Translate

सोमवार, 24 मार्च 2008

अपने ममता भरे हाथों से ....!



















(सन्ध्या के समय समुन्दर के किनारे बैठे बेटे विद्युत ने तस्वीर खींच ली,  
और हमने अपनी कल्पना में एक शब्द चित्र बना लिया. )







ममता भरे हाथों से सूरज को
वसुधा ने नभ के माथे पर सजा दिया

सजा कर चमचमाती सुनहरी किरणों को
साँवला सलोना रूप और भी निखार दिया

सागर-लहरें स्तब्ध सी रूप निहारने लगीं
यह देख दिशाएँ मन्द मन्द मुस्काने लगीं

गगन के गालों पर लज्जा की लाली सी छाई
सागर की आँखों में जब अपने रूप की छवि पाई

स्नेहिल-सन्ध्या दूर खड़ी सिमटी सी, सकुचाई सी
सूरज की बिन्दिया पाने को थी वह अकुलाई सी

रंग-बिरंगे फूलों का पलना प्यार से पवन झुलाए
हौले-हौले वसुधा डोले और सोच सोच मुस्काए

धीरे-धीरे नई नवेली निशा दुल्हन सी आएगी
अपने आँचल में चाँद सितारे भी भर लाएगी.

शनिवार, 22 मार्च 2008

बरस बरस बाद आती है होली



(गूगल के सौजन्य से)




यहाँ बोर्ड की परीक्षा का रंग छाया हुआ है जिसमें संगीत का रंग घोल कर होली का आनन्द ले रहे हैं.



बरस बरस बाद , आती है होली ,
आज ना कड़वा बोलो
हमने मन के मैल को धोया
तुम भी क्रोध को धो लो !

मारो भर भर कर पिचकारी
होली का यही मतलब है
रंगे इक रंग दुनिया सारी
होली का यही मतलब है
मारो भर भर कर पिचकारी
मारो भर भर कर पिचकारी

आज के दिन यूँ घुल मिल जाओ
बैर रहे न कोई
नया पुराना , अगला पिछला
बैर रहे न कोई
बढ़े प्यार की, बढ़े प्यार की साझे दारी
होली का यही मतलब है
मारो भर भर कर पिचकारी

आँगन आँगन
आँगन आँगन धूम मचाती
आई है शुभ बेला
नस में, नस नस मे
नस नस में संगीत जगाए
यह रंगों का मेला
खिले जीवन की फुलवारी
होली का यही मतलब है
मारो भर भर कर पिचकारी

जो भी हम से भूल हुई हो
आज उसे बिसरा दो
पश्चाताप सज़ा है खुद ही
और न कोई सज़ा दो
बने दुश्मन
बने दुश्मन भी आभारी
होली का यही मतलब है
मारो भर भर कर पिचकारी

बुधवार, 19 मार्च 2008

शायद आखिरी साँसें हों या जी उठे... या पुर्नजन्म !!

कई दिनों से ब्लॉग़र डॉट कॉम बन्द है, प्रेम ही सत्य है जो अब आखिरी साँसें लेने लगा है. शायद जी उठे...या फिर खत्म हो जाए... हो सकता है पुर्नजन्म हो..कब क्या हो जाए कुछ पता नहीं .. लेकिन विश्वास पर दुनिया टिकी है....
पहले पारिवारिक उत्तरदायित्त्व , यात्राएँ.. अतिथि , फिर कभी ऐसा भी समय आता है जब कुछ कर न पाने की विवशता से मन छटपटाने लगता है....
चिट्ठाजगत , नारद और ब्लॉगवाणी सब खुलते हैं लेकिन मयखाने से सजे ब्लॉग़ अन्दर आने की इजाज़त नहीं देते (ब्लॉग खुलते ही नहीं)... हम भी किसी से कम नहीं...सीधे दरवाज़े से अन्दर आने की अनुमति नहीं तो पीछे के रास्ते से (प्रोक्सी लिंक) से अन्दर घुस जाते हैं. फ्री ऑवरज़ की पीकर चुपचाप खिसक आते हैं बिना टिप दिए... (प्रोक्सी करते हुए टिप्पणी देने का विधान नहीं)
सच में मान लिया कि ब्लॉगिंग का नशा सबसे खतरनाक....
आज तक हर नशे को ठोकर लगाते शान से जीते आए. किसी भी तरह के नशे को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया फिर यहाँ......! इस नशे को जीतना अब चुनौती सा बन गया है.... !
अभी अभी एक चमत्कार हो गया... जीमेल के ऑप्शन को क्लिक करने पर डैशबोर्ड खुल गया. जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है, लगे हाथों आ रहे पर्वों की बधाई ही दे दें. आज नहीं तो कल समस्या का समाधान भी मिल जाएगा.
आज ईरानियों की शब ए आखिर है मतलब पुराने साल का आखिरी दिन...कल नूरोज़ यानि नया साल ... साल ए नू मुबारक ... कल मोहम्मद साहब के जन्मदिन की छुट्टी भी है लेकिन कल ही 12वीं के बोर्ड की गणित की परीक्षा भी है.
फिर गुड फ्राइडे का दिन और उसी दिन होली का त्यौहार ...
दुबई में कुछ खास खास जगह पर होली खेली जाती है. बरसों बीत गए होली खेले सो अब फोन और मेल के ज़रिए ही सबको होली की मुबारक दे देते हैं.
सबको होली मुबारक .... रविवार के दिन ईस्टर है...
दुबई में सब त्यौहारों के बारे में पता चल जाता है उसके ठीक विपरीत रियाद में कभी कभी त्यौहार निकल जाने के बाद दोस्तों से पता चलता कि पर्व आया भी और गया भी.

बरसों से होली आए
रंग-बिरंगे सपने लाए.
सूखे रंगों से भीगे तन
प्रेम के रंग में डूबे मन.

पब्लिश बटन को दबाना है, ब्लॉग को व्यू तो कर नहीं सकते.
अब देखना यह है कि यह पोस्ट 'ठिलती' है या नहीं.

(समस्या का समाधान करने वाले दोस्तों को अग्रिम आभार)

शनिवार, 15 मार्च 2008

जल बिन मानव !



त्रिपदम चित्रों में --

जीवन जले
जल बिन मानव
कैसे जिएगा ?







बहता जल
जल से जीवन है
कीमत जानो

बुधवार, 12 मार्च 2008

त्रिपदम (हाइकु) चित्र में







सिहरी काँपीं
आगोश मे सकून
सूरज तापे



(दम्माम में 8-10 क्लिक करने के बाद ही मेरी मन-चाही मन-भावन तस्वीर उतर पाई)

मंगलवार, 11 मार्च 2008

फिर कीबोर्ड पर उंगलियाँ थिरकने लगीं !

आज दस बारह दिन बाद एक बार फिर कीबोर्ड पर उंगलियाँ थिरकने लगीं. कीबोर्ड के मधुर संगीत की स्वर लहरी कानों में ठंडक देने लगी. अलग अलग खुशबू लिए चिट्ठे आँखों के ज़रिए दिल और दिमाग में उतरने लगे. एक नशा सा छाने लगा.
कुछ दिन पहले गले में थोड़ा दर्द और फिर तेज़ बुखार .... हँसी हँसी में बीमार पड़ने की इच्छा की तो सचमुच बीमार पड़ गए. तेज़ बुखार और खाँसी ज़ुकाम की मार अभी एक रात ही भोगी थी कि कनाडा से आई पुरानी सखी ने हमें एक ही रात में खड़ा कर दिया. सोचा था कि 12-13 घंटे की हवाई यात्रा की थकान दूर करके अगले दिन ही मुलाकात होगी लेकिन पुरानी यादों के साथ सीधा ऐयरपोर्ट से हमें मिलने आ पहुँची. पुराने दोस्तों से मिलने की बात ही कुछ अलग होती है. शाल लपेट कर बुखार को छुपाते और निकल पड़ते हम घूमने.... चार पाँच दिन तो दुबई टैक्सी और बिग बस के टूर में निकल गए. पाँच दिन की दवा का कोर्स खत्म होते ही ड्राइविंग शुरु.... दिन में मस्ती और शाम होते होते घर पहुँचते तो बिस्तर पर गिर पड़ते......
इस दौरान हमने सहेली को घुमाते हुए फोटोग्रॉफी की और आराम के दौरान Rhonda Byrne की लिखी 'The Secret' पढ़ने में व्यस्त रहे. कुछ पंक्तियाँ जो मुझे अच्छी लगीं उन्हें जैसे का तैसा अंग्रेज़ी में ही लिख रही हूँ क्योंकि उसी भाषा में ही उसके अर्थ की महत्ता दिख पाएगी.
"You are like a human transmission tower, transmitting a frequency with your thoughts. If you want to change anything in your life, change the frequency by changing your thoughts."

"Your thoughts determine your frequency, and your feelings tell you immediately what
frequency you are on. When you feel bad, you are on the frequency of drawing more bad things. When you feel good, you are powerfully attracting more good things to you."

"Beliefs about aging are all in our minds, so release those thoughts from your consciousness. Focus on health and eternal youth."

"Praise and bless everything in the world, and you will dissolve negativity and discord and align yourself with the highest frequency – love."

कुछ तस्वीरें जो हमने अपनी दोस्त को दुबई घुमाते हुए अपने कैमरे में कैद कीं. दुबई का ही नहीं अरब देश के लोगों का मिलता जुलता यह रूप पुराना है लेकिन खास है... विकास के इस दौर में रेगिस्तान में बद्दू लोग आज भी इसी तरह से रहना पसन्द करते हैं और कुछ तो रह भी रहे हैं.


दुबई म्यूज़िम में बेडरूम में अरबी मज़लिस पर बैठी औरत....


घर के बाहर अक्सर लोग बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाते और सुलेमानी चाय पीते दिखाई देते हैं.

रेगिस्तान में टैंट के बाहर अलाव जलाकर हाथ से बने वाद्य यंत्र बजाते हुए अरबी लोकगीत गाते हैं और सुलेमानी चाय का मज़ा लेते हैं.




दूर रेगिस्तान में टैंट में बद्दू परिवार सभी सुविधाओं के साथ आज भी इसी तरह से रहना पसन्द करता है. आजकल भी 40-50 भेड़-बकरियाँ और ऊँट का मालिक रेगिस्तान में इसी तरह से रहता है.


रमादान के दिनों में ही नहीं बल्कि सर्दी हो या गर्मी हो, हर रोज़ कई किस्म की ताज़ी खजूर इस तरह से बिकती हैं.





