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रविवार, 17 अप्रैल 2011

मैम.. आपने पलट के जवाब नहीं दिया...क्यों ?


’बस भी करो, जल्दी आओ स्टाफरूम में...सारा साल पढे नहीं तो अब क्या तीर मार लेंगे....’ आदत से मजबूर तब्बू ऊँची आवाज़ में बोलती हुई इधर ही आ रही थी... 
मैं मुस्करा रही थी लेकिन लड़कों के चेहरों के बदलते रंग भी देख रही थी...राघव कुछ कहते कहते चुप रह गया.... चारों छात्र सिर झुकाए अपनी अपनी किताबों पर नज़र गड़ाए चुप बैठे रहे....
दसवीं के क्लास रूम में तब्बू दाखिल हुई, मेरे साथ ही सीनियर सेक्शन को सोशल पढ़ाती थी....हम दोनों एक ही स्टाफरूम में बैठते थे.. उसे अनदेखा करके बच्चों के सिर नीचे ही झुके रहे... 
एक टीचर को विश न करना अच्छा तो नहीं लगा लेकिन उस वक्त डाँटना भी सही नहीं लगा सो चुप लगा गई....

उधर तब्बू बोले जा रही थी.....’इन पर मेहनत करके कुछ नहीं मिलेगा...इन्हें तो बस टीचर को बिज़ी करने का बहाना चाहिए.....और पैरेंटस को बेवकूफ बनाने का....तुम्हें बड़ा शौक है अपना वक्त इन पर बरबाद करने का’

‘तुम चलो....मैं अभी आती हूँ बस दस मिनट और’ मुस्कुराते हुए हल्की आवाज़ में कहा.....

‘टेबल लग चुका है.... सब तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे हैं, जल्दी आओ’ कह कर वह निकल गई....

तब्बू के बाहर निकलते ही शोहेब से रहा नहीं गया..... ‘वाय मैम...वाय... होऊ कैन यू बीयर हर?’

(विदेशों के बाकि स्कूलों का तो पता नहीं लेकिन यहाँ के स्कूलों में टीचर और स्टूडैंट्स में बहुत अपनापन होता है. टीचर, अभिवावक और दोस्त सभी उन्हें एक ही टीचर में चाहिए..... वन इन वन इंट्रैक्शन - जिससे वह उन सभी अभावों को भूल पाएँ जो अपने देश में आराम से पा सकते हैं.)

राघव भी बोल उठा...’ मैम... तब्बू टीचर आपको इतना कुछ कह गईं और आपने पलट के जवाब नहीं दिया...क्यों’
चुप रहने वाला जमाल भी बोल उठा... ‘कम से कम हमारे लिए ही बोलना था.....दसवीं बोर्ड के एग्ज़ाम्ज़ में तो सभी टीचर हैल्प करते हैं.’
राघव बड़े दार्शनिक अन्दाज़ में बोला....’मैम, यू शुड लर्न हाऊ टू से ‘नो’’ सच कह रहा हूँ ....आप कभी किसी भी स्टूडैंट को ‘ना’ नहीं बोलतीं...’ 
’हाँ मैम...आज अगर स्टाफ पार्टी थी तो मना कर देतीं....’ अमित बोला.
राघव ‘सॉरी मैम’ कह कर उठ गया....उसी के साथ ही बाकि तीन बच्चे भी सॉरी कहते हुए उठ खड़े हुए...

अच्छी तरह से जानती थी कि तब्बू कभी किसी स्टूडैंट को एक्स्ट्रा नहीं पढ़ाती और न ही नोटस बनाने या चैक करने में मदद करती...बिन्दास वह शुरु से ही थी....बिना सोचे समझे किसी के लिए भी कभी भी कुछ भी कह देती.... कुछ लोग बहस करने से रोक नहीं पाते लेकिन कुछ चुप लगाना सही समझते ..... खासकर मुझे तो समझ नहीं आता कि रिऐक्ट किया कैसे किया जाए....!  
मन ही मन गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन जाने क्यों उस वक्त मैं कुछ बोल न पाई....कभी कभी अपने आप पर ही मन खीजता है कि एक दम पलट कर वैसी ही तीखी प्रतिक्रिया क्यों नहीं कर पाती...

लेकिन जो अपने आप को कंट्रोल नही कर पाते और बात को तूल दे देते हैं... उन्हें इच्छा होती है कि काश वे अपने आप को काबू में कर पाएं.....
दरअसल दोनों तरह के रिएक्शन ही गलत हैं....सही वक्त पर सही जवाब देना और नज़ाकत समझ कर चुप रहना....दोनों तरह का संतुलन बनाना ज़रूरी होता है.....

बच्चों के साथ दोस्ताना बर्ताव मुझे उनकी दुनिया में घूमने की इजाज़त दे देता है.... सरल मन के बच्चे सहज भाव से दोस्ती कर लेते हैं और अपने मन के अंजाने कोनों को भी दिखाने में झिझकते नहीं... खेल खेल में बहुत कुछ सीखना सिखाना हो जाता है....बस यही कारण है कि सख्ती से पेश आने की बात कभी सोची ही नहीं....

जाने अनजाने यही आदत धीरे धीरे व्यक्तित्त्व का हिस्सा बन गई शायद !  


