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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

सफ़र के कुछ सफ़े - 1



ब्लॉग जगत के सभी मित्रों को नमस्कार.... !

6 अक्टूबर 2008 को अपने देश की ज़मीन पर पैर रखते ही सोचा था कि हर दिन का अनुभव आभासी डायरी में उतारती जाऊँगी लेकिन वक्त हथेली से रेत की तरह फिसलता रहा....आज पूरे चार महीने हो गए घर छोड़े हुए...

घर कहते ही मन सोच में पड़ जाता है कि कौन से घर की बात की जाए... पति और बच्चों के साथ बीस साल जहाँ बिताए वह घर या फिर बच्चों की खातिर दूसरी जगह आकर रहना पड़ा , उस घर की बात की जाए.....या अपने देश के घर की जहाँ रोज़ नित नए अनुभव बहुत कुछ सिखा रहे हैं....

अरब खाड़ी में रहने वाले लगभग सभी परिवारों के साथ एक बात कॉमन है.....बच्चों की स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही एक अभिवावक खासकर माँ को अपने देश आना पड़ता है .... कुछ बच्चे विदेश चले जाते हैं...कुछ बच्चे अपने देश के अलग अलग प्रदेशों में कॉलेज में दाखिला पा लेते हैं... जन्म से लेकर बाहरवीं तक की पढ़ाई के बाद कुछ बच्चे तो अपने देश में फौरन ही रच बस जाते हैं और कुछ बच्चों को वक्त लगता है...उन्हें परिस्थितियों से मुकाबला करने की कला सिखाने के लिए माँ को ही आगे आना पड़ता है। कुछ सालों की मेहनत के बाद बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं और बस निकल जाते हैं अपनी मंज़िल की ओर....

वरुण की पढाई खत्म होते ही वीज़ा भी खत्म..... स्टडी वीज़ा खत्म होने के कारण वरुण को दुबई छोड़ना पड़ा... वैसे भी इलाज के लिए अपने देश से बढ़िया का कोई जगह नहीं है... देश विदेश से लोग इलाज के लिए भारत आते हैं सो हमने भी दिल्ली का रुख किया..... छोटे बेटे ने कॉलेज में दाखिला अभी लिया ही था , न चाहते हुए भी उसे अकेले ही दुबई छोड़ना पड़ा .... खैर अब हम दिल्ली में है .... श्री तजेन्द्र शर्मा जी की कहानी 'पासपोर्ट के रंग' उनकी ज़ुबानी सुनते सुनते अपने बारे में सोच रहे थे कि 'शेर वाला नीला पासपोर्ट' होते हुए भी हम अरब देश से बाहर 6 महीने से अधिक नहीं रह सकते... छह महीने के अंतराल में एक बार खाड़ी देश में जाना लाज़िमी है... सफ़र ज़ारी है कभी यहाँ , कभी वहाँ ... लेकिन सर्दी का मौसम सफ़र में थकान होने ही नहीं देता...

पहली बार अक्टूबर में भारत का आनन्द ही अलग लगा... मीठी मीठी धूप में तीखी तीखी मूली खाने का खूब मज़ा ले रहे हैं..इसके अलावा क्या क्या गिनाए.... राजधानी दिल्ली में अलग अलग राज्यों के अलग अलग स्वादिष्ट पकवान सोचते ही बस आपके सामने..... ठंड के मौसम में खाने पीने का अलौकिक आनन्द अभी ले ही रहे थे कि अचानक आईने पर नज़र गई तो चौंक गए...पहले से ही अरब देश का खाना पीना ही नहीं हवा भी खूब लग रही थी .... इधर अपने देश के छ्प्पन भोग से जी था कि भरने का नाम ही नही ले रहा था लेकिन अभी और जीना है यह सोचकर अपने ऊपर पाबन्दी लगाने की बात कुछ इस तरह सोची.........


रे मन अब तू धीरज धर ले !


चिकन मटन को छोड़ के अब तो

घास फूस पर जी ले अब तू ...... रे मन .... !


चिकनी चुपड़ी भूल जा अब तो

रूखी सूखी ही खा ले अब तू .... रे मन .... !


चना-भटूरा, आलू-छोले से कर तौबा अब तो

धुली मूँग पर सबर बस करले अब तू .... रे मन .... !


भरवाँ-पराठाँ, आलू-गोभी मिले न अब तो

फुलका फुलकी में ही मन को लगाले अब तू ... रे मन .... !


मखनी-दाल, नवरतन कोरमा को विदा कर अब तो

अंकुरित दाल, सलाद को अपना ले अब तू ... रे मन ... !


