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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2007

धरा गगन का मिलन असम्भव !

अम्बर की मीठी मुस्कान ने,
रोम रोम पुलकित कर दिया
उससे मिलने की चाह ने,
धरा को व्याकुल कर दिया .
मिलन असम्भव पीड़ा अति गहरी,
धरा गगन की नियति यही रहती
अंबर की आँखों से पीड़ा बरसती,
वसुधा अंबर के आँसू आँचल मे भरती

हरा आँचल लपेट सोई जब निशा के संग धरा
अम्बर निहारे रूप धरा का चन्दा के संग खड़ा

सूरज जैसा अम्बर का लाल हुआ रंग बड़ा
मिलन की तृष्णा बढ़ी , विरह का ताप चढ़ा

जब सूरज चंदा की दो बाँहें अम्बर ने पाईं
और प्यासी धरती को आगोश मे भरने आई

तब पीत वर्ण की चुनरी ओढ़े वसुधा शरमाई
यह सुन्दर छवि वसुधा की नीलाम्बर मन भाई.

9 टिप्‍पणियां:

  1. धरती और अम्बर मिलना चाहते हैं - यह बड़ी काव्यात्मक कल्पना है। शायद क्षितिज देख कर इसको आयाम मिलते हों।
    मुझे क्षितिज निहारना बहुत भाता है।

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  2. जब सूरज चंदा की दो बाँहें अम्बर ने पाईं
    और प्यासी धरती को आगोश मे भरने आई

    तब पीत वर्ण की चुनरी ओढ़े वसुधा शरमाई
    यह सुन्दर छवि वसुधा की नीलाम्बर मन भाई.

    ek sundar kalapna ...milan ki aas aur pyaar ki aatut intha ..bahut hi sundar lagi yah kavita !! badhaai

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  3. बहुत सुन्दर कविता है।पसंद आई…।

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  4. बहुत ही सुन्दर प्रकृति का चित्रण किया है, मजा आ गया. इस सुन्दर और कोमल रचना के लिये बधाई.

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  5. dii,bahut bahut sundar...aankho ke saamney chitr khinch gaya...really beautiful..thx

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  6. सुंदर कविता, क्षितिज पर इसका आभास ही सत्य सा लगतो है ।

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  7. इन पंक्तियों को पढ़कर ये कविता याद आयी-

    'नियति का चलन'



    हरी-हरी घास पर,
    ओस की रास पर,
    पड़ी है सूर्य की किरण,
    पृ थ्वी ने पहना है हीरे का आवरण।
    प्रकाशित है धरा,
    मस्ती में ज़रा।
    हवा का झौंका आता है,
    बार-बार छेड़ जाता है,
    आवरण जाता है थिरक,
    लजा के धरती रही हो पुलक।
    ताक रहा है गगन,
    मन ही मन है मगन।
    देखकर पवन के खेल,
    उमड़ रहे उसके भी वेग,
    लगता है झुक पड़ा,
    पृथ्वी को छूने चला,
    दृष्टि सुख थोड़ा पड़ा,
    स्पर्श करने चला।
    परन कभी छू पाएगा,
    पृथ्वी से मिल पाएगा।
    फिर भी लगेगा चिर मिलन,
    भ्रमित अहसास की है लगन,
    यही है नियति का चलन।

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