शनिवार, 16 अप्रैल 2011

स्मृति-दंश














ख़ाली आँखें
रेगिस्तान अपार
वीरानापन

पीछा करती
सपनों के हैं साए
छूना है बस

स्वप्न सलोना
पा लूँगी इक दिन
विश्वास भरा

खुश्बू प्यार की
महकते हैं प्राण
खिला जीवन

स्वर्णिम पल
मिलन अलौकिक
स्मृति-दंश



शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

फिर जन्मे कुछ त्रिपदम (हाइकु)














शब्दों की कमी
समझ लेंगे सब 
भाव है मुख्य 

सपना प्यारा
मुख मासूम दिखा
भूल न पाऊँ 

बाँहों का घेरा
है मनचाही कैद
न्यारा बंधन

जादुई हाथ 
चाह स्पर्श की जागी
हरते पीड़ा 

प्यासे अधर 
अमृत रसपान
तृष्णा मिटती 


मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

मेरे त्रिपदम (हाइकु)

क्षमा चाहिए
त्वरित वेग था वो
बाँध लिया है

होती गलती
सुधार भी संभव
आधार यही

नित नवीन
सोच के फूल खिलें
महकें बस

दम घुटता
तोड़ दे पिंजरे को
मन विकल


कल न पड़े
मन-पंछी आकुल
उड़ना चाहे



शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अपने को बदलो....बदलाव नया इक आएगा....

अन्नाजी अनशन पर बैठे सपना सुन्दर लेकर

इक दिन ऐसा आएगा जब होगा भष्ट्राचार खत्म ....

होगा लोकपाल बिल पास, बंद होगा बेईमानी का खेल

भ्रष्टाचारी नेता जाएँग़ें जेल, जनता में जागी इक आस......


टीवी के हर चैनल में खबर यही थी...

अखबारों में भी चर्चा इसकी थी......

बेटा टीवी देख रहा था, सोच में अपनी डूब रहा था...

पापा से बोला.....

बिजली पानी का मीटर डायरेक्ट लगा है....

गेट हमारा सरकारी सड़क पर बना है....

हाउसटैक्स क्या भरा हुआ है...इंकम टैक्स .....

बात काट के पापा चिल्लाए......

चुप कर.....तू तो बच्चा है .... अक्ल का कच्चा है...

तू क्या जाने , समझेगा कैसे.....

दसवीं में पढ़ता हूँ , कुछ कुछ समझ रहा हूँ

सहमा सहमा सा बेटा समझ न पाया

पापा क्यों चिल्लाए...


मुझसे बोला, माँ सीख हमेशा देतीं तुम कहती हो

अपने को बदलो....बदलाव नया इक आएगा....


बदलेगा सब कुछ बाहर भी........



अनशन पर बैठे अन्नाजी क्या सब कुछ बदल सकेंगे.....

अनशन खत्म हुआ तो भी क्या कुछ बदलेगा..... !!!!!


सोच रही हूँ बस...... बस सोच रही हूँ ........ !

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

या तो दीवाना हँसे या अल्लाह जिसे तौफ़ीक दे


          पिछली पोस्ट को याद करते हुए सोचा कि अपना जन्मदिन प्यारे प्यारे मुस्कुराते बच्चों की तस्वीरों के साथ मनाया जाए......



किसी शायर ने सही कहा है ----

 “या तो दीवाना हँसे या अल्लाह जिसे तौफ़ीक दे
वरना इस दुनिया में आकर मुस्कुराता कौन है. 

 

 

यह है शरारती आर्यान, जानता है कि भारत के लोगों को नमस्ते करके आशीर्वाद लिया जाता है.



यकीन मानिए चपाती बनाने का हुनर काबिले तारीफ है... यह ईरानी नानुवा जो नान ए हिन्द बेहद पसन्द करता है.

 
छोटे भाई के बच्चे नन्ही नटखट ऑनेला के साथ सयाना समर्थ


छोटी बहन की बेटी आरुषी कहती है पोज़ बनाना कोई मुझसे सीखे


  छोटा बेटा विद्युत बचपन से ही अदाकार... 
                                                

अदाकारी भी और कलाकारी भी

 

 

 
बड़ा बेटा वरुण भागता तो कोई पकड़ न पाता  


कहता है अब मैं मस्ती करने के मूड में हूँ


बुधवार, 6 अप्रैल 2011

ज़िन्दगी खूबसूरत नहीं होती....उसे खूबसूरत बनाया जाता है !



विजय ऑफिस जाने से पहले ऑन लाइन ‘अरब न्यूज़’ पढते हैं...उनके जाते ही मैंने भी सोचा दिन शुरु करने से पहले 10-20 मिनट के लिए जीमेल देख लेती हूँ ....उस वक्त सुबह के सात बजे थे....जीमेल में मेल और बज़ दोनों ही जल्दी से देखने की सोची.... एक बज़ सन्देश पढकर दिल खुश हो गया...


अजय झा“ज़िन्दगी खूबसूरत नहीं होती....उसे खूबसूरत बनाया जाता है, मुस्कराहटों से, यादों से, सपनों से, दोस्ती से ....है न ??????”

इस खूबसूरत पंक्ति ने अतीत की कई खूबसूरत यादों के पन्ने खोल दिए....पिछले कई दिनों से ज़िन्दगी के केनवास पर बेरंग तस्वीर थी जिसे आज रंगीन यादों से खूबसूरत बनाने की कोशिश करने लगी...
सबसे पहली याद जो दिमाग में उतरी वह थी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह.... ज़िन्दगी के पच्चीस साल कभी झरना बनके शोर करते हुए तो कभी नदी की टेड़ी मेड़ी धारा बन कर गुज़र गए...अब इच्छा है कि आगे के आने वाले साल शांत झील जैसे गुज़रें..... अब कैसे गुज़रेंगे यह कौन जान सकता है.....लेकिन इच्छा तो की जा सकती है....

हम दोनों पति पत्नी निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि पच्चीसवीं सालगिरह के लिए कहाँ मिले.... दिल्ली में जहाँ बड़ा बेटा नानी के पास है...या छोटा बेटा जो दुबई में है जिसे मिले हुए अरसा हो गया था.. वरुण को हमेशा लगता है कि उसकी वजह से छोटे भाई को अकेले रहना पड़ता है...उसने सुझाया कि हमें विद्युत के पास दुबई जाना चाहिए क्यों कि वह कॉलेज छोड़ कर आ नहीं सकता था....