शैल से मोती निकालने के औज़ार





गोताखोर अपनी नाव से रस्सी बाँध कर समुद्र में नीचे उतरता है और गोता लगा कर मोती लगे शैल गले में लगी टोकरी में इक्ट्ठे करता है.

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

पलकों में सजी यादें ... ! 2










अनायास ही पलकों में सजी यादें पिछली पोस्ट की ज़मीन पर उतरती चली गईं. पलकों पर सजी कुछ और भी यादें हैं, जो हौले हौले से फिर एक नई पोस्ट की ज़मीन पर उतरने लगीं. कुछ यादें जमी हैं जिन्हें खींच कर निकाला तो कोमल पलकें भी साथ ही उतर आएँगीं. कुछ यादें पलकों पर ही सजी रहती हैं तो कुछ यादें झर जाती हैं...!
साउदी अरब अपने आप में एक खास देश है जहाँ हमने अपनी गृहस्थी शुरु की और खट्टी मीठी यादों का दस्तावेज़ तैयार हुआ. विजय पूरी कोशिश करते कि हमें किसी तरह की कोई कमी महसूस न हो. लेकिन सुविधाओं से सम्पन्न घर होने पर भी धीरे धीरे लगने लगा जैसे मैं सोने के पिंजरे में फड़फड़ाती चिड़िया हूँ जिसके पंख जमते जा रहे हैं. खुले आकाश में उड़ने की लालसा बढ़ने लगी. खिड़की पर पड़े मोटे पर्दों से दम घुटने लगा. धूप के छोटे से टुकड़े को मन तरसने लगा.
विजय ऑफिस के लिए खुद तैयार होते और चुपचाप निकल जाते, बाद में हम माँ बेटे की नींद खुलती. विजय बोलते सुबह उठने की ज़रूरत नहीं लेकिन सोकर भी समय काटो तो कितना....! इत्मीनान से वरुण की देखभाल और घर का कामकाज निपटाते. वरुण के काम, घर की सफाई, खाना पकाना बस... ! बाहर जाने के लिए पति का इंतज़ार.
एक दोपहर विजय ने फोन करके तैयार रहने को कहा कि हमें धूप लगवाने के लिए ले जाने आ रहे हैं. सोचने पर मजबूर हो गए जैसे दाल, चावल या गर्म कपड़ों को धूप लगवाई जाती है वैसे ही हमें भी.... फिर भी घर की चारदीवारी से निकलना नियामत होता. कुछ देर खुले आकाश के नीचे , खुली हवा में साँस लेने का अलौकिक आनन्द,,,,, उस भावना का बखान कैसे करें, शब्द नहीं हैं... सूरज की चमचमाती किरणें बाँहों में भर लेतीं. हवा गालों को थपथपा कर निकल जाती.
घर वापिस लौटते तो वरुण खूब रोता, घर के अन्दर जाने का नाम नहीं. एक बार फिर नज़रबन्द हो जाते. अन्दर घर में कैद और बाहर काले बुरके में कैद कभी उस देश को कोसते तो कभी विजय को. विजय बार बार कहते, "लव इट ऑर लीव इट". सोचने पर मज़बूर हो जाते कि छोड़ना या तोड़ना आसान होता है मतलब विपरीत परिस्थितियों से भाग जाना. छोड़ सकते नहीं थे सो प्यार करना ही शुरु कर दिया. जिसे हम प्यार करना शुरु कर देते हैं तो कुछ भी बुरा नहीं लगता और धीरे धीरे हमें उस देश से प्यार होने लगा जहाँ हमारा परिवार पलता था.
इसी बीच परिवार में एक और नया सदस्य आ गया बेटे विद्युत के रूप में. पड़ोस में रहने वाले अकबर साहब की नई नवेली दुल्हन सलमा आ गई. हमें एक प्यारी सी दोस्त मिल गई. अकबर साहब हैदराबाद के और सलमा लखनऊ की. लखनऊ और हैदराबाद की नौंक झौंक में खूब मज़ा आता. हिन्दी पढ़ाने के लिए इंडियन एम्बैसी के स्कूल में एप्लाई किया तो फट से नौकरी मिल गई.
साउदी कानून समझने लगे. काले बुरके के साथ काला दुपट्टा पहनना कभी न भूलते. जानते थे कि अगर कभी मतुए ने पकड़ लिया तो सबसे पहले पति का इक़ामा(परिचय-पत्र) नम्बर नोट कर लिया जाएगा. तीन बार नम्बर नोट हुआ तो देश से बाहर. जहाँ फैमिली एलाउड होती वहीं जाते चाहे वह बाज़ार हो , रेस्तराँ हो या पार्क हो. कभी कभी कार में बैठे रहते और विजय वीडियो लाइब्रेरी से कैसेटस ले आते क्योंकि औरतें दुकान के अन्दर नहीं जा सकतीं.
कुछ बाज़ार हैं जो सिर्फ औरतों के लिए हैं. पति और ड्राइवर बाहर बैंचों पर ही बैठे रहते हैं. कुछ बाज़ार सुबह औरतों के लिए और शाम को फैमिलीज़ के लिए हैं. बैचुलर्ज़ के लिए शुक्रवार का दिन होता. भिनभिनाती मक्खियों से दूर दूर तक फैले हुए आदमी दिखाई देते. एक-दूसरे से मिलते. देश जाने वाले लोगों को पैसे और सौगात भेजते, आने वालों से चिट्ठी-पत्री और और घर से आई सौगात लेते. अपने अपने परिवारों का हाल-चाल पूछते. घर की नहीं, पूरे गाँव की खबर सुनते और बस इसी में ही सन्तोष पा जाते.

साउदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ नमाज़ के वक्त सारे काम बन्द हो जाते हैं.फज़र की नमाज़ तो सुबह सवेरे चार बजे के करीब होती. उसके बाद की चार नमाज़ों की अज़ान होते ही शटर डाउन. मतुओं की बड़ी बड़ी ज़ी एम सी गाड़ियाँ घूम घूम कर कामकाज बन्द कर के नमाज़ पढ़ने की हिदायत देती हुई दिखाई देतीं. एक और खास बात कि साउदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ स्टेडियम में हज़ारों पुरुष खेल देखने के लिए एक साथ बैठते. यह बात गिनिज़ बुक में भी दर्ज़ है.
अन्य धर्मों के पूजा स्थल नहीं और न ही मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल. वीकैण्ड्स पर कुछ दोस्त एक-दूसरे के यहाँ मिलते और बारबीक्यू करते. बस यही एक मनोरंजन का साधन होता. कभी कभी शहर से दूर इस्तराहा (एक विला जिसमें कुछ कमरे स्विमिंग पूल और खेलने का छोटा सा स्थान) बुक कराके 8-10 परिवार जन्मदिन और शादी की सालगिरह भी मना लेते.
जीवन नई नई कहानियों के साथ पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ता गया. वहाँ रिश्तेदारों को वीज़ा मिलना मुश्किल है सो दोस्त ही रिश्तेदारों की भी भूमिका निभाते हैं. एक दूसरे के दुख सुख में काम आते लेकिन वह भी पति के भरोसे, जो काम से लौट कर ही कहीँ मिलने मिलाने ले जा पाते. दिल को खुश रखने के लिए सोचा करते कि हम बेगम से कम नहीं. पति शौहर ही नहीं शौफ़र भी हैं जो चौबीस घंटे डयूटी बजाते हैं.

त्रिपदम (हाइकु)






दिल को छू ले
बात-बात का फ़र्क
बुद्धि उलझे


शुष्क नीरस
प्रेम-पुष्प विहीन
मानव मन


मृग-तृष्णा है
मन मरुस्थल सा
प्रेम न फ़ूटा


वसुधा सोचे
खिलने की चाह है
शांति मिलेगी


सुमन खिले
हरयाली उमगी
खुशबू फैली


मन प्रेमी का
आनन्द का सोता सा
रस भीगा सा

सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

पलकों में सजी यादें ... !







26 अक्टूबर 1986 की सुबह सबकी आँखें नम थीं. मम्मी, डैडी, छोटी बहन बेला और भाई चाँद से अलग होने का दुख पति मिलन की खुशी से कहीँ ज़्यादा था. उधर पाँच महीने का नन्हा सा वरुण समझ नहीं पा रहा था कि वह कहाँ जा रहा है. उड़ान का समय हो रहा था. भीगी आँखों से सबको विदा करके बेटे को गोद में लिए भारी कदमों से प्लेन में आ बैठी. एयर होस्टेस की प्यारी मुस्कान ने मेरे मन को थोड़ा शांत किया. सच है कि मुस्कान तपती धूप में शीतल छाया सी ठंडक देती है. प्लेन के टेक ऑफ करते समय बेटे के मुँह में दूध की बोतल लगाई और मुँह में पड़ी चिंयुगम को चबाने लगी. कुछ ही देर में बेटा सो गया और मैं अतीत की खट्टी मीठी यादों में खो गई.
मम्मी डैडी और छोटे दो भाई बहन अपने आप में मगन ज़िन्दगी जी रहे थे कि मेरी शादी ने वह एक साथ रहने का भ्रम तोड़ दिया. संयोग यह बना कि सात दिन में ही अजनबी पति ने अपना अंश मेरे साथ जोड़ दिया और साउदी अरब वापिस लौट गए. ससुराल अम्बाला में और सास-ससुर बुज़ुर्ग सो मुझे दिल्ली मम्मी के घर ही रहने की सलाह दी गई. खैर तेरह महीने और अठारह दिन के बाद पहली बार माँ का घर छोड़ने पर रुलाई फूट रही थी.
बेटे वरुण के रोने से यादों का ताना-बाना टूट गया. घड़ी देखी तो ढाई घंटे बीत चुके थे. शायद वरुण के दूध का समय हो गया था. एयर होस्टेस से दूध की बोतल गर्म करने को कहा और बेटे को बहलाने लगी. भूख के कारण उसका रोना तेज़ होता जा रहा था और मेरे हाथ-पैर फूल रहे थे. मम्मी के घर तो चार-चार लोग वरुण को सँभालते थे लेकिन अब पता नहीं अकेले कैसे सँभाल पाऊँगी. तरह तरह के सवाल मन में पैदा हो रहे थे. पतिदेव की घर-गृहस्थी में रुचि है कि नहीं, मेरे साथ कैसा व्यवहार होगा...यही सोच रही थी कि एयर होस्टेस ने दूध की बोतल लाकर दी. बोतल मुहँ से लगते ही बेटा खरगोश की तरह गोद में दुबक कर दूध पीने लगा.
अपने नन्हे-मुन्ने को निहारती जा रही थी और सोच रही थी कि माँ बनते ही औरत में कितना बदलाव आ जाता है. ममता अपने सारे बाँध तोड़ कर बहना चाहती है. अपना सब कुछ न्यौछावर कर देना चाहती है लेकिन प्रभु की लीला ऐसी कि नौ महीने जो अंश मेरे खून और माँस-मज्जा से बना उसका एक एक अंग अपने पिता की समानता लिए हुए था. सिर से पैर तक सब कुछ एक सा. अब देखना है कि पिता अपने नन्हे स्वरूप को देखकर क्या अनुभव करते हैं. पहली बार बेटे को गोद में लेकर कैसे अपनी ममता दिखाएँगे. सोच कर मुस्कुरा उठी.
कुछ ही देर में बैल्ट बाँधने की बत्ती जल गई. लैंड करने का समय आ गया था. मैंने सोते वरुण को थोड़ा हिला डुला कर फिर से दूध की बोतल उसके मुहँ से लगाई और खुद चियुंगम चबाने लगी. हवाई जहाज के उतरने और चढ़ते समय मुँह चलाते रहने से कानों में हवा का दबाव कम महसूस होता है और दर्द भी नहीं होता. लैंडिंग बहुत आराम से हुई.








