
डरा कपोत
बिल्ली टोह में बैठी
बचेगा कैसे
**
सोचा मैंने भी
खामोश हूँ क्यों
बैठी जड़ सी
**
क्या मैं ऐसी हूँ
तटस्थ या नादान
भावुक जीव
**
पंछी आज़ाद
आँख कान थे बंद
ध्यान मग्न था
**
मैं-मैं या म्याऊँ
करते प्राणी सब
कौन मूर्ख
**
सभी निराले
गुण औगुण संग
स्वीकारा मैंने
प्रशंसनीय
जवाब देंहटाएंये तो त्रिपदम् ग़ज़ल हो गई!
जवाब देंहटाएंबढियां
जवाब देंहटाएंबेहद ही खुबसूरत और मनमोहक...
जवाब देंहटाएंबड़े दिन बाद...आनन्द आया.
जवाब देंहटाएंबहुत खूब!
जवाब देंहटाएंBahut achchhe lage aapke haikoo.Badhai!!
जवाब देंहटाएंत्रिपदम् गज़ल । वाह ।
जवाब देंहटाएंTasveer aur rachnayen..sabkuchh bahut khoobsoorat hai!
जवाब देंहटाएंवाह !
जवाब देंहटाएंबहुत खूब !
कलात्मक सुन्दर अभिव्यक्ति...
जवाब देंहटाएंउत्कृष्ट हाइकू ।
जवाब देंहटाएंगुड हैं जी। वेरी गुड हैं।
जवाब देंहटाएंachha hai....is vidha me aor likhiye...
जवाब देंहटाएं