चुकी हैं और पूरा विश्‍व एक गांव बन चुका है .. पर इन सरहदों को लेकर जीवन में समस्‍याएं आ ही जाती है .. काश हम पक्षी , नदिया या पवन का झोंके ही होते।

Anonymous said...

अपना देश क्यों छोड़ा?

क्या कोई ढकेलने वाला था या केवल अधिक पैसे के लिए

तो फिर आप क्यों रो रहे हो