धड़कते दिल से एयरपोर्ट की ओर कदम बढ़ाने लगी. एयरपोर्ट की सुन्दरता देखकर मेरी आँखें फैली जा रही थी. चमकते फर्श पर फिसलने के डर से पैर सँभल कर रख रही थी. शीशे जैसी चमक ...चारों ओर जगमग वातावरण. सुन्दर एयरपोर्ट रेगिस्तान में रंगमहल सा लग रहा था. नए देश की अजनबी संस्कृति से एक अंजाना सा भय. भाषा की समस्या सबसे विकट. सभी सरकारी काम अरबी भाषा में होने के कारण टूटी फूटी अंग्रेज़ी भाषा में ही काम चलाने की कोशिश की.
इमीग्रेशन काउण्टर पर बैठे साउदी ने पासपोर्ट रखकर इक़ामा इक़ामा कह कर इशारे से बाहर जाकर लाने को कहा. पहली बार आने पर पति का इक़ामा(परिचय-पत्र) दिखाकर ही बाहर जाने की इजाज़त मिलती है. पति विजय को ढूँढने में ज़्यादा देर नहीं लगी. बेटे को गोद में लेने को बेताब विजय ने फौरन अपना इक़ामा दिया और बेटे को लपक कर गोद में ले लिया. दुबारा अन्दर जाकर इक़ामा दिखाकर अपना पासपोर्ट लिया और सामान ट्रॉली में लेकर बाहर आई तो देखा कि पतिदेव बेटे को देख देख कर उसे बार बार गले से लगाकर चूम रहे हैं. बेटा भी टुकुर टुकुर पापा को देख रहा है. मैं नई नवेली दुल्हन माँ के रूप में खड़ी पिता-पुत्र के मिलन को देख कर मुस्कुरा रही थी.
कुछ ही देर में हम बाहर थे. दूर दूर तक फैले रेगिस्तान के बीच काली सी रेखा जैसी सड़क पर कार 120 की गति से दौड़ने लगी. विजय बीच बीच में मुझे और बेटे वरुण को देख कर मुस्कुरा रहे थे. मैं रेगिस्तान में हरयाली देखकर हैरान हो रही थी. रेगिस्तान पीछे छूटा तो ऊँची ऊँची अट्टालिकाएँ सी दिखने लगी.
एक शॉपिंग मॉल के सामने कार खड़ी करके एक बुरका खरीदा गया जिसे पहनना ज़रूरी था. वहाँ का कानून है कि घर से बाहर बुरका पहन कर ही निकला जा सकता है. बाज़ार से खाने पीने का सामान खरीदना था सो हमने फौरन बुरका ओढ़ लिया. पहनते ही सासू माँ की याद आ गई जो काला कपड़ा पहनने के सख्त खिलाफ थी. खानदान में कोई काला कपड़ा नहीं पहन सकता था लेकिन यहाँ के कानून के मुताबिक देशी- विदेशी, काले- गोरे सभी को बुरका पहनने का आदेश था.
नाश्ते का सामान खरीद कर हम जल्दी ही घर की ओर रवाना हुए. कार एक बड़ी सी इमारत के आगे रुकी. लगभग 10 फ्लैट वाली इमारत में ग्राउण्ड फ्लोर पर हमारा घर था. दरवाज़ा खोल कर विजय रुके और मुझे पहले अन्दर जाने को कहा. उनका ऐसा करना मन को भा गया. लाल रंग के मोटे कालीन पर कदम रखते अन्दर दाखिल हुई तो पीछे पीछे विजय भी अन्दर आ गए. छोटी सी गैलरी से दाखिल होते हुए देखा एक तरफ रसोईघर , दूसरी तरफ बाथरूम और तीसरे कोने में एक दरवाज़ा बेडरूम में खुलता था. अन्दर पहुँचे तो देखा एक बड़ी सी खिड़की पर मोटे मोटे पर्दे थे, जिन्हे हटाने की सख्त मनाही थी क्यों कि घर ग्राउण्ड फ्लोर पर था.
छोटे से घर में भी हम खुश थे क्योंकि लम्बे इंतज़ार के बाद यह दिन देखने को मिला था. उधर विजय अपने सोए प्रतिरूप को देखकर अलौकिक आनन्द पा रहे थे. बस इसी तरह हमारा गृहस्थ जीवन शुरु हुआ.

नए त्रिपदम 'हाइकु' - मन-प्रकृति



मैं मैं नहीं हूँ
जो हूँ वैसी नहीं हूँ
भ्रमित मन


छलिया है जो
पाखंड करता क्यों
नादान मन

प्रशंसा पाए
अहम ही ब्रह्रास्मि
तृप्त हो जाए


मोह पाश है
विश्व मकड़ी जाल
नहीं उलझो


सत्य का खोजी
प्रकाश स्वयं बन
तू ही आनन्दी

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

test post




तस्वीरों में सफर की कहानी





साउदी अरब में कुछ बड़े बड़े कम्पाउंड छोड़कर अधिकतर घर कुछ इस तरह माचिस की डिब्बी से होते हैं. जिसका कुछ हिस्सा खोलकर धूप और ताज़ी हवा का थोड़ा मज़ा लेने की कोशिश की जाती है.


धूप का एक भी टुकड़ा घर के अन्दर आ जाए तो समझिए कि हम बहुत भाग्यशाली हुए अन्यथा पति की दया पर निर्भर कि किसी दोपहर को धूप लगवाने परिवार को बाहर ले जाएँ.
हमने अपने घर के एक कमरे में जैसे ही सूरज के सुनहरे आँचल को फैलते देखा.... हाथ जोड़कर सर झुका दिया......






नाश्ते में चटकदार रंग के ताज़े फल खाने से पहले तस्वीर लेना न भूलते. हर बार अलग अलग ऐंगल से तस्वीर खींच कर फिर ही खाते.
उसके बाद घर के कोने कोने से यादों की बेरंग धूल को ढूँढ ढूँढ कर साफ करते.
बन्द घर में भी ऐसी महीन धूल कहीं न कहीं से दनदनाती हुई आ ही जाती है... सुबह भगाओ तो दोपहर को फिर आ धमकती है...दोपहर अलसाई सी धूल शाम तक फिर कोने कोने पर चढ़ जाती है.... लकड़ी का कुत्ता जो अम्बाला शहर से कुछ दूर एक गाँव नग्गल की कोयले की एक टाल से लाया गया है, जिसके पैरों तले धूल बिछी पड़ी है...

जिस तरह रेतीली हवाएँ कभी आहिस्ता से आकर सहला जाती हैं तो कभी तेज़ी से आकर झझकोर जाती हैं , उसी तरह हरा भरा पेड़ जब ठूँठ हो जाता है तो दिल को झझकोर डालता है... लगता जैसे पेड़ का अस्थि पंजर अपनी बाँहें फैला कर शरण माँग रहा हो....






जड़ में भी चेतन का अनुभव होता है....
चित्त को चंचल करती इस जड़ को ही देखिए...
आपको क्या दिखता है.....


बस इसी तरह घर भर में डोलते सुबह से शाम
हो जाती. दोनों बेटे तो अपने कमरे में अपनी अपनी पढ़ाई में मस्त रहते. हम कभी मोबाइल पर उर्दू रेडियो का स्टेशन पकड़ने की कोशिश करते तो कभी अंग्रेज़ी और अरबी गाने सुनकर मन बहलाते. किताबें तो आत्मा में उतरने वाला अमृत रस जो जितना पीते उतना ही प्यास और बढ़ती...
एक हाथ में 'दा सीक्रेट' तो दूसरे हाथ में 'वुमेन इन लव' ..... एक रोचक तो दूसरी नीरस....लेकिन पढ़ना दोनो को है सो पढ़ रहे हैं. जल्द ही उस विषय पर कुछ न कुछ ज़रूर लिखेंगे.
सुबह से जलती मोमबत्ती आधी हो चुकी थी ...... लौ का रंग भी गहरा हो गया था .... नई मोमबत्ती की तलाश शुरु हुई ... !
हमें ही नहीं बेटों को भी अपनी अपनी मेज़ पर जलती मोमबत्ती रखना अच्छा लगता है. मन में कई बार सवाल उठता है कि तरह तरह की मोम बत्तियाँ जलाने के पीछे क्या कारण हो सकता है... !!

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

लौट आए हैं फिर से ...

लौट आए हैं फिर से पुरानी दिनचर्या में.... पिछले कुछ दिनों से सफ़र और अतिथि सत्कार में व्यस्त थे. दो दिन पहले दम्माम से लौटे तो अपनी कुर्सी पर आ बैठे और बस लगे पढ़ने ब्लॉग पर ब्लॉग जैसे एक जाम के बाद एक दूसरा..तीसरा...चौथा....अनगिनत...कोई रोकने-टोकने वाला नहीं....... लिखने की सुध ही नहीं रही...

लेकिन लगा कि ....

कोई सागर दिल को बहलाता नहीं....



फिर थोड़ा रुके... शब्दों का सफर में एक कविता पढ़ी, पारुल के ब्लॉग पर अपनी मन-पसन्द गज़ल सुनी तो मन में इक लहर सी उठी. और हलचल सी हुई....होश आया कि बहुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं है लेकिन शुक्र है कि किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया....

