दुबई में हूँ छोटे बेटे के साथ ... जहाँ छोटे बेटे से मिलने की खुशी है वहीँ बड़े बेटे से बिछुड़ने का दुख भी है. माँ बनते ही औरत की बाकि सभी भूमिकाएँ धूमिल होने लगती है. शायद तभी माँ को सबसे ऊँचा दर्जा दिया जाता है. अचानक हिन्दी फिल्म 'औरत' का एक गीत याद आ गया....'नारी जीवन झूले की तरह इस पार कभी उस पार कभी' ....
दिल्ली हवाई अड्डे पर हम दोनों एक साथ अन्दर दाखिल हुए थे लेकिन दोनों को अलग अलग देशों में जाना था. बेटे ने गल्फएयर से बेहरीन जाना था और हमने एयर अरेबिया से शारजाह. दिल्ली ऐयरपोर्ट दाखिल होते ही पहले हमारा काउंटर आया सो हमने फट से अपना सामान बुक करवा दिया. वरुण धीरे धीरे गल्फ ऐयर के काउंटर की तरफ जाने लगा।
अपना सामान बुक कराने के बाद जब हम गल्फएयर के काउंटर पर पहुँचे. तो काउंटर पर बैठे लोग परेशान हो गए कि हम अन्दर कैसे आ गए. सवाल पर सवाल करने लगे. पूरी कहानी कुछ उलझी हुई थी सो बस इतना ही बता पाए कि हम दुबई छोटे बेटे के पास जा रहे हैं और यह बेटा अपने पापा के पास साउदी अरब जा रहा है. उत्सुकता थी सब कुछ जानने की लेकिन पीछे के मुसाफिरों को देखकर जल्दी से वरुण की मन पसन्द सीट दे दी ...
कुछ देर में हम दोनों वेटिंग लॉंज में थे... हम दोनों की ही फ्लाइट गेट न. 9 से जानी थी.... काफी वक्त होने के कारण एक तरफ कोने की कुर्सियों पर जा बैठे... किसी मुसाफिर की आँखें अभी भी भीगी थी तो कोई मोबाइल पर अपने प्रियजनों से बात करता करता रो रहा था... किसी के चेहरे पर अपने बिछुड़ों से मिलने की खुशी थी.... एयरपोर्ट भी एक अजब जगह है जहाँ कुछ लोग मिलते हैं और कुछ लोग बिछुड़ते हैं... आँखें सब की गीली होती हैं.
हम दोनों मुस्कुरा रहे थे...कुछ ज़्यादा ही ... दोनों ही एक दूसरे को दिखाना चाहते थे कि इस विपरीत परिस्थिति में भी हम सामान्य हैं.. कुछ ही देर में वरुण अपनी फ्लाइट की ओर रवाना हो गया...हमारी निगाहें स्क्रीन पर टिकी थीं जहाँ 'डिपार्टड' लिखा देख कर समझ गए कि अब जहाज़ उड़ चुका है. एक घंटे बाद हमारी फ्लाइट थी. बेटे के बिना एक घंटा भारी लगने लगा...ऐसे में डयूटी फ्री शॉप घूम कर वक्त आसानी से कट गया और घोषणा होते ही हम भी जहाज़ की ओर बढ़ गए...
सालों से सफ़र करते हुए भी जहाज़ में दाखिल होते ही दिल कुछ तेज़ी से धड़क उठता है. वरुण के दादाजी ने एक बार अपने पास बिठाकर कहा था कि देखता हूँ कि तुम पूजा पाठ नहीं करती हो लेकिन एक बात मेरी मानना कि महामृत्युंजय मंत्र का पाठ ज़रूर किया करो, सफ़र में चलते हुए तो ज़रूर करना बस तब से हमेशा सीट पर बैठते ही
'महा मृत्युंजय' का पाठ करने लगते हैं...कब आँख लगी पता नहीं चला, लैंडिंग के वक्त ही आँख खुली.
एयरपोर्ट उतरते ही पहले विद्युत को फोन लगाया, उसका हालचाल पूछने की बजाए पहले वरुण के खैरियत से पहुँचने की खबर जाननी चाही. दोस्त 'अर्बुदा' जिसे हम स्लीपिंग ब्लॉगर कहते हैं उसके पति गौरव वरुण को घर ले जा चुके थे. अगले दिन पति आकर ले जाएँगे यह पता लगने पर शांत मन से एयरपोर्ट से बाहर निकली.
बाहर निकलते निकलते आधी रात हो चुकी थी. विद्युत को कह चुके थे कि हम टैक्सी से घर पहुँच जाएँगें. जैसे ही हम टैक्सी स्टैंड तक पहुँचे , हमें फिलीपीनो ड्राइवर, जो 30-35 साल की लग रही थी , उसकी टैक्सी में बैठने को कहा. लेडी ड्राइवर ने बड़ी फुर्ती से हमारा सामान कार में रखा और घर का पता पूछने लगी।
हम दोनों मुस्कुरा रहे थे...कुछ ज़्यादा ही ... दोनों ही एक दूसरे को दिखाना चाहते थे कि इस विपरीत परिस्थिति में भी हम सामान्य हैं.. कुछ ही देर में वरुण अपनी फ्लाइट की ओर रवाना हो गया...हमारी निगाहें स्क्रीन पर टिकी थीं जहाँ 'डिपार्टड' लिखा देख कर समझ गए कि अब जहाज़ उड़ चुका है. एक घंटे बाद हमारी फ्लाइट थी. बेटे के बिना एक घंटा भारी लगने लगा...ऐसे में डयूटी फ्री शॉप घूम कर वक्त आसानी से कट गया और घोषणा होते ही हम भी जहाज़ की ओर बढ़ गए...
