Friday, October 19, 2007

ईरान का सफर (2)

ईरानी लोगों का लखनवी अन्दाज़ देखने लायक होता है. हर बार मिलने पर झुक कर सलाम करते-करते बहुत समय तक हाल-चाल पूछना हर ईरानी की खासियत है. 'सलाम आगा'-सलाम श्रीमान् 'सलाम खानूम'-सलाम श्रीमती 'हाले शोमा चतुरी?'-आपका क्या हाल है? 'खूबी?'-अच्छे हैं, 'शोहरे शोमा खूबी?'- आपके पति कैसे हैं?, 'खानूम खूबे?'- श्रीमती कैसी हैं?', 'बच्चेहा खूबी?'-बच्चे ठीक हैं? 'खेली खुशहाल शुदम'- बहुत खुशी हुई मिलकर 'ज़िन्दाबशी' – लम्बी उम्र हो,
यदि धन्यवाद 'मरसी' कहा जाए तो फिर एक और जुमला सुनने को मिलता है. 'ख्वाहिश मीकोनाम' या 'काबिल न दरे'. कहने का मतलब है कि हर ईरानी आपसे हाल-चाल पूछता पूछता आधा समय गुज़ार देगा और प्यारी सी मुस्कान के साथ झुक कर सलाम करता रहेगा. आप न चाहते हुए भी मुस्कराएँगें और उनके जाने के बाद अपने दुखते गालों को दबाएँगें.
बाज़ार चलते समय हर मिलने वाले को मुस्कुरा कर , झुक कर सलाम करना जैसे एक रिवाज़ है वहाँ. अगर आप भारत के हैं तो बस एक लम्बी सी लिस्ट की चर्चा शुरु हो जाएगी. वे कहाँ-कहाँ जाना चाहते हैं; उन्हें भारत की फिल्में, वहाँ के पहनावे बहुत अच्छे लगते हैं. जल्दी ही आपसे पूछ लेंगे कि यदि आप साड़ी लाएँ हैं तो उनकी बेटी को एक बार पहना कर तस्वीर खींच दें.
किसी के घर जाने पर सबसे पहले काली चाय चीनी के टुकड़े के साथ (जिसे मिशरी नहीं 'गन्द' कहा जाता है) परोसी जाती है.चाय बनाने का भी उनका एक अलग ही तरीका होता है. केतरी(केतली) जिसमे पानी उबाला जाता है और उस पर उससे छोटी कूरी जो केतरी का ही छोटा रूप होता है , रखी जाती है , जिसमे चाय की पत्ती होती है. साथ मे वहाँ की अलग अलग की तरह की मिठाइयाँ और ताज़े फल परोसने का बहुत चलन है. केतरी और कूरी को कश्मीर मे अलग नाम से जाना जाता है , काफी कुछ मिलते-जुलते रिवाज़ और खान-पान हैं. एक व्यंजन है जिसे ईरान में आब ए गुश्त कहा जाता है, कश्मीर मे गुश्ताबा कहा जाता है. कुछ व्यंजनों की कुछ तस्वीरें हैं जिन्हें देख कर किसी के भी मुहँ में पानी आ जाए.













तीन तरह की रोटी जिन्हें बारबरी, संगक और लवश कहा जाता है. कबाब और चावल सबसे प्रिय व्यंजन होते हैं. इसके अलावा हर प्रदेश के अपने अलग-अलग कई व्यंजन होते हैं. केसर और गुलाब जल से बनाई गई मिठाइयाँ इतनी स्वादिष्ट होती हैं कि खाए चले जाओ बस मुहँ में घुलती जाती हैं. भारत का काजू जिसे वहाँ बादाम ए हिन्द कहा जाता है सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. अखरोट डाल कर कई व्यंजन बनाए जाते हैं. कैसपियन सागर की विशेष प्रकार की मछली स्वादिष्ट ही नहीं, सेहत के लिए भी अच्छी होती है. मछली के अण्डे खाने को मिल जाएँ तो और भी अच्छा. हर भोजन के साथ ताजे हरे पत्ते भी खाए जाते हैं. उत्तरी ईरान की खुशमज़ा गज़ा (स्वादिष्ट भोजन) ही नहीं , वहाँ की आबोहवा भी सेहत के लिए बहुत ही मुफीद है. एक बार जाना हो जाए तो बार-बार जाने का मन करता है.



भोजन के बाद संगीत का स्थान आता है. संगीत के प्रेमी बड़े ही नहीं छोटे-छोटे बच्चे भी होते हैं. भोजन के बाद जैसे ही संगीत की आवाज़ कानों मे पड़ती है , बच्चे, बूढ़े , जवान सभी के पैर थिरकने लगते हैं. मर्यादा के दायरों में रहकर जीवन की विषमताओं से जूझते हुए कुछ देर के लिए सब कुछ भुला कर जैसे वही कुछ पल जी लेते हैं.










8 comments:

Udan Tashtari said...

सलाम खानूम,

खेली खुशहाल पढ़कर-मरसी.

:)

मीनाक्षी said...

सलाम आगा समीर ,

बाह बाह (वाह वाह)
खेली खुशहाल पढ़कर-मरसी.----- दरस ए शोमा खून्दम ..खेलि खुशहाल शुदम.. !!



ज़िन्दाबशी

उन्मुक्त said...

ईरान वहां के लोगों के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा

Gyandutt Pandey said...

इतना सुसंस्कृत देश इतनी कट्टरता में कैसे फंसा है?

हिन्दी टुडे said...

ईरानी जिंदगी का रोचक चित्रण है। तस्वीरें काफी अच्छी हैं।' हर भोजन के साथ ताजे हरे पत्ते भी खाए जाते हैं'। यह मेरे लिये नई जानकारी है।वाकई लेखानुसार मेरे मुंह मे पानी आ गया।"
कभी मिलेगा क्या हमें भी खाने को।

मीनाक्षी said...

ज्ञान जी , राजनीति मेरे लिए गरिष्ट भोजन है जो पचता नही , एक ऐसी भाषा है जो समझ से बाहर है ... लेकिन आम मानव और उससे जुड़ी मानवता मन को भा जाती है.

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया!!

आप ईरान का वह चित्र हमारे सामने रख रही हैं जो हम देख नही सके थे, हम सबके मन मे ईरान की जो छवि बनती आई है वह है एक कट्टरपंथी मुल्लाओं के देश के रुप में।

आप वहां की संस्कृति से जो परिचय करवा रही है यह एक दूसरा पहलू हम सबके सामने रख रही हैं
निश्चित ही इसके लिए आपको शुक्रिया कहा जाना चाहिए!!
शुक्रिया!!

जारी रखें।

नितिन व्यास said...

लेख अच्छा लगा, जारी रखें।