उनको ये शिकायत है कि हम..... (यह गीत कुछ प्यारी यादों के साथ जुड़ा है)

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008

कुछ पल मेरे अपने


मुम्बई से लौटे अभी दो दिन न बीते थे कि ईरान से अतिथि आ पधारे। भारतीय संस्कृति के अनुसार अतिथि को देव मान कर सत्कार में जुट गए। सुबह-सवेरे बेटों को स्कूल कॉलेज विदा करके मित्र को लेकर निकलते दुबई की प्रोपटी दिखाने, दोपहर घर आकर अपने हाथों से भारतीय व्यंजन पकाकर खाते-खिलाते , आराम करते शाम हो जाती , फिर निकलते शॉपिंग के लिए। आठ दिन इसी भागमभाग में बीते फिर आठ फरवरी को मित्र को ईरान के लिए रवाना किया और शाम की फ्लाइट से हम बच्चों के साथ साउदी अरब वीज़ा इकामा के काम से निकले।
इस दौरान एक दिन भी ब्लॉग जगत को नहीं भूले। यहाँ पतिदेव के पास एक ही लैपटॉप है जो शाम सात बजे के बाद ही मिलता है। सबसे पहले दोनों बेटों का नम्बर आता । जब तक अपनी बारी आती मन असमंजस में पड़ जाता । कुछ ही पलों में दुविधा दूर हो जाती , मन सोचता कि पूरे परिवार के साथ मिल-जुल कर रहने का आनन्द लिया जाए ।
यहाँ घर में टी०वी० है लेकिन कनैक्शन नहीं है सो मोबाइल को टी०वी० से जोड़कर रेडियो सुनते हैं। सोनी का एक बहुत पुराना डिजिटल कैमरा है जिससे घर की चारदीवारी के अन्दर की तस्वीरें खींचते रहते हैं। धूप के टुकड़े जब कमरों में आते हैं तो उनमें अपनी छाया की अलग अलग छवियाँ देखकर मन बहलाते हैं और कैमरे में कैद कर लेते हैं। रसोई में खाना पकाते पकाते खाने-पीने का अक्स उतार लेते हैं। खाना खत्म करते ही किताबों का स्वाद न चखा जाए तो खाना कैसे पचे सो किताबों के रस में डूब जाते हैं। फिलहाल आजकल यही दिनचर्या है ।

मंगलवार, 29 जनवरी 2008

मौन अभिव्यक्ति !

मौन हुई मैं
स्नेह करे निशब्द
भाव गहरे

शब्द न पाऊँ
मौन की भाषा पढ़ो
आभारी हूँ मैं

सपनों की नगरी मुम्बई में छह दिन 2 (कुछ बोलती तस्वीरें)

मुम्बई में चलती कार से , होटल की या अस्पताल की खिड़की से ली गई तस्वीरों में से कुछ तस्वीरें त्रिपदम कहें ---














गौर से देखो

अक्स में दिल मेरा

देश में छोड़ा











इतने एसी
कितना प्रदूषण
दिल धड़का
























राह चलते
किताबें खरीदीं थी
सस्ती दो तीन














ध्यान में लीन
कबूतर सोच में
मन मोहता





















गहरा कुँआ
जल-जीवन भरा
मन भी वैसा














प्यारे बालक
देश-प्रेम दर्शाएँ
रिपब्लिक डे










रस्ता देखूँ मैं
कोई मीत मिलेगा
आशा थी बस






देखे किसको
कागा पीठ दिखाए
गीत सुनाए












मीत को पाया
वट-वृक्ष का साया
मन भरमाया

सोमवार, 28 जनवरी 2008

सपनों की नगरी मुम्बई में छह दिन !

छह दिन के बाद लौटे हैं ...! सब को मेरा प्रणाम ...!
सपनों की नगरी मुम्बई से माया नगरी दुबई में पहुँचते पहुँचते आधी रात हो गई थी इसलिए चाह कर भी आभासी दुनिया में न जा सकी. सुबह बच्चों को नाश्ता देकर सबसे पहले हम अपनी उसी दुनिया में पहुँचे जहाँ हम छह दिन से जा न सके थे.
सबसे पहले तो अनिता दी को प्रणाम, जिनकी स्नेहमयी ऊर्जा ने हमें नतमस्तक कर दिया. उनके लिए 'कुछ हम कहें' लेकिन शब्द ही नहीं मिल रहे. अभी अभी अनिता दी की पोस्ट पढ़ी, फिर से याद आ गई दो मुलाकातें जिन्हें हमने दिल में सहेज कर रख लिया है. हमने ही नहीं वरुण ने भी.
सपनों की नगरी मुम्बई से माया नगरी दुबई में लौटते हुए जैसे पीछे कुछ छूट रहा था. एयरपोर्ट जाने का समय हो रहा था लेकिन हम माँ बेटा दोनों ही होटल की खिड़की के पास खड़े होकर मुम्बई के सुनहरी से सुरमई होते आकाश को देख रहे थे. ठंडी हवा में पीपल के पेड़ की झूमती शाखाएँ पहले ही बॉय बॉय करने लगीं.
छह दिन छू मंतर करते उड़ गए थे. छोड़ गए मीठी यादों के निशान.
अभी जैसे कल ही एयरपोर्ट उतरे थे. प्री पेड टैक्सी से होटल वैस्ट एंड पहुँचते पहुँचते जैसे पूरा मुम्बई देख लिया. एयरपोर्ट से मरीन लाइंस तक जाते हुए 25-30 कि.मी. तक फ़ासला तय करना था. दर्द और थकावट ने बेटे वरुण को पस्त कर दिया था. बीच-बीच में हम बाहर देखते तो लगता कि शायद कोई जाना पहचाना आभासी दुनिया का कोई मित्र दिख जाए. वरुण हम पर हँस रहा था पर हमे बुरा नहीं लग रहा था. हमें सबको याद करके अच्छा लग रहा था, दूसरा दर्द से उसका ध्यान बँट रहा था.
होटल पहुँचते ही वहाँ के कर्मचारियों ने जिस मुस्कान से स्वागत किया, लगा ही नहीं कि हम मुम्बई पहली बार आ रहे हैं. फ्रेश होकर खाना खाने के बाद वरुण आराम करने लगा और हमने सोचा कि अनिता दी और आशीष को फोन किया जाए. दोनों के फोन आने की एक रात पहले चैट में मिल चुके थे सो उनसे बात करके मन खुश हो गया.
गूगल अर्थ में स्टडी करके यह तो पहले ही जान चुके थे कि लोग दूर दूर रहते हैं और आने जाने की दिक्कत होती है तो किसी से मिल पाने की आशा तो थी नहीं. जब अनिता दी और आशीष ने मिलने की बात की तो खुशी का ठिकाना न रहा.
सुबह उठते ही हम डॉक्टर से मिलने गए. होटल से जल्दी ही हमें अस्पताल में दाखिल होने को कहा गया. उसी दोपहर को बोरिया बिस्तर बाँध कर होटल से हॉस्पिटल आ गए. डॉक्टर से लेकर कमरे की सफाई करने वाले सभी के चेहरों पर मुस्कान देखकर हम प्रभावित हो रहे थे. आधा दुख तो उसी मुस्कान से दूर हो गया. वैसे भी अगर दूसरे के दुख-दर्द देखो तो लगता है कि अपना आधा दुख भी न के बराबर है. वरुण की सर्जरी होते होते टल गई. फ़िज़ियोथेरैपी शुरु हुई और नई दवाएँ लेने को कहा गया.
अनिता दी से पहली मुलाकात अस्पताल में हुई .लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. 25 जनवरी को फिर मिलने का वादा किया तो हम चहक उठे. कॉलेज के काम के कारण 25 की बजाय
26 जनवरी मिलना तय हुआ. तब तक हम अस्पताल से डिस्चार्ज़ होकर एयरपोर्ट के नज़दीक अन्धेरी ईस्ट के एक होटल में आकर ठहरे थे. पता चला कि आशीष भी आ रहे हैं. बातों बातों में अनिता दी ने जान लिया था कि वरुण को मटन बिरयानी पसन्द है. फिर क्या था बस 26 जनवरी हमने अनिता दी की बनाई मटन बिरयानी और गोभी के पराँठों के साथ मनाई.



आशीष भी समय पर पहुँच गए थे. वरुण और उसके बचपन दो मित्रों के साथ आशीष भी उन्हीं में से एक लग रहे थे. आशीष कम बोलते हैं लेकिन जो बोलते हैं पते की बात होती है. इतनी छोटी उम्र में बहुत कम युवा ऐसे होते हैं जो सोच समझ कर नपी तुली बात करें.
26 जनवरी की शाम न चाहते हुए भी दोनों से फिर मिलने का वादा करके विदा ली क्योंकि दोनो को ही अपने अपने घर दूर जाना था.
अनिता दी का सरल स्वभाव और मुक्त हास उनके व्यक्तित्व को चार चाँद लगा देता है. कविता के रूप में कुछ कहने को जी चाहता है.

उसके उज्ज्वल मुख पर इक आभा है
और दीप्तीमान नेत्रों में इक आशा है !
उसे देख मन की कलियाँ खिलतीं
कभी किसी को काँटे सी न चुभती !
जगती के प्रति स्नेह और करुणा है
ह्रदय में आनन्द की अमृत रसधारा है !
उसके उज्ज्वल मुख पर इक आभा है
और दीप्तीमान नेत्रों में इक आशा है !
लेकिन अभी कुछ और भी .......
क्रमश:

सोमवार, 21 जनवरी 2008

प्रथम मिलन को भूल न पाऊँ





आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

सूखे कगार सी पतली दो रेखाएँ
बेचैन भुजाएँ बनकर आलिंगन करना चाहें !!

सूखे अधरों का कंपन बढ़ता ही जाए
फिर भी प्यास प्रेम की बुझ न पाए !!

आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

प्रथम मिलन को भूल न पाऊँ
मोहपाश में फिर-फिर बँधती जाऊँ !!

प्यासे अधरों की, चंचल नैनों की
भाषा प्रेम की फिर से पढ़ना चाहूँ !!

आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

शनिवार, 19 जनवरी 2008

जब भी हमें शायर पुकारा जाता !