विजय भी रियाद से निकलना चाहते थे...तय हुआ कि विजय रियाद से और मैं दिल्ली से दुबई पहुँचू... वरुण का फैंसला था कि वह नानी के पास ही रहेगा.....छोटे बटे को बता दिया गया कि सब उसके घर इक्ट्ठा हो रहे हैं...(उसका घर इसलिए कि अब वही ज़्यादा समय वहाँ रहता है) ...विजय रियाद से और हम दिल्ली से पहुँचे....अतिथि देवो भव की उक्ति सार्थक करते हुए ईरान से भी दोस्त आ गई जो हमारी सालगिरह के लिए ख़ास आई थी....साथ लाईं थी आफ़त का गोला नन्हा सा बेटा जो बड़ो बड़ो के कान काट दे..... लेकिन कहना होगा कि सालगिरह की रौनक वही था....

घर में रह कर सादगी से सालगिरह या जन्मदिन मनाने का अपना अलग ही आनन्द है...... आसपास दान के योग्य पात्र मिल जाएँ तो उससे बढिया सेलिब्रेशन नहीं होती... न पच्चीस साल का लेखा जोखा.. न तोहफों की माँग.....बस जो साथ थे...उनके साथ मिलकर खूब मस्ती की.... रियाद की एक दोस्त सपरिवार कनाडा से आई हुई थी अपनी बेटी को मिलने...हम दोनों के बच्चों में बचपन की दोस्ती अब तक कायम है......यासमीन और मैंने दस साल तक एक ही स्टाफरूम में बैठकर सुख दुख के कई पल एक साथ बाँटे थे.....और आज भी जब मौका मिलता है तो खूब बातें होती हैं....

लिडा के पति अली और विजय की दोस्ती ने न सिर्फ हम दोनों परिवारों को एक किया बल्कि हमारे माता पिता और भाई बहन भी एक दूसरे के परिवारों को अपना मानने लगे.... दोस्ती में विश्वास और प्रेम देश, धर्म और भाषा से कहीं ऊपर होता है.... उसी प्रेम और विश्वास के कारण ही हम रिश्तों को निभा पाते हैं....

सालगिरह की सुबह दोस्तों और रिश्तेदारों के फोन सुने...कुछ के एस.एम.एस का जवाब दिया.. विद्युत को पॉकेट मनी दी....आर्यन के मनपसन्द नाश्ते में आलू के परोठें बनाए गए......सोचा गया कि आज के दिन घर से बाहर नहीं निकलेंगे.....घर पर ही खाना-पीना...म्यूज़िक और गपशप का मज़ा लिया जाएगा.. शाम होते होते लिडा और आर्यन सैर करने के बहाने बाहर निकल गए .... वापिस लौटे तो एक् के हाथ में केक और दूसरे के हाथ में फूल थे.... बहुत अच्छा लगा देख कर.....!

नन्हें आर्यन के हाथों केक कटवाया गया.....केक काटने के बाद अब उसे हिन्दी और फारसी संगीत पर डांस करना था...खुद तो नाच ही रहा था...सबको नचा दिया....बच्चों की मासूम हरकतें....उनकी छोटी छोटी खुशियाँ उनकी आँखों में चमक पैदा कर देती हैं जिसकी रोशनी से हम भी चमकने लगते हैं.... एक साथ बैठ कर पुरानी यादों को सहेजना फिर संगीत की लय पर झूमना.... यही तो चाहिए था....खाना बाहर से मँगवा लिया था... ऐसे मौके पर हुक्का न हो तो सैलिब्रेशन जैसे पूरा ही नहीं होता.... (इसे आदत न बनने दिया जाए तो मस्ती है...) गुड़गुड़ की आवाज़ और धुएँ के छ्ल्लों में कुछ देर के लिए ज़िन्दगी की पेचीदगी गुम हो जाती है........ और संगीत तो जैसे संजीवनी का काम करता है...

पच्चीसवीं सालगिरह पन्द्रह दिन तक ऐसे ही मनाते रहे....विद्युत को भी एक हफ्ते की छुट्ठी हो गई थी....हम सभी रोज़ लिडा और् नन्हें आर्यन के साथ नई नई जगह तलाशते घूमने के लिए.... छोटा सा बच्चा आर्यन जानता था कि कैसे अपनी बात मनवानी है...नमस्ते करते हुए बस प्लीज़ कहता और जो उसे चाहिए, वह पा जाता... सबसे ज़्यादा उसी ने ही इन छुट्टियों में मस्ती की....पहली बार स्कूल जाने की तैयारी में खरीददारी भी उसी की हुई...

दुबई का जे.बी.आर(जुमैराह बीच रेज़िडैंस) हर तरह से लाजवाब लगा.... जहाँ आधी रात को भी जाओ तो दिन जैसा लगता है..सड़क के किनारे के रेस्तँरा में राहत के साथ बैठा जा सकता है क्योंकि कारें न धुँआ उगलती हैं और न ही हॉर्न बजाती हैं....धीरे धीरे रुक रुक कर राहगीरों को सड़क पार करने की राह देती हुई चुपचाप चलती रहती हैं....

कब पन्द्रह दिन बीते और लिडा के जाने का वक्त आ गया पता ही नहीं चला...लिडा ईरान के लिए निकली.... दो दिन बाद हम रियाद के लिए निकले क्यों कि गल्फ में नागरिकता मिले न मिले लेकिन छह महीने के अन्दर अन्दर वापिस उस देश में दाख़िल होना होता है.....तीन दिन रियाद रह कर फिर लौटे दिल्ली....


क्रमश:

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

दर्द से अद्भुत रिश्ता


मैंने उसे देखा , मुझसे रहा न गया .......
मैं आगे बढ़ी और उसे बाँहों में भर लिया......

मैं उसे ही नहीं उसके दर्द को भी अपनी बाँहों में जकड़ रही थी........ 
धीरे धीरे उसका दर्द मेरे अन्दर उतरता जा रहा था ......
मेरी नस नस में पिघलता लावा सा.... 

