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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

स्मृति-दंश














ख़ाली आँखें
रेगिस्तान अपार
वीरानापन

पीछा करती
सपनों के हैं साए
छूना है बस

स्वप्न सलोना
पा लूँगी इक दिन
विश्वास भरा

खुश्बू प्यार की
महकते हैं प्राण
खिला जीवन

स्वर्णिम पल
मिलन अलौकिक
स्मृति-दंश



19 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय मीनाक्षी जी
    नमस्कार !
    अद्भुत सुन्दर रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

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  2. अरसे बाद .....पढना अच्छा लगा ....

    ..हाइकू लिखना भी एक कला है

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  3. सटीक हाईकू...सुंदर विचार.
    बधाई और शुभकामनाएं |

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  4. @संजय..शुक्रिया
    @डॉअनुराग..अरसे बाद आपको यहाँ देखना अच्छा लगा
    @समीरजी...धन्यवाद
    @अभि..शुक्रिया
    @संगीताजी,,आभार
    @डॉवर्षा...आपकी टिप्पणी तो बहुत बढ़िया रही... जिसके कारण आपके दोनों ब्लॉग़ घूम आए... खूबसूरत गज़ले...सुन्दर गीत...मनमोहक चित्र...
    और जीवंत रंग मन को मोह गए.... आभार..

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 19 - 04 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. बहुत सुंदर और संजीदगी से लिखी कविता बधाई

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  7. shabdon ke aagosh men bhavnaon ka khilkhilana,manmomak to hota hai,sarthak bhi .bodhgamya rachana.
    shukriya

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  8. उत्तम त्रिपद . मन अह्वलादित हुआ .

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  9. पावर पैक्ड हायकू, बहुत अच्छे लगे सारे के सारे. बधाई.

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  10. स्वप्न सलोना

    पा लूँगी इक दिन

    विश्वास भरा

    **************

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..

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  11. सीमित शब्द ....
    आनंद की लहरें भरे
    विस्तार अपार ......!!!
    सुंदर हाइकु ....बधाई |

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