कभी कभी पुरानी यादें दौड़ती चली आती हैं और गले लग जाती हैं जिनसे मिलकर हम मस्ती में डूब कर उनके संग खेलने लगते हैं. हिन्दी के बुज़ुर्ग अध्यापक सिद्दिकी साहब जो अब रिटायर होकर भारत लौट चुके हैं कभी अपने हिन्दी ज्ञान से और कभी शायरी से मालामाल कर देते. उनकी शायरी को पचाने का मादा किसी किसी में ही होता. उनके चाहने वालों में अव्वल नम्बर पर आते थे हमारे प्रिंसिपल साहब जो स्कूल के लगभग हर जश्न का आग़ाज़ उनकी शायरी से करवाते. प्रिंसिपल साहब से अपनी तारीफ़ सुनकर उनके चेहरे की रौनक देखने वाली होती थी. उन्हीं दिनों की एक रचना आज अचानक याद आ गई.

जब भी हमें शायर कहकर पुकारा जाता
दिल हमारा बाग़-बाग़ हो जाया करता !

तन से पहले मन मंच पर पहुँच जाया करता
शायरी करने को जी मचल मचल जाया करता !

लेकिन ------------

नाम हमारा सुनते ही श्रोताओं पर गिरते कई बम
उनका रुख देखते ही हमारा भी निकल जाता दम !

हिम्मत कर फिर भी बढ़ाते कदम
सीधा पहुँचते मंच पर हम !
एक ही साँस में पढ़ जाते लाइनें दस
फिर लेते थोड़ा हम दम !

कुछ श्रोताओं का होता सब्र कम
शोर कुछ श्रोताओं का जाता बढ़ !

कुछ श्रोताओं की बेरुखी सहते हम
कुछ श्रोताओं की मुस्कान भी पाते हम !

फिर भी मैदान में डटे सिपाही से हम
पीछे न हटते, हार न मानते हम !

सब्र से बैठे हुए लोगों पर
अपनी शायरी का सिक्का जमाते हम

शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

त्रिपदम (हाइकु)






क्यों मैं ही मैं हूँ
गर्व किस बात का
नासमझी क्यों

अहम त्यागो
अमर तुम नहीं
मृत्यु निश्चित

घना अंधेरा
छाया का साया नहीं
अविश्वास है

मृत्यु मित्र सी
चुपके से आती है
गले लगाती

यायावरी है
आना-जाना लोगों का
थके न कोई

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

मेरे त्रिपदम (हाइकु)




कॉफी का प्याला
कागज़ कलम है
शब्दों की झाग

प्राण फूँकते
जादू से भरे हाथ
संजीवनी से

सलोना नभ
सुरमई मेघ हैं
साँवली घटा

तूफानी रात
तड़ित दामिनी सी
भयभीत मैं

छाया रहस्य
धूल से आच्छादित
मौन हैं बुत

साकी सोया सा
स्वेद सुरा को चख
सन्तुष्ट हुआ

मंगलवार, 15 जनवरी 2008

फुर्सत के पल यादों के मोती बने !! 2



सुबह सवेरे सूरज की किरणें नीचे उतरीं और हम भी ट्रेन से नीचे उतरे. जम्मू पहुँच चुके थे , पता चला कि श्री नगर की बस कुछ ही देर में श्रीनगर के लिए निकलने वाली है. हमने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया और बस में चढ़ गए. मैं फट से खिड़की वाली सीट पर आकर बैठ गई.
हरी भरी वादियों में बलखाती काली चोटी सी सड़क पर बस दौड़ रही थी. बहुत दूर के पहाड़ों पर कहीं कहीं थोड़ी बहुत बर्फ थी जिसे कभी कभी बादल आकर ढक देते थे. नीचे नज़र जाए तो गहरी खाइयों में पतली रेखा सी नदी बस के साथ साथ ही भाग रही थी. प्रकृति के सुन्दर नज़ारों को मन में बसाते हुए पता ही नहीं चला कि कब बस श्रीनगर के लाल चौक पर आकर रुक गई. जीजाजी पहले ही बस स्टेशन पर खड़े हमारा इंतज़ार कर रहे थे. मित्र को धन्यवाद देकर हम घर की ओर रवाना हुए.
अभी सूरज पहाड़ों के ऊपर था और कुछ ही देर बाद नीचे भी उतर गया. शाम का गहराता साँवला रंग और गहरा होता गया. उस साँवले रंग में अनोखी सी खुशबू जो मस्ती में डुबो रही थी. उसी मस्ती में मैंने घर तक ताँगे पर जाने की इच्छा जताई तो फट से सुन्दर सी घोड़ा गाड़ी सामने आ खड़ी हुई. ताँगे पर बैठ कर घर तक जाने का भी एक अलग मज़ा था. आधे से कुछ ज़्यादा बड़ा चाँद साथ साथ चल रहा था लेकिन तारे ऐसे दिख रहे थे जैसे अपनी अपनी जगह खड़े टिमटिमा कर बस टुकुर टुकुर देख रहे हों. मैं आकाश में इतने सारे तारों को देखकर हैरान थी क्योंकि दिल्ली में इतने तारे तो कभी दिखाई नहीं देते.
बीस मिनट में घर पहुँच गए थे. दीदी और नन्हा सा पारस जिसे हम प्यार से सोनू कहते हैं, गेट पर खड़े थे. गेट तक पहुँचते कि एक तेज़ खुशबू का झोंका साँसों के साथ अन्दर उतर गया. देखती क्या हूँ कि गेट के आसपास लाल लाल गुलाब के फूल खिले हैं. मैंने लपक कर सोनू को गोद में ले लिया, दीदी हैरान थी कि बिना रोए मेरी गोद में नन्हा सा खरगोश मुझे देखे जा रहा है.

अगली सुबह का सूरज सोनू की प्यारी मुस्कान के साथ चमका. उसके बाद तो कश्मीर की सैर शुरु हुई तो कभी न खत्म होने वाली यादों का सिलसिला बन गई. डल लेक में शिकारे की सैर , नगीन लेक और वुलर लेक ऐसी हैं जैसे झीलों की सड़कें बनीं हों और शीशे से साफ जिसमे छोटे छोटे पत्तों का स्पष्ट प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है. चश्माशाही का स्वास्थ्यवर्धक शीतल जल, निशात बाग, शालीमार गार्डन के रंग-बिरंगे खुशबूदार फूल, सोनमर्ग, खिलनमर्ग के हरे भरे मैदान .... शंकराचार्य मन्दिर से पूरे श्रीनगर के रूप को निहारना. इन सब की सुन्दरता पर तो महाग्रंथ लिखा जा सकता है.

खूबसूरत वादियों के जादू ने मुझे स्वप्नलोक पहुँचा दिया. सपनों का सुन्दर लोक दिल और दिमाग पर ऐसी छाप छोड़ चुका था जिसे भुला पाना आसान नहीं था.

आज एक विशेष भाव जो मन में आ रहा है कि उस वक्त अगर मम्मी डैडी ने मुझे अकेले कश्मीर आने की इजाज़त न दो होती तो क्या मेरे लिए ऐसी खूबसूरत यादों को सहेज पाना संभव हो पाता ! !


फुर्सत के पल यादों के मोती बने !!



आजकल बड़े बेटे वरुण की छुट्टियाँ हैं और छोटा बेटा अपनी पढ़ाई में व्यस्त है इसलिए मेरे पास समय ही समय है. व्यस्तता के बाद जब ऐसे पल हाथ लगते हैं तो मैं उन्हें दोनों हाथों में भर लेती हूँ. फुर्सत के पल यादों के मोती बन जाते हैं. उन बिखरे मोतियों को अपने दिल में सजा लेती हूँ. उनकी खूबसूरती से आँखों में चमक जो आती है उसे मैं छिपा नहीं पाती. इस वक्त भी ऐसा ही कुछ हो रहा है और मैं अतीत के सुनहरे बादलों में यादों के पंख लगा कर आवारा सी उड़ रही हूँ. कल मैं आवारा बंजारन थी जिसे आज यादों के पंख लग गए हैं.
उस दिन भी ऐसा ही कुछ अनुभव हो रहा था. चंचल मस्त हवा सी इधर से उधर भागती तैयारी में जुटी थी क्योंकि रात ही मुझे श्रीनगर के लिए रवाना होना था. कैसे दिन थे जब डर शब्द या उसके अर्थ से पहचान ही नहीं हुई थी. वादे के मुताबिक डैडी ने मुझे कश्मीर भेजने का सारा बन्दोबस्त कर लिया था. एक पल के लिए दिल धड़का था कि शायद दादी माँ कुछ कहेगीं लेकिन उन्होंने भी कोई रोक टोक नहीं की. अब सोचती हूँ तो अच्छा लगता है कि लड़की के रूप में जन्म लेने के बाद भी मुझे किशोर अवस्था तक आते आते टुकड़ों में आज़ादी न देकर पूरी आज़ादी दे दी गई ताकि मन में आत्मविश्वास पैदा हो सके.
15 साल की अल्हड़, शोख उम्र का नशा और कश्मीर की सुन्दर वादियों में घूमने का चाव. रेलवे स्टेशन पहुँच कर जम्मू तवी जाने वाले ट्रेन ढूँढी गई. एक कम्पार्टमैंट के बाहर लगी लिस्ट में अपना नाम देखकर राहत मिली और उछल कर चढ़ गई. अपने नम्बर की सीट भी दिख गई. सूटकेस सीट के नीचे रखा और खिड़की के पास जाकर बैठ गई. डैडी ने कहा कि नौ बजे के बाद यही तुम्हारी स्लीपिंग बर्थ होगी. उस वक्त किसी को बैठने नहीं देना और सो जाना. यह भी बता दिया कि दीदी जीजाजी के एक मित्र दो कम्पार्टमैंट छोड़कर बैठे हैं. बीच बीच में आकर खबर लेते रहेंगे. दिल और दिमाग तो कश्मीर में पहले ही पहुँच गया था तो क्या सुनती, बस एक मुस्कान के साथ सिर हिलाती रही. ट्रेन चलने का समय हुआ तो डैडी सिर पर हाथ फेरते हुए हैप्पी जर्नी कहते हुए नीचे उतर गए.
दो बोगी छोड़ कर जीजाजी के जो मित्र बैठे थे, उन्हें मैंने पहले कभी देखा भी नहीं था. रात के दस बजे अपने बैग से खाना निकालने के लिए बैग में हाथ डाला. अरे यह क्या...खाने का डिब्बा गायब. फट से अपना मनीबैग टटोला तो सन्न रह गए. डैडी से पैसे लेना भी भूल गई थी. मम्मी ने कहा भी था कि याद से पैसे ले लेना. चेहरा सफेद और दिल की धड़कनें तेज़.
सामने वाली सीट पर बैठी आंटी जी शायद कुछ भाँप गई थी. उन्होंने पूछा, 'अकेली हो?' 'नहीं, अंकल भी साथ हैं लेकिन उन्हें दो कम्पार्टमैंट छोड़कर सीट मिली है. जवाब देकर मैं साथ लाई एक किताब पढ़ने लग गई. किताब के पहले पन्ने पर ही दीदी का पता और फोन लिख लिया था, जिसे पढ़कर चैन की साँस ली. किताब के कोने से नज़र चुराकर देखा आँटी जी के चेहरे पर हैरानी के भाव थे. हैरानी के भाव धीरे धीरे नरम हुए तो चेहरे पर ममता भरी मुस्कान आ गई. अपने बच्चों को आलू पूरी देते समय मुझे भी खाने की मिन्नत की. मैंने सकुचाते हुए एक निवाला तोड़कर उनका मान रख लिया.
जीजाजी के मित्र ने दो बजे रात को खिड़की खटखटाते हुए पुकारा, 'मधु , ठीक हो? कुछ खाना है?' मधु मेरा बचपन का नाम है जो अभी तक जन्मपत्री में है. पाँचवीं तक के प्रमाणपत्र में भी लिखा हुआ है. छठी कक्षा में जाने पर पाँचवीं की क्लास टीचर ने मुझे मीनाक्षी नाम आशीर्वाद के रूप में दिया था . ननिहाल में अभी भी सब मधु ही पुकारते हैं.
मैंने ज़ोर से आवाज़ दी, 'अंकल, मै ठीक हूँ.' दबी आवाज़ में खाने के लिए भी हाँ कह दी कि शायद कुछ खाने को मिल जाए. 'इस वक्त रात के दो बजे हैं, सुबह जम्मू पहुँच कर नाश्ता जल्दी करेंगे.' कहते हुए वापिस अपने कम्पार्टमैंट की ओर लौट गए. मैं मन ही मन उन्हें कोसने लगी कि फिर इतनी रात को खाने का पूछा ही क्यों. पेट को दबाकर किसी तरह सोने की कोशिश की...!!
सफ़र तो चल ही रहा है......
लेकिन आज बस इतना ही..