मैं जड़ हो चुकी हूँ उसके दर्द से ........
लेकिन वह अभी भी दर्द में डूबा  है....
दर्द ने उसके पूरे शरीर को अपने आग़ोश में ले  रखा है....

मेरी बाँहों के घेरे से खुद  को आज़ाद करता है....
पूरी तरह से दर्द की गिरफ़्त में है....... 
उसे दानव सा दर्द भी अपना सा लगता है..... 

मैं चकित सी देखती रह जाती हूँ ......
दर्द से उसका अद्भुत रिश्ता ! 

रविवार, 3 अप्रैल 2011

मेरे बहते जज़्बात -2


पिछली पोस्ट में मेरे सब्र का बाँध जाने कैसे टूट गया और उस बहाव में छिपे जज़्बात बह निकले...दिल और दिमाग ऐसे खिलाड़ी हैं जो हर पल हमसे खेलते हैं.... कभी खुद ही हार मान लेते हैं और कभी ऐसी मात देते हैं कि इंसान ठगा सा रह जाए...
मुझे शब्द शरीर जैसे दिखाई देते हैं तो उनके अन्दर छिपे भाव उनकी आत्मा....  अनगिनत भावों को लिए शब्द सजीव से होकर हमारे सामने आ खड़े होते हैं....उनके अलग अलग रूप और उनमें छिपे अर्थ कभी उल्लास भर देते हैं तो कभी उदासी.....
कल कुछ ऐसा ही हुआ...’ज़ील’ की पोस्ट ने अतीत में की कई गलतियों को याद दिला दिया जिन्हें सुधार पाना अब सपना सा लगता है.....मन बेचैन हो गया...उधर ‘उड़नतश्तरी’ की कविता पढ़कर दिल और दिमाग ने ऐसा खेल खेला कि मैं कमज़ोर पड़ गई....अपनी भावनाओं पर काबू न रख पाई...बस जो दिल में आया लिखती चली गई....
नाहक उदास पोस्ट लिख कर अपने ब्लॉग़ मित्रों को दुखी कर दिया ... सबसे माफी चाहूँगी......खासकर समीरजी से...... वास्तव में उनकी कविता तो एक साधन बन गई अन्दर के दबे दर्द को बाहर निकालने में.....असल में हम हरदम हँसते हुए ऐसा दिखाना चाहते हैं कि सब ठीक ठाक है लेकिन अन्दर ही अन्दर कहीं गहराई में दर्द का सोता बह रहा होता है....जो कभी कभी बह निकलता है और हम बेबस होकर रह जाते हैं....
ऐसी बेबसी मुझे कभी अच्छी नहीं लगी.....ज़िन्दगी हमेशा एक बगीचे सी दिखी.... जिसमें सुख के खुशबूदार रंग बिरंगे फूल हैं तो दुख के अनगिनत झाड़ झंकाड़ भी हैं......दोनो को साथ लेकर चलने में ही ज़िन्दगी का असली मज़ा है....अगले पल का भरोसा नहीं , मिले न मिले... इसी पल को बस भरपूर जी लें.......

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मेरे बहते जज़्बात


आज सुबह सुबह पहला ब्लॉग ‘ज़ील’ खुला जिसमें पहली अप्रेल को सुधार दिवस का नाम दिया. बहुत अच्छा किया. इसी बहाने अपने अन्दर भी झाँकने का मौका मिल गया...अपने आपको गलतियों का पुतला ही मानती हूँ लेकिन कोशिश यही रहती है कि एक ही गलती दुबारा न करूँ पर भी हो ही जाती है.....
खैर दूसरा ब्लॉग़ ‘उड़नतश्तरी’ खुला. उनकी कविता की कुछ् पंक्तियों ने जैसे पुराने ज़ख्मों को ताज़ा कर दिया....शुक्र है कि शुक्र की छुट्टी होने पर भी विजय ऑफिस चले गए किसी ज़रूरी काम से... और बेटा अभी सो रहा है...बहते दर्द को रोका नहीं....बेलगाम सा, बेतरतीब सा गालों पर बहने दिया...जो मेरे ही दामन को भिगोता रहा...

दर्द, छटपटाहट, बेबसी के ज्वालामुखी में पूरा बदन पिघलने लगा... आँखें अँगारे सी जलने लगीं... कानों में बार बार कोई जैसे  पिघलता लावा डाल रहा हो... कुछ देर के बाद ही गहरी उदासी और शिथिलता ने जकड़ लिया...दिल भारी हो गया.. गले में कुछ अटकने सा लगा और उस दर्द में आँखें धुँधली होने लगी...एक दर्द का सैलाब उमड़ आया जो सँभाले नहीं सँभला...

एक मासूम से बच्चे को दर्द से जूझते हुए देख कर कैसे कह दूँ कि  ‘अपने ही कर्मों के फल का अभिशाप’ है....सिर्फ 12 साल का बच्चा जिसे बेसब्री से ‘टीन’ में जाने का जोश था...जिसे अभी किशोर जीवन की सारी मस्तियों का मज़ा लेना था... उसे एक अंजाने से दर्द ने जकड़ लिया था...
ठंडी साँस लेकर लोग कहते.....पिछले कर्मों का फल है....अपने कर्मों का फल है... इस अभिशाप को कैसे टालोगे.... यह तो भुगतना पड़ेगा....मेरा मन ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगता.... कैसा अगला पिछला जन्म...जो है बस यही है...यही एक जन्म है...जो दुबारा नहीं मिलेगा....सब जन्मों का हिसाब किताब बस इसी जन्म में ही हो जाता है ....

