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सोमवार, 27 अगस्त 2007

मैं या अहम्

मानव का "मैं" अहम् के रूप में --

मैं ही मैं हूँ इस सृष्टि में,
और न कोई इस दृष्टि में,
मैं  ज्ञानी हूँ सब अज्ञानी 
सादी सच्ची मेरी ही बानी . 
ऐसा भाव किसी का पाकर,
मन सोचे यह रह रहकर,
मानव मन क्यों समझ न पाए,
क्षण भंगुर हम तन ये लाए।।

मैं सुन्दर हूँ और न कोई,
मैं सर्वगुण और न कोई,
मैंने पाया सब कुछ उत्तम,
मेरा यह सब तेरा क्या है ।।
ऐसा भाव किसी का पाकर,
मन सोचे यह रह रहकर,
मानव मन क्यों समझ न पाए,
क्षण भंगुर यह तन हम लाए।।



मानव का "मैं" करुणा के रूप में ---

मैं झरना झर झर बहूँ ।
अमृत की रसधार बनूँ ।।
मैं तृष्णा को शान्त करूँ।
प्रेम बनूँ औ' हिय में बसूँ।।
मैं मलयापवन सी मस्त चलूँ।
मानव मन में सुगन्ध भरूँ।।
मैं सबका सन्ताप ग्रहूँ।
हिय के सब का शूल गहूँ।।
मैं ग्यान की ऊँची लपट बनूँ।
अवनि पर प्रतिपल जलती रहूँ।।
मैं विश्व की ऐसी शक्ति बनूँ।
मानव मन को करूणा से भरूँ।।





रियाद में शाम-ए-अवध के मंच पर मैंने पहली बार अपनी दोनों कविताएँ पढ़ी