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शुक्रवार, 4 जनवरी 2008

लीच/जौंक

जाने किस झोंक में मैंने
जौंको को अपनी पीठ पे छोड़ दिया !

मीठा मीठा दर्द जिन्होंने मेरे खून में घोल दिया
जाने क्यों उठती आहों को मैंने आने से रोक लिया.

आँख मींच कर लीच को मैंने बाँहों में भींच लिया
साँस खींच कर आते दर्द को खून में सींच लिया.

कुछ लीचें मेरी अपनी हैं, मेरी मज्जा से ही बनी हैं
ये लीचें कुछ न्यारी हैं जो मेरे ही खून से सनी हैं.

इन पंक्तियों को पढ़कर सबसे पहला भाव मन में क्या आ सकता है ?
उसे टिप्पणी के रूप में देंगे तो आभार होगा.

12 टिप्‍पणियां:

  1. अपने पाले हुए दर्द.... समझ तो रहा हूं... शायद.

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  2. सच बताऊँ तो हफ्ते भर पहले ही पेरियार के जंगलों में लीचों के झुंड से सामना हुआ था इसलिए कविता का भाव दूसरा होने पर ही मुझे पीठ पर लीच के छोड़े जाने से यही लगा कि ये तो भरी भयावह कल्पना है ..:)

    पर कविता के गंभीर विचार को लें तो अपने खून से सींच कर पलने वालों का हमेशा के लिए जोंक बन कर निर्भर हो जाना दुखद ही है पर वास्तविकता में कभी कभी ये प्यारी जोंक हमारे ही अस्तित्व के लिए खतरा बन जाती हैं. ये पंक्तियाँ खास पसंद आईं
    कुछ लीचें मेरी अपनी हैं, मेरी मज्जा से ही बनी हैं
    ये लीचें कुछ न्यारी हैं जो मेरे ही खून से सनी हैं.

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  3. समझ सकता हूँ आपकी पीडा। अपने लिये भी समय निकालिये और ब्लाग के सहारे उस माहौल से निकलने का प्रयास करिये।


    हम तो कभी आपके परदेस गये नही। बीच-बीच मे आप कुछ लिखती है अपने आस-पास के बारे मे तो जानकारी बढती है। बहुत दिनो से त्रिपदम भी नही दिख रहा।

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  4. जोंक, खून और दर्द का रिश्ता पुराना है, पर जरूरत है कि जिस भी स्थिति में हैं हम, नये अर्थ ढ़ूढ़ कर पॉजिटिविज्म खोजें।
    जोंक हीमोफीलिया के मामलों में सहायक भी है!

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  5. अपनो से मिली पीडा और उसे सहने की अभिव्यक्ति आपकी कविता मे हॆ,नारी खासकर मां ही ऎसी पीडा को इतनी सरलता सहन व समझ सकती हॆ ,बधाई
    विक्रम

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  6. BAAR BAAR PADHII AAPKI PANKTIYAAN di,कुछ लीचें मेरी अपनी हैं, मेरी मज्जा से ही बनी हैं
    ये लीचें कुछ न्यारी हैं जो मेरे ही खून से सनी हैं.
    KITNA VIVASH HAI INSAAN

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  7. क्या कहा जाए!
    मन को इस तरह शब्दों में सच-सच अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल है और आप इसमें सफल हो रही हैं।

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  8. मीनाक्षी जी, कुछ सोच रहा हूँ आप की पंक्तियाँ पढ़कर. आज ही किसी से बातें करते वक्त एक ख़याल आया था... आप की रचना पढ़कर मेरे उस एक छोटे ने ख़याल को भी शक्ल-सी मिल गई :

    क्या कहूँ कितना प्यासा हूँ तुझ बिन
    यूँ तो है जाम भी, सुबू भी है ......
    तू भला मुझ को ज़ख्म क्या देगी
    ज़ख्म है, इस लिये तो तू भी है

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  9. एक् दर्द का अहसास होता है।

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  10. aap ka kament yaad aata haen

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  11. @संजय जी, शायद आप मुझे बहुत कमज़ोर समझ रहे हैं..
    @मनीष जी, अच्छा अनुभव बताया आपने.
    @पंकज जी, क्या मैं अपने देश से दूर रह कर भी अपने लोगों का दर्द महसूस नहीं कर सकती? हाँ अपने अनुभव चित्रो के साथ शीघ्र ही पोस्ट करूँगी. त्रिपदम कल ही पोस्ट करती हूँ.
    @ज्ञान जी, आपने लीच के बारे में सही कहा है. हर पल कीमती है, निराशा में डूब कर एक पल भी नष्ट करना मूर्खता होगी.
    @विक्र्म जी धन्यवाद , एक नारी या उसका कोई रूप इस पीड़ा को समझ सकती है.
    @पारुल, इंसान नहीं नारी विवश हो जाती है जब अपने कोख से जन्मे नर को दानव बनते देखती है.
    @संजीत आपका धन्यवाद.
    @मीत आपकी लिखी आखिरी दो पंक्तियों का अर्थ समझ नहीं पा रही ...
    @ममता जी , इसी दर्द का अहसास ज़रूरी है.
    @कभी सम्मानित...और कभी अपमानित... होती किससे है... यही लीच या जौंके हैं... हमारी अपनी...

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  12. पता नहीं क्यों मुझे हर चीज का मतलब अपने ही हिसाब से नज़र आता है, मुझे तो लगता हे कि ये दर्द आया नहीं है, बल्कि उधार लिया गया हे..इस दर्द में सब कुछ कष्टकारी नहीं है कुछ लत सी हो हो गई हे लिखने वाले को इस पीडा की वर्ना अपना खून दे कर, आह जब्त कर के कोई क्यों किसी दर्द को सहेगा ... पता नहीं पर मुझे तो सब चीज अपने ही हिसाब से समझ में आती है
    " जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी "

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