अगर ऐसा भी है तो उस अबोध बालक को क्या बतलाऊँ .... अपने किन कर्मों का अभिशाप है ये दर्द....नहीं........यह अभिशाप नहीं......जैसे माता-पिता अपने बच्चों को जानबूझ कर तकलीफ़ नहीं पहुँचाते तो फिर भगवान ऐसा क्यों करेंगे.... कोई न कोई कारण तो रहता ही होगा.....
बेटा दर्द में छटपटाते हुए पूछता – वाय मीईईई....... वाय मम्मीईई....वाय मीईईई... मैं ही क्यों ..मुझे ही क्यों यह दर्द  मिला....!!!!!
मुस्कुरा कर कहती कि अभी आकर बताती हूँ और बाथरूम जाकर खूब रोकर दिल को काबू  में करती और एक नई मुस्कान के साथ आकर उसके पास बैठ जाती......

”बेटा, क्या तुमने अपने आपको कभी आइने में देखा है..कितनी प्यारी मुस्कान है तुम्हारी...भगवान तुम्हारी इसी मुस्कान पर फिदा हो गए...तुम्हें अपना खास बेटा मान लियाजिन पर वह ज़्यादा हक मानता है उन्हें ही अपने ख़ास ख़ास कामों के लिए चुन लेता है.”

अपनी तारीफ सुनकर बेटा मुस्कुरा दिया...”मम्मी, आप बहुत चालाक हो और बातें भी खूब बनाती हो.””नहीं नहीं...सच कह रही हूँ ..सुनो कैसे... उन्हें तुम पर पूरा भरोसा है कि इस दर्द में भी तुम मुस्कुराते रहोगे... अपने दूसरे कमज़ोर बच्चों को हौंसला और हिम्मत देने के लिए तुम्हें उनके सामने खड़ा करना चाहते हैं जो छोटे छोटे दुख - दर्द से रोने लगते हैं...तुम्हें दर्द में मुस्कुराते देख कर अपना दर्द भूल जाएँगे.......”
बीच बीच में वह अपने घुटने को दबाता , दर्द को पीता हुआ मेरी बातें सुनता जाता... अपनी तारीफ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता... मेरे रुकने पर फिर कह देता... “मम्मी यू आर क्लेवर, बहुत चालाक हो.. बातें बनाना तो आपसे कोई सीखे...”. मैं भी कहाँ रुकती...झट से कह दिया.... “अरे भगवानजी ज्यादा चालाक हैं इसी बहाने तुम्हारा टेस्ट भी ले रहे हैं कि तुम दर्द में भी मुस्कुराते रहोगे या रोना शुरु कर दोगे..”
मासूम आँखों में एक अजीब सी चमक देखी जिसने मेरे दिल पर मरहम लगा दिया..

क्रमश....   

मंगलवार, 29 मार्च 2011

चित्रों में हाइकु (त्रिपदम)



 प्यारी सी बेटी न्यूशा

चंचल  नैन
हर पल उड़ते हैं
पलकें पंख 

गुलाबी से हैं
आज़ादी के नग़में
सुरीले सुर

खुतकार सी
ये उंगलियाँ रचें
तस्वीर नई


वीरान पथ
निपट अकेली मैं
कोहरा गूँगा 

नीले सपने
गहरे भेद भरे
विस्तार लिए


साकी सा यम
मौत अंगूरी न्यारी
रूप खिलेगा/नशा चढ़ेगा/मोक्ष मिलेगा

मुत्यु प्रिया सी
इक दिन आएगी
गले मिलेंगे

(खुतकार=पेंसिल)


रविवार, 27 मार्च 2011

मासूम और नादान बच्चे



आज की ‘अरब न्यूज़’ में जब पाकिस्तानी बच्चे रिज़वान के मिलने की खबर पढ़ी
तो दिल को राहत मिली...11 साल का रिज़वान पकिस्तानी इंटरनेशनल स्कूल में  
छठी क्लास में पढ़ता है.. चार भाई बहनों में बड़ा है..गणित के पेपर की तैयारी के लिए
ट्यूशन गया था फिर नहीं लौटा....दो चार घरों की दूरी पर पैदल ही चला
जाया करता था उस दिन भी गया लेकिन डरा हुआ बाल मन....अगले दिन के पेपर
की पूरी तैयारी न हो पाई...कम नम्बर आने के डर से ट्यूशन पढ़के निकला और टैक्सी
करके मक्का पहुँच गया... जद्दा से मक्का टैक्सी से एक घंटे में पहुँच जाते हैं..पता नहीं रिज़वान
ने टैक्सी वाले को क्या कहा होगा जो उसे अकेले ही मक्का के हरम तक पहुँचा दिया.....
इधर माता पिता का बुरा हाल....याद आने लगा जब वरुण विद्युत को बोर्ड पेपरों के दिनों में
ऐसे ही छोड़ आया करते थे... जब तक वे घर नहीं लौटते थे, जान अटकी रहती थी... कई कहानियाँ सुनते थे जो अखबारों में छपती नहीं थी....इसलिए और भी डर लगता.... समझ सकती थी रिज़वान के माता पिता के दिल का हाल...खाना पीना सोना दुश्वार हो गया होगा....
कई लोगों ने उसे हरम में अकेले देखा होगा...शायद उसकी किस्मत अच्छी थी जो कुछ अच्छे लोगों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया..पुलिस ने रिज़वान के पिता को फौरन फोन किया और सही सलामत घर पहुँचा दिया..इस दौरान पाकिस्तानी काउंसिल जर्नल और सभी दोस्तों के प्यार और साथ ने ही उन्हें हौंसला दिया...
ऐसे कितने ही बच्चे हैं यहाँ जिनके मन को माता पिता समझ नहीं पाते....इसलिए बच्चे उनसे दूरी
बनाकर अपने मन की दुनिया में अकेले रहने लगते हैं..वहाँ का अकेलापन और भी तकलीफ़देह होता है. मातापिता अपने सपनों को पूरा करने के लिए बच्चों को साधन बनाते हैं जिसका बच्चों पर बहुत गहरा असर पड़ता है. बच्चे अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि किसी भी तरह वे अपने माँ बाप को खुश कर सकें जब ऐसा नहीं कर पाते तो कई तरह के गलत रास्ते चुन लेते हैं ....
पिछले दिनों रश्मिजी ने इसी समस्या पर दो लेख -- 1 2  लिखे जिन्हें सिर्फ पढ़ लेने से समस्या का हल नहीं मिलेगा बल्कि उन पर अमल किया जाए तो बच्चों की समस्याएँ तो हल होगीं घर परिवार में एक नई खुशी का आलम भी होगा. 

