Tuesday, April 29, 2014

स्याह चेहरे वाली चिमनी



खिड़की के उस पार 
अचानक नज़र चली गई
दीवार पर खड़ी थी 
स्याह चेहरे वाली चिमनी
सिसकती सी काला धुआँ उगलती
तनी खड़ी तिकोनी टोपी पहने
देर तक काला गहरा धुआँ उगलती
फिर एक खूबसूरत एहसास जैसे
अनदेखी खुशबू फैला देती चारों ओर
महकती रोटियाँ जन्म लेतीं उसकी कोख से
जीवनदान देती, भूख मिटाती सबकी
स्याह चेहरे वाली चिमनी
जाने कब तक 
बस यूँ ही धुआँ उगलती रहेगी
जलती रहेगी आग उसके भीतर
उसका स्याह चेहरा याद दिलाता है 
अनेकों स्याह चेहरे जिनके अंतस में
धधकती रहती है आग 
कैद से निकलने की छटपटाहट
आज़ाद होने की चाहत 
स्याह चेहरे वाली चिमनी 
जाने कब तक 
बस यूँ ही धुआँ उगलती रहेगी !  





5 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ाँ और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कभी चि‍मनि‍यों औधोगि‍क वि‍कास की परि‍चायक थीं

संजय भास्‍कर said...

स्‍वयं का सच बयां करती हुई पंक्तियां ...।

Smart Indian said...

रूप, सुगंध और उपयोग, और शायद उससे भी आगे बहुत कुछ - समझ की कोई सीमा नहीं।

मीनाक्षी said...

@ब्लॉगबुलेटिन- उस्ताद साहब के साथ पोस्ट शामिल करने का बहुत बहुत शुक्रिया
@काजलकुमार और आज चिमनी को देख कर कुछ और ही ख्याल मन में आता है
@संजय सच जो कड़वा होता है
@अनुराग जी,यकीनन सोच सीमाहीन है.
आपका आना अच्छा लगा.. आभार