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बुधवार, 9 अप्रैल 2008

शैशव की स्मृति



स्मृतियाँ लौटीं , शैशव की याद आई
घुटनों के बल कितनी माटी खाई

चूड़ियाँ माँ की कानों में खनकी
भूली यादों से आँखें भर आईं

ममता की चक्की चलती चूल्हा जलता
स्नेह भरे हाथों से फिर खाना पकता

रोटी पर माखन साग को ढकता
दही छाछ जो पेट को फिर भरता

खोजते नन्हे पैर तपती धूप में छाया
धूल भरी राहों में डोलती वो काया

चोरी से बेर तोड़ना बेहद भाता था
मन-पंछी सैंकड़ों सपने लाता था

सन्ध्या का सूरज रक्तिम आभा को लाता
दीपक का प्रकाश घर-भर में छा जाता

बेटी की सुन पुकार टूट गया सपना
जैसे पीछे कोई छूट गया हो अपना

खट्टी मीठी यादों का टूटे सँग ना
फिर याद आ गया छूट गया अँगना