गुरुवार, 24 मार्च 2011

इंतज़ार है बस
























भरम में खड़े हैं शायद वो चलेंगे साथ दो कदम
तन्हा बुत से बने हैं उस पल का इंतज़ार है बस 
रुके हैं वहीं जहाँ से शुरु किया था सपनों का सफ़र
हो जाए शायद उनपर मेरी सदाओं का कुछ असर 
न हुए न होंगे कभी हमारे थे वो संगदिल सनम
दीवाने हुए थे यकीं था हमें भी मिलेंगे अगले जनम















सब्र कर लिया जब्त कर लिया बहते जज़्बातों को
पर कैसे रोकें दिल की दरारों से रिसते इस दर्द को........! 
                 

स्वार्थी मन कुछ कहता है ....


















सुबह की दिनचर्या से फुर्सत पाते ही पहला काम  होता है देश विदेश के समाचार जानना.. ताज़ी खबरों के साथ साथ पुरानी खबरों को दुबारा पढ़ना कम रोमांचक नहीं होता...जिस देश में रहते हैं पहले वहाँ की खबर जानने की उत्सुकता रहती है.
मध्यपूर्व देशों की अशांति देख कर एक अंजाना सा डर लगा ही रहता है कि कभी यहाँ भी ऐसा कुछ हो गया तो क्या करेंगे... कुछ असर तो साउदी अरब पर होना ही था .. असर देखा गया काले लबादो से ढकी 20-30 औरतों पर जो गृह मंत्रालय के बाहर अपने रिश्तेदारों की रिहाई की गुहार लगाने आ पहुँची थीं. कैदी जिस कारण से भी अन्दर हों या बिना ट्रायल सालों से कैद में हों...वह बाद की बात थी....
हैरानी इस बात की थी कि औरतें कानून तोड़ कर घरों से अकेली बाहर निकली थी.  ...जिन्हें अकेले घर से निकलने का अधिकार नहीं है.., ड्राइव करने का हक नहीं है..... उन्हें वोट देने का अधिकार कब मिलेगा, यह तो ऊपर वाला ही जाने.....लेकिन फिर भी उनमें से कुछ निडर औरतें बिना मर्दों के रियाद पहुँच गईं थी. सरकार गुस्से में थी कि बिना किसी इजाज़त के इस तरह धरने पर बैठने की हिम्मत कैसे हुई उन औरतों की. सरकार औरतों की आर्थिक मदद करती है जिनके भी मर्द किसी न किसी कारण जेल में बन्द होते हैं... अधिकतर लोग आतंकवाद से जुड़े होने के शक के कारण ही पकड़े जाते रहे हैं..
इसी तरह की हिम्मत देश के और भी कई इलाकों में देखने सुनने को मिली.. पिछले कुछ सालों से जद्दा में आई बाढ़ के कारण लाखों का नुक्सान हुआ..उससे नाराज़ लोगों ने आवाज़ उठाई कि राजा को इस बारे में कुछ सोचना चाहिए... बेरोज़गारी के कारण घर जुटाना भी एक आम अरबी के लिए बहुत मुश्किल काम है.... उनकी आवाज़ अभी उठी ही थी कि राजा के कान खड़े हो गए....
इतने सालों से जो नहीं हुआ था , आज अरब देशों में हो रही खतरनाक हलचल के कारण हो गया. अमेरिका में इलाज कराने गए किंग ने फौरन मिलियन बिलियन डॉलरज़ लोगों को दिए जाने का एलान कर दिया...खरीदे गए घरों की बाकि बची किश्तें माफ कर दी गई... रीयल एस्टेट्स को नए घर बनाने का आदेश दिया गया..क्यों कि 76% साउदी लोगो के पास रहने के लिए घर नहीं है और हर घर में कम से कम एक तो बेरोज़गार है ही.(यह आँकड़े फेसबुक के ज़रिए निकाले गए थे). बेरोज़गारों को मिलने वाला पैसा  बढ़ा दिया गया..... वेतन दुगुने कर दिए गए...बोनस भी साथ दिया गया....
बन्दर के मुँह में केला देकर कुछ वक्त के लिए तो मदारी उसे अपने बस में कर सकता है लेकिन कब तक....आग तो लग चुकी है.... गर्मी भी महसूस होने लगी है ... बस लपटों के आने का इंतज़ार है...
स्वार्थी मन कहता है पहले अपना हित फिर परहित.... मन ही मन दुआ करते हैं कि अभी यहाँ एक दो साल शांति रहे तो अच्छा है अपने लिए... !

