Friday, October 5, 2007

ईरान का सफर

(तेहरान से गिलान (रश्त) जाते हुए)


मानव मन प्रकृति की सुन्दरता में रम जाए तो संसार की असुन्दरता ही दूर हो जाए। प्रकृति की सुन्दरता मानव मन को संवेदनशील बनाती है। हाफिज़ का देश ईरान एक ऐसा देश है जहाँ प्रकृति की सुन्दरता देखते ही बनती है। सन 2002 में पहली बार जब मैं अपने परिवार के साथ ईरान गई तो बस वहीं बस जाने को जी चाहने लगा। एक महीने बाद लौटते समय मन पीछे ही रह गया।

कवियों और लेखकों ने जैसे कश्मीर को स्वर्ग कहा है वैसे ही ईरान का कोना कोना अपनी सुन्दरता के लिए जन्नत कहा जा सकता है। सबसे पहला सुखद अनुभव हुआ रियाद के ईरानी दूतावास जाकर । भारत के प्रति अपना स्नेह दिखा कर उन्होंने हमें आश्चर्यचकित कर दिया। हमारे देश की पुरानी हिन्दी फिल्में आज भी याद की जाती हैं। राजकपूर की 'संगम' , अमिताभ बच्चन की 'मर्द' , 'कुली' किसी भी विडियो लाइब्रेरी में आसानी से मिल जाती है। आजकल शाहरुख खान के भी बहुत चर्चें हैं.कई लोगों का सपना है कि अवसर मिलने पर वे भारत ज़रूर देखने जाएँगें.मेरे विचार में मध्य-पूर्वी देशों के लोग भी प्रेम और भाईचारे में किसी से कम नहीं हैं बस आगे बढ़कर हाथ मिलाने की देर है फिर देखिए कैसे दोस्ती निभाते हैं ।

ईरान के लिए वीज़ा आसानी से मिल गया । किसी कारणवश पति को रियाद ही रुकना पड़ा । मैं बच्चों के साथ ईरान के सफ़र पर निकल पड़ी। बच्चे भी कम उत्साहित नहीं थे। ईरानी मित्रों के साथ कुछ ऐसा नाता बन गया था जो अपने नज़दीकी रिश्तेदारों से भी बढ़कर था। ईरान की यात्रा से पहले ही अंर्तजाल के माध्यम से हम उस देश के बारे में बहुत कुछ जान गए थे। रियाद के ईरानी दूतावास की अध्यापिका से ईरानी भाषा सीख कर मैं अपने मित्रों को हैरानी में डाल देना चाहती थी।

यात्रा का दिन आ गया । रियाद से तहरान की हवाई यात्रा ३-४ घंटे की ही थी लेकिन उससे आगे ४-५ घंटे का सफर हमें कार से ही तय करना था। विजय के मित्र अली पहले से ही हवाई अड्डे पर हमारा इन्तज़ार कर रहे थे । समय कैसे कट गया , पता ही नहीं चला । जहाज से उतरते ही स्वागत के लिए खड़े एक अफसर ने मुस्कान के साथ हाथ जोड़कर मुझे सिर ढकने के लिए कहा। मैं भूली नहीं थी, बुरका मेरे हैंड बैग में ही था लेकिन यह नहीं मालूम था कि उतरते ही कोई टोकेगा। खैर मैंने तुरन्त अपना दुपट्टा सिर पर ले लिया। इमिग्रेशन से पहले ही मैंने अपना बुरका निकाला जो सालों से मैं रियाद में पहनती आई हूँ । बुरका पहनते ही मैं जैसे आज़ाद हो गई। "जैसा देश, वैसा भेस" उक्ति सोलह आने सच है। जिस देश में हम रहते हैं , उस देश के कायदे कानून को मान देने से ही अपना मान बढ़ता है।

एयरपोर्ट पर सभी अफसरों और कर्मचारियों ने अपने मीठे व्यवहार से हमें अपनेपन का एहसास कराया। ईरान एक सुन्दर देश तो है ही , वहाँ के लोग भी अच्छे मेहमान नवाज़ हैं। समय अच्छा गुज़रे , ऐसी कामना करते हुए अफसर ने पासपोर्टस हाथ में दे दिए और हम सामान की बैल्ट की ओर रवाना हुए। मित्र पहले से ही वहाँ खड़े इन्तज़ार कर रहे थे । सामान लेकर शीघ्र ही कार की ओर चले क्योंकि आगे की यात्रा हमारे लिए रोमांचक थी ।उत्तरी ईरान का गिलान क्षेत्र कश्मीर की तरह पहाड़ी है और जिस रास्ते से हमें गुज़रना था , वह बर्फ से ढका हुआ था। पहली बार हमें इस तरह नज़दीक से बर्फ देखने का मौका मिला था ।

