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शुक्रवार, 4 जून 2010

मेरे घर के आँग़न में









एक जून , मंगलवार की रात शारजाह एयरपोर्ट उतरे.. ज़मीन पर पैर रखते ही जान में जान आई... जब भी हवाई दुर्घटना की खबर पढ़ते तो एक अजीब सी बेचैनी मन को घेर लेती... फिर धीरे धीरे मन को समझा कर सामान्य होने की कोशिश करते.... लेकिन रियाद से दुबई आने से पहले एक बुरा सपना देखा था जिसमें दो हवाई जहाज आसमान में आपस में टकरा कर गिर जाते हैं और हम कुछ नहीं कर पाते...जड़ से आकाश की ओर देखते रह जाते हैं...

पैसे की बचत की दुहाई देकर हमने पतिदेव से कहा कि बस से चलते हैं जो बहुत आरामदायक होती हैं...लेकिन 12 घंटे के सफ़र की बजाए डेढ़ घंटे का सफ़र ज़्यादा सही लगा उन्हें और अंत में हवाई यात्रा ही करनी पड़ी.... सालों से सफ़र करते हुए हमेशा ईश्वर पर विश्वास किया ..ऐसे कम मौके आए जब हमने विश्वास न किया हो और बाद में लज्जित होना पड़ता...सोचते सोचते दुखी हो जाते कि कितने एहसानफ़रामोश हैं जो उस पर शक करके भी सही सलामत ज़मीन पर उतर आते हैं...

मंगलवार की रात नीचे उतरे तब भी ऐसा ही महसूस हुआ... फिर से उस असीम शक्ति से माफ़ी माँगी और छोटे बेटे को गले लगा लिया जो लेने आया था.....एयरपोर्ट शारजाह में और घर दुबई में ...दूरी लगभग 35-40 किमी....पहली बार बेटा ड्राइविंग सीट पर था और पिता पिछली सीट पर मेरे साथ बैठे थे.....120-130 की स्पीड पर कार भाग रही थी लेकिन डर नहीं लगा शायद धरती का चुम्बकीय आकर्षण....ममता की देवी माँ की गोद में बच्चे को बिल्कुल डर नहीं लगता लेकिन पिता की गोद में बच्चा फिर भी डरता है... उसका अतिशय बलशाली होना भी शायद बच्चे को असहज कर देता है, शायद मुझे धरती माँ भोली भाली से लगती है और आसमान गंभीर पिता जैसे लगते....

11 बजे के करीब घर पहुँच गए....अपनी तरफ से दोनो बच्चों ने घर को साफ सुथरा रखा हुआ था... बड़े बेटे के हाथ की चाय पीकर सारी थकान ग़ायब हो गई....फिर सिलसिला शुरु हुआ छोटी छोटी बातों पर ध्यान देने का.... डिनर का कोई इंतज़ाम नहीं था... बड़े ने लेबनानी खाना और छोटे ने 'के.एफ.सी' पहले ही खा लिया था...छोटा बेटा हमें घर छोड़ कर किसी काम से बाहर निकल गया, यह कह कर कि वह जल्दी ही खाना लेकर लौटेगा लेकिन महाशय पहुँचे देर से....

जब भी आवाज़ ऊँची होने को होती है तो जाने कैसे दिल और दिमाग में चेतावनी की घंटी बजने लगती है और हम दोनो ही शांत हो जाते हैं.... बच्चे खुद ब खुद समझ कर माफ़ी माँगने लगते हैं....मुस्कुरा कर हमारी ही कही बातें हमें याद दिलाने लगते हैं कि इंसान तो कदम कदम पर कुछ न कुछ नया सीखता ही रहता है और माहौल हल्का फुल्का हो जाता .... मुक्त भाव से खिलखिलाते परिवार को देख कर मुक्त छन्द के शब्द भी भावों के साथ मिलजुल कर खिलखिला उठते......


मेरे घर के आँगन में...

छोटी छोटी बातों की नर्म मुलायम दूब सजी

कभी कभी दिख जाती बहसों की जंगली घास खड़ी

सब मिल बैठ सफ़ाई करते औ’ रंग जाते प्रेम के रंग....