शनिवार, 19 मार्च 2011

विदेश में बसना : चाहत या ज़रूरत









‘’बाऊजी, अब पूरी तरह से चारपाई पर हैं, उनका सब काम बिस्तर पर ही होता है. माताजी जल्दी ही थक जाती हैं. उनका चश्मा भी टूट गया है. बड़का शरारती होता जा रहा है. मेरी तो बिल्कुल नहीं सुनता और बाऊजी के बार बार बुलाने पर ही उनकी बात सुनता है. छोटे की तबियत वैसी ही है, धन्नीराम कम्पाउडर की दवाई से भी कोई असर नहीं हो रहा... आप बस जल्दी से आ जाइए... रूखा सूखा खाकर ही पेट भर लेंगे लेकिन रहेंगे तो एक साथ “

अमर अपनी पत्नी सरोज का ख़त पढ़ कर अतीत की यादों में डूब गया... एक बार पहले भी वह नौकरी छोड़ कर घर वापिस गया था.... दो साल तक कोई नौकरी नहीं मिली थी.... बैंक बैलेंस खत्म होता जा रहा था मुट्ठी से जैसे रेत खिसकती जाती हो.... सब रिश्तेदार जो मदद करने की बात करते थे सब मुँह मोड़ चुके थे.... व्यापार करने की सोची तो हिस्सेदार ने 50,000 लिखा पढ़ी से पहले ही हजम कर लिए थे.... गैस ऐजेंसी लेने की सोची थी तो 10,000 रिश्वत देकर भी काम नहीं बना था.... मजबूरन फिर वापिस आना पड़ा था.

“मेरी प्यारी बन्नो, खुशखबरी मिली कि मुन्नी अपने ससुराल में खुश है, वह अपना मायका भूल गई है...यह तो बड़ी खुशी की बात है... तसल्ली हुई ... अपने बेटे को भी अच्छी नौकरी मिल गई है..अपनी मनपसन्द लड़की से उसने शादी भी कर ली....चलो कोई बात नहीं....बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी है.... दोनों खुश रहें बस यही दुआ है. सुना है उसे कम्पनी की तरफ से घर और कार भी मिली है....

अब हम दोनों के बनवास के दिन पूरे हो गए....जैसा तुम चाहती थी....हमारा सपनों का घर भी बन कर तैयार हो गया है...उम्मीद है कि तुमने अपनी पसन्द से उसे सजा भी लिया होगा...”

एक महीने बाद लाल सिंह को खबर मिलती है कि सब कुछ बेच बाच कर बेटा बहू इंगलैंड चले गए..माँ से धोखे से काग़ज़ों पर साइन करवा लिए थे... माँ को गाँव बुआ के पास छोड़ गया...विधवा बुआ जिसकी कोई औलाद नहीं थी ,,,वह खुद ही खस्ताहाल में थी... दोनों औरतें अपनी अपनी किस्मत पर रोतीं दिन गुज़ार रही थी... लाल सिंह को अब नए सिरे से पैसा जमा करने हैं...गाँव के उस घर की कच्ची छत की जगह पक्का लंटर डलवाना है...इस्तीफा देने की बात उसे न चाहते हुए भी भुलानी पड़ी...

परिवार की ज़रूरते इतनी होती हैं कि न चाहते हुए भी अपने घर परिवार से दूर होना पड़ता है... अपने देश में 5000 रुपए महीना की कमाई अगर विदेश में 40,000 रुपए के रूप में मिले तो ज़रूरतमन्द विदेश का ही रुख करेगा...

ऐसी हज़ारों कहानियों का ठिकाना साउदी अरब ही नहीं है...शायद हर वह देश है जहाँ लोग आ बसे हैं अलग अलग कारणों से.... यहाँ सबकी नहीं तो अधिकतर लोगों की यही कहानी है.....’’पेट जो कराए सो थोड़ा”

कुछ लोग गलती से आ बसे तो फिर बुरी तरह से जकड़े गए... घर परिवार होने के कारण खतरा मोल लेने का जोख़िम न उठा पाए.... चुपचाप किस्मत का लिखा मान कर कोल्हू के बैल की तरह परिवार को पालने पोसने में लगे रहे... पैसा कमाना कहीं भी आसान नहीं ... चाहे देश हो या विदेश .... मेहनत मशकत तो हर जगह एक जैसी है.... थोड़ी बहुत सुख सुविधाएँ हर देश के रहन सहन के स्तर के कारण मिल पाती हैं....

जहाँ तक सुख सुविधाओं की लालसा है....उसका कोई पार नहीं...जब भी गाँव जाती हूँ तो वहाँ के लोगों की नज़र शहर की ओर होती है...स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे इसी इंतज़ार में अपनी पढ़ाई खत्म करने के लिए बेसब्र हुए जाते हैं कि कब वे शहर जा पाएँगे क्योंकि उनके मातापिता की भी यही चाहत होती है.... शहर में आकर ऐसे परिवार दिखते हैं जो बच्चों को विदेश भेजने की तैयारी में जुटे हैं....बुढ़ापे में चाहे वही फिर अपने बच्चों को कोसने से भी नहीं हिचकते..... यहाँ विदेश में दिखता है कि ज़्यादातर लोगों में दुनिया के अलग अलग देशों में जाने की होड़ सी लगी है.....

विदेश में रहना किसी के लिए ज़रूरत हो सकती है...किसी के लिए चाहत हो सकती है..... इस बात को भी नहीं नकार सकते कि किस्मत का भी कुछ न कुछ हाथ तो होता ही है.....कुछ लोग न चाह कर भी विदेश में रह रहे हैं...और कुछ चाह कर भी विदेश नहीं जा पाते...इसे शायद “अन्न जल की माया” कहते हैं.....

ऐसे में अगर कोई यह कह दे कि आपको तो अपने देश से प्रेम ही नहीं है, विदेश में ठाठ से रहिए तो दिल दर्द से सुलगने लगता है...!

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

एक नया सफ़रनामा








एक हफ्ते से सोच रहे हैं कि कैसे पतिव्रता नारी बन कर दिखाएँ... इतने दिनों बाद रियाद लौटे हैं.... पतिदेव की कुछ सेवा की जाए...... लेकिन साहब हैं कि हम से पहले ही उठ कर तैयार हो कर ..नाश्ता वाश्ता करके हमें ‘गुड मॉर्निग’ कह कर निकल जाते हैं....नींद को झटका देकर जब तक आँख खुलती है तो वे निकल चुके होते हैं....

सारा दिन इसी सोच में गुज़र जाता है कि अगले दिन पक्का उठेंगे....