सालों से सफ़र करते हुए भी जहाज़ में दाखिल होते ही दिल कुछ तेज़ी से धड़क उठता है. वरुण के दादाजी ने एक बार अपने पास बिठाकर कहा था कि देखता हूँ कि तुम पूजा पाठ नहीं करती हो लेकिन एक बात मेरी मानना कि महामृत्युंजय मंत्र का पाठ ज़रूर किया करो, सफ़र में चलते हुए तो ज़रूर करना बस तब से हमेशा सीट पर बैठते ही
'महा मृत्युंजय' का पाठ करने लगते हैं...कब आँख लगी पता नहीं चला, लैंडिंग के वक्त ही आँख खुली.
एयरपोर्ट उतरते ही पहले विद्युत को फोन लगाया, उसका हालचाल पूछने की बजाए पहले वरुण के खैरियत से पहुँचने की खबर जाननी चाही. दोस्त 'अर्बुदा' जिसे हम स्लीपिंग ब्लॉगर कहते हैं उसके पति गौरव वरुण को घर ले जा चुके थे. अगले दिन पति आकर ले जाएँगे यह पता लगने पर शांत मन से एयरपोर्ट से बाहर निकली.
बाहर निकलते निकलते आधी रात हो चुकी थी. विद्युत को कह चुके थे कि हम टैक्सी से घर पहुँच जाएँगें. जैसे ही हम टैक्सी स्टैंड तक पहुँचे , हमें फिलीपीनो ड्राइवर, जो 30-35 साल की लग रही थी , उसकी टैक्सी में बैठने को कहा. लेडी ड्राइवर ने बड़ी फुर्ती से हमारा सामान कार में रखा और घर का पता पूछने लगी।
दुबई के उस पार का पता जान कर दूरी के कारण कुछ पल के लिए वह झिझकी लेकिन फिर एक बड़ी मुस्कान के साथ बिस्माल्लाह कह कर टैक्सी स्टार्ट कर दी. टैक्सी 120 की स्पीड पर सड़क पर दौड़ने तो लगी लेकिन लगा कि हवाई जहाज़ के सफ़र में तो हम बच गए ...कहीं ऐसा न हो यह लेडी ड्राइवर हमें ज़मीन पर पटक दे सदा के लिए.... डर तो बहुत रहे थे लेकिन फिर हमने महामृत्युंजय का मंत्र पढ़ना शुरु कर दिया. सोचने लगे शायद देर रात की सवारी की उम्मीद न थी लेकिन अब इतनी दूर जाना पड़ गया.
कुछ देर बाद रहा न गया ,,, आखिर पूछ ही लिया, 'हैलो मिस, आर यू ओके?' 'यस यस मदाम,,,आइ एम ओके...' कुछ देर बाद फिर से अपने आप ही बोल उठी कि चार साल से ड्राइविंग करते हुए उसे कमर में दर्द रहने लगा इसलिए वह वापिस अपने देश लौट जाएगी. सड़क पर दौड़ती टैक्सी की जितनी स्पीड थी उससे कहीं ज़्यादा हमारे दिल की धडकन थी, असल में जब तक हमें ड्राइविंग नहीं आती तब तक तो हम किसी के साथ भी आराम से बैठ सकते हैं लेकिन जब खुद गाड़ी चलाने लगो तो दूसरे पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल लगने लगता है.
खैर अपने घर पहुँच ही गए, बेटा पहले से ही बाल्कनी में खड़ा इंतज़ार कर रहा था, फौरन आकर गले लग गया, (पैर छूना भूल गया और हम गले लगते ही बताना भूल गए) इस बार घर पहले से बहुत साफ सुथरा था बस कपड़े ही कपड़े दिखाई दे रहे थे.
मेरे पहुँचने से पहले डिनर मँगवा लिया था. दोनो ने एक साथ खाना खाया. कुछ ही देर में बेटा चाय भी बना कर ले आया. सारी थकान , सारी चिंता दूर हो गई. अगले दिन बेटे का आखिरी एग्ज़ाम था सो जल्दी ही सो गए कि सुबह कॉलेज छोड़ने जाना है. अगले दिन एक नई दिनचर्या का स्वागत करना था...!
कुछ देर बाद रहा न गया ,,, आखिर पूछ ही लिया, 'हैलो मिस, आर यू ओके?' 'यस यस मदाम,,,आइ एम ओके...' कुछ देर बाद फिर से अपने आप ही बोल उठी कि चार साल से ड्राइविंग करते हुए उसे कमर में दर्द रहने लगा इसलिए वह वापिस अपने देश लौट जाएगी. सड़क पर दौड़ती टैक्सी की जितनी स्पीड थी उससे कहीं ज़्यादा हमारे दिल की धडकन थी, असल में जब तक हमें ड्राइविंग नहीं आती तब तक तो हम किसी के साथ भी आराम से बैठ सकते हैं लेकिन जब खुद गाड़ी चलाने लगो तो दूसरे पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल लगने लगता है.
खैर अपने घर पहुँच ही गए, बेटा पहले से ही बाल्कनी में खड़ा इंतज़ार कर रहा था, फौरन आकर गले लग गया, (पैर छूना भूल गया और हम गले लगते ही बताना भूल गए) इस बार घर पहले से बहुत साफ सुथरा था बस कपड़े ही कपड़े दिखाई दे रहे थे.
मेरे पहुँचने से पहले डिनर मँगवा लिया था. दोनो ने एक साथ खाना खाया. कुछ ही देर में बेटा चाय भी बना कर ले आया. सारी थकान , सारी चिंता दूर हो गई. अगले दिन बेटे का आखिरी एग्ज़ाम था सो जल्दी ही सो गए कि सुबह कॉलेज छोड़ने जाना है. अगले दिन एक नई दिनचर्या का स्वागत करना था...!




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