स्थूल काया कम होगी कैसे यही फिकर है अब तो

कृशकाया कैसे फिर आए, यही सोच बस अब तू... रे मन ...!


फिकर फिगर का धीरे धीरे बढ़ता जाता अब तो

खोई हुई फिगर का सपना फिर से देखले अब तू... रे मन ... !


(पतंजलि योगपीठ का सफ़र अगले सफ़े में .........)


19 टिप्‍पणियां:

  1. वैसे परिवार की खातिर एक पत्नी और एक माँ जितना समर्पण और संघर्ष करती है उसकी मिसाल जितनी दी जाये वो कम है ....
    आपकी मन के ऊपर कविता बहुत अच्छी लगी मुझे

    अनिल कान्त
    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  2. मीनाक्षी जी
    आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई। आप हिंदी साहित्य के बारे में खासकर पत्रिकाओं े बारे में जानना चाहती हैं तो मेरे ब्लोग पर अवश्य पधारे। आपकों बहुत ही अच्दी पत्रिकाओं की समीक्षा पढ़ने को मिल जाएगी।
    अखिलेश शुक्ल
    संपादक कथा चक्र
    pl visit--
    http://katha-chakra.blogspot.com

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  3. वैसे आप २००९ की जगह २००८ कर ले

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  4. शुक्रिया अनिलजी,, सुधार कर लिया है..
    शुक्लजी, लिंक देने के लिए धन्यवाद... जल्दी ही पढ़कर प्रतिक्रिया दूँगी.

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  5. Lamhe Bahut Kambakht hote hai. Isliye Kam karate jaiye safarnaama bhul jayen........

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  6. वापसी का स्वागत है़

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  7. हम भी नवम्बर आखिरी से यहाँ आये हुए हैं, वापस जाने का मन ही नहीं मगर जाना तो होगा.

    जब वापस जायेंगे तब ही आईना देखेंगे और तब ही आपकी कविता के भाव समझने की कोशिश करेंगे-अभी तो हर पहली लाईन में जो आईटम छूट गये हैं, वो नोट कर लिए हैं. :)

    जैसे चने भटूरे की अच्छी याद दिलाई-आज ही साधते हैं एक प्लेट. :)

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  8. Bharat yatra ki baatein shuru to huee ..Minai jee ,,bahut achcha laga padh ker..aur kavita bhee sach, yehee
    ab maan ker chalna jaroori ho gaya hai.
    Bharat to Duniya bhar mei sub se alag
    aur sub se badhiya hai , aisa mujhe
    humesha lgta hai.
    So enjoy your trip.
    Dono Raj kumaron ko ashish va pyar :)

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  9. Are , Ye Sopan mere bete ke account se Angrezee mei tippani kee hai.

    Sneh,
    - Lavanya

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  10. रोचक श्रृंखला की शुरुआत...अपना देश अपना देश ही होता है...अगली कड़ी का इंतज़ार है...याने ओक्टूबर से फरवरी तक के समय के दौरान बहुत सी दिलचस्प बातें सुनने को मिलेंगी आपसे...वरुण उम्मीद है पहले से बेहतर होगा...पिछली बार आप के मुंबई आने के दौरान मिलना सम्भव नहीं हो सका उसका मलाल सदा रहेगा...
    खाने पीने पर अंकुश लगाने का समय आ गया है...आपकी कविता मैंने रट ली है...बहुत काम है...
    नीरज

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  11. अच्छा लगा आपको एक बार फ़िर से पढ़कर ।

    अरे आप आजकल दिल्ली मे है तो सूरज कुंड मेला क्यों नही देख आती है ।

    कविता तो लाजवाब लिखी है । :)

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  12. आपकी हिम्मत तो आपके व्यक्तित्व में साफ झलकती है.. अपना देश तो अपना देश होता है.. जल्द ही आप इन सारे चक्करो से निजात पाकर नियमित रूप से हमारे साथ रहे .. यही हमारी शुभकामना है..

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  13. महिलाओं को तो अपने परिवार,अपने बच्‍चों के लिए समय देना ही चाहिए.....अच्‍छा लगा आपको पढकर....खासकर आपकी कविता....उम्र बढने के साथ साथ स्‍वाद पर अंकुश लगाते हुए स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में भी सोंचना चाहिए....सही है।

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  14. हाय इसे कहते है जिगर का दर्द........सची सच्ची सब कह डाला आपने .....

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  15. aap ki post padh kar bhookh lag aayi so kitchen ka chakkar lagaa kar aati hun...:)
    aap ki himmat ki daad deni hogi...

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