अभी तक तो सफ़लता मिली नहीं ,,,, जाने कल .......

घर के सामने ही मस्ज़िद है... फ़ज़र की अज़ान बहुत ज़ोरों से होती है लेकिन न जाने क्यों हमें ही सुनाई नहीं देती..विजय के लिए अज़ान सुनते ही फौरन उठ जाते हैं...आँखों पर सूरज की तेज़ किरणें दस्तक देतीं हैं तो नींद खुलती है.......खिड़की खोलते हैं तो उसी मस्ज़िद की मीनार के पीछे से चिलकता सूरज आग उगलता सा घूरता सा देख रहा होता है..... सूरज को प्रणाम करके वहीं खिड़की की ओट में बैठ जाते हैं..प्रणाम करते ही सूरज देवता प्रसन्न हो जाते हैं....ताज़ी हवा का झोंका और सूरज की मुस्कुराहट तन मन को गहरे तक तरो ताज़ा कर देती हैं... बरसों बाद ऐसा मौका मिला है कि बिस्तर पर बैठे बैठे ही उदय होते सूरज को निहारने का मौका मिल रहा है...

वहीं बैठ कर सुबह की पहली चाय की चुस्कियाँ लेती हूँ... कभी कभी यह एकांतवास भी मन को अच्छा लगता है ....दिल्ली में काम वाली बाई की खटपट , धोबी और कूड़ा ले जाने वाले की आवाज़ें... कबाड़ी और सब्ज़ीवाले की सुरीली तानें ...कुछ भी तो नहीं सुनाई देता.... चार पाँच बार अज़ान की सदा और आती जाती कारों की आवाज़ें .... बस...इतना ही.... हॉर्न तो यहाँ बजता ही नहीं....

विजय जानते हैं कि यहाँ आकर हम लिखने पढने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकते.... इसलिए अपना लैपटॉप घर पर रख कर जाते हैं... मेरा लैपटॉप रिपेयर के लिए गया हुआ है... खैर...... लिखने से ज़्यादा पढने का भूत सवार रहता है ...... जाने क्यों.... शायद अपने ही मन की बात किसी न किसी ब्लॉगर के लेखन में पढ़ कर महसूस होता है कि यही तो था मेरे मन में...उन्हें पढ़कर बेहद सुकून मिलता है....


मंगलवार, 15 मार्च 2011

ब्लॉग जगत के सभी नए पुराने मित्रों को प्रणाम !

मानव प्रकृति ऐसी है कि एक बार जिससे जुड़ जाए फिर उससे टूटना आसान नहीं होता चाहे फिर 7 महीने और 10 दिन का अंतराल ही क्यों न आ जाए.... इससे पहले भी लम्बे अंतराल आए लेकिन घूम फिर कर फिर आ पहुँचते इस विराट वट वृक्ष की छाया तले..... जड़े गहरी हैं... शाखाएँ अनगिनत...हर बार नन्हीं नन्हीं नई शाखाएँ उभरती दिखाई देतीं.... पुरानी और भी मज़बूत होती , जड़ों से जुड़ती दिखती हैं.....

आजकल एकांतवास में हैं...सहेज कर रखे हुए अपने ब्लॉग को एक अरसे बाद जतन से खोला....एक अजब सा भाव मन को छू गया.....उदास , ख़ामोश और खाली खाली सा लगा.... पहले सोचा वादा करते हैं कि अब नियमित आते रहेंगे, फिर सोचा नहीं नहीं.... अगर न पाए तो....... कितनी बार ऐसा हो चुका है कि नियमित होने का वादा निभा नहीं पाए......

जब भी मौका मिलेगा ज़िन्द्गी के इस सफ़र की छोटी छोटी यादों का ज़िक्र करने आते रहेगे.....

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

मैं अपराधिनी.....!

पिछली पोस्ट में अपने आप को अनफिट कहा क्योंकि अपने देश के साँचे में फिट होने के लिए तपने की ज़रूरत है, वैसा न करके हम पाप के भागीदार हो जाते हैं..... आज कहती हूँ कि मैं अपराधिनी भी हूँ ..... अत्याचार करने वाले से अधिक अत्याचार सहने वाला दोषी होता है...... कई दिनों का मौन आज टूटा जब रसोईघर की अल्मारियों को अन्दर से पैंट करने के लिए खोला गया....... पड़ोसी ने बेदर्दी से किचन की दीवार ऐसे तुड़वाई जिसे देख कर एक और सदमा लगा..... किचन केबिनेट के अन्दर टूटी दीवार देख कर दिल बैठ गया..... इंसान इतना स्वार्थी हो गया है कि एक पल के लिए नहीं सोचता कि खाली हाथ आए हैं खाली हाथ ही जाना है.....
मन ही मन अपने आप को कई नाम से पुकारने लगती हूँ....कभी अपने आप को कोसती हूँ कि क्यों नहीं घर के बाहर खड़ी होकर ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर पड़ोसी की सोई हुई आत्मा को जगा दूँ.... फिर खुद ही अपने आप पर हँसने लगती हूँ ..... सोई हुई आत्मा को तो जगाया जा सकता है लेकिन जहाँ आत्मा मर चुकी हो वहाँ पत्थर पर सिर पटकने वाली बात हो जाती है........
कहा जाता है 'यथा राजा, तथा प्रजा' फिर लोगों को दोष देने का कोई लाभ नहीं..... घर के पिछवाड़े पानी की अनगिनत टंकियाँ बहती हुई देख कर लगता है जैसे इंसानियत बह कर गटरों में गुम हो रही है...... क्यों न हो...जब देश के नेता दूध के टैंक सड़कों पर बहाते हुए नहीं सोचते कि हज़ारों नवजात शिशु दूध के बिना मर जाते हैं....

















डी.डी.ए के बन्द फ्लैट की किचन के ऊपर टॉयलेट.... !!!!