आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!
सूखे कगार सी पतली दो रेखाएँ
बेचैन भुजाएँ बनकर आलिंगन करना चाहें !!
सूखे अधरों का कंपन बढ़ता ही जाए
फिर भी प्यास प्रेम की बुझ न पाए !!
आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!
प्रथम मिलन को भूल न पाऊँ
मोहपाश में फिर-फिर बँधती जाऊँ !!
प्यासे अधरों की, चंचल नैनों की
भाषा प्रेम की फिर से पढ़ना चाहूँ !!
आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!