Friday, May 27, 2016

शब्द शराब तो भाव नशा





शब्द शराब बन
आँखों के ज़रिए
उतरते हैं दिल
और दिमाग़ में
नशा ग़ज़ब चढ़ता
नस नस में उतरता
धीरे धीरे असर होता
शब्दों का, भावों का
इसीलिए तो शब्द सबके
और अपने भी पी जाती हूँ
जो नशा बन छा जाते
करते जादू सा मुझ पर 
 कर देते मुझे मूक-मुग्ध !