Monday, May 5, 2014

अपनापा




रोज़ की तरह पति को विदा किया
दफ़तर के बैग के साथ कचरे का थैला भी दिया
दरवाज़े को ताला लगाया
फिर देखा आसमान को लम्बी साँस लेकर
सूरज की बाँहें गर्मजोशी से फैली हैं
बैठ जाती हूँ वहीं उसके आग़ोश में..  
जलती झुलसती है देह
फिर भी सुकूनदेह है यूँ बाहर बैठना
चारदीवारी की कैद से बाहर 
ऊँची दीवारों के बीच 
नीला आकाश, लाल सूरज, पीली किरणें 
बेरंग हवा बहती बरसाती रेत का नेह 
गुटरगूँ करते कबूतर, बुदबुदाती घुघुती 
चहचहाती गौरया 

यही तो है अपनापा !!

8 comments:

संजय भास्‍कर said...

बेरंग हवा बहती बरसाती रेत का नेह
गुटरगूँ करते कबूतर, बुदबुदाती घुघुती
चहचहाती गौरया

.....बहुत ही सुन्दर बहुत ही सुकून भरी पंक्तियाँ..!!

बहुत सुन्दर भावों को आपने शब्दों में ढाला है

मीनाक्षी said...

@संजय...शुक्रिया.. प्रकृति का साथ सबसे सुकूनदेह होता है ...

Digamber Naswa said...

प्राकृति से जन्मे इंसान को प्राकृति सबसे ज्यादा सुकून देती है ... बस उसका एहसास होना जरूरी है ...

मीनाक्षी said...

@दिगम्बरजी...कुछ देर नेट पर लिखने पढ़ने के अलावा आजकल तो प्रकृति के साथ ही ज़्यादा वक्त बीत रहा है..यकीनन बेहद सुकून है...

Amrita Tanmay said...

इस आनंद के लिए शब्द हैं कहाँ ?

मीनाक्षी said...

@अमृताजी...इस आनंद के लिए सिर्फ एहसास हैं

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



☆★☆★☆



नीला आकाश, लाल सूरज, पीली किरणें,
बेरंग हवा बहती बरसाती रेत का नेह
गुटरगूँ करते कबूतर, बुदबुदाती घुघुती
चहचहाती गौरया

वाऽह…!
निःसंदेह सब-कुछ सुकून देते हैं...
बढ़िया लिखा है !


आदरणीया मीनाक्षी जी
सुंदर कविता है आपकी !
साधुवाद !

लेकिन यह भी सच है कि- संयुक्त परिवारों की औरत के लिए घर की चारदीवारी क़ैद नहीं


मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार


मीनाक्षी said...

शुक्रिया राजेन्द्र जी... दरअसल अपने देश से दूर जिस देश में हम रहते हैं वहाँ के माहौल को ध्यान में रखते हुए अपने मन के भाव प्रकट करते हैं...
जहाँ तक संयुक्त परिवार की बात है जब तक आपसी प्रेम और आदर रहे तब तक साथ रहना स्वर्ग से कम नही..