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Friday, May 15, 2020

मस्त रहो 


महामारी के इस आलम में 
मन पंछी सोचे अकुला के 
छूटे रिश्तों  की याद सजा के
ख़ुद ही झुलूँ ज़ोर लगा के  
 आए अकेले , कोई ना अपना  
 साथ निभाते भरम पाल के ! 
 ख़ुद से रूठो ख़ुद को मना के  
 स्नेह का धागा ख़ुद को बाँध के  
 यादों का झोंका आकर कहता   
 मस्त रहो ख़ुद से बतिया के !! 
 मीनाक्षी धनवंतरि 

4 comments:

रेणु said...

खुद से रूठो खुद को मनाके
स्नेह का धागा खुद को बांधके
यादों का खोंका आके कहता
मस्त रहो खुद से बतियाके |
बहुत खूब मीनाक्षी जी ! पहली बार आपके ब्लॉग पर आई कुछ रचनाएँ देखी अच्छा लगा | हार्दिक शुभकामनाएं|

रेणु said...

अगर -- यादों का झोंका आ [ आके नहीं ] कहता लिखेंगे तो और प्रभावी होगा |

मीनाक्षी said...

शुक्रिया रेणु !

Admin said...

मनोहर रचना है Thanks You.
आपको Thanks you Very Much.
बहुत अच्छा लिखते हाँ आप
हम लगातार आपकी हर पोस्ट को पढ़ते हैं
दिल प्रसन्न हो गया पढ़ के
.