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गुरुवार, 8 मई 2014

नो वुमेन नो क्राई..नो नो...वुमेन नो ड्राइव

तुम बहुत नाज़ुक हो कोमल हो
बला की खूबसूरत हो तुम
चेहरा ढक कर रखो हमेशा
बुर्के में रहो बिना मेकअप के
आँखों पर भी हो जालीदार पर्दा
काजरारी आँखें लुभाती हैं ............
मर्द मद में अंधा हो जाता है
ग़र कोई मर्द फिसल गया
अपराधी कहलाओगी

तुम बहुत नाज़ुक हो कोमल हो
तुम घर के अंदर महफ़ूज़ हो
तुम्हारे पैर बेहद नाज़ुक हैं
दुनिया की राहें हैं काँटों भरी
मैं हूँ न तुम्हारा रक्षक
बाकि सारी दुनिया है भक्षक ..........
घर की चारदीवारी में रहो
पति परिवार की प्यारी बनकर
मेरे वारिस पैदा करो बस

तुम बहुत नाज़ुक हो कोमल हो
मैं शौहर हूँ और शोफ़र भी
कार की पिछली सीट पर बैठी
राजरानी पटरानी हो तुम मेरी
औरत के लिए ड्राइविंग सही नहीं ...........
डिम्बाशय गर्भाशय रहेंगे स्वस्थ
मुश्किलें और भी कई टलेगीं
ड्राइव करना ही आज़ादी नहीं
मर्द ही निकलते हैं सड़कों पर

ऐ औरत ! ख़ामोश रहो !
आज़ादी की बेकार बातें न करो
सौ दस कोड़े खाकर क्या होगा
जेल जाकर फिर बाहर आओगी
फिर आज़ादी का सपना लोगी
हज़ारों हक पाने को मचलोगी ............
हसरतों की  रंगबिरंगी पर्चियाँ
बनाओ दफ़नाओ,बनाओ दफ़नाओ
बस यही लिखा है तुम्हारे नसीब में

आख़िरी साँस तक लड़ने की ठानी .........
क्या है आज़ादी  समझ गई औरत !





18 टिप्‍पणियां:

  1. हे औरत ,सच्चाई ये है तुम बस हमारे मनोरंजन और सेवा के लिए हो.आगे बढ़ने की क्या ज़रूरत ?

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  2. @प्रतिभादी,,,जानती हूँ यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है लेकिन जहाँ हम रहते हैं वहाँ की घटनाओं का गहरा असर होता है,,दिल घुटने लगा था जैसे साँस लेना दूभर हो सो लिख दिया..

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  3. कडुवे सच को लिखा है ... कई बार कलम का सहारा कितना मजबूत होता है ...

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बाबा का दरबार, उंगलीबाज़ भक्त और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. चलो शुरु करें लड़ना । साथ साथ । झूठ नहीं सच कहने की कोशिश कर रहा हूँ।

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  6. समझ रही हूँ मीनाक्षी,
    ऊँची-ऊँची दीवारों की बात पढ़ कर ही समझ में आने लगा था .और आज ,कैसा लगता होगा इसका अनुमान कर लिया.उन निरीहों जीवन कैसा होगा जो मौन प्रतिबंधित रहने को विवश हैं !
    आखिर कब तक ?

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    1. दी , हर औरत के वजूद की अनगिनत दर्दभरी कहानियाँ हैं ।

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  7. तुम बहुत नाज़ुक हो कोमल हो
    बला की खूबसूरत हो तुम
    चेहरा ढक कर रखो हमेशा
    बुर्के में रहो बिना मेकअप के
    आँखों पर भी हो जालीदार पर्दा
    कजरारी आँखें लुभाती हैं ............
    मर्द मद में अंधा हो जाता है
    ग़र कोई मर्द फिसल गया
    अपराधी कहलाओगी

    वाह रे मर्द(?)
    फिसलोगे तुम और अपराधी औरत ?!


    ऐ औरत ! ख़ामोश रहो !
    आज़ादी की बेकार बातें न करो
    सौ दस कोड़े खाकर क्या होगा
    जेल जाकर फिर बाहर आओगी
    फिर आज़ादी का सपना लोगी
    हज़ारों हक पाने को मचलोगी ............
    हसरतों की रंगबिरंगी पर्चियाँ
    बनाओ दफ़नाओ,बनाओ दफ़नाओ
    बस यही लिखा है तुम्हारे नसीब में

    उफ़्फ़ ! औरत की यह स्थिति तो आदिम युग से भी बदतर है...



    आदरणीया मीनाक्षी जी
    बहुत विचारोत्तेजक है आपकी कविता
    इससे मुस्लिम औरत की नारकीय स्थिति स्पष्ट है।
    कब तक इन औरतों को इनके अधिकार से वंचित रखा जाएगा ?

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  8. ए औरत खामोस रहो यही सच में है मर्द की मानसिकता। तुम बहुत नाजुक हो कोमल हो ये तो ऊपर का मुलामा है। बहुत सुंदर मीनाक्,ी जी बहुत दिनों बाद आई आपके द्वार।

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    उत्तर
    1. आशाजी आपका आना हमेशा अच्छा लगता है , मैंने भी बहुत दिनों बाद फिर से लिखना शुरु किया ।

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  9. कटु सत्य .... हकीकत को रेखांकित करती पोस्ट....

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  10. इस सच के आगे कितना ठहराव होगा और कब तक !

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  11. oh! कितना मुश्किल है ऐसे किसी स्थान पर रहना !

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