रास्ते में क्वीन पड़ता है जहाँ का ऑमलेट जिसे 'नीम्ब्रू' कहा जाता है, जिसे 'लवाश' नाम की रोटी और काली चाय के साथ परोसा जाता है। 'गज़ा खेली खुशमज़ा हस्त' मेरे बोलने पर मित्र ही नहीं आसपास के लोग भी हैरानी से देखने लगे। माथे पर बिन्दी देखकर पहले ही सब लोग समझ गए थे कि हम 'मुसाफिर ए हिन्द' हैं। दरअसल इस नाम का एक टी०वी० सीरियल उन दिनों चल रहा था, जिसमें भारतीय लड़की बनकर सीता का रोल अदा करने वाली अदाकारा ईरानी ही थी, उसकी बिन्दी से लोगों को पहचान हो गई कि बिन्दी लगाने वाले लोग भारतीय होते हैं, हालाँकि आजकल कई देशों के लोग फैशन के लिए बिन्दी लगाते हैं।

चाय खत्म होते ही १०-१५ 'लवाश' रोटी साथ बाँध कर हम चल पड़े। प्रकृति का यह सुन्दर रूप कुछ अलग ही था। बर्फ से ढके पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे ईरान की धरती सफेद आँचल से सिर ढके बैठी हो। कहीं कहीं सफेद आँचल पर हरे रंग का 'पैच वर्क' किया हो या यों कहें कि सफेद आँचल पर हरी टाकियाँ लगी हों।

8 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया!!
शुक्रिया!!
ईरान घूमने के लिए अगली किश्तों का इंतजार रहेगा।

तस्वीरें और होनी चाहिए थी!
इसके अलावा दो लंबे पैराग्राफ की बजाय इसे और छोटे छोटे पैराग्राफ मे बांट देने से पाठकों को आसानी होगी!!
आशा है सुझाव को अन्यथा नही लेंगी।

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब। ईरान के और संस्मरण लिखें।

Sanjay said...

ये तो नाइंसाफी है. यात्रा का वृत्तांत वो भी अधूरा और इतना संक्षिप्‍त.. बात कुछ जमी नहीं. ईरान के बारे में मेरा सामान्‍य विचार यह है कि वे कट्टरवादी मानसिकता वाले मुस्लिम हैं और दुनिया में फैले इस्‍लामी आतंकवाद को प्रश्रय देने वालों में से एक हैं. इसलिए उत्‍सुक्‍ता थी जानने की कि आपने क्‍या देखा वहां.. वहां तो फारसी बोलते हैं न.. एक लाइन हमने भी रटी हुई है, जो अक्‍सर कश्‍मीर के बारे में कही जाती हैं. गर फिरदौस ए ज़मीं अस्‍त, हमीं अस्‍त... हमीं अस्‍त
मतलब तो आप जानती ही होंगीं.

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subhash kumar said...

आपकी यात्रा वृत्तांत की शुरुआत तो अच्छी है लेकिन आप अगर इसे पूरा कर पाते तो अच्छा होता. हाँ ज़िन्दगी की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि एक बार अगर कोई चीज़ छुट गयी तो पुरा करना मुश्किल होता है. मैं तबरीज़ से हाल हीं में भ्रमण करके आया हूँ लेकिन उसके बारे पूरा नहीं लिख पाया. मैं फिलहाल खुद ईरान में हूँ और आपके द्वारा एअरपोर्ट पर हुए व्यवहार के सजीव चित्रण को सराहता हूँ. हाँ यहाँ पर कपड़े पहनने के सन्दर्भ में कुछ परेशानियाँ हैं लेकिन बाकी सब मिला - जुलाकर अच्छा है. यहाँ बॉलीवुड को सब कोई जनता है. पुराने लोग राजकपूर और संगम का नाम लेते हैं, तो नए लोग ऐश्वर्या, शाहरुख़, सलमान का नाम लेते हैं. हाँ लेकिन भारतीय फ़िल्में मुख्यतः एक हीं विषय पर बनती है इसलिए मजाक भी उड़ाते हैं. खैर जो भी हो ये लोग भारत को बहुत पसंद करते हैं और भारतीयों को इज्जत करते हैं.

Anonymous said...
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