सोमवार, 14 जनवरी 2008

मैं भी आवारा बंजारन थी, आज भी हूँ !

आज का शीर्षक देने का एक मुख्य कारण है आवारा बंजारा का जन्म दिन. उनकी 'मैं' कविता पढ़कर लगा कि आज एक मस्त अवारा में गम्भीर मनन चिंतन करने वाला बंजारा छिपा है. ऐसा व्यक्तित्त्व हमेशा आकर्षित करता है जो जीवन को विभिन्न ऋतुओं का संगम बना दे. कभी शांत, गम्भीर और रहस्यमयी तो कभी किनारों के बाहर छलकती. कभी सिकुड़ती जलधारा सी और कभी दूसरों के प्रभाव से मटमैली होती.
टिप्पणी के रूप में शुभकामनाएँ भेजने के बाद मुझे जहाँ उनके मस्ती भरे मनचले स्वभाव की याद आई, वहीं याद आ गया अपना जन्मदिन. पन्द्रह साल पूरे हुए थे और मम्मी डैडी ने वादा किया था कि दो महीने की छुट्टियों में मुझे दीदी के पास कश्मीर भेजा जाएगा. यह तोहफा तो मेरे लिए अनमोल था. एक महीने बाद ही वह दिन भी आ गया. मुझे कहा गया कि रात जम्मू तवी जाने वाली ट्रेन से मुझे श्रीनगर के लिए रवाना होना है. यकीन ही नहीं हुआ कि मम्मी डैडी मुझे अकेला भेजने को तैयार हो जाएँगें. दादी ने भी कुछ नहीं कहा. आप सोच सकते हैं कि हम बिन पंखों के कैसे उड़ रहे होंगें उस समय.
आवारा बंजारन का ट्रेन का सफ़र कल लिखूँगी. आज तो संजीत जी के जन्मदिन पर कुछ गीत सुनिए.


कुछ दिन पहले संजीत जी ने एक बच्चा 'पारटी' पर पोस्ट लिखी थी..उसमें एक नन्ही सी गुड़िया को याद करके यह गीत चुना... 'हैप्पीबर्थ डे टू यू'



यह गीत उस समय का जब हमारे जन्मदिन पर अकेले कश्मीर जाने का तोहफा मिला था...
'दीवाना मस्ताना हुआ दिल'

रविवार, 13 जनवरी 2008

यूँ ही कुछ गुफ्तगू !!



बेटे वरुण को नाश्ता देकर सोचा कि चलो बाहर की ताज़ी हवा खाई जाए लेकिन यह क्या...घर की एक चाबी तो छोटा बेटा विद्युत अपने साथ ले गया है. इधर उधर ढूँढने के बाद पता चला कि दूसरी चाबी तो कार में ही रह गई. अब... क्या किया जाए... बेटा तो बैठ गया था डैस्कटॉप पर..हम ललचाई नज़र से देखते हुए एक कप चाय और अखबार लेकर बाल्कनी में आकर बैठ गए.
ईरानी मित्र अब परिवार का एक हिस्सा सा बन गए है इसलिए ईरान की खबर पर नज़र जाना स्वाभाविक है. एक भारतीय और एक ईरानी परिवार की दोस्ती ने कब रिश्ते का रूप ले लिया पता ही नहीं चला. इस बारे में इरान का सफर में कुछ लिखा है और आगे भी विस्तार से लिखने का इरादा है.
सबसे पहले मौसम का हाल देखा, ईरान ही नहीं पूरी दुनिया के पर्यावरण को बदलते देख कर मन चिंतित हो गया. चालीस साल का रिकोर्ड तोड़ती बर्फ ने ईरान के लोगों को तोड़ कर रख दिया है. सफर करते हज़ारों लोग सड़कों पर हैं क्योंकि बर्फ ने सब तरफ से रास्ते बन्द कर दिए हैं. हमारे मित्र अली के पड़ोसी जिन्हें हम पहले वहीं मिल चुके हैं, तीन दिन से रास्ते में हैं. तहरान से रश्त आने का रास्ता बन्द है. बीच बीच में मोबाइल से अपनी खैरियत की खबर देते रहते हैं. पुलिस सफर करते लोगों को कम्बल और चाय दे रही है. सब अपनी अपनी कारों में बन्द रास्ते खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
वहाँ के आम लोगों की रोज़मर्रा की तकलीफों का ज़िक्र होता है तो अपने देश के खस्ताहाल लोगों का जिक्र स्वाभाविक है लेकिन सुनते ही मेरे मित्र एक बात जो कहते हैं उसका कोई जवाब मैं नहीं दे पाती. ...आज़ाद पंछी पिंजरे के बाहर रह कर अगर रूखी सूखी खाता है तो उड़ता भी खुले आकाश में ही है.... सच है कि आज़ादी हम सब का जन्म सिद्ध अधिकार है. शाह के समय और अब में ज़मीन आसमान का अंतर है. वहाँ के हर इंसान में एक अजीब सी छटपटाहट देखने को मिलती है.
जीवन की ज़रूरतें पूरी करने के लिए आम आदमी जूझता सा दिखाई देता है. पैट्रोल तो पहले से ही राशन में मिलने लगा था , अब घर में आती गैस की सप्लाई भी आती जाती रहती है. ज़रूरत की चीज़ें महंगी होती जा रही हैं. युवा पीढ़ी के पास काम नहीं है जिस कारण खाली दिमाग शैतान का घर बन कर खूब खुराफाते करता है. इन सब बातों पर चर्चा करते हुए दिल दुखी हो जाता है.
फिलहाल इस वक्त हालात यह हैं कि वहाँ गैस की कमी के कारण स्कूल कॉलेज और ऑफिस सब बन्द कर दिए गए हैं. दो मीटर बर्फ गिर रही है और सड़कें वीरान हैं. कोई इक्का दुक्का कार या टैक्सी दिखाई दे जाती है. घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है. ताज़ी रोटी खरीदने के लिए भी लम्बी लाइन में लगना पड़ता है. यह सुनकर मन और भी खराब होता है जब उनका तीन साल का छोटा बेटा आर्यन मेरे हाथ की रोटी को याद करके अपनी मम्मी से पूछता है, ...' मॉमान यादात मियाद मीमी नून मीपोख्त?' मम्मी, क्या याद है मीमी कैसे रोटी पकाती है?' जब से बोलना सीखा है मुझे मीमी ही बुलाता है.... बड़ा बेटा अर्दलान खाला मीनू कहता हुआ पनीर की सब्ज़ी और सादी चपाती को याद करता है. चपाती बना कर वैब कैम पर दिखा देने से ही बच्चे खुश हो जाते हैं. बच्चे जो हैं और बचपन तो सबसे प्यारा और मासूम होता है. उनकी मुस्कान दिल बाग बाग कर देती है और फिर से बचपन लौट आता है.


शनिवार, 12 जनवरी 2008

मैं झरना झर झर बहूँ, प्रेम बनूँ औ' हिय में बसूँ !

'प्रेम ही सत्य है' इस अटल सत्य को कोई नकार नहीं सकता. स्वामी विवेकानन्द जी ने भी कहा है, 'प्रेम ही विकास है, प्रेम ही मानव जीवन का मूलमंत्र है और प्रेम ही जीवन का आधार है, निस्वार्थ प्रेम और निस्वार्थ कार्य दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं. जैसे प्रेम से उच्च तत्त्व नहीं वैसे ही कामना के बराबर कोई नीच भाव नहीं. 'हमारे मन की बात हो जाए' कामना का यह भाव दुखों का मूल है.
कामनाओं के, इच्छाओं के बीहड़ जंगल में हम भटकते हैं, अपने मन की शक्ति से बाहर भी निकल सकते हैं . उस जंगल से बहुत दूर निकल कर प्रेम के महासागर में डुबकी लगा कर शांति पा सकते हैं. बस एक कोशिश करके........

मैं झरना झर झर बहूँ ।
अमृत की रसधार बनूँ ।।

मैं तृष्णा को शान्त करूँ।
प्रेम बनूँ औ' हिय में बसूँ।।

मैं मलयापवन सी मस्त चलूँ।
मानव मन में सुगन्ध भरूँ।।

मैं सबका सन्ताप ग्रहूँ।
हिय के सब का शूल गहूँ।।

मैं ग्यान की ऊँची लपट बनूँ।
अवनि पर प्रतिपल जलती रहूँ।।

मैं विश्व की ऐसी शक्ति बनूँ।
मानव मन को करूणा से भरूँ।।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

तू सूरज मैं मूरत मोम की



तू सूरज मैं मूरत हूँ मोम की
तू अग्निकण मैं बूँद हूँ ओस की !
तपन तेरी से पिघले तन-मन
तपिश तेरी से सुलगे प्रति-क्षण !
तू समझे न बातें मेरे ह्रदय की
तू क्या जाने पीड़ा मेरे मन की !
अभिव्यक्त करूँ मैं कैसे अपने भावों को
हँसते-हँसते सहती हूँ तेरी घातों को !