मेरे घर के आँगन में......

नन्हीं मुन्नी खुशियों के फूल खिले हैं..

काँटों से दुख भी साथ लगे हैं...

खुशियाँ निखरें दुख के संग ...


मेरे घर के आँगन में .....

नहीं लगे हैं उपदेशों के वृक्ष बड़े..

छोटे सुवचनों के हरे भरे पौधे हैं....

खुशहाली आए सुवचनों के संग..


मेरे घर के आँगन में...

पता नहीं क्यों बड़ी बड़ी बातों के

खट्टे खट्टे नीम्बू नहीं लगते..

छोटी छोटी बातों की खुशबू तो है...


मेरे घर के आँगन में....

उड़ उड़ आती रेत जलन चुभन की

टीले बनने न देते घर भर में

बुहारते सरल सहज गुणों से


मेरे घर के आँग़न में

उग आते मस्ती के फूल स्वयं ही

उड़ उड़ आते आज़ादी के पंछी

आदर का दाना देते सबको


मेरे घर के आँग़न में

विश्वास का पौधा सींचा जाता

पत्तों को गिरने का डर नहीं होता

प्रेम से पलते बढ़ते जाते..


मेरे घर के आँगन में....

बहुत पुराना प्रेम वृक्ष है छायादार

सत्य का सूरज जगमग होता उस पर

देता वो हम को शीतलता का सम्बल हर पल


27 टिप्‍पणियां:

  1. आईये जाने ..... मन ही मंदिर है !

    आचार्य जी

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  2. सबका ही घर आँगन ऐसा हो .....

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  3. आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

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  4. सुबह सुबह इतने सुन्दर विचार पढ़ मन प्रशां हो गया...यूँ ही घर के आँगन में प्यार और विश्वास की महक बानी रहे ...

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  5. nimitt aap ho... bhaw hr maa ke yhi hai.jo aapne likhe hai. prabhu kripa hai jo aap mn ki bato ko kagaj pr chitrit kr deti ho. very nice.

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  6. एक सुन्दर शब्द - चित्र मनोभावों का।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  7. आपके घर का आँगन,
    भगवान करे,
    नित अमृत बरसाये,
    आपकी आशाओं पर ।

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  8. सच में ऐसा ही लगता है जी हमें भी...आसमान पिता...धरती माँ....

    और घर-आँगन के जो शब्द-चित्र बनाए है....वो तो ....वाह!बहुत दिनों बाद घरवालो से मिलने का आनंद....अविस्मर्णीय अनुभव....

    कुंवर जी,

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  9. ऐसे ही बना रह..बहुत शुभकामनाएँ.

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  10. बड़ी सहजता से आपने मन के भाव कह दिए हैं ...कुछ पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं ।

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  11. आपका घर आँगन ऐसे ही खुशबुओं से गमकता रहे...बहुत ही सुन्दर संस्मरण...ये पिता जैसे गंभीर आसमान और ममतामयी धरती की उपमा बहुत अच्छी लगी...

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  12. ghar pahuchne par mann ko ko sakoon milta hai vo jhalak raha hai aapki is post par...

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  13. परिवार में आत्मीयता बनी रहे,तो जीवन सहज हो जाता है. सशक्त लेखनी से आपने इस तथ्य को रेखांकित किया है.

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  14. यह रचना बहुत अच्छी लगी...मन को छू गई....

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  15. आईये जानें .... मैं कौन हूं!

    आचार्य जी

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  16. आपका सुनहरा आँगन सदा यूँ ही महकता रहे ...

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  17. आपका घर आँगन यूँ ही सदाबहार रहे...छोटी छोटी खुशिया निरंतर आती रहें...बहुत खूबसूरत पोस्ट लिखी है आपने...बहुत दिनों से पढ़ा नहीं था आपको आज खिंचा चला आया और आपको पढ़ कर खुश हो गया...

    नीरज

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  18. कल मंगलवार को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है



    http://charchamanch.blogspot.com/

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  19. jab aangan ki fasal itni acchhi hogi to aangan ki byaar acchhi hi hogi.bahut nirmal kavita. badhayi.

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