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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

पलकों में सजी यादें ... ! 2










अनायास ही पलकों में सजी यादें पिछली पोस्ट की ज़मीन पर उतरती चली गईं. पलकों पर सजी कुछ और भी यादें हैं, जो हौले हौले से फिर एक नई पोस्ट की ज़मीन पर उतरने लगीं. कुछ यादें जमी हैं जिन्हें खींच कर निकाला तो कोमल पलकें भी साथ ही उतर आएँगीं. कुछ यादें पलकों पर ही सजी रहती हैं तो कुछ यादें झर जाती हैं...!
साउदी अरब अपने आप में एक खास देश है जहाँ हमने अपनी गृहस्थी शुरु की और खट्टी मीठी यादों का दस्तावेज़ तैयार हुआ. विजय पूरी कोशिश करते कि हमें किसी तरह की कोई कमी महसूस न हो. लेकिन सुविधाओं से सम्पन्न घर होने पर भी धीरे धीरे लगने लगा जैसे मैं सोने के पिंजरे में फड़फड़ाती चिड़िया हूँ जिसके पंख जमते जा रहे हैं. खुले आकाश में उड़ने की लालसा बढ़ने लगी. खिड़की पर पड़े मोटे पर्दों से दम घुटने लगा. धूप के छोटे से टुकड़े को मन तरसने लगा.
विजय ऑफिस के लिए खुद तैयार होते और चुपचाप निकल जाते, बाद में हम माँ बेटे की नींद खुलती. विजय बोलते सुबह उठने की ज़रूरत नहीं लेकिन सोकर भी समय काटो तो कितना....! इत्मीनान से वरुण की देखभाल और घर का कामकाज निपटाते. वरुण के काम, घर की सफाई, खाना पकाना बस... ! बाहर जाने के लिए पति का इंतज़ार.
एक दोपहर विजय ने फोन करके तैयार रहने को कहा कि हमें धूप लगवाने के लिए ले जाने आ रहे हैं. सोचने पर मजबूर हो गए जैसे दाल, चावल या गर्म कपड़ों को धूप लगवाई जाती है वैसे ही हमें भी.... फिर भी घर की चारदीवारी से निकलना नियामत होता. कुछ देर खुले आकाश के नीचे , खुली हवा में साँस लेने का अलौकिक आनन्द,,,,, उस भावना का बखान कैसे करें, शब्द नहीं हैं... सूरज की चमचमाती किरणें बाँहों में भर लेतीं. हवा गालों को थपथपा कर निकल जाती.
घर वापिस लौटते तो वरुण खूब रोता, घर के अन्दर जाने का नाम नहीं. एक बार फिर नज़रबन्द हो जाते. अन्दर घर में कैद और बाहर काले बुरके में कैद कभी उस देश को कोसते तो कभी विजय को. विजय बार बार कहते, "लव इट ऑर लीव इट". सोचने पर मज़बूर हो जाते कि छोड़ना या तोड़ना आसान होता है मतलब विपरीत परिस्थितियों से भाग जाना. छोड़ सकते नहीं थे सो प्यार करना ही शुरु कर दिया. जिसे हम प्यार करना शुरु कर देते हैं तो कुछ भी बुरा नहीं लगता और धीरे धीरे हमें उस देश से प्यार होने लगा जहाँ हमारा परिवार पलता था.
इसी बीच परिवार में एक और नया सदस्य आ गया बेटे विद्युत के रूप में. पड़ोस में रहने वाले अकबर साहब की नई नवेली दुल्हन सलमा आ गई. हमें एक प्यारी सी दोस्त मिल गई. अकबर साहब हैदराबाद के और सलमा लखनऊ की. लखनऊ और हैदराबाद की नौंक झौंक में खूब मज़ा आता. हिन्दी पढ़ाने के लिए इंडियन एम्बैसी के स्कूल में एप्लाई किया तो फट से नौकरी मिल गई.
साउदी कानून समझने लगे. काले बुरके के साथ काला दुपट्टा पहनना कभी न भूलते. जानते थे कि अगर कभी मतुए ने पकड़ लिया तो सबसे पहले पति का इक़ामा(परिचय-पत्र) नम्बर नोट कर लिया जाएगा. तीन बार नम्बर नोट हुआ तो देश से बाहर. जहाँ फैमिली एलाउड होती वहीं जाते चाहे वह बाज़ार हो , रेस्तराँ हो या पार्क हो. कभी कभी कार में बैठे रहते और विजय वीडियो लाइब्रेरी से कैसेटस ले आते क्योंकि औरतें दुकान के अन्दर नहीं जा सकतीं.
कुछ बाज़ार हैं जो सिर्फ औरतों के लिए हैं. पति और ड्राइवर बाहर बैंचों पर ही बैठे रहते हैं. कुछ बाज़ार सुबह औरतों के लिए और शाम को फैमिलीज़ के लिए हैं. बैचुलर्ज़ के लिए शुक्रवार का दिन होता. भिनभिनाती मक्खियों से दूर दूर तक फैले हुए आदमी दिखाई देते. एक-दूसरे से मिलते. देश जाने वाले लोगों को पैसे और सौगात भेजते, आने वालों से चिट्ठी-पत्री और और घर से आई सौगात लेते. अपने अपने परिवारों का हाल-चाल पूछते. घर की नहीं, पूरे गाँव की खबर सुनते और बस इसी में ही सन्तोष पा जाते.

साउदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ नमाज़ के वक्त सारे काम बन्द हो जाते हैं.फज़र की नमाज़ तो सुबह सवेरे चार बजे के करीब होती. उसके बाद की चार नमाज़ों की अज़ान होते ही शटर डाउन. मतुओं की बड़ी बड़ी ज़ी एम सी गाड़ियाँ घूम घूम कर कामकाज बन्द कर के नमाज़ पढ़ने की हिदायत देती हुई दिखाई देतीं. एक और खास बात कि साउदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ स्टेडियम में हज़ारों पुरुष खेल देखने के लिए एक साथ बैठते. यह बात गिनिज़ बुक में भी दर्ज़ है.
अन्य धर्मों के पूजा स्थल नहीं और न ही मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल. वीकैण्ड्स पर कुछ दोस्त एक-दूसरे के यहाँ मिलते और बारबीक्यू करते. बस यही एक मनोरंजन का साधन होता. कभी कभी शहर से दूर इस्तराहा (एक विला जिसमें कुछ कमरे स्विमिंग पूल और खेलने का छोटा सा स्थान) बुक कराके 8-10 परिवार जन्मदिन और शादी की सालगिरह भी मना लेते.
जीवन नई नई कहानियों के साथ पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ता गया. वहाँ रिश्तेदारों को वीज़ा मिलना मुश्किल है सो दोस्त ही रिश्तेदारों की भी भूमिका निभाते हैं. एक दूसरे के दुख सुख में काम आते लेकिन वह भी पति के भरोसे, जो काम से लौट कर ही कहीँ मिलने मिलाने ले जा पाते. दिल को खुश रखने के लिए सोचा करते कि हम बेगम से कम नहीं. पति शौहर ही नहीं शौफ़र भी हैं जो चौबीस घंटे डयूटी बजाते हैं.

12 टिप्‍पणियां:

  1. सच बहुत मुशकिल होता है किसी अनजाने देश में और वो भी अलग संस्कृती वाले देश में जा कर बसना। हम आप की त्रासदी महसूस कर सकते हैं। ये जान कर सकून है कि अब आप इसकी अभयस्त हो गयी हैं ।

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  2. ये सब पहली बार पढा। दिल मे चाह थी कि यहाँ कुछ वर्ष रहते। पर अब तो लग रहा है जहाँ है वही भले है। चित्र अच्छे है।

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  3. ठीक ही तो कहा, 'सोने का पिंजड़ा ...'

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  4. meenakshi jee,
    saadar abhivaadan. beshak yaadein aapkee hain magar unhein sanjo hum bhee rahe hain. aap bus bataatee jaayein, sunaatee jaayein, dikhaatee jaayein.

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  5. वाकई, ऐसी जगह पर रहना शायद ही पसंद करूं मै !!

    विवरण बढ़िया दिया है आपनें, ऐसे ही जारी रखें!!

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  6. सच ही कहा है आपने मीनाक्षी जी।
    हमारी एक ननद इरान मे रहती थी उनसे हम इस तरह की बातें सुना करते थे।

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  7. सोचने पर मजबूर हो गए जैसे दाल, चावल या गर्म कपड़ों को धूप लगवाई जाती है वैसे ही हमें भी....

    छोड़ना या तोड़ना आसान होता है मतलब विपरीत परिस्थितियों से भाग जाना. छोड़ सकते नहीं थे सो प्यार करना ही शुरु कर दिया. जिसे हम प्यार करना शुरु कर देते हैं तो कुछ भी बुरा नहीं

    sach hi to kaha hai aapne

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  8. इसी तरह की कहानियाँ ताउजी के लड़के भी सुनाते है - और इसीलिए मेरे साथ काम करने वाले एक मित्र यहाँ आए - [हाँ वो मिस्री महिला द्वारा पुलिसिए को हड़काना भी लिखा जाएगा क्या ?] - मनीष

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  9. अनिता जी ने ठीक ही कहा है कि "बहुत मुशकिल होता है किसी अनजाने देश में और वो भी अलग संस्कृती वाले देश में जा कर बसना।"वैसे आपने वहाँ की सही तस्वीर सामने रखी है , मैं तो एक पल भी न रहूँ ........!

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  10. दी बिलकुल सही लिखा है आपने...

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