डूबते को तिनके का सहारा !

घुघुती जी की कविता तिनकानामा पढ़ने के बाद उनसे बातचीत के दौरान मैने निश्चय किया कि उनकी इस कविता पर अपने कुछ भाव प्रकट करूँगीं. समय को पकड़ने की कोशिश में समय के पीछे भागती रही लेकिन उसके पीछे वाले सिर पर तो बाल ही नहीं थे फिर वह हाथ में कैसे आता सो आज समय को आगे के बालों से पकड़ कर बैठ गई लिखने.
तिनकानामा में जीवन दर्शन दिखाई देता है. कविता के हर अंश में गहरा अर्थ छिपा है. तिनकानामा को ही क्यों चुना इसके पीछे भी एक कारण है. कई साल पहले रियाद में हुए मुशायरे में अपनी दो कविताएँ 'मैं' और 'अहम' पढ़ने का अवसर मिला था जिन्हें कविता तिनकानामा से जुड़ा हुआ सा पाती हूँ. शायद पूरी कविता पर बात न हो पाए लेकिन कुछ अंश जो मुझे बहुत भाए उन पर तो अवश्य चर्चा करूँगी.
संयोग से रेडियो पर एक गीत बज रहा है, 'तिनका तिनका ज़रा ज़रा, है रोशनी से जैसे भरा --- रोशनी शब्द सुनकर छोटे छोटे ज्योति कीट जुगनु याद आने लगे.

तिनकों की भी क्या इच्छाएँ होती हैं
उन्हें तो बस बह जाना होता है
नदी के बहाव के साथ
जिस दिशा में ले चले वह

तिनकानामा के इस पहले अंश को पढकर याद आने लगी हरे भरे और फिर सूखते तिनकों की जिनकी जननी वसुधा सोचती होगी कि नदी के रुख मोड़ने वाली वह स्वयं है, जिधर चाहे चट्टानें खड़ी करके नदी का रास्ता बदल देती है, जब चाहे, जहाँ से चाहे नदी की धारा उस ओर मोड़ देती है, सागर तक जाने का रास्ता भी वह स्वयं निश्चित करती है. फिर नदी कैसे सोच सकती है कि तिनको को वह अपने बहाव में कहीं भी ले जा सकती है.

कुछ तिनके यूँ सोचते हैं
उन्होंने स्वयं चुना है
नदिया संग बहना

तिनको ने अगर सोचा है कि उन्होंने नदी के संग बहना है तो यह उनका स्वयं का निर्णय है , उसे उन्होंने स्वयं चुना है तो सही सोचा है. समय के साथ चलना ही तो बुद्धिमानी है. समय के साथ चल कर ही लक्ष्य रूपी सागर तक पहुँचा जा सकता है.


कुछ इठलाते कुछ इतराते
देख गति अपनी प्रगति की
मन ही मन मुस्काते
बढ़ आगे जाने को
पूरा अपना जोर लगाते ।

इन पंक्तियों को पढकर तो मुझे मेहनतकश लोगों की याद आ जाती है जो अपने बल से रेगिस्तान में भी हरियाली ले आते हैं. जंगल मे भी मंगल कर देते हैं. समय को मुट्ठी में बन्द कर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते जाते हैं, उन्हें कोई रोक नही सकता. कविता 'कर्मवीर' की एक पंक्ति याद आ गई, 'कोस कितने ही चलें पर वे कभी थकते नहीं.'

यूँ इतराते वे जाते हैं
जल पर सवार
मानो उनका ही हो
सारा यह संसार ।

इन पंक्तियों में जहाँ आगे बढ़ने का भाव है, वहाँ इठलाते और इतराते तिनको का अहम भाव भी दिखाई देता है. यहाँ तिनकों का अहम देखकर अपनी कविता की कुछ लाइने याद आ गईं-

मैं ही मैं हूँ इस सृष्टि में,
और न कोई इस दृष्टि में,
ऐसा भाव किसी का पाकर,
मन सोचे यह रह रहकर,
मानव क्यों यह समझ न पाए,
क्षण भंगुर यह तन हम लाए।।

यूँ अन्त हो जाता है
सफर इक तिनके का
काल की गर्त्त में
यूँ ही हैं सब तिनके समाए ।

इस संसार में सब नश्वर है. एक न एक दिन सबको काल का निवाला बनना ही है लेकिन फिर भी कुछ तिनके इतिहास के पन्नों में अपने आप को अमर कर जाते हैं, कुछ समाज के महल को मज़बूत बनाने के लिए नींव की ईंट का काम कर जाते हैं.

या फिर कर आती उसे
किसी चलबच्चा हवाले
कभी छोड़ आती वह उसे
किसी भंवर में
खाने को अनन्त तक चक्कर

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ और उससे भी सुन्दर उसमे छिपा भाव. जीवन में दुखों के भँवर न हों तो सुख का आनन्द कैसा..! हर पल एक नई चुनौती को पाकर उससे जूझना और निकल पाना , यही तो जीने का आनन्द है.

कुछ भूले, कुछ बिसराए
यही नियति है हर तिनके की
चाहे कितने ही तिनकेनामे
हम लिखते जाएँ ।

तिनकानामा लिखना व्यर्थ नहीं जाता. मेरा अपना अनुभव है कि मैं जो भी पढ़ती हूँ उसका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अपने अन्दर अनुभव करती हूँ. मन ही मन सोच रही हूँ कि चाहे अनगिनत तिनकों की तरह मेरा भी अंत हो जाएगा लेकिन किसी एक डूबते को मुझ तिनके का कभी एक बार भी सहारा मिला तो जीवन धन्य हो जाएगा. डूबते को तिनके का सहारा उक्ति शायद यहाँ सार्थक कही जा सकती है.

बुधवार, 9 जनवरी 2008

मैं भी उन संग बहक सी रही थी !

चंदा का सितारों से जड़ा प्रकाशित आँचल जब छाया धरती पर
सुषमानुभूति से मदमस्त हुआ फिर नशा सा छाया सागर पर !

लहरें बाँहें फैलाए उचक उचक कर चढ़ गईं चट्टानों के कंधों पर
नज़र थी उनकी शोभामय आकाश के जगमग करते तारों पर !

जलधि के उर पर देखके तारों का प्रतिबिम्ब लहरें चहक रहीं थीं
चंदा की चंचल किरणें लहरों के संग खेल-खेल में बहक रहीं थीं !

छू लेने की, आँखों में सुषमा भरने की चाहत सी उनमें जाग गई थी
छवि सुन्दर विस्तृत नभ की, मनमोहती मानस-पट पर छा सी गई थी !

गर्वित गगन से आती-जाती शीत-पवन सी साँसें मुझको छू सी रही थीं
महकी-महकी साँसों से दिशाएँ बहकीं, मैं भी उन संग बहक सी रही थी !

शनिवार, 5 जनवरी 2008

मेरे त्रिपदम (हाइकु)



प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा

निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं

धरा ठिठकी
लहरों में उद्वेग
चंदा निहारे

सुर कन्या सी
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी

रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता


शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप


संघर्षरत जीते
जाएँ जीवन
आत्मा की शक्ति


गरजे मेघ
दामिनी दमकती
सूरज भागा

हे मेरे मन, आशा का दीप जला !

आज सोचा कि मन में आते भावों को बाँधने की बजाए उसे बहने देना ही सही होगा.
बहता पानी साफ रहता है, रुके हुए पानी से अपने लिए ही नहीं आसपास के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है. कई दिनों से ब्लॉग जगत में बहुत कुछ पढ़ते रहने के बाद लगने लगा कि बस बहुत हो चुका. ज़्यादा पढ़ना भी मुसीबत बन सकता है. अलग अलग ब्लॉगज़ द्वारा बहुत से विचार एक साथ दिल और दिमाग में उतर रहे थे. चाह कर भी प्रतिक्रिया स्वरूप लिखने का समय निकालना सम्भव नहीं लग रहा था. इस समय को भी दूसरे कामों से आँख चुराकर ही निकाल पाएँ हैं.
मानव समाज में अलग अलग रूप से क्लेश, अशांति, वहशीपन, आक्रोश की बहती हवा का प्रभाव ब्लॉग जगत पर भी दिखाई देता है कुछ चिट्ठाकार इन मुद्दों पर लिखकर चिंतन करने को बाध्य करते हैं. कुछ अपनी तीखी प्रतिक्रिया द्वारा समाज और सरकार को जगाने का प्रयास करते हैं, कुछ सीमा तक सफल भी हो जाते हैं.
ब्लॉगर की ताकत का अन्दाज़ा इसी से लगता है कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखते ही फौरन हरकत में आ जाती है, उसे अपना आस्तित्व हिलता सा दिखाई देने लगता है.
दिसम्बर की 10 तारीख को एक साउदी ब्लॉगर फुयाद अल फरहान को पुलिस पकड़ कर ले गई क्योंकि ब्लॉगिंग के माध्यम से वह समाज के विकास में आने वाली बाधाओं की अपने ब्लॉग पर चर्चा कर रहा था. दूसरे ब्लॉगरज़ को भी इस ओर ध्यान देने को कह रहा था. पच्चीस दिन से फरहान जेल में है.
दिसम्बर जाते जाते एक और दर्द दे गया जिसे पाकर मन सोचने पर विवश हो गया कि क्यों ...? ऐसा क्यों होता है ? हमारे अन्दर मानव और दानव दोनों का निवास है, इस बात को हम नकार नहीं सकते लेकिन जब मानव दानव के हाथों पराजित होता दिखाई देता है तो मन विचलित हो जाता है. क्यों हम अपने अन्दर के दानव को बाहर आने देते हैं ? मन सोचने पर विवश हो जाता है कि किस प्रकार मानव और दानव के बीच तालमेल बिठाकर मानव समाज को नष्ट होने से बचाया जाए.
मेरे विचार में ब्लॉग जगत से जुड़ा हर लेखन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में समाज के हित की ही सोचता है. सभी अपनी अपनी सोच के अनुसार अच्छी बुरी घटनाओं पर अपने अपने तरीके से प्रतिक्रिया भी करते हैं. ऐसा तो हो नहीं सकता कि हर कोई एक ही जैसा सोच कर हर विषय पर अपने विचार प्रकट करे.
अखबारों में, टीवी में या अंर्तजाल पर भ्रष्टाचार के प्रति जो इतना आक्रोश दिखाई देता है, यही साबित करता है हम समाज से बुरे तत्त्वों को निकाल बाहर करना चाहते हैं.
"दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है. बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उदघाटित करके उसमें रस लिया जाता है और दोषोदघाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है. बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है. सैंकड़ों घटनाएँ ऐसी घटती हैं, जिन्हें उजागर करने से लोक-चित्त में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जगती है." यह पंक्तियाँ श्री हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी के लेख "क्या निराश हुआ जाए' से ली गई हैं.
जीवन में कितने धोखे मिले, कितनी बार किसी ने ठगा, कितनी बार किसी ने विश्वासघात किया. समाज के घिनौने रूप को देख कर पीड़ा होती है, भुलाए नहीं भूलती. यदि इन्हीं बातों का हिसाब किताब लेकर बैठेंगे तो जीना दूभर हो जाएगा.
प्रेम ही सत्य है – इस मूल-मंत्र को हम जान लें तो जीना आसान ही नहीं खूबसूरत भी हो जाए. प्रेम अपने आप से , प्रकृति से , जीव-जंतुओं से और फिर मानव-मानव से, बस फिर अपने महान भारत देश को ही नहीं, विश्व को पाने की भी संभावना हो जाएगी.
आज से कोशिश करूँगीं कि अपने ब्लॉग में गद्य को भी उतना ही महत्व दूँ जितना कि पद्य को देती आई हूँ.

शुक्रवार, 4 जनवरी 2008

लीच/जौंक

जाने किस झोंक में मैंने
जौंको को अपनी पीठ पे छोड़ दिया !

मीठा मीठा दर्द जिन्होंने मेरे खून में घोल दिया
जाने क्यों उठती आहों को मैंने आने से रोक लिया.

आँख मींच कर लीच को मैंने बाँहों में भींच लिया
साँस खींच कर आते दर्द को खून में सींच लिया.

कुछ लीचें मेरी अपनी हैं, मेरी मज्जा से ही बनी हैं
ये लीचें कुछ न्यारी हैं जो मेरे ही खून से सनी हैं.

इन पंक्तियों को पढ़कर सबसे पहला भाव मन में क्या आ सकता है ?
उसे टिप्पणी के रूप में देंगे तो आभार होगा.

मेरी भी आभा है इसमें

नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें

भीनी-भीनी खुशबूवाले
रंग-बिरंगे
यह जो इतने फूल खिले हैं
कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था
कल इनको मेरे सपनों ने सहलाया था

पकी सुनहली फसलों से जो
अबकी यह खलिहान भर गया
मेरी रग-रग के शोणित की बूँदें इसमें मुसकाती हैं

नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें

" नागार्जुन "

गुरुवार, 3 जनवरी 2008

आप सबके बड़प्पन को प्रणाम !

फुर्सत के पल मिलते ही अभी मैंने अपना मेल एकाण्ट खोला तो चेहरा खुशी से खिल उठा . मेल खोलते जा रहे थे और पढ़ते जा रहे थे. लगा कि मेल भेजते वक्त सबके चेहरे पर मुस्कान ही होगी जैसे राह चलते किसी को गिरते देख कर हँसीं निकल जाती है. सच मानिए कभी कभी गलती करके माफी माँगने का अलग ही आनन्द है.
कल शाम एक जन्मदिन की पार्टी पर छोटे बेटे को लेकर अजमान जाना पड़ा, लौटते लौटते रात के दो बज गए.
आज सुबह बड़े बेटे को लेकर कॉलेज गई जहाँ मुझे ठहरना था क्योंकि अक्सर एग्ज़ाम के दिनों में बेटे पर दर्द कुछ ज़्यादा ही मेहरबान हो जाता है. दोपहर एक बजे घर आते ही दोपहर खाना बनाया , खाया और खिलाया. न चाह कर भी नींद को अपने करीब आने से रोक नहीं पाए. अच्छी तरह मालूम है कि भोजन करने के एकदम बाद सोना ज़हर का काम करता है, फिर भी सो गए थे. उठने के बाद हालत खराब होनी ही थी सो हो गई.
तब सोचा कि अर्बुदा के हाथ की चाय पी जाए और नन्हे-मुन्ने जुड़वाँ इला इशान से खेला जाए तो तन-मन दोनो प्रफुल्लित हो जाएँगें. मीनू आटीं मीनू आटीं कहते हुए दोनों की होड़ लग जाती है कि सबसे ज़्यादा कौन अपनी बातों से लुभाएगा. एक मज़ेदार खेल होता है वहाँ. दोनो बच्चे अपनी प्यारी प्यारी बातों से हम दोनों को बात करने का अवसर ही नहीं देते लेकिन हम भी मौका पाकर अपनी बात कर ही लेते हैं.
वहाँ भी पैगी डॉट कॉम पर चर्चा हुई. सोचा कि चाय पीने के बाद तो ज़रूर इस विषय पर लिखना ही है.
जब सेहतनामा के संजय जी का मेल आया कि एक डोमेन का आमंत्रण मिला है तो हमारा माथा ठनका क्योंकि उससे पहले उस डोमेन पर विकास जी से भी बात हुई तब तक हम कुछ समझ नहीं पाए थे कि वे हमारे ब्लॉग परिवार के सदस्य हैं या कोई और .. आशा जी से निमंत्रण मिला था जिसे हमने उनकी साइट समझी और पैगी की पगली पढ़ लिया.
नहीं अब इस विषय पर बात करने का जोश ठंडा सा पड़ता जाता है . अब सोचते हैं "बीती बात बिसार दे , आगे की सुध ले" सो कल की बातें भुलाकर आज इस समय हमारे साथ कुछ गीतों का आनन्द लीजिए जो अभी मैं सुन रही हूँ --


दीवाना मस्ताना हुआ दिल........




जाता कहाँ है दीवाने ......




हूँ अभी मैं जवाँ ए दिल ......




जानूँ जानूँ रे ......

मंगलवार, 1 जनवरी 2008

विश्व - प्राँगण











नववर्ष के प्रथम दिवस का सूर्योदय एक नई आशा की किरण लेकर आया. एक नई सुबह खिलखिलाती सी, जगमगाती सी अपने सुन्दर रूप से मुझे मोहित कर रही थी. मंत्र-मुग्ध सी मैं आकाश के एक कोने से चमकते सूरज को देख रही थी तो दूसरी ओर आँखों से ओझल होता फीकी हँसी हँसता शशि न चाहते हुए भी विदा ले रहा था.

नए वर्ष का मंगल गीत गाते हुए पंछी वृक्षों की फैली बाँहों में नाचते हुए चारों दिशाओं को मोहित कर रहे थे.

यह सुन्दर दृश्य देखकर विश्व प्राँगण में उतरी हर ऋतु की सुन्दरता का रूप याद आने लगा.


विश्व-प्राँगण में उतरीं ऊषा की किरणें
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

सूर्योदय की चंचल किरणें मुस्काईं
अपने ही स्वर्णमयी यौवन से शरमाईं
पीतवर्ण सरसों आँचल सी लहराई
अन्न धन हाथों में अपने भर लाई.

विश्व-प्राँगण ग्रीष्म के ताप से तप्त हुआ
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

ओस पसीने सा चमका धरती के माथे पर
प्यास बुझाने की तृष्णा थी सूखे अधरों पर
धानी आँचल फटा हुआ कृशकाय तन पर
वीरानापन छाया था वसुधा के मुख पर.
विश्व-प्राँगण में पावक पावस अति छाए
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

जगी प्यास जब घनघोर घटाएँ छाईं
रिमझिम बूँदें लेकर मोहक वर्षा-ऋतु आई
नभ की कजरारी अखियाँ प्यारी भाईं
दामिनी चपला ने भी अदभुत सुन्दरता पाई.

विश्व-प्राँगण ठिठुर गया काँपा सीसी कर
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

शरदऋतु के आते सब सकुचाए दुबके कोने में
मानव, पशु-पक्षी सब ओझल हुए किसी कोने में
तड़प उठी वसुधा पपड़ी फटे होठों पर होने से
तरु-दल भी पाले से मुरझाए शीत के होने से.


विश्व-प्राँगण में सूखा सा पतझर छाया
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

अस्थि-पंजर बन कृशकाय तन लहराया
प्यासी बेरंग आँखों में पीलापन छाया
पावक पावस ने वसुधा का मन भरमाया
मधु-रस पाने का स्वर सूखे होठों पर आया.

विश्व-प्राँगण में ऋतुराज बसंत पधारे
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

ऋतुराज जो आए संग बासंती पवन भी लाए
रंग-बिरंगे महकते फूलों की बहार लुटाने आए
वसुधा के सुन्दर तन पर धानी आँचल लहराए
रोम-रोम में उसके सुष्मिता अनोखी छा जाए.

नभ पर सुन्दर अति सुन्दर सुरचाप सजे
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

चंदा की मदमाती किरणें उतरीं बहकी-बहकी
रवि-किरणें थी चंचल चपला से चहकी-चहकी
वसुधा के आँगन में कलियाँ बिखरीं महकी-महकी
नीलम्बर की सतरंगी सुषमा है लहकी-लहकी.

विश्व-प्राँगण में बिखरी चंदा की किरणें
धरती ने जब ली अँगड़ाई !
चंदा की चंचल चाँदी से किरणें सजीं हुईं
नभ की साड़ी अनगिनत तारों से टंकी हुई
चोटी जगमग करते जुगनुओं से भरी हुई
लहराते दुग्ध धवल आँचल से ढकी हुई.

विश्व-प्राँगण में उतरा मानव का विज्ञान
धरती ने जब ली अँगड़ाई !

विश्व-प्राँगण है प्रकृति का सुन्दर आँगन
रंग-बिरंगे फूलों का सुगन्धित उपवन
धीरे धीरे नीरसता से जो भरता जाता है
प्रदूषण से अब बेरंग हुआ वो जाता है.

विश्व-प्राँगण के सुन्दर आँग़न में वसुधा जब ले अँगड़ाई तो प्रकृति का सुन्दर मोहक रूप ही दिखाई दे उसमें, नव वर्ष में यही कामना है.